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Rahul Dwivedi 'Smit'

Tragedy Inspirational


5.0  

Rahul Dwivedi 'Smit'

Tragedy Inspirational


रोया दूर समंदर भी

रोया दूर समंदर भी

3 mins 413 3 mins 413

चीख उठी है स्वयं वेदना, देख क्रूरता के मंजर ।

निष्ठुरता ने मानवता को, मार दिया खूनी ख़ंजर ।


गलियाँ-गलियाँ सुबक रही हैं, वादी-वादी दहशत है ।

सन्नाटों में कहीं चीखता, धरती का दिल आहत है ।


कैसा निर्मम कृत्य हुआ है, मानवता शर्मिंदा है ।

एक फूल को कुचला जिसने, वो हत्यारा जिंदा है ।


इस घटना पर मौसम रोया, रोये दरिया, पोखर भी ।

देर रात तक अम्बर रोया, रोया दूर समंदर भी ।


पत्थर के सीने भी रोये, रोये नर्म सलोने भी ।

घर की छत, दालान, कोठरी, रोये कोने-कोने भी ।


माँ की आंखों के सागर ने, बाँध सब्र के तोड़ दिए ।

और हृदय के तटबंधों ने, लाखों दरिया मोड़ दिए ।


फूट-फूट कर एक पिता का, संयम रोया आँखों से ।

सिसकी भर-भर अहसासों का, मौसम रोया आँखों से ।


जिन हांथो ने नन्हे बचपन, को प्यारी किलकारी दी ।

एक कली को खुलकर खिलने, की पूरी तैयारी दी ।


जिस बेटे की जिद के आगे, सारा घर झुक जाता था ।

और समय का पहिया जिसकी, बोली से रुक जाता था ।


एक जरा सी सिसकी से ही, कई हृदय फट जाते थे ।

जिसकी आंखों के आंसू भी, बहने से कतराते थे ।


जिसकी बातें गीता जैसी, कभी कुरान सरीखी थीं ।

और बोलियाँ पूजा भी थीं, और अजान सरीखी थीं ।


जिसने घर आँगन को प्यारी-प्यारी सी फुलवारी दी ।

आज उसी ने हाय विधाता, ये कैसी लाचारी दी ।


पल भर में खुशियों का दर्पण, जरा चोट से तोड़ दिया ।

और दुखों का दरिया अपनों, के जीवन में मोड़ दिया ।


जिसके दुनिया में आने पर, सबने खूब बधाई दी ।

आज उसी को नम आंखों से, सबने मौन बिदाई दी ।


ऐसा दृश्य देखकर पत्थर, भी खुलकर रोये होंगे ।

और सदी के सारे लमहे, पीड़ा में खोए होंगे ।


जिन आंखों ने जिस भविष्य का, स्वप्न सुखद बोया होगा ।

आज उसी के मृत शरीर को, कंधों पर ढोया होगा ।।


जिसने अब तक जीवन के, थोड़े ही सावन देखे थे ।

जिसने इस दुनिया मे केवल, उजले दामन देखे थे ।


उसे नियति ने कैसे इतनी, जल्दी हमसे छीन लिया ।

और सभी के दिल पर ऐसा, घाव एक संगीन दिया ।


कितना निष्ठुर, निर्मम होगा, वह कातिल हत्यारा भी ।

जिसने साजिश रची और नन्हे बच्चे को मारा भी ।


क्या भोले चेहरे पर उसको, जरा तरस आया होगा ।

क्या भोली भाली आंखों ने उसको भरमाया होगा ।


क्या चाकू की नोंक गले के पास जरा ठहरी होगी ।

या उसके अंदर मानवता ही गूँगी बहरी होगी ।


क्या मासूम चीख भी उसके, दिल तक नहीं गयी होगी ।

जाने कैसी हालत दोनों, की उस वक़्त रही होगी ।


स्वाभाविक है उस कातिल की, सोंच बहुत विकृत होगी ।

और विषैले साँपों जैसी, ही उसकी फितरत होगी ।


तब ही तो नन्हे बच्चे पर, उसको दया नहीं आई ।

नन्हा सा प्रद्युम्न खड़ा था, और खड़ी थी निठुराई ।


निष्ठुरता ने कोमलता पर, ऐसे तेज प्रहार किए ।

नन्हा सा तन कब तक सहता, प्राण सहज ही त्याग दिये ।


समय बदल जायेगा लेकिन, रोज चांदनी रोयेगी ।

नन्ही शबनम की बूंदों से, सबकी आँख भिगोयेगी ।


जब यादों की हरी घास पर, शबनम सी बिखरी होगी ।

वहीं कहीं प्रद्युम्न नाम की, बूँद एक ठहरी होगी ।


निर्ममता की गूँज हमेशा चीखेगी चिल्लायेगी ।

कोमलता को कुचल स्वयं को, वह महान ही गायेगी ।


किन्तु सत्य है काँटे फूलों, के बस रक्षक होते हैं ।

वे पागल होंगे, मासूमों, के जो भक्षक होते हैं ।।


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