Sushma s Chundawat

Abstract


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Sushma s Chundawat

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राखी का मोल

राखी का मोल

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मम्मी-पापा की आँखो का तारा था गोलू । इकलौती संतान होने की वज़ह से काफी लाड़-प्यार मिलता था उसे, मगर इसी वज़ह से गोलू काफी जिद्दी और तुनक मिजाज हो गया था। 

मम्मी-पापा भी अपने लाड़ले बेटे की हर माँग पूरी करना अपना कर्तव्य समझते थे आखिरकार एक ही बच्चा जो था उनका, लेकिन उनकी किस्मत में अभी एक नन्हीं सी जान का आना और लिखा था इसलिए एक छोटी सी, प्यारी सी परी ने घर को अपनी किलकारियों से गुंजित किया।

अब तो मम्मी पापा का ज्यादातर समय गुड़िया का ध्यान रखने की तरफ़ चला गया, और यह वाज़िब भी था मगर गोलू को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। वह गुड़िया को अपनी प्रतिद्वंदी समझते हुए मन ही मन उससे नफ़रत करने लगा।

दोनों भाई-बहन बड़े हो रहे थे मगर गोलू के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया। गुड़िया को परेशान करने में उसे बहुत मज़ा मिलता था, खासकर रक्षाबंधन के दिन। 

छोटी मासूम बच्ची सुबह से तैयार होकर, राखी की थाली सजाए भाई को राखी बांधने के लिए इन्तज़ार करती रहती और गोलू उस दिन बाहर ही रहता और फिर देर रात लौटता । अपने प्रति भाई का यह रवैया देखकर गुड़िया बहुत दुःखी होती थी मगर फिर भी वो गोलू को राखी बांधती, लेकिन गोलू तो तब भी ऐसा व्यवहार करता मानों गुड़िया से राखी बंधवाकर वो उस पर कोई एहसान कर रहा हो !

समय बीतता गया मगर गोलू के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया। मम्मी पापा का समझाना व्यर्थ ही रहता हर बार।दोनों भाई-बहन बड़े हो रहे थे, गोलू इंजीनियरिंग कर रहा था तथा गुड़िया के कॉलेज का प्रथम वर्ष था। गोलू बाइक से आता-जाता और गुड़िया को पापा ने स्कूटी दिलवा दी थी।

गुड़िया धीरे-धीरे स्कूटी चलाकर कॉलेज जाती मगर सावन की पूर्णिमा आने से ठीक तीन दिन पहले घर लौटते समय तेज बारिश की वज़ह से सड़क पर हुई फिसलन से वह स्कूटी समेत गिर गयी और चोटिल हो गयी।

गोलू को इस दुर्घटना का पता चला तो वह पहले तो खुश हुआ मगर राखी के दिन उसे कुछ अजीब सा लगने लगा।हर बार राखी की थाली सजाए इन्तज़ार करती गुड़िया इस दफ़ा घर पर मौजूद नहीं थी, स्कूटी से फिसलकर गिरने की वज़ह से शरीर पर चोट लगने के साथ-साथ उसका एक हाथ भी फ्रैक्चर हो गया था इसलिए वो हॉस्पिटल में एडमिट थी।

इस रक्षाबंधन गोलू के हाथ पर राखी नहीं बंधी, उसकी कलाई सूनी ही रही। गुड़िया के जन्म के बाद पहली बार ऐसा हुआ था, हर बार तो गुड़िया उसके देर रात लौटने पर भी राखी बाँध देती थी मगर इस बार....

पता नहीं क्यों गोलू को आज जीवन में कुछ खालीपन का एहसास हो रहा था,गुड़िया को उसने कभी पसंद नहीं किया मगर आज जब वो घर पर मौजूद नहीं थी तो गोलू को घर, घर नहीं लग रहा था। 

 मेहंदी रचाये, चूड़ियाँ खनकाती, पायल झमकाती, पीछे-पीछे घूमती, राखी बंधवा लेने की चिरौरी करती बहन की छवि बार-बार उसकी आँखों में घूम रही थी।बहन की कीमत शायद आज समझ आ रही थी उसे।

हर बार गुड़िया उसके घर लौटने का इन्तज़ार करती थी मगर इस बार गोलू बहन की घर वापसी की बाट जोह रहा था, राखी का मोल जो समझ आ गया था उसे। 


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