Vandana Gupta

Romance Tragedy


4.8  

Vandana Gupta

Romance Tragedy


अव्यक्त प्रेम

अव्यक्त प्रेम

5 mins 1.4K 5 mins 1.4K

कम्प्यूटर युग में मेल के बजाय पत्र का लिफाफा मिलने पर आश्चर्य हुआ.. किसका होगा ? उत्सुकता इतनी कि तुरन्त ही पढ़ने बैठ गयी।

".................."

आपको अजीब लग रहा होगा रिक्त सम्बोधन से लिखा पत्र.. पहले सोचा था कि नाम लिखूँ, फिर नहीं लिखा.. क्यों ? पत्र पढ़ते पढ़ते आप समझ जाएंगी.. कोई सीधा रिश्ता भी तो नहीं है आपसे.. फिर क्या सम्बोधन दूँ ? मैं खुद ही पशोपेश में हूँ।

रिश्ता नहीं होते हुए भी हम बहुत गहरे जुड़े हैं। चलिए मेरे कुछ सवालों के जवाब दीजिए.. पहला प्रश्न, प्रेम आपके लिए क्या है ? एक दोस्ती, एक विश्वास, एक अहसास या कि सिर्फ एक स्वार्थ ? नहीं समझ पा रहीं.. चलिए दूसरा प्रश्न, प्यार की मंजिल क्या है ? मिलन या जुदाई ? शादी न हो तब भी क्या आप प्यार की मंजिल पा सकते हैं, सोचना जरूर.. जवाब मिला ? अभी भी नहीं.. चलिए तीसरा प्रश्न, प्यार हो जाता है या किया जाता है ?

पत्र का एक एक वाक्य मुझमें उत्सुकता जगा रहा था। शायद यह भी कॉलेज जमाने का कोई आशिक होगा। मुझे चाहने वालों की कमी नहीं थी। आगे पढ़ना शुरू किया..

आप सोच रही होंगी कि यह अनजान और गुमनाम कोई पुराना आशिक होगा.. आप मुस्कुरा रही हैं, देखिए कितना बेहतर जाना है मैंने आपको..! बस आपकी इसी मुस्कुराहट के अनेक दीवाने थे, पता ही है आपको. कुछ आपको देखकर ही खुश हो जाते थे, कुछ आपसे बात कर पाते थे, कुछ आपको छू भी पाते थे, क्योंकि आप दोस्ती खुलकर करती थीं। कान्वेंट स्कूल में सहशिक्षा में पढ़ने से मित्रता में कोई भेद न था, चाहे लड़का हो या लड़की.. सही कहा न मैंने ? अब आप फिर सोच में गुम हैं... सोचिए.. गहराई से सोचिए... कुछ याद आया..? हाँ.. या नहीं...?

मैं अतीत में चली गयी.. सच ही तो है, मैं बहुत उन्मुक्त थी अपनी कॉलेज लाइफ में और दोस्ती का दायरा भी बहुत बड़ा था। अमीर पिता की बेटी होने से खर्च भी खूब करती थी। लगभग रोज ही आउटिंग, मूवी, पिकनिक और मस्ती, यही तो जिंदगी थी। बॉय फ्रेंड्स भी खूब बदले थे, लेकिन प्रश्न अभी भी अनुत्तरित था कि यह कौन सा आशिक है मेरा ?

अब आपके जेहन में बहुत सारे नाम गड्डमड्ड हो रहे होंगे.. फिर भी आपने मुझे अब तक नहीं पहचाना.. सही है न ? तो चलिए याद कीजिए एक नाम... 'रोहन'...!

ओह ! सारे जाले एकदम साफ हो गए। रोहन.. इस नाम ने सोच की धुंध को परे हटा एक चेहरा याद दिला दिया... एक अजीब सा कुछ खोया खोया रहने वाला कवि टाइप और टॉपर..! इसने तब तो मेरे नज़दीक आने की कोशिश भी नहीं की... मैं भी उसकी तरफ से बेपरवाह ही रहती, किन्तु सब कहते कि उसकी कविताएँ मेरे गिर्द ही घूमती थीं। मैं भी उसकी कविताओं में रुचि लेने लगी। मुझे भी लगा कि वह मेरे लिए लिख रहा था क्योंकि उसकी हर कविता में मेरा नाम जरूर आता था.. शब्द अलग पर अर्थ वही..! वह मेरी तरफ देखता भी नहीं था और मेरी लोकप्रियता ने मुझमें कुछ अहंकार पैदा कर दिया था कि सब मेरे दीवाने हैं, मुझसे दोस्ती को लालायित.. मैं अपनी तरफ से दोस्ती की पहल नहीं करती थी। वह जितनी मेरी उपेक्षा करता मैं उतना ही उसकी ओर आकर्षित हो रही थी, किन्तु मेरा अहंकार मुझे यह स्वीकार नहीं करने दे रहा था। मुझे पता था कि मुझ पर कविताएँ लिखने वाला ज्यादा दिन मेरे आकर्षण से बच नहीं पाएगा और मैं इंतज़ार करती रही कि वह मेरी तरफ देखे। वह पता नहीं किस मिट्टी का बना था.. एक कैंपस में रहने के बावजूद मुझसे बेखबर सा.. और उसकी यह निर्लिप्तता मुझमें क्रोध पैदा कर रही थी।

इसी ऊहापोह में फाइनल परीक्षा हो गयी और फिर सब अपनी नयी जिंदगी में व्यस्त.. पर रोहन जरूर एक प्रश्नचिन्ह की तरह मेरे दिल दिमाग में बहुत समय तक काबिज़ रहा। वक़्त के साथ उसकी याद भी धुँधली हो गयी। अब उम्र की संध्या बेला में मुझे याद करने का क्या प्रयोजन ? अपनी जीत पर खुश होते हुए मैंने आगे पढ़ना शुरू किया..।

आप अभी भी गलत सोच रही हैं.. मैं रोहन नहीं हूँ। अब आप पशोपेश में हैं। चलिए कुछ और संकेत समझिए.. मैंने नापसंद होते हुए भी बहुधा नीला रंग पहना है, क्योंकि वह आपका फेवरेट कलर है, मुझे हमेशा नीला रंग उदास कर देता था.. न न.. आपकी याद में नहीं, क्योंकि आपको तो कुछ दिन पहले ही जाना है और जानने के बाद अभी तक स्तब्ध हूँ..

अब मेरा सिर घूमने लगा कि यह क्या चक्कर है ? मेरे बारे में इतना सब पता है और कुछ दिन पहले ही जाना... साँस रुक सी गयी आगे पढ़ने में...

आप जानती हैं न कि सूरज और चाँद कभी मिलते नहीं, पर चाँद जगमगाता तो सूरज की रोशनी से ही है। चलिए अब अपना परिचय देती हूँ.. मैं चंदा हूँ, रोहन की पत्नी.. रोहन से शादी कर मैं बहुत खुश थी, भरपूर प्यार किया उसने मुझे, कोई गिला शिकवा नहीं.. किन्तु...... उसके जाने के बाद उसकी डायरी से जाना कि उसकी जिंदगी में तो सविता ही थी.. चंदा थी पर सविता के खोल में.. आपकी पसन्द नापसंद सबको जिया है मैंने.. आपके हिस्से का प्यार पाया है मैंने.. बेहद निजी अंतरंग पलों में भी उसके मुँह से सवी सुनकर मैं नाराज होती तो वह बहला देता.. और मैं भी कवि मन की कल्पना की नायिका समझकर भुला देती... पर अब पता चला कि मैंने वो जिंदगी जी, जो मेरी थी ही नहीं और आपने तो कितना कुछ पाये बिना ही खो दिया और रोहन... उसने प्यार आपसे किया पर कभी कह नहीं पाया फिर भी अपने प्यार को पूरी जिंदगी जिया... अब बताइए प्रेम की क्या यही परिभाषा है ? उत्तर मिले तो बताइएगा जरूर...

चंदा.. न न.. रोहन की सविता..!

पत्र पढ़कर मैं स्तब्ध रह गयी.. सही तो कह रही है चंदा... अनजान होते हुए भी अव्यक्त प्रेम ने हम दोनों को एक रिश्ते से बाँध रखा है... कौन सा रिश्ता है ये... सम्बन्धों से परे... दोस्ती से परे... यहाँ तक कि जिंदगी से भी परे... सारी सीमाओं से परे... फिर भी एक दूसरे में समाया हुआ.. एक दूसरे को जीता हुआ....!


Rate this content
Log in

More hindi story from Vandana Gupta

Similar hindi story from Romance