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Vivek Agarwal

Romance Tragedy

4.9  

Vivek Agarwal

Romance Tragedy

गुलमोहर का पेड़

गुलमोहर का पेड़

28 mins
851


"ये दिल तो मैं तुम्हें तीस साल पहले ही दे चुका था बस तुमने इसे अपनाया आज है। अब तो हम सदा सदा के लिए हमसफ़र बन गए हैं। ऐसे हमसफ़र जो हर समय साथ रहेंगे।" ज्ञान की बात सुन, आँखें बंद कर लेटी हुई वायलेट के कमजोर चेहरे पर एक मुस्कान सी उभर आयी जो उसके धीरे धीरे लाल होते चेहरे को और भी आकर्षक बना रही थी। बात तो सही है। अब तो वाकई में ज्ञान और वायलेट हमेशा हमेशा के लिए हमसफ़र बन गए हैं, एक हो गए हैं। कुछ ऐसे जैसे कि एक जिस्म और दो जान।


वायलेट को तीस साल पुरानी वो दोपहर याद आ गयी जब ज्ञान उसे पहली बार मिला था। वो कॉलेज से अपने घर की तरफ अपने ही कुछ ख्यालों में खोयी हुई जा रही थी कि अचानक एक आवाज़ सुनाई दी। "हैलो माय नेम इस ज्ञान एंड आई ऍम ए स्टूडेंट हियर"। वायलेट ने हड़बड़ाकर ज्ञान की तरफ देखा जिसकी आँखें लगातार उसी पर टिकी हुई थीं और उन आँखों में आशा, प्यार, उमंग, आशंका जैसे ना जाने कितने भाव एक साथ दिख रहे थे। ज्ञान ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि "मैं आपको बहुत दिनों से इसी समय यहाँ से जाते हुए देख रहा हूँ और आपको मिलना चाहता हूँ। क्या आप आज शाम को मुझे लाइब्रेरी के बाहर वाले सेंट्रल लॉन में मिल सकती हैं?" वायलेट की समझ में नहीं आया कि वो क्या जवाब दे इस प्रश्न का तो वो बस खामोश खड़ी ज्ञान को देखती रही। वायलेट के लिए ये कोई नयी बात नहीं थी। किसी भी १९ साल की सुन्दर लड़की के लिए ये नयी बात हो भी नहीं सकती थी पर ज्ञान थोड़ा अलग था। उसकी आँखों में कुछ तो विशेष सा आकर्षण था। ज्ञान ने फिर कहा "क्या आप आएँगी?" वायलेट अब भी चुप थी। "ठीक है, मैं आपका इन्तिज़ार करूँगा सात से आठ बजे तक। वहाँ एक गुलमोहर का पेड़ है। उसी के नीचे।" वायलेट अब भी चुप थी। "अच्छा कम से कम अपना नाम तो बता दीजिये" ज्ञान की आँखों में उत्सुकता का भाव भी उभर आया था। "वायलेट" इतना कह वो तेजी से अपने घर की तरफ कदम बढ़ाने लगी। ना जाने क्यों उसके दिल की धड़कन काफी तेज़ हो गयी थी।


शाम के सात बजे थे और वायलेट ये निर्णय नहीं ले पा रही थी कि वो ज्ञान को मिलने जाए या ना जाए। ऐसे भला कौन बुलाता है पहली ही मुलाकात में पर भला ज्ञान के पास और विकल्प ही क्या था। जैसा उसने कहा वो दो महीनों से रोज़ उसी समय उसी स्थान पर उसके आने की प्रतीक्षा करता था और इतने दिनों के बाद वो उसको रोक कर बात करने का साहस कर पाया। वैसे भी 'इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ ऑपरेशन मैनेजमेंट' में आने वाले छात्र बहुत बेबाक किस्म के नहीं होते थे। भारत के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक था ये कॉलेज और यहाँ प्रवेश पाने के लिए कड़ी परीक्षा देनी पड़ती थी। वायलेट के पापा इसी कॉलेज में छात्रों को 'बिज़नेस कम्युनिकेशन' का विषय पढ़ाते थे और वो अक्सर उनसे ये सुना करती थी की यहाँ के छात्र वैसे तो बहुत मेधावी होते हैं परन्तु कम्युनिकेशन के मामले में उन्हें काफी सुधार की आवश्यकता होती है। वायलेट ने फिर घडी की ओर देखा। सवा आठ बज चुके थे और लाइब्रेरी तक पहुँचने में घर से दस मिनट का समय तो लगेगा। वायलेट ने ना जाने का मन बना ही लिया था कि किसी झोंक में आ कर वो घर से बाहर निकली और लाइब्रेरी की तरफ चल पड़ी। उसे स्वयं ये नहीं पता था की ज्ञान अभी तक वहाँ होगा या नहीं और यदि वो वहाँ होगा भी तो क्या वो उसे मिलेगी या नहीं। जब साढ़े आठ के आस पास वायलेट लाइब्रेरी के सामने वाले लॉन में पहुँची तो उसे कोने में गुलमोहर के पेड़ के नीचे खड़ा ज्ञान दिखाई दिया और उसके कदम स्वतः उस तरफ बढ़ चले।


"हैलो वायलेट, थैंक्स फॉर कमिंग। मुझे पता था कि तुम जरूर आओगी।"

"क्यों भला? इतने यकीन के साथ कैसे कह सकते हो और आठ बजे तक तो मैं नहीं ही आयी थी ना, फिर और आधे घंटे क्यों खड़े रहे?" जवाब में ज्ञान सिर्फ मुस्कुरा के रह गया। फिर उसने पूछा कि वो तुम्हारे साथ कौन आयी थी जो लॉन के दूसरे कोने से हमें ही देखे जा रही है। जवाब में वायलेट ने कहा कि वो उसकी सहेली प्रियंका है और वायलेट उसी के साथ शाम की सैर का बहाना करके घर से निकली है। बातें करते करते कब एक घंटा निकल गया पता ही नहीं चला। उस पहली मुलाकात के बाद ज्ञान और वायलेट अक्सर मिलने लगे। उसी गुलमोहर के पेड़ के नीचे सात बजे शाम को। सात से आठ तक वो दोनों संस्थान के एक कोने में स्थित झील के आस पास टहलते हुए दुनिया भर की बातें करते थे। इतिहास, देश के हालात, कॉलेज के प्रोफेसर्स में चलती राजनीति, मुंबई की तेज गति जिंदगी बनाम ज्ञान के छोटे से शहर की जिंदगी पर सबसे ज्यादा उन्हें अच्छा लगता था साहित्य के बारे में बात करना। ज्ञान को हिंदी कविता लिखने का शौक था और वायलेट को अंग्रेजी कहानियाँ लिखने का तो बस प्रसाद, दिनकर, डिकिंस, और रोआल्ड डाल की चर्चा करते कब एक घंटा निकल जाता, पता ही नहीं चलता। वायलेट की बम्बइया हिंदी ज्ञान की शुद्ध तत्सम हिंदी से काफी भिन्न थी और अक्सर ज्ञान को प्रसिद्द हिंदी कविता को सरल शब्दों में या अंग्रेजी में समझाना पड़ता। ऐसी ही एक शाम वायलेट ने कहा कि पापा अक्सर कहा करते हैं की इस कॉलेज के छात्रों की कम्युनिकेशन स्किल्स थोड़ा कमजोर हैं पर ज्ञान से बात करते हुए तो उसे ऐसा नहीं लगा। ज्ञान ने मुस्कुराते हुए कहा की दुर्भाग्य से भारत में कम्युनिकेशन स्किल्स और अंग्रेजी एक दूसरे के पर्याय बन गए हैं और इस संस्थान में अधिकांश छात्र अपनी मातृभाषा में शिक्षा लेने के उपरान्त आते हैं तो उन्हें धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने में या अंग्रेजी के भारी भरकम शब्दों का प्रयोग करने में समस्या होती है। पर यदि तुम उनसे उनकी मातृभाषा में बात करो तो पाओगे की अधिकांश छात्र बड़े तर्कपूर्ण तरीके से अपनी बात प्रस्तुत कर सकते हैं। वायलेट को भी लगा कि बात तो सही है। तभी अचानक ज्ञान ने कहा कि क्या तुम प्रोफेसर फ्रांसिस लोबो कि बेटी हो जो हमें बिज़नेस कम्युनिकेशन पढ़ाते हैं? जवाब में वायलेट ने धीरे से गर्दन हिला कर सहमति भर दी।

“अरे तुमने पहले क्यों नहीं बताया?”

"तुमने पूछा ही नहीं और फिर उस से क्या अंतर पड़ता है।" मुस्कुराते हुए वायलेट ने कहा।

"वो भी ठीक है। और तुम्हारी मदर? वो क्या करती हैं?" ज्ञान ने पूछा।

"वो बहुत अच्छा गाती हैं। हर संडे को चर्च में और कभी कभी स्टेज कार्यक्रमों में या चैरिटी शोज में।"

"अरे वाह। तुम्हें पता है मुझे संगीत का बहुत शौक है पर मैं बिलकुल नहीं गा सकता और इसी लिए अपने लिखे गीतों के लिए नयी नयी आवाज़ें ढूँढता रहता हूँ। हमारे बैच में एक लड़का बहुत अच्छा गाता है और साथ में गिटार भी बजाता है। हर संडे को हम साथ में कोई गाना बनाने की कोशिश करते हैं। कभी मौका मिला तो ऑन्टीजी के साथ भी कोई गाना बनाएंगे। " ज्ञान के चेहरे पर एक रंग निखार आया था।

"देखते हैं। " वायलेट को पता था कि उसकी मम्मी को ये सब बिलकुल अच्छा नहीं लगेगा।


"तुम्हारा ब्लड ग्रुप क्या निकला?" वायलेट ने क्लिनिक के बाहर सीढ़ी पर बैठे ज्ञान से पूछा। आज कॉलेज में रक्तदान शिविर लगा हुआ था और वायलेट रक्तदान कर अभी बाहर निकली ही थी कि उसे ज्ञान दिख गया। ज्ञान ने चुपचाप अपने हाथ में थामी पर्ची उसे पकड़ा दी। "अरे हमारा ब्लड ग्रुप तो एक ही है। चलो अच्छा है, कभी खून की जरुरत पड़ी तो तुम्हीं से ले लूँगी " ज्ञान अभी भी चुपचाप अपनी ही दुनिया में खोया हुआ था। "अच्छा शाम को मिलते हैं तब बताना कि क्या चिंता तुम्हें सता रही है?" ये कह वायलेट अपने घर की ओर चल पड़ी। शाम को भी ज्ञान के चेहरे पर बड़े गंभीर भाव ही दिख रहे थे। वायलेट के पूछने पर ज्ञान ने बताया कि उसे अब चार महीने मैकनरो कंसल्टिंग में इंटर्नशिप करनी होगी और सप्ताह में ६ दिन हर सुबह सात बजे निकलना होगा और वापिस हॉस्टल आते आते रात के दस तो बज ही जायेंगे और ऐसे में वो वायलेट से कैसे मिल पायेगा। "अरे हाँ समस्या तो है। पर मैंने पापा से सुना है कि मैकनरो कंसल्टिंग हर एक छात्र का सपना होती है तो तुम्हें अपना ध्यान अपने काम पर लगाना चाहिए। हम हर संडे को मिल सकते हैं और एक दूसरे को चिट्ठी भी लिख सकते हैं। देखो यहाँ इस पेड़ में ये खोखली सी एक जगह है। हम यहीं पर एक दूसरे के लिए चिट्ठी छोड़ सकते हैं। वैसे एक बात बताओ मिस्टर ज्ञान चतुर्वेदी। तुम्हारा शुद्ध शाकाहारी आस्तिक परिवार किसी दूसरे धर्म की लड़की को स्वीकार कर पायेगा? और मेरी तो कोई कुंडली भी नहीं है तो मिलाओगे क्या?"

"अरे आज ही हमारा ब्लड ग्रुप मिला है तो कुंडली का भी देख ही लेंगे। वेट ! इस दैट ए प्रपोजल वायलेट?" ज्ञान के चेहरे पर उसकी स्वाभाविक मुस्कान के साथ शरारत सी दिखने लगी थी और वायलेट का चेहरा लाल होने लगा था।


ज्ञान अपनी इंटर्नशिप में काफी व्यस्त हो गया था। कई बार तो रविवार को भी वो ऑफिस में बैठा काम कर रहा होता था या मुंबई के बाहर यात्रा कर रहा होता था। उसका प्रोजेक्ट भी बहुत रूचिकर था। किस तरह भारत के छोटे छोटे व्यापारियों और उद्योगों को बैंक के द्वारा ऋण दिलाया जायें क्यूंकि अधिकांश बैंक मात्र बड़े उद्योगपतियों को ही व्यपार के लिए ऋण देने में लगे थे। छोटे व्यापारियों को ऋण देना काफी रिस्की लगता था और इसी कारण छोटे व्यापारियों को अक्सर बहुत ऊँची दरों पर स्थानीय साहूकारों से ऋण लेना पड़ता था जिससे उनको अपने व्यापार को आगे बढ़ाने में बहुत समस्या होती थी। ज्ञान कुछ ऐसे अल्गोरिथ्म्स बना रहा था जिससे ऐसे छोटे व्यापारियों की ऋण चुका सकने की शक्ति का सही आँकलन किया जा सके और इस सूचना के आधार पर बैंक ऋण दे सकें। ज्ञान को पूरा विश्वास था कि ये कार्य भारत कि अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने और बैंकिंग को विस्तृत करने में बहुत बड़ा योगदान दे सकता है।


काम में डूबे ज्ञान के पास अब वायलेट से संवाद का बस एक ही माध्यम बचा था। वही गुलमोहर का पेड़। हर रात वो ऑफिस से लौटकर उसी गुलमोहर के पेड़ से वायलेट की लिखी चिट्ठी निकाल लेता और सुबह सुबह ऑफिस जाने से पहले अपनी चिट्ठी वहीँ पर छोड़ देता था। पर दोनों को मिले हुए काफी समय बीत गया था। ज्ञान के लिखे हुए पत्र लम्बे होते थे और अक्सर कविताओं से भरे होते थे पर वायलेट के पत्र हमेशा छोटे और औपचारिक होते थे। ज्ञान जो सामने नहीं बोल पाता था वो अपनी कविताओं के माध्यम से व्यक्त कर देता था पर वायलेट जो बिंदास खुल कर हर बात कह दिया करती थी, लिखने में काफी झिझकती थी। ज्ञान को लगा की शायद वायलेट भी व्यस्त होगी क्यूंकि उसकी भी आखिरी वर्ष की परीक्षाएं आरम्भ होने वाली थीं। वायलेट कॉपीराइटिंग और मास कम्युनिकेशन की पढाई कर रही थी।


एक रात ज्ञान जब ऑफिस से लौटा तो पाया की गुलमोहर के पेड़ में वायलेट की जगह उसी की चिट्ठी रखी हुई थी। उसे लगा कि शायद वायलेट का स्वास्थ्य ठीक न हो तो उसने अगले दिन सुबह एक और चिट्ठी लिख कर वहीँ रख दी और उत्सुकता से जवाब की प्रतीक्षा करने लगा परन्तु उस रात भी वहाँ उसी के लिखे दो पत्र रखे थे। अब तो ये रोज का सिलसिला बन गया था। गुलमोहर का पेड़ ज्ञान के लिखे पत्रों से भरता जा रहा था। न वायलेट का जवाब आता था और न ही वायलेट। ज्ञान की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे। उसने कई बार सोचा कि प्रोफेसर लोबो के घर जाकर पूछ ले पर उसे लगा कि कहीं इस से वायलेट के लिए कोई समस्या न पैदा हो जाये। प्रियंका भी कहीं दिखाई नहीं दे रही थी।


आखिर वो दिन भी आ गया जब ज्ञान की इंटर्नशिप और उसी के साथ कोर्स दोनों समाप्त हो गए। ज्ञान के प्रोजेक्ट प्रेजेंटेशन में मैकनरो कंसल्टिंग के दो पार्टनर भी आये थे और उन्होंने प्रोफेसर्स को ज्ञान के किये गए काम और उसके दूरगामी प्रभाव के बारे में बताया। ज्ञान को इस प्रोजेक्ट की वजह से मैकनरो कंसल्टिंग ने जॉब ऑफर और मुंबई के एक पॉश इलाके में घर भी दे दिया था। ज्ञान खुश तो था पर वायलेट को लेकर उसके दिमाग में कई आशंकाएं उठ रही थीं। उसने निर्णय लिया कि वो अपने घर जाने कि तारीख दस दिनों से आगे बढ़ा देगा और इन दस दिनों में वायलेट से संपर्क करने कि पूरी कोशिश करेगा। वैसे कॉलेज में भी उत्सव जैसा मौहाल था। सभी छात्र पिछले दो साल की मेहनत के बाद आने वाली जिंदगी को लेकर बहुत उत्साहित थे। भारत की अर्थव्यवस्था खुलने लगी थी और कई बहुराष्ट्रोय कम्पनियां भारत में प्रवेश कर अच्छे टैलेंट के लिए आई आई ओ एम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से छात्रों को चुन रही थीं। ज्ञान के सभी करीबी मित्रों को अच्छी जगह नौकरी मिल चुकी थी और सब छात्र मिल कर एक आखिरी जश्न की तैयारी में लगे हुए थे और कल्चरल सेक्रेटरी होने के नाते ज्ञान से उम्मीद थी की वो एक बढ़िया कार्यक्रम तैयार करे जैसा की वो पिछले दो सालों में हर प्रमुख अवसर पर करता आया था। पर इस बार ज्ञान के दिलो-दिमाग में कुछ और ही चल रहा था और उसने अपने दो सबसे करीबी मित्रों को इस कार्यक्रम को आयोजित करने के लिए मना लिया था।


आखिर ज्ञान के प्रयास सफल हुए और एक दोपहर उसे प्रियंका हॉस्टल के सामने वाली कैंटीन में बैठी दिखाई दी। ज्ञान ने अवसर का लाभ उठाते हुए प्रियंका से वायलेट के बारे में पूछा तो उसे कोई संतोषजनक जवाब नहीं प्राप्त हुआ। ज्ञान ने बताया कि उसे चार दिनों बाद दो सप्ताह के लिए अपने घर जाना है और उसके बाद वो मैकनरो कंसल्टिंग में नया जॉब शुरू कर रहा है। जाने से पहले वो कम से कम एक बार वायलेट से मिलना चाहता था।

"मुझे नहीं लगता वायलेट अब तुम्हें मिलना चाहती है। तुम्हें भी उसे भूल जाना चाहिए ज्ञान "

"मगर क्यों? क्या बदल गया। क्या मुझसे कोई गलती हुई?" प्रियंका के पास कोई जवाब नहीं था।

"अच्छा उसे मेरा एक सन्देश तो दे दो। उसे कहो कि मैं उसी गुलमोहर के पेड़ के नीचे सात से आठ बजे तक उसका वेट करूँगा। इतना तो तुम कर सकती हो ना?" प्रियंका ने हामी में गर्दन हिला दी।


ज्ञान बड़ी बेचैनी से शाम के सात बजने की प्रतीक्षा कर रहा था। उसने अपने साथ वायलेट की फोटो लेने के लिए एक मित्र से माँगा कैमरा भी रख लिया था। ठीक सात बजे वो गुलमोहर के पेड़ के नीचे वायलेट की राह देखने लगा पर आठ बजने पर भी उसका कहीं नामोनिशान नहीं था। धीरे धीरे ज्ञान की सारी आशाएं समाप्त होती जा रही थीं कि अचानक उसे दूर से दो परछाइयाँ दिखाई दीं। थोड़ी देर में उसने वायलेट को पहचान भी लिया पर हर बार की तरह प्रियंका वहीँ लॉन के दूसरे छोर पर रुकी नहीं पर वायलेट के साथ उसी की तरफ चली आ रही थी।


"हैलो वायलेट, थैंक्स फॉर कमिंग। मुझे पता था कि तुम जरूर आओगी।"

"क्यों भला? इतने यकीन के साथ कैसे कह सकते हो और आठ बजे तक तो मैं नहीं ही आयी थी ना, फिर और आधे घंटे क्यों खड़े रहे?" इस बार जवाब में मुस्कुराया नहीं। ऐसा लगा कि एक पूरा चक्कर लगाकर वो दोनों फिर उसी दो साल पुराने मोड़ पर आ पहुँचे थे जब वो इसी गुलमोहर के पेड़ के नीचे पहली बार मिले थे।

"बताओ क्यों मिलना चाहते थे? मेरे पास ज्यादा समय नहीं है। मम्मी की तबियत ठीक नहीं है और मैं ही उनकी दवाओं का ध्यान रख रही हूँ। "

वायलेट के इस औपचारिक लहजे से ज्ञान चकित था और उसकी समझ नहीं आया कि वो क्या बात करे। प्रियंका कि उपस्थिति भी उसे बहुत असहज बना रही थी।

"वो इतने दिनों से ना तुमसे मुलाकात हुई और ना ही तुम्हारा कोई मैसेज मिला तो में सोच रहा था कि सब ठीक है या नहीं। अभी तीन दिनों में मुझे घर जाना है और उसके २ हफ्ते बाद मैं फिर मुंबई लौट के आऊँगा। मैं सोच रहा था कि घर पर सब को तुम्हारे बारे में बता दूँ इस बार। तुम्हारा क्या कहना है?"

"अरे ऐसी कोई बात नहीं है। एक तरफ एक्साम्स की तैयारी और दूसरी तरफ मम्मी की तबियत और उनकी देखभाल, तो बस मैं बहुत बिजी थी। और अभी कहीं कोई बात करने की जरुरत नहीं है। में सिर्फ २० साल की हूँ और तुम २१ के। अभी पाँच साल तक तुम दिमाग में ऐसे कोई विचार लाओ भी मत। मुझे मास्टर्स करना है और तुम्हारे करियर की भी अभी शुरुआत ही है। "

ज्ञान ने राहत की साँस ली। पिछले दिनों में उसने ना जाने क्या क्या सोच लिया था।

"ये कैमरा कब ख़रीदा और इसे क्यों लाये हो"

"अरे नहीं। ये तो एक दोस्त का है। हमारी फेयरवेल पार्टी के फोटो खींचे थे तो एक-दो फोटो रोल में बाकी थे तो मैंने सोचा कि क्यों ना तुम्हारी एक फोटो ले ली जाये। स्मृति के लिए, हालाँकि तुम्हें याद करने या अपने सामने लेने के लिए मुझे इसकी जरुरत नहीं है। "

"तो लो फिर एक फोटो। मेरा और प्रियंका का एक साथ। दो प्रिंट हम दोनों के लिए भी निकलवा लेना और यहीं गुलमोहर के पेड़ में रख देना। अच्छा अब मैं चलती हूँ। मम्मी की दवा का समय भी हो गया है।"

ज्ञान ने हाथों और साँस को स्थिर करते हुए दोनों का एक साथ फोटो खींच लिया। वायलेट और प्रियंका से विदा लेकर हॉस्टल लौटे समय ज्ञान को बिलकुल भी अंदेशा नहीं था कि भविष्य में क्या क्या होने वाला है। ये तो आने वाला समय ही दिखायेगा। फिलहाल ज्ञान की आशंकाओं का उन्मूलन हो गया था और वो आने वाले दिनों के प्लान मन ही मन बनाने लगा था। बस २ दिन बचे थे और उसे घर में सभी के लिए कुछ ना कुछ लेना था। आखिर दो साल बाद वो घर जा रहा था।


"तुमने उसे सब कुछ सच सच क्यों नहीं बताया। " ज्ञान के जाते ही प्रियंका ने वायलेट से पूछा।

"वो सच सहन नहीं कर पायेगा प्रियंका और वो उसे अभी बहुत कुछ करना है। अपने लिए, अपने परिवार के लिए और शायद इस समाज के लिए। सच बताकर में उसके सभी सपनों को एकदम चकनाचूर नहीं कर सकती। "

"पर कुछ दिनों में तो उसे पता चल ही जायेगा। तब?"

"उसे एक साथ कुछ नहीं पता चलेगा। और जब तक सच्चाई कि परतें धीरे धीरे खुलेंगी वो अपने काम, अपने नए दोस्तों में बिजी हो जायेगा। हो सकता है उसे कोई और साथी भी मिल ही जाये। "

"हाँ। हो भी सकता है। तो अब तो तुम ज्ञान को शायद कभी भी नहीं मिलोगी।"

"हाँ। सोचा तो यही है।"

बातें करते करते वायलेट और प्रियंका अपने घरों तक पहुँच गयी थीं।


हॉस्टल के आखिरी दिन ज्ञान ने एक लम्बा सा पत्र लिखा। हमेशा की तरह इस बार भी पत्र में एक कविता के माध्यम से उसने अपनी बात रखने की चेष्टा की थी। फिर एक लिफाफे में पत्र के साथ उस रात खींचे गए फोटो के २ प्रिंट और मैकनरो कंसल्टिंग में अपना फ़ोन नंबर लिखा हुआ एक कार्ड रख वहीँ गुलमोहर के पेड़ में छोड़ दिया। अगले दिन सुबह सुबह उसे दिल्ली के लिए ट्रेन पकड़नी थी जिसमें उसके कुछ और मित्र भी यात्रा कर रहे थे।


घर पर दो हफ्ते पलक झपकते ही गुजर गए। सभी लोग इतने लम्बे अंतराल के बाद उसको मिलकर बहुत खुश थे। इस अवकाश के दौरान उसको मैकनरो कंसल्टिंग से फ़ोन आया कि उसे दो महीने के लिए लंदन जाना पड़ेगा। वहाँ एक बिज़नेस स्कूल में क्वांटिटेटिव रिस्क मैनेजमेंट का कोई नया कोर्स शुरू होने वाला था और कंपनी ज्ञान को उस कोर्स के लिए स्पांसर करना चाहती थी। ये एक बहुत अच्छा अवसर था कंपनी हेडक्वार्टर में सीनियर पार्टनर्स को मिलने का और ये देखने सीखने का कि विकसित देशों में बैंकिंग प्रणाली भारत से कैसे भिन्न है। ज्ञान को दिल्ली से ही सीधे लंदन जाना पड़ा क्यूंकि कोर्स शुरू होने में अधिक दिन नहीं बचे थे। वायलेट से ना मिल पाने का दुःख तो ज्ञान को था पर वो इस अवसर को लेकर बहुत उत्साहित भी था।


कोर्स समाप्त होने के बाद ज्ञान कुछ दिन घर पर बिता वापस मुंबई आ गया और जैसे ही पहला संडे आया वो वायलेट को मिलने कि इच्छा लिए अपने कॉलेज चला गया। उसे काफी हैरानी थी कि इन तीन महीनों में वायलेट ने उसको संपर्क करने कि कोई कोशिश नहीं की थी। अब ये पहले वाला जमाना तो था नहीं, वो अपना टेलीफोन नंबर छोड़ कर गया था और ऑफिस में रिसेप्शनिस्ट और सेक्रेटरी दोनों को बता कर गया था की उसके लिए जो भी व्यक्तिगत फ़ोन कॉल्स आयें तो वो उसके लंदन जाने के बारे में बताकर उसके लिए सन्देश लिख कर ऑफिस की इंटरनल इलेक्ट्रॉनिक मेल में भेज दें। कई मित्रों के सन्देश उसे लंदन में प्राप्त हुए थे बस एक वायलेट की ही कोई खबर नहीं थी। उसने मुंबई में काम कर रहे अपने कुछ करीबी दोस्तों से भी सहायता लेने की कोशिश की थी पर उसे कुछ नया नहीं पता चल पाया था। कॉलेज जा कर उसे पता चला की प्रोफेसर फ्रांसिस लोबो ने समय से पहले सेवानिवृत्ति ले ली थी और अपने परिवार के साथ मुंबई छोड़ कर गोवा में अपने पैतृक निवास चले गए थे। इस से ज्यादा उसे कुछ नहीं पता चल पाया था। न वहाँ का पता और न ही फ़ोन नंबर। एक छोटी सी उम्मीद के साथ वो गुलमोहर के पेड़ जा पहुंचा कि शायद वहाँ कुछ मिले। जब उसने खोखल में हाथ डाला तो उसे एक बड़ा लिफाफा मिला जिसमें उसके लिखे हुए सारे ख़त रखे थे और एक छोटा सा नोट कि ज्ञान को अपने काम पर ध्यान देना चाहिए और वायलेट के बारे में सोचना बंद कर देना चाहिये। ज्ञान की हैरानी का कोई ठिकाना नहीं था। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर क्या हुआ जो प्रोफेसर अचानक मुंबई छोड़ कर चले गए और वायलेट ने यूँ सारे सम्बन्ध तोड़ लिए। प्रियंका भी कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। उसके बाद तो ये नियम सा बन गया था। उसे जब भी रविवार को अवकाश मिलता और वो मुंबई में होता तो कॉलेज जा कर कोशिश करता की वायलेट के बारे में कोई समाचार मिल जाये पर उसे निराशा के सिवा कुछ हाथ ना लगा।


दो साल बाद अचानक एक दिन उसे कॉलेज में मिसेज सरिता मिश्रा मिली। वो कॉलेज में हिंदी विभाग में कार्यरत थीं और हिंदी दिवस पर आयोजित काव्य पाठ प्रतियोगिता में ज्ञान की भेंट उनसे हुई थी। उनके पति भी एक कवि थे और कई काव्य संकलन प्रकाशित करा चुके थे। उनसे बात चीत में पता चला की कुछ महीनों पहले प्रोफेसर फ्रांसिस लोबो की पत्नी का स्वर्गवास कैंसर से हो गया था और उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं चल रहा था और इसीलिए उन्होंने अपनी बेटी की शादी भी कुछ महीनों पहले कर दी थी। ये सुन ज्ञान को एक गहरा सदमा लगा।

 उसकी समझ में नहीं आया कि वो क्या प्रतिक्रिया दे। मिसेज मिश्रा से विदा ले कर वो अपने घर तो आ गया परन्तु उसे लगा कि उसका एक हिस्सा वही कॉलेज में रह गया था। उसी गुलमोहर के पेड़ के खोखल में।


इसके बाद ज्ञान ने अपने को पूरी तरह अपने काम में समर्पित कर दिया था। उसका बस अब एक ही सपना रह गया था कि कैसे भारत में हर छोटे व्यापारी को बैंक-ऋण की सुविधा दिलाई जाये। देश के बड़े बड़े बैंकर्स को अपना अल्गोरिथम और उससे होने वाले लाभों को समझाते समय निकलता चला गया। ये वो समय था जब भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही थी। प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के कार्यकाल में आरम्भ हुए वित्तीय सुधार प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृव्य में बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे थे। अटल जी का ये भी मानना था की देश के नागरिकों को सड़कों और दूरभाष के माध्यम से जोड़ने से भी देश और प्रगति कर सकता है। वैश्विक स्तर पर भी इंटरनेट ने भी कई मूलभूत बदलाव लाने शुरू कर दिए थे। ज्ञान को भी इंटरनेट में बहुत सारी नयी संभावनाएं दिखनी लगी थी। उसे ये भी समझ आ रहा था कि मैकनरो कंसल्टिंग की महंगी सेवा मात्र बहुराष्ट्रीय बैंक या कुछ बड़े प्राइवेट बैंक ही खरीद सकते थे जबकि छोटे व्यापारियों को ऋण देने का काम देश भर में फैले छोटे छोटे बैंक ज्यादा अच्छी तरह कर सकते थे। अंततः ज्ञान इस निर्णय पर पहुँचा कि उसे इंटरनेट की शक्ति का प्रयोग करते हुए कुछ ऐसा करना चाहिए कि छोटे से छोटा बैंक उसके अल्गोरिथम का प्रयोग कर छोटे व्यापारियों का आँकलन कर सके। और ऐसा तब हो सकता था जब बैंक को अल्गोरिथम खरीदना न पड़े बल्कि वो जब भी ऋण आवंटित करें तब उसका प्रयोग एक छोटा सा शुल्क दे कर कर सकें। और व्यापारी एक ही जगह सभी बैंक्स कि ब्याज दर, और ऋण से सम्बंधित नियम और शर्ते भी देख सकें। ये सब सोच कर उसने मैकनरो कंसल्टिंग छोड़ कर एक नयी कंपनी खोली – ‘माई बैंक’। उसे पता था की आने वाले कुछ साल बहुत मुश्किल होंगे। उसे अपने पॉश घर, बड़ी गाड़ी, और कई सुख सुविधाओं को तिलांजलि देनी होगी। बिना किसी ब्रांड और बिना अधिक पैसे के अच्छी टीम बनानी होगी पर ज्ञान ने इस कार्य को जैसे अपनी जिंदगी का लक्ष्य बना लिया था।


समय गुजरता गया। माई बैंक काफी तेजी से बढ़ता जा रहा था पर मुनाफा अभी शुरू नहीं हुआ था। अचानक विश्व की बैंकिंग व्यस्वस्था को एक बड़ा झटका लगा। अमरीका से शुरू हुई सुनामी में हर देश के बड़े से बड़े बैंक बहते चले गए। नए ऋण देना बिलकुल बंद हो गया और माई बैंक को आगे चलाना भी असंभव हो गया था। ज्ञान को कुछ कठिन निर्णय लेने थे। अपनी टीम को कम करने के बाद भी वो कंपनी नहीं चला पा रहा था। अंततः उसने माई बैंक को एक रेटिंग एजेंसी को बेचने का निर्णय लिया। ज्ञान ने एक बार फिर एक अपनी जिंदगी का प्यार और लक्ष्य खो दिया था। लेकिन संतोष जनक बात यह थी कि खरदीने वाली रेटिंग एजेंसी ने ज्ञान और उसकी टीम को पूरी स्वतंत्रता दी हुई थी कि वो इस यूनिट को कैसे आगे बढ़ाएं।


ज्ञान को कॉलेज छोड़े पच्चीस साल और माई बैंक बेचे दस साल हो गए थे। उसके बालों में कहीं कहीं सफेदी भी नज़र आने लगी थी। अब भी यदा कदा उसको वायलेट की याद आ जाती थी और वो सोचने लग जाता कि आखिर हुआ क्या था ? ऐसी क्या बात थी जो वायलेट ने उसे बताना भी उचित नहीं समझा। कॉलेज छोड़ने के बाद से ज्ञान ने कविता लिखना भी बिलकुल बंद कर दिया था। उसने अपनी सभी पुरानी नोटबुक्स और वैलेट को लिखे पत्र वहीँ उस गुलमोहर के पेड़ के नीचे जला दिए थे। जिंदगी में कोई शिकायत तो नहीं थी पर कोई उद्देश्य भी नहीं था। वो कहते हैं न कि जिंदगी बस कट रही थी।


अचानक एक दिन उसे फेसबुक पर वायलेट की फ्रेंड रिक्वेस्ट दिखाई दी। ज्ञान को समझ नहीं आया कि वो क्या जवाब दे। खैर उसने फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली। कुछ दिनों के बाद वायलेट का जन्मदिन था। ज्ञान ने उसे जन्मदिन कि शुभकामना देते हुए एक औपचारिक सा सन्देश डाल दिया और उत्तर में वायलेट का भी छोटा सा धन्यवाद का सन्देश आ गया। ज्ञान नहीं चाहता था कि उसकी वजह से वायलेट की जिंदगी में कोई नयी समस्या आये। वो समय से पहले अपने माता-पिता को खोने के दुःख से गुजर चुकी थी। अगले दो-तीन सालों तक साल में ऐसे ही जन्मदिन, नव वर्ष, दिवाली की शुभकामनाओं जैसे औपचारिक संदेशों का आदान - प्रदान होता रहा।


समय का चक्र चलता रहा और एक नयी समस्या ने पूरे विश्व को घेर लिया। कोविड नाम की महामारी तेजी से फैलती जा रही थी। ज्ञान का शहर बैंगलोर तो अभी तक अछूता था पर मुंबई में नए मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही थी और मेडिकल संसाधनों की उपलब्धता बहुत बड़ी समस्या बनती जा रही थी। ज्ञान भी एक ऐसे अल्गोरिथम पर काम करने लगा जिससे देश के सभी राज्यों में आने वाले दिनों में मरीज़ों की संख्या का सही अनुमान लगाया जा सके जिस से सीमित संसाधनों का पूरा सदुपयोग किया जा सके। लॉकडाउन के चलते सभी स्कूल भी बंद हो गए थे और ज्ञान अपना कुछ समय जान पहचान के बच्चों को इंटरनेट के माध्यम से गणित पढ़ाने में भी लगा रहा था। बचपन से ही उसे स्वयं गणित बहुत प्रिय था और उसे बच्चों को पढ़ाने में बहुत आनंद भी आता था।


वायलेट से होने वाले संवादों के बीच का अंतराल थोड़ा कम होने लगा था। यदा कदा वायलेट ने ज्ञान से अपने बेटे सैम के विषयों के चुनाव और करियर के बारे में सलाह भी मांगी थी पर पुरानी बातों को ना कभी ज्ञान ने पूछा और ना कभी वायलेट ने बताया। पुनः संपर्क स्थापित होने के पाँच साल बाद भी उन्होंने कभी बात तक नहीं की थी और सिर्फ टेक्स्ट मैसेज से ही संपर्क रखे हुए थे। दोनों के बीच जैसे एक बड़ी सी हिमशिला आज भी खड़ी हुई थी। यकायक एक दिन वायलेट ने ज्ञान को बताया कि वो एक फिक्शन बुक लिख रही है और क्या ज्ञान उसकी रिव्यु और एडिटिंग में मदद कर सकेगा। ज्ञान ने उत्तर दिया कि कॉलेज छोड़ने के बाद से वो साहित्यिक गतिविधियों से बिलकुल दूर ही रहा है और पढ़ने के अतिरिक्त वो बहुत ज्यादा मदद नहीं कर पायेगा। वायलेट ने उसे अपनी किताब कि ड्राफ्ट कॉपी पढ़ने और सुझाव के लिए भेज दी थी। हर रात ज्ञान कुछ समय किताब को पढ़ने में लगाने लगा। इस किताब में कई छोटी छोटी काल्पनिक कहानियों के माध्यम से जिंदगी में प्रायः अनुभव की जाने वाली भावनाओं जैसे प्रेम, क्रोध, मोह, लोभ इत्यादि की समीक्षा की गयी थी। पढ़ते पढ़ते ज्ञान कुछ सुझाव भी देने लगा था जो वायलेट ने सहर्ष स्वीकार कर लिए थे। पिछले कुछ दिनों में उनके बात करने के तरीके में थोड़ी अनौपचारिकता आने लगी थी। मानो वो हिमशिला पिघलने लगी हो।

पर होनी को शायद कुछ और मंजूर था। लगभग दो महीने तक वायलेट का कोई सन्देश नहीं आया और ज्ञान भी अपनी तरफ से कोई ऐसा काम नहीं करना चाहता था की वायलेट पर किसी तरह का कोई दबाव पड़े। फिर एक दिन वायलेट का वो छोटा सा सन्देश आया जिसमें उसने लिखा था कि कोविड के कारण उसके पति का निधन हो गया था। वायलेट को भी कोविड हुआ था पर वो कुछ दिनों में ठीक हो गयी थी पर दुर्भाग्य ने उसका पीछा नहीं छोड़ा था। उसका बेटा सैम अमरीका में पढाई पूरी कर नौकरी कर रहा था और वायलेट पूरी तरह अकेली रह गयी थी। ज्ञान ने अपनी संवेदना तो व्यक्त कर दी पर वो मन ही मन वायलेट को लेकर बहुत उदास था। थोड़े अंतराल के बाद वायलेट ने एक और किताब लिखनी आरम्भ कर दी थी और पहले की तरह ज्ञान ने फिर से समीक्षा और संशोधन की जिम्मेदारी उठा ली थी। ये किताब एक तरह से दोनों को अपने अपने संघर्षों से साथ साथ लड़ने की प्रेरणा दे रही थी। एक दिन वायलेट ने ज्ञान से कहा कि उसे फिर से कविता लिखनी शुरू करना चाहिए । ज्ञान ने कहा कि कविता छोड़े बहुत समय हो गया है और अब उस से यह संभव नहीं हो पायेगा पर उस रात जब ज्ञान अपनी स्टडी में बैठा था तो दिल में कुछ तो भाव उठे और एक कविता जैसे स्वतः ही लिख गयी। कविता पढ़ ज्ञान के होठों पर एक मुस्कराहट सी आ गयी। उसके बाद ज्ञान यदा कदा कवितायेँ लिखने लगा।


एक दिन वायलेट ने ज्ञान से कहा कि उसे अपनी कविताओं का संकलन प्रकाशित करना चाहिए पर ज्ञान ने कहा कि आजकल हिंदी कवितायें बहुत कम लोग पढ़ते हैं और किताब तो उस से भी कम लोग खरीदते हैं। नयी पीढ़ी के लोग तो हिंदी पढ़ भी नहीं पाते और हिंदी भाषा को देवनागरी लिपि के स्थान पर रोमन लिपि में लिखते पढ़ते हैं। पर ज्ञान ने नोटिस किया था कि बहुत सारे लोग अपने फ़ोन पर संगीत और अन्य कार्यक्रम काफी सुनते हैं। सुबह कि सैर के समय, ट्रेन या कार में यात्रा करते हुए या ऐसे ही। ऑडियो फॉर्मेट बहुत तेजी से लोकप्रिय होता जा रहा था और इसीलिए ज्ञान ने सोचा कि वो अपनी कविताओं को ऑडियो फॉर्मेट में लोगों तक ले कर जायेगा। इस से वो जो भी लिखेगा वो तुरंत ही श्रोताओं तक पहुँचाया जा सकता है और उसे किसी प्रकाशक की खुशामद भी नहीं करनी पड़ेगी। कुछ दिनों में ज्ञान का हिंदी कविता का चैनल भारत की सबसे बड़ी म्यूजिक ऍप्स पर सबसे लोकप्रिय प्रोग्राम बन गया था। ज्ञान की पहली कविता वही थी जो उसने उस रात लिखी थी - 'हम दोनों'। ज्ञान का कहना था की कुछ रिश्ते अपूर्ण, अपरिभाषित होते हुए भी लोगों की जिंदगी को नया अर्थ, सुंदरता, और सम्पूर्णता दे सकते हैं।


हम दोनों नदिया के तीरे, मध्य हमारे अविरल धारा। 

अलग अलग अपनी दुनिया पर, अनाद्यनंत रहे साथ हमारा।

अलग अलग अपनी राहें हैं, अपनी अपनी जिम्मेदारी।

अपनी खुशियां, अपने दुःख हैं, फिर भी अपनी साझेदारी।

मेरे तट पर जब मावस का, घना अँधेरा छा जाता है।

तेरे तट का पूनम चन्दा, मेरा मन भी बहलाता है।

तेरे तट पर जब आंधी में, पुष्प लताएं सिहराती हैं।

मेरे तट के वट वृक्षों की, शाख उधर ही बढ़ जाती हैं।

ग्रीष्म ऋतू में तप्त हवायें, जब मेरे तट को झुलसाती हैं।

तेरे तट से मंद बयारें, मरहम बन कर आ जाती हैं।

तेरे तट पर जब सर्दी में, हिम की चादर बिछ जाती हैं।

मेरे आलिंगन की गर्मी ले, शुष्क हवायें उड़ जाती हैं।

कभी कोई पर्ण मेरे तट से, तेरे तट तक बह जाता है।

अनकही बातों को मेरी, कान में तेरे कह जाता है।

और कभी हवा का झोंका, तेरे तट से आ जाता है।

तेरी श्वासों की खुशबू से, मेरा तट महका जाता है।

एक तट पर एकाकीपन की, नीरवता जब छा जाती है।

दूजे तट से एक सोन चिरैया, गीत हर्ष के गा जाती है।

नहीं किये कोई वादे हमने, कोई वचन न तोड़े हैं।

जीवन की ये बहती नदिया, हम दोनों को जोड़े है।


ज्ञान और वायलेट अब लगभग रोज ही मैसेज एक्सचेंज करने लगे थे। न सिर्फ वायलेट की कहानियों और ज्ञान की कविताओं के बारे में पर समाज, देश की स्थिति, महामारी का गरीब तबकों पर प्रभाव, बच्चों की पढाई जैसे सभी सामान्य से विषय अब उनके संवादों में स्थान पाने लगे थे। ज्ञान कि कवितायेँ तेजी से लोकप्रिय होती जा रही थीं और अब उसे कई पुरूस्कार भी मिलने लगे थे तथा कवि सम्मेलनों से निमंत्रण भी आने लगे थे। वायलेट भी उसे और आगे बढ़ने को प्रेरित करने लगी थी। ज्ञान में एक और परिवर्तन आने लगा था। वो पुनः बड़े बड़े स्वप्न देखने लगा था और इस बार वो सोच रहा था कि कैसे देश के हर कोने में हर स्तर के बच्चे को गणित कि अच्छी पढाई उपलब्ध हो सके। उसे लगता था कि टेक्नोलॉजी इस बात को संभव कर सकती है। उसी तरह जैसे दशकों पहले उसने फाइनेंसियल इन्क्लूसन का सपना देखा था।


लेकिन ज्ञान की ये ख़ुशी भी ज्यादा दिन नहीं टिकी। एक दिन अचानक उसे वायलेट से मैसेज आया " आई ऍम नॉट कम्फ़र्टेबल विद द वे वे आर कमिंग क्लोज़र अगेन एंड दिस इस दी लास्ट मैसेज फ्रॉम मी। प्लीज डु नॉट कांटेक्ट मी अगेन "। ज्ञान एक पुतले की तरह निशब्द था। उसकी समझ में नहीं आया की वो क्या करे। कांपते हाथों से उसने एक सन्देश भेजा "क्या तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं है?"

"तुम पर तो है ज्ञान पर मुझे अपने ऊपर विश्वास नहीं है" मन ही मन ऐसा सोचते हुए वायलेट ने ज्ञान को मैसेज भेजा "मैंने तुम्हें कांटेक्ट करने के लिया मना किया था। इसलिए अब में तुमसे सारे संपर्क तोड़ रही हूँ। " इसके बाद वायलेट ने ज्ञान को सभी प्लेटफार्म पर सदा के लिए ब्लॉक कर दिया।


अगले कुछ महीने ज्ञान के अंदर का सारा दर्द कवितायेँ बन कर निकलता रहा। उसके श्रोताओं की संख्या बढ़ती रही। फिर एक दिन उसे अचानक प्रियंका से पूरी सच्चाई ज्ञात हुई। कैसे वायलेट ने अपने माता पिता की ख़ुशी के लिए तीस साल पहले उनके द्वारा चुने व्यक्ति से शादी कर ली थी और क्यों वायलेट अब फिर ज्ञान से सारे रिश्ते तोड़ बैठी थी। ज्ञान की नजरों में वायलेट के लिए आदर और स्नेह और बढ़ गया था। उसे समझ नहीं आया की वो प्रियंका से क्या कहे। उस समय उसके मुख से बस यही शब्द निकले - "वो काश कुछ कह कर जाती " पर कुछ दिनों बाद उसने प्रियंका को एक मैसेज भेजा जिसमें कुछ आखिरी निर्देश थे।


वर्तमान समय


"लुक मॉम'स फेस इस ग्लोइंग अगेन एंड शी इस स्माइलिंग आल्सो। इट सीम्स हर हार्ट ट्रांसप्लांट ऑपरेशन हैस बीन सक्सेसफुल।" सैम की आवाज़ में खुशी और खनक दोनों साफ़ सुनाई दे रही थीं। जैसे जैसे एनेस्थीसिया का प्रभाव समाप्त हो रहा था, वायलेट की बंद आँखें भी धीरे धीरे खुल रही थीं। वायलेट ने अपने दायें और बायें ओर देखा जैसे किसी को ढूँढ रही हो और फिर अपना हाथ अपने वक्ष पर रख मन ही मन बोली - "तुमने सच ही कहा ज्ञान। अब तो हम हमेशा के लिए हमसफ़र बन ही गए। " वायलेट के अंदर धड़कते ज्ञान के दिल ने भी वायलेट के हाथ को थपथपा कर जैसे मूक स्वीकृति दे दी थी।

वायलेट के कमरे की खिड़की से एक गुलमोहर का पेड़ दिखाई दे रहा था।


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