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Vandana Gupta

Abstract Drama


3.6  

Vandana Gupta

Abstract Drama


सिर्फ हमारे लिए

सिर्फ हमारे लिए

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आज भी वही फूलों की खुशबू, नीली रोशनी और उसी छः बाई छः के बेड पर हम दोनों, बीच में पसरी खामोशी.. सब कुछ वैसा ही, पैंतीस साल पहले की तरह... तब अनछुए अहसासों को छूने का प्रयास करती हुई.. मैं इंतज़ार में थी कि तुम मेरा घूँघट उठाओ.. नितान्त अजनबी फिर भी अपनापन महसूसती हुई मैं खुद में ही सिमट रही थी.. और तुम्हारे उद्दात्त प्रेम को महसूस कर रही थी । आज... आज हम एक दूसरे को बहुत अच्छी तरह से जान गए हैं... आज भी तुम मुझसे और मैं तुमसे अटूट प्रेम करते हैं.. आज बच्चों ने हमारी शादी की कोरल एनीवर्सरी मनाई है, सब कुछ उसी पहली रात की तरह, किन्तु कितना बदला बदला सा.......!

"सुनो! जिंदगी खूबसूरत हो, हमारा प्यार तरोताज़ा रहे, इसके लिए सबसे जरूरी है कि हम एक दूसरे पर विश्वास करें.. हमेशा...!" यह हमारे वैवाहिक जीवन की शुरुआत थी। प्यार की पहली शर्त... परस्पर विश्वास.. और फिर कई दफा चाहते हुए भी मैं तुमसे कुछ पूछ नहीं पायी, कि तुम मेरी परवाह को अपने प्रति अविश्वास न समझ लो। मैं इंतज़ार करती थी कि तुम मुझसे देर से आने की वजह पूछो, पर वह तुम्हारे स्वभाव में नहीं था। मैं खुद को बदलने लगी... सिर्फ तुम्हारे लिए...!

आज जब मैं मेरे पुराने दोस्त से बात कर रही थी, मैंने तुम्हारे चेहरे पर वह भाव देखा, जो मैं हमेशा देखना चाहती थी। पहले शायद मैं इसे महसूस कर खुश होती, किन्तु आज अजीब लगा। तुम शायद वह महसूस कर रहे थे, जो बरसों से मैं करती आयी. क्यों...? शायद तुम भी बदल रहे थे। उस दिन जब तुम और तुम्हारे दोस्त किसी बात पर ठहाका लगा रहे थे, मैं अचानक ही चाय लेकर ड्राइंग रूम में आ गयी थी। बातों के कुछ पुच्छल्ले कानों से टकराकर दिल को घायल कर गए, पर तुम्हारे प्यार ने कुछ और सोचने ही नहीं दिया। मैं चाहती थी कि तुम मलहम लगाओ, पर तुम और मैं एक होते हुए भी बिल्कुल अलग थे.. और शायद यह भिन्नता ही हमारे आकर्षण का कारण थी। हम एक दूसरे के पूरक थे और इसीलिए हमारी जोड़ी आदर्श थी।

आज सोचकर हँसी आती है कि मैं कितनी नादान थी, जो चाहती थी कि तुम मुझे सरप्राइज गिफ्ट दो, पर तुम्हें ये बचकाना लगता। "सब कुछ तो तुम्हारा है, जो चाहो जरूरत के हिसाब से खरीद लो.." तुम्हारी यह बात मेरी चाहत को जरुरत में सीमित करती गयी और वक़्त के साथ मेरी जरूरतें कोने में सिमट गयीं। तुम जो चाहते अकेले खुद के लिए खरीद लाते.. मैं चाहती थी तुम्हारी चीजें मैं पसन्द करूँ, किन्तु तुम मुझे घर परिवार में थकने के बाद आराम देना चाहते थे। अब तुम चाहते हो कि मैं तुम्हारे साथ खरीदारी करने चलूँ तो मुझे अटपटा लगता है।

सुखद दाम्पत्य शायद इसी को कहते हैं.. 'हम-तुम' एक साथ होकर भी अपने 'मैं और तू' को जिंदा रख पाए.. क्योंकि हमने अपनी इच्छाएँ एक दूसरे पर थोपी नहीं..! "हमें अपने रिश्ते में स्पेस रखनी होगी.." तुम्हारी इस बात पर भी मैंने स्वीकृति की मोहर लगा दी थी।

अपने अपने कार्यक्षेत्र हमने बखूबी संभाले.. दोनों बच्चे उच्च शिक्षित, बहू और दामाद भी बढ़िया, सब कुछ एकदम सेटल्ड.... फिर भी कुछ छूटा हुआ सा....!

शायद हमारा प्यार हमें बदल रहा था... एक दूसरे के प्रति समर्पित और भावनाओं का सम्मान करते हुए हम खुद से ज्यादा दूसरे के बारे में सोचने लगे.. 'मैं' 'तुम' हो रही थी और 'तुम' 'मैं' में तब्दील हो रहे थे।

"सुनो..." यह सिर्फ एक शब्द नहीं था.. मैंने आवाज़ के साथ तुम्हारा स्पर्श भी महसूस किया... मेरा रोम रोम श्रवणेन्द्रिय बन गया... सोच को विराम दे मैं उठ बैठी.. "जी कहिए.."

तुम मेरा हाथ पकड़कर कमरे से बाहर निकले... "अजी कोई देखेगा तो क्या कहेगा..?" मैं नवेली दुल्हन बन गयी... पहले बड़ों से और आज बच्चों से झिझक रही थी। तुम बिना बोले मुझे छत पर ले आए।

आज हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों तारीख पैंतीस साल पुरानी थी। पूनम का चाँद आसमान में था और वातावरण में ठंडक घुलने लगी थी। वृक्षों के शीर्ष पर छिटकी धवल चाँदनी मोहक दृश्य प्रस्तुत कर रही थी...

"बुझ गई तपते हुए दिन की अगन

साँझ ने चुपचाप ही पी ली जलन

रात झुक आई पहन उजला वसन                            

प्राण तुम क्यों मौन हो कुछ गुनगुनाओ

चाँदनी के फूल तुम मुस्कराओ......."

जगजीत सिंह की ग़ज़ल कानों में रस घोलने लगी.. मैं स्तब्ध रह गयी तुम्हारा ये रूप देखकर... यही तो मैं हमेशा से चाहती रही, किन्तु आज ये सब देखकर मैं खुश क्यूँ नहीं.......?

तुम अचानक गम्भीर हो गए...

"अंजू! एक बात कहूँ.?"

"मैंने कभी रोका या टोका कुछ कहने के लिए..?"

मेरा प्रतिप्रश्न सुन तुम थोड़ी देर चुप रहे.. फिर धीरे धीरे हाथ आगे किया... एक पैकेट था...

"ये तुम्हारे लिए..... खोलो."

मैं निःशब्द तुम्हारा चेहरा पढ़ने की कोशिश करती रही.. तुम्हारा यह रूप एकदम नया था मेरे लिए...!

तुमने पैकेट खोलना शुरू किया... रैपर खुलने के साथ परत दर परत जिंदगी खुल रही थी...

यादों का खूबसूरत कोलाज सामने था...

"ये देखो हमारी शादी की तस्वीर... ये चीकू हुआ था तब की.... ये चिंकी की... ये.... और.... वो.…...." तुम बच्चे की तरह चहक रहे थे।

"अंजू तुमने एक बात नोटिस की?" तुम एकाएक इकसठ साल के बुजुर्ग हो गए...!

"क्या..?"

"उम्र बीतने के साथ मैं महसूस करने लगा हूँ कि पैंतीस साल पहले दो अजनबी एक डोरी के दो सिरे पकड़े खड़े थे..."

"फिर..." मुझे सुनने में रुचि होने लगी।

"हम दोनों अलग परिवेश में पले बढ़े... फिर हमने एक दूसरे की ओर कदम बढ़ाना शुरू किया। हम एक दूसरे की पसन्द नापसंद को जानकर उसके अनुसार खुद को बदलने लगे..."

"जी मैंने तुम्हारे लिए खुद को बदला..."

"हाँ और मैंने तुम्हारे लिए.. और एक दूसरे की ओर बढ़ते हुए हम भूल गए कि हमें मध्य बिंदु पर रुकना भी था। आज हमारी डोरी का सिरा बदल गया है और दूरी वही की वही..."

"वाह! इस तरह तो मैंने सोचा ही नहीं.."

"अब सोचना है और खुद को बदलना है.. मेरे या तुम्हारे लिए नहीं...."

"....सिर्फ हमारे लिए...."

हम दोनों एक साथ बोल पड़े..!

आसमान में पूनम का चाँद मुस्कुरा रहा था..!



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