Agrawal Shruti

Drama Romance Inspirational


4.2  

Agrawal Shruti

Drama Romance Inspirational


आज समझी हूँ प्यार को शायद

आज समझी हूँ प्यार को शायद

14 mins 17.3K 14 mins 17.3K

इतनी भयंकर गर्मी के बाद बारिश की छोटी छोटी बूँदें बेचैन मन को आश्वस्ति सी दे रही थीं।

यद्यपि सुनंदा जानती है कि इसके बाद चिपचिपे पसीने का एक नया दौर शुरू होगा पर उससे क्या ? जब बादलों और सोंधी हवा से भरे ये पल मन को सुकून दे रहे हैं तो उसका आनंद क्यों नहीं उठा लिया जाय ? तो क्या यही, सिर्फ आज में जीने की आदत ने सुनंदा को कुछ यूँ छला है कि समय रेत की तरह ऊँगलियों के बीच से निकल गया ? वो लाड़ दुलार भरा बचपन, स्कूल - काॅलेज के अलमस्त दिन और बहुत कुछ बनने के वे ढ़ेर सारे सपने .... इन्जीनियरिंग करके नासा में नौकरी भी करनी थी, भरतनाट्यम का पूर्ण प्रशिक्षण भी लेना था।

छुट्टी में ड्रेस डिजाइन भी सीखनी थी और जाने कितने रोमांचक स्पोर्ट्स भी सीखने थे। मानों सामने एक असीमित आकाश हो और उसको मुठ्ठी में बंद कर लेने की क्षमता भी, पर ऐसा क्यों हुआ धूमकेतु की तरह उतर, अश्विन सर ने अचानक उसकी दुनिया ही बदल दी। बहुत कम दिनों के लिए काॅलेज में आए थे वह.... शायद मैथ्स के सर ने किसी मजबूरी में लम्बी छुट्टी ली थी और काॅलेज ने अश्विन सर को अस्थायी तौर पर बुला लिया था। सुनंदा ने उनको देखा तो देखती ही रह गई थी.... बिल्कुल फिल्मी हीरो जैसा उँचा कद, चौड़ा सीना और स्टाईलिश रहन सहन... पता ही नहीं चला कब उसका मन उनके घुँघराले बालों के पेंचों में उलझ गया। उसकी आँखों में अपने प्रति उभरे आकर्षण को पढ़ने में अश्विन सर ने कोई गलती नहीं की थी। बीच बीच में वह उसकी तरफ देख कर मुस्कुरा देते तो वह धन्य हो जाती। इस लगाव ने उस के समूचे व्यक्तित्व को ही बदल कर रख दिया था कि खिलंदड़ी सुनंदा चुप सी हो गई।

इंजीनियरिंग और भरतनाक्ट्यम की जगह अपनी खूबसूरती को सँभालने, नए नए फैशनबल कपड़़े की जानकारी, और लक दक जीवनशैली ने ले ली। अश्विन का काॅलेज आना तो जल्दी ही बंद हो गया था पर उन लोगों का मिलना - जुलना चलता रहा। भैया को अश्विन बिल्कुल पसंद नहीं आए थे। सुनंदा की जिद पर पापा उनके यहाँ रिश्ता लेकर गये, पर वो तो कोई बात आगे बढ़ाने के बजाय नाखुश ही होकर लौट आए.... उन्हें न उस घर का रहन सहन पसंद आया था न स्तर ही और उस पर से उनके पिता ने अपने बेरोजगार बेटे के लिये लंबा चौड़ा दहेज माँग कर ताबूत में आखिरी कील ही जड़ दी थी। यूँ लाड़ली बेटी को कुछ भी देने में पापा को कोई परेशानी नहीं थी पर अगर कोई सिर्फ दहेज की ही बात कर रहा हो तो वह तो सही आदमी नहीं हो सकता न ? पापा ने उसे पास बिठाकर बड़े प्यार से समझाया था। बेमन से ही सही सुनंदा ने उनकी बात मान भी ली और अश्विन की रट लगानी भी छोड़ दी पर उसकी समझ में एक बात बिल्कुल नहीं आई कि इस घटना के बाद उसके घर के लोगों को उसकी शादी करने की ऐसी क्या जल्दी पड़ गई कि रतन जैसे लड़के को उसके लिये पसंद कर लाए।

चेहरे में ऐसा कुछ नहीं कि दोबारा उस पर नजर डालने का भी मन करे और न बातचीत का ही कोई स्टाइल और उधर मम्मी, पापा, भैया सब उस पर लट्टू ही हुए जा रहे थे। अगर बड़े सरकारी अफसर थे तो जरा रोबदार ही दिखते ? ये भी कोई बात हुई कि पुरानी सी गाड़ी, अपने के चलाकर चले आए ? उनकी माँ, पिताजी, छोटी बहन, किसी की कोई पर्सनालिटी ही नहीं ! सुनंदा को पता था कि रतन जैसे मामूली इन्सान को सुनंदा जैसी लड़की तीन जनम लेने पर भी नहीं मिलेगी सो उन लोगों को तो उसे पसंद करना ही था पर वह क्या करे अगर घर में हर समय रतन की सादगी और अच्छे स्वभाव के चर्चे चलते रहते और ऐसे में उसका आगे पढ़ने का तर्क तक किसी ने नहीं सुना।

फिर बाद में जब रोज रात में चुपके-चुपके रतन के फोन आने लगे जिनमें कभी उसकी खूबसूरती की तारीफ होती तो कभी हनीमून के लिये ऊटी की सुन्दरता का जिक्र होता तो उसे भी उनका व्यक्तित्व ठीकठाक सा ही लगने लगा और उसने स्वयं को वक्त की लहरों के हवाले छोड़ दिया।

ब्याह कर ससुराल आई तो घर के सारे लोग सचमुच सीधे और अच्छे लगे। सास ने अपनी नन्ही सी दिखने वाली उन्नीस वर्षीय बहू पर ज्यादा जिम्मेदारियाँ छोड़ना उचित नहीं समझा और रतन दिन भर घर के बाहर ही रहते थे, अतः सुनंदा के पास अपने लिये ढेर सारा समय होता था। शादी को लगभग साल भर बीत चुका होगा जब बाजार में यूँ हीं अश्विन सर से भेंट हो गई थी । हाल-चाल पूछते, उन्होंने उसका मोबाइल नंबर ले लिया और रोज फोन करने लगे थे। अब जाकर सुनंदा को पता चला था कि गलती तो खुद उसके पापा की ही थी... जिन्होंने भैया की बातों में आकर दो प्रेम करने वालों को अलग कर दिया। अब क्या करे सुनंदा ? अब तो वह चक्रव्यूह में फँस चुकी है। अश्विन जैसा सुदर्शन पुरुष उसके लिये बाँहें फैलाए बैठा रहा और वह रतन के साथ बाँध दी गई।

रतन और उससे संबंधित हर चीज में अब कमी ही कमी नजर आने लगी थी। उधर अश्विन के व्यक्तित्व का आकर्षण, उसकी बातें, सिर चढ़ कर बोलने लगी। फिर लगा कि भला कब तक दो नावों में पैर रखकर चलती रहेगी तो कोई कठोर निर्णय तो उसे लेना ही पड़ेगा। फिर उहापोह के उस दौर में लिये गए अपने फैैसले के तहत, वह उपेक्षित रतन को बिना कुछ कहे, एक दिन अश्विन के साथ उनके घर चली आई थी।

आज सोचती है तो लगता है कि जिंदगी का वह गलत कदम उसकी नासमझी हो सकती है, पर कुटिलता नहीं क्योंकि अश्विन सर के बार बार इशारा करने पर भी, उसने न रूपये और गहने लिये थे, न कोई कीमती सामान ! पर्स में डेढ दो हजार रूपयों के साथ वह तो कुछ ऐसे चली आई थी मानों सिनेमा हाॅल जाने को निकली हो। अश्विन बहुत नाराज थे ...."तुम्हें पता है न, कि अभी मेरे पास कोई काम नहीं है ! कैसे सँभालूँगा तुम्हें ? तुम्हारे अपने खर्चों भर पैसे तो तुमको ले आने ही चाहिये थे न ?" पर सुनंदा के कोई खर्चे हैं ही कहाँ ? बिल्कुल साधारण तरीके से रह सकती है वह !

अब वह भी कोई नौकरी कर लेगी और अपनी पहली तनख्वाह से अश्विन को मोटर साईकिल गिफ्ट करेगी। उनकी हर सुविधा का ध्यान रखेगी वह और दुनिया के सामने प्यार की मिसाल होगी उसकी कहानी ! पर शुरुआत ही कड़वाहट से हो गई थी। अश्विन शायद उसकी तरह नहीं सोंच रहे थे। उन्होंने तो मानों धड़ाम से उसे हकीकत की धरातल पर ला पटका.... कि फोन पर इतना लाड़ प्यार दिखाते, उसके बिना जिंदा न रह पाने का दावा करने वाले अश्विन तो अब उससे सीधे मुँह बात भी करने के मूड में नहीं थे। किसी राजकुमारी की तरह पली बढ़ी सुनंदा को अब समझ आया कि वह क्या गलती कर बैठी है।

डाँट डपट जल्दी ही मार पीट में बदल गई, और कुछ ही क्षणों में उसने भोग लिया था कि रतन के प्यार दुलार भरे स्पर्श और अश्विन के बलात्कार में क्या फर्क है। अपने पराये का फर्क देख भौंचक्की थी वह ! अश्विन चाहते थे कि वह पापा को फोन करके आर्थिक मदद माँगे पर अब कोई भी दूसरा कदम उठाने से पहले वह जरा थम कर अपनी स्थिति पर सोचना चाहती थी.... पापा और भैया से उसे कितना डर भी तो लगता था ! ऐसा थोड़े ही न था कि वह फोन करेगी और पापा पैसे लेकर आ जाएँगे ? पता नहीं वह अब उससे बात भी करेंगे या नहीं ? क्या वो कभी यहाँ से वापस जा सकेगी ? उस दिन अचानक पापा को आया देख, कितनी खुशी हुई थी उसे ! जैसे कि कोई बुरा सपना देखते देखते नींद खुल जाय ! अब बस वो यहाँ से जाना चाहती है, उनकी हर बात मानना चाहती है..... पर अश्विन ने उसे कमरे में बंद कर अपने नए बिजनेस के लिये दस लाख रूपये माँगने के लिये धमकाना शुरू कर दिया था !

कुछ नहीं हुआ था फिर ! पापा की नजरों में छिपी वह नफरत, वो परायापन, उनके कठोर हाथों का वह थप्पड़ जिसके निशान गालों पर तीन दिन तक बने रहे थे और टूटे विश्वास की वे किरचें कि पापा उससे सारे संबंध तोड़ कर लौट गए थे और साथ ले गए उसका सारा बचपना ! समझ गई थी वह कि सबकुछ समाप्त हो चुका है ! वह पूरी दुनिया में अकेली हो चुकी है। वस्तु स्थिति को स्वीकार कर लिया। अश्विन की वासनापूर्ति और उनकी माँ की नौकरानी, जो जैसे नचाता, नाचने लगी। आत्म विश्वास ऐसा टूटा कि दिमाग में ही नहीं आया कि अगर रतन को छोड़ सकती थी तो अश्विन को क्यों नहीं छोड़ पा रही है ? या शायद वह एक भयंकर शाॅक की अवस्था थी, अपराध बोध इतना कि अगर वे लोग उसे कुछ लाख रुपयों के लिये कहीं बेच भी आते तो वह इसी को अपने कर्मों का फल मान बैठती !

छः महीने बीतते बीतते जब वह सूख कर काँटा हो चुकी थी.... रंग साँवला और आँखें कोटरों में धँस चुकी थीं तब एकदिन पता चला कि इस दुनिया में चमत्कार भी होते हैं। उसे तो आजतक नहीं पता कि रतन को इस बात की खबर कैसे मिली कि वह अश्विन के साथ खुश नहीं है। उस दिन अचानक उन्हें सामने पाकर सोचा था कि शायद तलाक के कागजों पर साइन लेने होंगें पर वे तो पुलिस को साथ लेकर अपनी पत्नी को छुड़ाने और अपहरण, बलात्कार और यंत्रणा देने के जुर्म में उन लोगों को गिरफ्तार कराने आए थे। किसी देवदूत की तरह वह उसे बुरे सपने से बाहर ले आए थे और एक बार फिर सुनंदा ने स्वयं को समय की लहरों के समक्ष शिथिल छोड़ दिया था।

रतन के घर पँहुच कर दो दिन वह अवश निढाल भूखी प्यासी एक कोने में पड़ी रही। फिर धीरे धीरे अपनी स्थिति समझ में आने लगी कि रतन के माता पिता और बहन, कोई भी उसे अपने घर में वापस लेने को बिल्कुल भी तैयार नहीं थे, तलाक ले लेने के लिये उन्हें लगातार समझा रहे थे पर न जाने क्यों रतन बिल्कुल ही चुप रहने लगे थे। उनका गंभीर चेहरा देख कर किसी को कुछ अंदाज ही नहीं होता था कि वह सोच क्या रहे हैं ! पर अगर वह कुछ बोल ही नहीं रहे थे तो घर के बाकी लोगों ने सुनंदा की पूर्ण उपेक्षा का निर्णय ले लिया। वह भी समझ गई थी कि उसका हाल पूछने उसके मम्मी पापा ही नहीं आए तो यहाँ किसी को क्या पड़ी थी ?

अगले दिन रतन ऑफिस से लौटकर कमरे में आए और हाथ का बैग एक तरफ रख कर निढाल से कुर्सी पर बैठ गए। रूठी सी नन्द भाई के लिये एक प्याला चाय रखकर चली गई थी। .... साँवला, टूटा और निर्जीव सा चेहरा .... कितने बूढ़े दिखने लगे हैं रतन ! सुनंदा के मन में उनके लिये ढेर सा प्यार उमड़ा .... वही तो जिम्मेदार है इसकी ! कितनी बड़ी गलती हो गई है उससे ! कुछ देर वैसे ही उनको निहारने के बाद, वह धीरे से उठी और उनके पैरों के पास आकर बैठ गई .... "मेरी गलती माफ करने के लायक नहीं है न रतन ?" रतन ने धीरे से आँखें खोली थीं.... उफ, कितना दर्द था उन आँखों में !

"मैं कभी भी तुमको पसंद नहीं था न सुनंदा ?"

उन्होंने पूछा तो तड़प उठी थी वह....

"मैंने आपका मोल नहीं समझा रतन जी ! जिसके सर पर असली रत्नों का ताज सजा था वह नकली पत्थर तलाशने चल पड़ी थी। मुझे माफ कर दीजिये।"

पर रतन शायद यह सब कुछ नहीं सुनना चाहते थे, उठकर कमरे से बाहर निकल गये। बाद में यही उन्होंने अपना स्वभाव बना लिया कि सुनंदा या घर का कोई भी सदस्य उनसे कुछ बात करने की कोशिश करता तो वो उठकर चले जाते। सुबह सबेरे ही ऑफिस निकल जाते और लौटने पर घंटों लाॅन में टहलते रहते। कोई कुछ कहने समझाने की कोशिश करता तो वो आधी एक रोटी जो मुश्किल से उनके गले से उतरती थी, उसे भी छोड़ कर हट जाते। उनकी हालत पर सुनंदा जार जार रोती पर वो तो नजर उठाकर देखते तक नहीं। जिंदगी यूँ ही तो नहीं कटेगी... सुनंदा ने सबका दिल जीतने के लिये घर के सारे काम काज अपने ऊपर लेने की कोशिश की, सभी लोगों से अलग अलग माफी भी माँगी.... पर वह क्या करे अगर कोई उससे बात ही नहीं करना चाहता था ? कुछ कड़वा, कुछ तीखा मुँह से न निकल जाय यह संभ्रांतता बनाए रखने के लिये, कुछ न बोलना ही सबको आसान लगता था शायद !

उधर सुनंदा के मन में गहरा डर भी बैठा हुआ था कि पता नहीं कब, रतन का मन पिघलेगा और वह घर वालों की बात मान कर किसी अच्छी सी लड़की से शादी कर लेंगें .... फिर वह क्या करेगी ? एक अजीब सा सन्नाटा सुनंदा के इर्द गिर्द बिखरा पड़ा था.... क्या करे वह ? कहाँ चली जाय ? वह तो रतन से बस इतना कहना चाहती थी कि भले मारें पीटें, प्रताड़ित करें, उफ भी नहीं करेगी वह, पर कुछ तो बोलें ! तो फिर उन्हीं की खुशी .... अगर वे उसे सामने पा कर असहज हो जाते हैं, तो उनके सामने पड़ने से बचेगी वह ! यही उसकी सजा भी होगी, प्रायश्चित भी !

सुनंदा अपना सामान समेट कर घर के बाहर वाले छोटे कमरे में आ गई थी। अगर हर समय गिड़गिड़ाने से माफी नहीं मिलेगी तो इसे समय पर छोड़ना होगा। सोचना ही पड़ेगा कि भविष्य में वह स्वयं को कहाँ पर देखना चाहती है ! अगर दीनता की प्रतिमूर्ति नहीं बनना है तो अपने अंदर वो शक्ति संचित करनी होगी कि लोग उसकी इज्जत करने को मजबूर हो जाएँ। जीवन को एक नई दिशा देना है तो अपने पैरों पर खड़े होना पहली जरूरत थी। घर के पास स्थित एक छोटे से स्कूल में कुछ घंटों की नौकरी का इन्तजाम कर सुनंदा ने काॅलेज में एडमिशन भी ले लिया। पढाई, जो कभी बीच में ही छूट गई थी, पहले उसे ही पूरा करना होगा। शायद तभी आगे सोचना संभव होगा। जीवन एकाएक बहुत व्यस्त हो गया। यथासंभव वह रतन के सामने पड़ने से बचती पर कभी कभी छुपकर दुख की उस मूर्ति के दर्शन जरूर करती रहती जिसकी दुर्दशा का कारण वह स्वयं थी।

उनकी उदास मूर्ति उसे और मेहनत करने को उकसाती। कड़ी मेहनत के उन कई वर्षों के बाद, एक दिन ईश्वर उसपर प्रसन्न हो गये। प्रोबेशनरी ऑफिसर की परीक्षा पास कर ली थी उसने और अब जल्दी ही किसी बैंक में नौकरी भी मिल जाने वाली थी। कमरे के कोने में रखी उसी कुर्सी पर बैठे थे रतन, जब अपना रिजल्ट उनके हाथों में रखकर वहीं जमीन पर बैठ गई थी वह, मानों उनकी बगल में बैठने की हैसियत ही नहीं थी उसकी ! खामोशी से कागजों को उलटते पलटते गंभीर आवाज में बोले थे वह

"मैं तुम्हारे भविष्य के लिये परेशान था, पर अच्छा है कि तुम अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हो। अब मैं बिना किसी परेशानी के, तुमको अपनी पसंद का जीवनसाथी चुन लेने की सलाह दे सकता हूँ।"

चौंक उठी थी वह ! तो क्या पहले उसको विदा करके तब अपने लिये सोचने वाले हैं वह ! पर जो भी हो, वह किसी बात की शिकायत करने की स्थिति में तो है नहीं.. "मेरी पसंद की बात अब छोड़िये रतन जी, उसे तो अपनी नादानी से खो दिया है मैंने। पर मेरी वजह से आप कब तक ये शापित जीवन जियेंगें ? सबकी बात मान क्यों नहीं लेते आप ?"

धीमी आवाज में सुनंदा ने पूछा तो खोए खोए से रतन कहने लगे.... "एक दिन मैं इतना स्वार्थी हो गया कि तुमसे तुम्हारी पसंद पूछे बिना ही ब्याह लाया था तुम्हें .... पर अब तुम जिसको भी चाहो, मैं तुम्हारी मदद करूँगा। तुम्हारा ये उतरा चेहरा मुझसे नहीं देखा जाता। तुम्हें खुश रखने को मैं कुछ भी कर सकता हूँ।"

रतन की आँखें गीली थीं। एकाएक सुनंदा समझ गई कि अस्वीकार के जिस डर से वह गुजर रही थी, वही डर उधर भी था। अगर वह सोचती थी कि किसी दिन रतन उससे मुक्ति पाने का निर्णय ले लेंगें तो उधर भी यही डर था। शायद दोनों ही तो एक दूसरे की पहल का इन्तज़ार कर रहे थे ?

किसी के साथ भागी हुई पत्नी को बिना एक शब्द बोले लाकर घर में तो रखा ही संयुक्त परिवार में रहकर भी ऐसा माहौल नहीं बनने दिया कि कोई उसे कुछ भी कह सके। एक ही घर में अलग अलग रहते हुए पिछले इतने समय से उसके निर्णय का इन्तज़ार कर रहे हैं वह और आज भी चयन का अधिकार उसे ही दे रहे हैं। पल भर में ही वह उदासी के उस गहन गह्वर से बाहर निकल आई थी। अब तो महसूस हो रहा था कि दुनिया की सबसे सौभाग्यशाली स्त्री है वह, और ईश्वर ने जो उसे दिया है वह तो किसी और के पास नहीं होगा ! बरसों से जमी धूल साफ हुई तो चमकदार धूप अंतरतम् के कोने कोने तक जा कर पसर गई।

अब सुनंदा की आवाज में चपलता थी ...."जीवनसाथी तो मेरे पास है, बस उसके दायित्व से उसका प्यार बनने तक का सफर तय करना बाकी है !" उसकी बात समझने में रतन को कुछ समय लगा था। फिर वह उठे और पैर मोड़ कर उसके पास वहीं जमीन पर बैठ गये। सुनंदा के हाथों को पकड़ कर कहने लगे "मुझे तो सिर्फ तुम चाहिये थीं सुनी .... न समाज की परवाह है न किसी और का ख्याल, बस तुम कह दो कि मैं तुम्हें पसंद हूँ। इस बार मुझे मत नकारना, मैं बर्दाश्त नहीं कर पाउँगा। तुम्हारी पसंद पर पूरा उतरने के लिये मैं कुछ भी कर सकता हूँ सुनंदा !" जानती है वह.... पता है उसको.... मूर्ख तो वह थी जो ऐसा अथाह प्यार अपने आँचल में समेट कर भी खुद को असहाय समझती रही थी। पर अब अपने इस प्राप्य को सँभाल कर रखना उसे आता है। आत्म विश्वास से ओतप्रोत सुनंदा उठी, हाथ पकड़ कर रतन को उठाया और सास ससुर के कमरे में जाकर उनके पैरों पर झुक गई ... "हमें नये जीवन का आशीर्वाद दीजिये पापा !"


Rate this content
Log in

More hindi story from Agrawal Shruti

Similar hindi story from Drama