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Madhu Gupta "अपराजिता"

Tragedy Fantasy Others

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Madhu Gupta "अपराजिता"

Tragedy Fantasy Others

नहीं करना है अब कोई सवाल

नहीं करना है अब कोई सवाल

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नहीं करना अब तुझसे कोई सवाल

और ना ही चाहिए.....

अब किसी बात का जवाब

वो सवाल कुछ टूटे कुछ अन-टूटे

बहुत कुछ संकलित किया था

मैंने अपने अन्दर....

तेरी यादों तेरी बातों की

एक माला सी पिरोई थी, 

सोचा था....

जब मिलूँगी तुझसे, 

तो एक अरसे से जो अनकही बातें, यादें और वक़्त

मन के तहखाने में बन्द पड़ा....

तुझे बताऊँगी, 

कैसे बिताया मैंने...... 

सोचा कभी तू भी तो पूछेगा

कैसे रही मेरे बिना तुम.... 

बैठी उस दर पर

तेरा कदमों की आहत का

करती इंतज़ार.....

और फ़िर तू आया

देख कर तुझे......

सारे सवाल मूक बन कर

रह गये....

तेरे चेहरे के भाव को पढ़,

लिया मैंने....

जो अब भाव विहीन और सपाट,

हो चला था.....

अब कहने को कुछ शेष ना रहा,

तू धीरे- धीरे कदमों से,

वापस मुड़ गया....

मैं ख़ामोश सवालों की,

झड़ी लिये....

देर तक दूर जाते,

मन के अंदर पसरे वीराने पन से लड़ती

तुझे सूनी आँखों से निहारती,

जब तक तू आँखों से,

ओझल ना हुआ....

और फ़िर रह गये सारे सवाल

होंठों के बीच दबे.....

घायल परिंदे की तरह छतपटाते....!! 



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