STORYMIRROR

कुमार अविनाश केसर

Abstract

3  

कुमार अविनाश केसर

Abstract

आईना

आईना

1 min
184

तुम रोज इसमें इस तरह झाँका ना करो,

ये आईना है टूट कर बिखर जाएगा।


लबों पे दर्द की हिचकियाँ न लाना कभी,

सुन के मंजर ये सारा दहल जाएगा।


तूने उठा रखी जो नज़रों से कायनात की ज़मीर,

कयामत में सरेआम मातम पसर जाएगा।


तू जो इस तरह चला करती है, अदाओं में सिमट के,

माहताब भी किसी दिन कत्लेआम कर जाएगा।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract