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Sahil Hindustaani

Abstract Romance Fantasy

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Sahil Hindustaani

Abstract Romance Fantasy

जी चाहता है

जी चाहता है

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हर अदा पर उसकी मिटने को जी चाहता है

बदहाल था पहले अब जीने को जी चाहता है

उसकी बोली उसके लब बदन में हरारत लाते है

ऐसे लबों को छूने का अब जी चाहता है

आंखों के तीर उसके बदन छलनी कर जाते है

ऐसे ही छलनी होते रहने का अब जी चाहता है

बदन की महक उसकी मदहोश मुझे कर जाती है

इसी महक में डूबा रहूँ ऐसा जी चाहता है

सरापां वो काफ़िर मुझे लगती है इक आग

इस आग में अब जलूँ ऐसा जी चाहता है

बिंदिया, चूड़ी, पायल, झुमके, जैसे गहने उनके पास

इनकी सदा अब सदा सुनने को जी चाहता है

अपनी हर मुस्कान से वो और नशीली लगती है

इस नशे में खो जाऊँ अब ऐसा जी चाहता है 


हर अदा पर उसकी मिटने को जी चाहता है

बदहाल था पहले अब जीने को जी चाहता है



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