स्वयंसिद्धा

स्वयंसिद्धा

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मोबाइल की घंटी सुनकर स्नेहा ने मोबाइल उठाया…


‘ क्या आप डा0 निशीथ रंजन के घर से बोल रही हैं ?’


‘ हाँ...आप कौन ?’


‘ क्या आप उनकी वाइफ है...?’ उसने उसके प्रश्न का उत्तर दिये बिना पूछा ।


‘ हाँ...पर आप इतने प्रश्न क्यों पूछ रहे हैं...? आप कौन है ? निशीथ का मोबाइल आपके पास आया कैसे से...?’


‘ आप मुझे नहीं जानती, मेरा नाम पल्लव है । निशीथ का एक्सीडेंट हुआ है...मैंने उन्हें मिशन अस्पताल में दाखिल करा दिया है...प्लीज आप जल्दी आ जाइये ।’


‘ एक्सीडेंट...वह ठीक तो है न !! अभी एक घंटे पूर्व ही उन्होंने मुझसे बात की थी...।’


‘ धैर्य रखिये...वह ठीक हैं । प्लीज आप जल्दी आ जाइये...।’


‘ ठीक है, अभी आती हूँ...।’ कहते हुए उसने स्विच आफ कर दिया । 


मन कह रहा था कि यह सब झूठ है...पर कोई इस तरह की गलत सूचना क्यों देगा ? किसी अनहोनी की आशंका से भयभीत उसका मन रोने-रोने को हो आया था । मन ही मन बुदबुदा उठी...मेरे साथ ही सदा ऐसा क्यों होता आया है ? जीवन में अभी तक हुए हादसे क्या कम थे कि अचानक एक और हादसा...!! हे ईश्वर ! चाहे मेरा सब कुछ ले ले, पर मेरे निशीथ के जीवन रक्षा अवश्य करना...।


मन ही मन प्रार्थना करते हुये उसने पर्स में पैसे रखे तथा दरवाजा बंद करके बाहर निकली ही थी कि ऊपर बालकनी में बैठी नेहा आंटी ने पूछा,‘ अकेले कहाँ जा रही हो स्नेहा...क्या अभी तक निशीथ नहीं आये ?’


नेहा आंटी की आवाज ने उसे सदमे से उबारा था । उसका उत्तर सुनकर वे बोली,‘ रूको स्नेहा, इतनी रात ऐसे अकेले जाना उचित नहीं है । हम दोनों भी तुम्हारे साथ चलते हैं ।’


नेहा आंटी की बातों से टूटे मन को आस बंधी...लगा इस शहर में वह अकेली नहीं हैं, वरन् निशीथ के अलावा भी कोई है जिन पर वह विश्वास कर सकती है । वास्तव में वह उसके लिये ममतामई माँ जैसी ही हैं । वह उनकी मकान मालिकिन हैं । बच्चों के बाहर सैटिल हो जाने के कारण उन्होंने मकान का एक हिस्सा किराये पर उठा रखा है । उन्होंने उसे कभी अकेलेपन का एहसास नहीं होने दिया है । इसके पूर्व भी एक दो बार निशीथ के अस्पताल से लौटने में देरी होने पर उन्होंने उसके मन में बैठे अज्ञात भय से निजात दिलाई थी । आज भी उसकी मनःस्थिति समझकर तुरंत साथ चलने को तैयार हो गई । 


आलोक अंकल ने अपनी गाड़ी निकाल ली । गाड़ी वह स्वयं चला रहे थे तथा वह नेहा आंटी के साथ पीछे बैठी थी । वह बार-बार उसके कंधे पर हाथ फेर कर उसे धीरज बंधा रही थीं । न जाने कैसा होगा निशीथ, न जाने कितनी चोट आई होगी । बार-बार मन में विचारों का सैलाब आकर उसे मथने लगा...आज तक जो कुछ उसके साथ घटता रहा है वह सिर्फ हादसे थे या वह वास्तव में ही मनहूस है...जैसा कि उसे बार-बार सुनने को मिलता रहा है । एक-एक पल पहाड़ जैसा लग रहा था । गाड़ी की रफ्तार के साथ ही अचानक उसका अतीत बंद खिड़की की दरार से अड़ियल बच्चे की तरह दस्तक देनेे लगा...


उसके पैदा होते ही उसकी माँ चल बसी थीं...इसी के साथ उस पर मनहूस होने का ठप्पा लग गया था । पापा माँ को बहुत प्यार करते थे अतः वह उनकी जुदाई सह नहीं पाये । उन्होंने माँ की मौत का जिम्मेदार उसे ठहराया तथा कभी उसका मुँह न देखने का फैसला सुना दिया । 


दादा-दादी ने उन्हें बहुत समझाया पर वह अपने फैसले पर अडिग रहे तथा देश छोड़कर विदेश में जा बसे तथा कभी उसकी खोज खबर लेने की भी कोशिश नहीं की । उसे दादा-दादी की गोद मिली । जब वह आठ वर्ष की थी तब वे दोनों एक दुर्घटना के शिकार हो गये...जबकि वह भी उनके साथ थी । उससे आश्रयस्थल भी छिन गया पर वह दुनिया के कटु सत्यों को झेलने के लिये रह गई । 


पापा उस समय आये थे । नाना-नानी थे नहीं, उसकी एक मात्र मौसी ने जब पापा से इस संदर्भ में बात की तो उन्होंने उसकी जिम्मेदारी लेने से साफ मना करते हुए कहा, ‘ इस मनहूस के लिये उनके घर में कोई जगह नहीं है । अब तुम चाहे इसे अपने पास रखो या अनाथाश्रम में डाल दो ।’


पापा के शब्द उसके अंतःस्थल को चीरते चले गये थे । वह समझ नहीं पा रही थी कि कोई कैसे अपने ही खून से मुँह फेर सकता है ? उन्होंने पत्नी को खोया था तो वह भी तो माँ की गोद से वंचित रह गई थी ।


मौसी तब उसे अपने साथ ले आई किंतु उसकी दुख भरी दास्तां को अभी भी विराम नहीं मिला । मौसी ने तो उसे स्वीकार कर लिया था किन्तु उनके बच्चे अभय और अंकिता स्थाई रूप से उसे अपने साथ रखने के अपनी माँ के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर पाये । अंकिता को तब उसके साथ कमरा शेयर करने के लिये कहा गया तो वह यह कहते हुये बिदक उठी थी...‘ मुझे अकेले पढ़ने की आदत है, यदि यह मेरे साथ रही तो मैं पढ़ नहीं पाऊँगी वैसे ही मेरे कमरे में जगह नहीं है...।’


अगर कभी गलती से वह उसकी या अभय की किसी वस्तु को छू देती थी तो वह उसे पीट भी देते थे । मौसाजी को भी उससे कोई विशेष हमदर्दी नहीं थी । वैसे भी वे उन लोगों में से थे जिन्हें पत्नी के मायके से मिले उपहार तो अच्छे लगते है किन्तु वहाँ की छोटी से छोटी जिम्मेदारी से बचना चाहते है और फिर उसकी जिम्मेदारी मात्र कुछ दिनों की ही नहीं थी वरन् जिंदगी भर की थी जिससे निभाना सहज नहीं था अतः वह भी मौसी से नाराज थे ।

उसने एक बार मौसाजी को मौसी से कहते सुना था,‘ जब इसके पिता ने ही इसकी जिम्मेदारी उठाने से मना कर दिया तब तुम्हें ही क्या पड़ी थी इसका बोझ उठाने की । हम कोई धन्ना सेठ तो हैं नहीं...कमाई अपने बच्चों में ही पूरी नहीं होती, अब इसका खर्च कौन उठायेगा ?’


मौसी चुप रह गई थी और वह उस दिन तकिये में मुँह छिपाकर खूब रोई थी । वह सचमुच मनहूस थी तभी तो उसे माँ पापा का सुख नहीं मिला । माँ तो नहीं रहीं पर पापा ने जीवित रहते हुए भी उसे मरा समझ लिया । दादा-दादी की आश्रयस्थली भी उससे छिन गई और अब जब मौसी ने थोड़ी सी खुशियाँ उसकी खाली झोली में डालनी चाही तो उनकी अपनी खुशियों में ग्रहण लगने लगा है जिसकी जिम्मेदार वह स्वयं थी, इसका उसे एहसास हो चला था किंतु वह कर भी क्या सकती थी !! अपने एक मात्र आश्रय को छोड़कर वह जाती भी तो जाती कहाँ ?


अभय और अंकिता जहाँ शहर के प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ते थे वहीं मौसा जी ने उसका सरकारी स्कूल में दाखिला करवा दिया । उसके कपड़ों और किताबों का खर्च निकालने के लिये मौसाजी के निर्देशानुसार घर में काम करने वाली नौकरानी को हटा दिया गया । घर का सारा काम उसके और मौसी के जिम्मे आ गया । सुबह वह जल्दी उठकर मौसी का हाथ बँटाने की चेष्टा करती तथा बाकी काम लौटने के बाद करती...जबकि अभय और अंकिता अपने हाथों से पानी भी नहीं पीते थे । अपने एक-एक काम के लिये उसे तंग करना उनकी आदत बन गई थी...। मौसी की आँखों में उसने अपने लिये दर्द महसूस किया था लेकिन वह भी अपने पति और बच्चों के सम्मुख विवश थीं ।


हायर सेकंडरी करने के पश्चात् उसने डी.एड की ट्रेनिंग लेकर एक स्कूल में नौकरी कर ली थी तथा साथ ही साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखी । स्कूल घर से दूर था, आने जाने में समय तथा पैसा बरबाद होने की बात कर उसने स्कूल के पास ही एक कमरा किराये पर लेकर रहने की पेशकश की तो किसी ने भी मना नहीं किया । मन पर पत्थर रखकर जब वह विदा हो रही थी तब मौसी ने उससे धीरे से बुदबुदाते हुए कहा था,‘ बेटी, मैं विवश हूँ । मुझे सदा तेरी चिंता रहेगी, कभी-कभी आकर मिल जाया करना । मैंने तेरा परिश्रम और विश्वास देखा है...किसी पर निर्भर रहने की बजाय स्वयं पर विश्वास करना सीख...स्वयंसिद्धा बन बेटी, स्वयंसिद्धा बन...तभी तू इस बेदर्द जमाने से टक्कर ले पायेगी ।’  


मौसी की बात सुनकर उसकी आँखों में आँसू भर आये थे...यह सच है कि मौसी के अतिरिक्त किसी ने उसे कभी अपना नहीं समझा है किंतु उसका तो वही घर है, चाहे जैसा भी है...। कुछ दिनों तक वह प्रत्येक इतवार को यह सोचकर जाती कि दूर होने से शायद उनके संबंध सहज हो जायें, शायद उसे उसके अपने मिल जायें किंतु मौसी के अतिरिक्त अब भी किसी को उसकी उपस्थिति पसंद नहीं है, इसका एहसास होते ही धीरे-धीरे उसने वहाँ जाना कम कर दिया । समय के साथ उसने एम.ए., एम.एड. कर लिया...उसे कालेज में व्याख्याता पद पर नियुक्ति मिल गई । जीवन चल निकला था ।


धीरे-धीरे अभय और अंकिता के विवाह हो गये । अंकिता ससुराल चली गई तथा अभय को अपनी नौकरी के सिलसिले में बाहर जाना पड़ गया । बच्चों के चले जाने के कारण मौसी अकेली पड़ गई थीं, अब वह अक्सर घर जाने लगी । मौसाजी का व्यवहार भी अब उसके प्रति कुछ नर्म हो चला था । वे दोनों अक्सर उससे विवाह करने का आग्रह करते । मौसी ने तो एक दो जगह बात भी चलाई किंतु पता नहीं क्यों वह मन से विवाह के लिये स्वयं को तैयार ही नहीं कर पा रही थी । उसकी मनसा जानकर वे भी शांत हो गये । सच तो यह था कि उसने स्वयं को अपनी दिनचर्या में इतना व्यस्त कर लिया था कि उसके पास इन सब बातों को सोचने और समझने के लिये समय ही नहीं था । 


इसी बीच मौसाजी का देहान्त हो गया । अभय और अंकिता आये तथा कुछ दिन रह कर चले गये । मौसी अकेली रह गई थीं । एक दिन वह उनसे मिलने गई तो वे बोली,‘ बेटी, इतना बड़ा घर है, अकेला घर काटने को दौड़ता है, तू यहीं आ जा ।’


उनका मन रखने के लिये वह उस घर में...उस आँचल की छाँव में पुनः लौट आई थी जिसे उसे मजबूरी में छोड़कर जाना पड़ा था । उसके लौट आने से मौसी संभलने लगी तथा उनके स्वास्थ्य में भी सुधार होने लगा । सच तो यह है कि घर में सब कुछ हो लेकिन सकून न हो तो अच्छा भला आदमी भी अस्वस्थ हो जाता है...फिर मौसी तो मौसाजी की मृत्यु के पश्चात् न केवल शारीरिक तथा मानसिक रूप से टूट चुकी थी वरन् अकेलेपन की त्रासदी भी भोग रही थीं ।


        जैसे ही अभय और अंकिता को उसके लौटने का पता चला वह दोनों परिवार सहित आये तथा उसे तथा मौसी को खूब खरी खोटी सुनाने लगे । उनके मन में यह डर समा गया था कि यदि वह यहाँ रही तो हो सकता है माँ से मकान और जायदाद कहीं अपने नाम न करा ले । मौसी ने उनके आशय को समझ कर उत्तर दिया था,‘ तुम दोनों का डर व्यर्थ है । अरे, इसने तो सदा तुम्हारा झूठा खाया है । तुम्हारी उतरन पहनी है । तब भी इसने कभी कोई विरोध नहीं किया...तुम्हारी किसी वस्तु पर अपना हक नहीं जमाया तो अब जब इसने अपना मार्ग स्वयं अपनी मेहनत के बल पर तलाश कर लिया है तथा उस पर दृढ़ कदमों से चल रही है...तब तुम्हारे इस टूटे-फूटे घर पर अपनी नजर क्यों डालेगी ? वैसे भी बेटा, जिसके पैर बालू पर जमे रहते हैं, उन्हें ही अपने पैर के नीचे से बालू खिसकने का डर रहता है ।


मैं तुम्हें यह भी बताना अपना कर्तव्य समझती हूँ कि स्नेहा यहाँ स्वयं रहने नहीं आई है । इसे मैंने बुलाया है । वैसे मुझे तुम लोगों से ऐसी उम्मीद नहीं थी...तुम्हारे इस क्रूर व्यवहार से मेरे दिल को बहुत ठेस लगी है । तुम लोगों ने तो एक बार भी नहीं कहा...माँ हमारे साथ चलो, यहाँ अकेले कैसे रहोगी ? शायद तुम दोनों को अपनी आजादी ज्यादा प्यारी है । आज तुम्हारा व्यवहार देखकर मुझे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि मैं तुम लोगों की बजाय इसे अपने ज्यादा नजदीक पाती हूँ । तुम तो मेरी अपनी औलाद हो फिर भी तुमने कभी मेरे मन को समझने का प्रयत्न नहीं किया । यह तुम्हारी अपनी मौसी की लड़की है क्या तुम इसे प्यार के दो मीठे बोल नहीं दे सकते थे ? मेरे निर्णय का मान नहीं रख सकते थे !! तुमने सदा पाना ही चाहा लेकिन देना नहीं...। अहंकार के वशीभूत तुम यह भी भूल गये कि प्यार एक तरफा नहीं होता । मैंने तुम्हारे प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा दी अब अगर मैं अपनी इस बेटी के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना चाहती हूँ तो तुम्हें ऐतराज क्यों हैं ?’


आत्मविश्वास भरे मौसी के स्वर सुनकर वह तो क्या अभय और आकंाक्षा भी अवाक् रह गये थे । मौसी ने उस समय तो उन्हें चुप करा दिया था लेकिन उनके मन में छाई नफरत की तपन को उसने महसूस किया था । वह तो कब की उनकी जिंदगी से निकल जाती किंतु मौसी का प्यार ही सदा उसके पैरों में बेड़ी पहना देता था ।

उसे समझ में नहीं आता था कि अभय और अंकिता उससे इतनी नफरत क्यों करते हैं...? उनके प्यार की एक नजर पाने के लिये वह बचपन में उनके कपड़े प्रेस किया करती थी, जूते पोलिश करती, यहाँ तक कि उनका छोटे से छोटा काम हँसते-हँसते करने का प्रयास करती लेकिन तब भी वह उससे सीधे मुँह बात नहीं करते थे । उसे आज भी याद है एक बार दीपावली पर मौसी अभय और अंकिता के लिये कपड़े लेने गई तो उसके लिये भी एक ड्रेस खरीद लाई । उसकी ड्रेस को देखकर पूरे घर में जो हँगामा मचा, उसे देखकर वह तो क्या मौसी स्वयं स्तब्ध रह गई थी । उसके पश्चात् उसे सदा अंकिता की उतरन ही पहनने को मिलती रही थी, यदि कहीं कुछ छोटा बड़ा होता तो मौसी उसे काट-छाँटकर उसके पहनने लायक बना देतीं थीं । समय तो गुजर गया था किंतु खट्टी मीठी यादें उसके जेहन में चुभकर जब तब लहूलुहान कर ही जाती थीं । इस समय भी उनकी बातें सुनकर उसने जाना चाहा था किंतु मौसी के प्यार ने उसे रोक लिया था । यह सच है कि मौसी के प्यार ने ही उसका खोया आत्मविश्वास लौटाया था किंतु यह भी उतना ही सच है कि उसकी उपस्थिति ने उनके हँसते-खेलते परिवार में ग्रहण लगा दिया था । इस अपराधबोध से वह कभी मुक्त नहीं हो पाई थी । यही कारण था कि वह अनजाने ही अंतर्मुखी होती चली गई...।  


एक दिन वह कालेज से लौटी ही थी कि घंटी बजी, दरवाजा खोला तो सामने एक युवक खड़ा था...पता नहीं उसमें ऐसा क्या था कि वह उसे देखती ही रह गई । इतनी देर में मौसी भी कमरे से बाहर निकल आई तथा पूछ बैठी , ‘ कौन है स्नेहा ? ’


‘ अरे, बेटा तुम, आओ, आओ...। स्नेहा, यह निशीथ है, पिछले हफ्ते ही यहाँ आया है । सामने वाले फ्लैट में रहता है । यह मेरी बचपन की सहेली मीना का लड़का है । सरकारी अस्पताल में डाक्टर है । हाल में ही यहाँ पोस्टिंग हुई है । ’ मौसी ने उस व्यक्ति को देखकर अंदर बिठाते हुए उससे उसका परिचय करवाया था ।


निशीथ के व्यक्तित्व में न जाने ऐसा क्या था कि वह अनायास ही उसकी ओर आकृष्ट होती चली गई । उसकी एक ही नजर ने उसके अंदर की स्त्री को जीवित कर दिया था । उसकी एक झलक पाने के लिये वह घंटों बालकनी में दूसरे दिन का लेक्चर तैयार कऱने के बहाने बैठी रहती...। साज श्रंगार से उसे सदा नफरत रही थी, उसका मानना था कि दूसरों को आकर्षित करने के लिये लोग व्यर्थ ही इतनी लीपापोती करते हैं किंतु इधर कुछ दिनों से उसमें तथा उसके विचारों में परिवर्तन आ गया था । घंटो शीशे के सामने खड़े होकर स्वयं को विभिन्न दृष्टिकोणां से निहारने में उसे अद्वितीय आनंद की प्राप्ति होने लगी थी । 

कभी-कभी हल्की सी लिपिस्टक या छोटी सी बिंदी भी लगा लेती थी । उसके व्यवहार में आया परिवर्तन मौसी से छिपा नही रहा । एक दिन वह पूछ ही बैठी,‘ क्या बात है स्नेहा, कहीं किसी से प्यार तो नहीं हो गया, अगर हो गया हो तो बतला दे, अब तो डोली उठ ही जानी चाहिए ।’


‘ नहीं मौसी...।’ कहकर उसने बात टालनी चाही किंतु सच तो यह था कि उसका मन भी प्यार के हिंडोले में उड़ान भरने को आतुर हो उठा था ।


निशीथ का उनके घर आना प्रारंभ हो गया था । मौसी खाने में कोई स्पेशल अच्छी चीज बनाती तो उससे ही निशीथ को देकर आने का आग्रह करतीं । पहले तो वह कुछ नानुकुर करती किन्तु बाद में वह स्वयं जाने को उत्सुक रहने लगी और वह भी उनके घर बरतन लौटाने के बहाने आकर घंटों गप मारता रहता । वह चाहकर भी ज्यादा बातें नहीं कर पाती थी, बस कनखियों से उसे देखकर कभी-कभी मुस्करा देती । उसे ऐसे देखते पाकर एक दिन निशीथ ने मुस्कराते हुए कहा,‘ आँटी, आपकी बेटी गूँगी तो नहीं है ।’


‘ नहीं बेटा, इसकी तो चुप रहने की आदत सी ही पड़ गई है । अब तुम ही बताओ, ऐसे ही चुपचाप रही तो भला आजकल के जमाने में कौन इससे विवाह करेगा ? ’ मौसी ने उसकी ओर देखते हुए मायूस शब्दों में कहा था ।

मौसी का इतना कहना था कि स्नेहा उठकर अंदर चली गई तथा निशीथ की आवाज उसके कानों में पड़ी,‘ आँटी, आप यदि चाहें तो आपकी इस गूँगी बेटी को बोलना सिखा दूँ ।’


‘ तुम कहना क्या चाह रहे हो बेटा ?’ मौसी ने किंचित आश्चर्य से पूछा था ।


‘ आँटी, यदि स्नेहा की स्वीकृति हो तो मैं उससे विवाह करना चाहता हूँ ।’ निशीथ ने सीधे सपाट शब्दों में कहा था ।


‘ बेटा, तुम यह क्या कह रहे हो हम छत्रिय और तुम ब्राह्मण...क्या मीना इस रिश्ते को स्वीकार करेगी ? और फिर तुम्हें यह भी बता देना चाहती हूँ कि स्नेहा मेरी अपनी पुत्री नहीं है, मेरी बहन की बेटी है, किन्तु मैंने इसे अपनी बेटी समझकर ही पाला है ।’


‘ आँटी, मुझे इससे कोई मतलब नहीं है कि यह आपकी बेटी है या किसी अन्य की, या उसकी जाति क्या है ? मैं तो बस इतना जानता हूँ कि मैं उसे पसंद करने लगा हूँ तथा उसके साथ जीवन बिताना चाहता हूँ ।’

मौसी की सहेली मीना ने अपने पुत्र की इच्छा का मान रखा तथा उसे बहू बनाकर घर ले आई । पहली बार उसे लगा जिंदगी कितनी खूबसूरत है...!! निशीथ ने उसके मन के कोरे कैनवास पर रंग ही रंग भर दियेे जिसमें डूबकर वह सतरंगी आसमान में जा बैठी थी ।


अभी कुछ ही दिन हुए थे कि निशीथ का स्थानांतरण हो गया...नई जगह, नया सैट अप, बिल्कुल ही मन नहीं लगता था । कहाँ वहाँ अपनी नौकरी के कारण पूरे दिन व्यस्त रहा करती थी, अब एकदम खाली हो गई थी...। यहाँ तक कि समय काटना भी मुश्किल लगने लगा । साथ ही मौसी की भी बेहद याद आती...। मौसी को अपने मन की बात बताती तो वह कहती,‘ बेटा, अब तू मेरी चिंता छोड़ और अपनी घर गृहस्थी में मन लगा...वैसे भी बेटा, आज तक कौन माँ बाप के पास रह पाया है ।’


नौकरी में तो यह सब चलता ही है, सोचकर मन लगाने की कोशिश करने लगी थी । ब्रेक की आवाज ने उसकी अनवरत चलती विचारश्रृंखला पर भी रोक लगा दी । गाड़ी एक चौराहे पर खड़ी थी, कुछ देर पहले ही वहाँ शायद कोई एक्सीडेंट हुआ था...इसीलिये ट्रैफिक जाम हो गया था । मार्ग साफ होने पर लोग जहाँ से भी जगह मिलती निकलने की कोशिश कर रहे थे । लोगों की बेसब्री देखकर उसे लगा सच चाहे कुछ भी हो जाये, जीवन चलता ही रहता है । किसी को किसी की परवाह नहीं रहती है...जिस पर बीतती है वही सब कुछ झेलने और सहने के लिये रह जाता है । अचानक दिल का दर्द चेहरे पर उतर आया था घबड़ाहट और पसीने में लगभग नहाई स्नेहा ने विचलित स्वर में पूछा,‘ आँटी, अभी और कितनी दूर अस्पताल है ?’


‘ बस पहुँच ही रहे हैं ।’ आलोक अंकल ने उत्तर दिया ।

उसकी स्थिति देखकर नेहा आँटी उसका हाथ अपने हाथ में लेकर उसे ढाढस बंधाने लगीं ।


अस्पताल पहुँचकर रिसेप्शन पर पूछ ही रहे थे कि वह आदमी जिसने फोन किया था, आ गया । वह उन्हें निशीथ के पास ले गया । निशीथ के हाथ, पैरों तथा सिर में पट्टी बँधी देखकर वह होश खो बैठी थी । नेहा आँटी ने किसी तरह उसे संभाला । वह आदमी उस समय उसे देवदूत जैसा लगा, जिसने निशीथ को समय पर अस्पताल पहुँचाकर मदद की । कुछ संभलने पर उसने कृतज्ञता व्यक्त करते हुए धन्यवाद दिया तो उसने नम्र स्वर में कहा, ‘इसमें धन्यवाद की क्या बात है, यह तो मेरा कर्तव्य था आखिर इंसान ही तो इंसान के काम आता है ।’


आलोक अंकल ने डाक्टर से बातें की तो उन्होंने कहा,‘ अभी कुछ नहीं कहा जा सकता...यदि आने में थोड़ी सी भी देर हो जाती तो शायद बचाना भी मुश्किल हो जाता ।’

आलोक अंकल ने उससे नंबर पूछकर निशीथ के माता-पिता तथा उसकी मौसी को इस दुर्घटना सूचना दे दी । तब तक अस्पताल में भी निशीथ के एक्सीडेंट की खबर पहुँच चुकी थी । सी.एम.ओ. तथा सी.एम.एस. भी आ गये । उन्होंने न केवल निशीथ की हालत के बारे में डाक्टर से जानकारी ली वरन् उसे हरसंभव मदद का भरोसा दिलवाया । जाते समय उससे कहा, ‘ हमारे अस्पताल से इस अस्पताल में ज्यादा अच्छी सुविधायें हैं, आप चिंता न करें सब ठीक होगा । आपकी सहायता के लिये हम एक हेल्पर भेज रहे हैं । कुछ भी आवश्यकता पड़े तो हमें सूचित कीजियेगा ।’ 


आलोक अंकल उसके खाने के लिये कुछ सामान ले आये । उसके मना करने पर नेहा आँटी ने उससे जबरदस्ती खाना खाने का आग्रह करते हुए कहा,‘ बेटी, मैं जानती हूँ कि तुम्हारा खाने का मन नहीं हो रहा होगा लेकिन ऐसे समय में भूखा रहना न तो तुम्हारे लिये अच्छा है और न ही तुम्हारी कोख में पल रहे नवजात शिशु के लिये...चिंता मत कर बेटी, निशीथ ठीक हो जायेगा...भगवान उसकी रक्षा करेंगे ।’


निशीथ को आई.सी.यू. यूनिट में रखा गया था । डाक्टर होने के कारण उसकी विशेष देखभाल भी हो रही थी किन्तु अस्पताल के नियमानुसार आई.सी.यू. में सिर्फ एक ही अटैडेंट रह सकता है अतः आलोक अंकल ने स्वयं रूकने की पेशकश करते हुए उसे घर जाने के लिये कहा किन्तु वह निशीथ को अकेला छोड़कर कैसे जा सकती थी...?


अंततः वे दोनों उससे यह कहकर चले गये कि अगर कुछ भी आवश्यकता हो तो हमें फोन कर देना, हम तुरंत आ जायेंगे । वह निशीथ के बैड के पास पड़ी बैंच पर बैठ गई...। निशीथ को नलियों से जकड़ा देखकर चिंता से नसों में तनाव होने लगा था...सासू माँ के शब्द याद आये, ‘ बहू, अपनी धरोहर तुझे सौंप रही हूँ , आशा है अपनी जान से ज्यादा तू इसकी परवाह करेगी ।’


किंतु वह अपना वचन कहाँ पूरा कर पाई...!! निशीथ के पूरे शरीर को पट्टियों में जकड़ा देखकर आँखों से आँसू रूकने का नाम ही नहीं ले रहे थे किंतु कोई पोंछने वाला नहीं था...। जो निशीथ उसकी पेशानी पर आई पसीने की एक बूँद देखकर भी परेशान हो उठता था वही आज उसकी स्थिति से बेखबर विवश पड़ा है...।


‘ अभी कुछ नहीं कहा जा सकता...। ’ डाक्टर के कहे शब्द उसे मन ही मन मथे जा रहे थे...। कल जब उसके सास-ससुर आयेंगे तब वह कैसे उनका सामना करेगी ?

बार-बार मन से एक ही आवाज निकल रही थी...हे ईश्वर, तुम मुझे किस जुर्म की सजा दे रहे हो...? चाहे मेरी जान ले लो लेकिन मेरे निशीथ की जान बख्श दो, यही तो मेरी आत्मा...मेरा जीवन हैं । इन्होंने ही मुझे जीवन के अंधकूप से बाहर निकाला है...क्या तुम फिर मुझे उसी अंधेरे कुएं में ढकेलना चाहते हो ? निशीथ के बिना मैं कैसे जिंदा रह पाऊँगी ? कैसे कोख में पल रहे शिशु की देखभाल कर पाऊँगी ? क्या उसे भी मेरे समान किसी के टुकड़ों पर पलना होगा...?


अचानक एक अस्पष्ट सी चीख निशीथ के मुँह से निकली । वह दौड़कर डाक्टर को बुला लाई । डाक्टर आये, चैक किया तथा नर्स को इंजेक्शन लगाने का आदेश देकर चले गये । उसने पूछना चाहा तो कोई जबाव नहीं दिया । कुछ समय पश्चात् दूसरे डाक्टर आये, वह चैक कर ही रहे थे कि आलोक आंटी, अंकल आ गये...डाक्टर ने इमर्जेन्सी आपरेशन करने की आवश्यकता महसूस करते हुए, खून का इंतजाम करने को कहा । आलोक अंकल तुरंत ही खून का इंतजाम करने चले गये और वह बेबस और बदहवास सी शून्य में निहारती रह गई ।


‘ माँ, घबराओ नहीं, मैं हूँ न तुम्हारे साथ...।’ पेट में हलचल हुई, इस एहसास ने उसके टूटे दिल को तसल्ली दी ।  


निशीथ को आपरेशन थियेटर में ले जाया जा रहा था कि तभी उसके सास-ससुर, मौसी को साथ लेते हुए आ गये । उनको देखते ही वह बिलख-बिलख कर रो पड़ी । मौसी आँखों में आँसू लिये उसके कंधे सहला रही थीं कि उसकी सासू माँ ने कहा ,‘ रो मत बेटी, हिम्मत रख ,यह हम सबकी परीक्षा की घड़ी है...कल ही तुषार आया है वह सब संभाल लेगा ।’


सासू माँ के शब्द सुनकर कुछ हिम्मत बंधी थी क्योंकि तुषार निशीथ का मित्र ही नहीं एक कुशल सर्जन भी है । उन दोनों ने साथ-साथ एम.बी.बी.एस किया था । तुषार एम.एस करने के लिये स्टेटस चला गया था जबकि निशीथ ने सरकारी नौकरी ज्वाइन कर ली थी । यद्यपि वह तुषार से मिली नहीं थी । बस टेलीफोन से ही बात हो पाई थी लेकिन जितना उसने निशीथ से सुना था, उससे उसे कभी महसूस ही नहीं हुआ कि वह अजनबी है ।


तुषार को उनके विवाह में सम्मिलित न हो पाने का बेहद दुख था, बार-बार यही कहता था...यार, विवाह तो तूने मेरे बिना कर लिया लेकिन एक ग्रांड पार्टी लिये बिना छोडूंगा नहीं...और अब लौटा भी तो पहली खबर उसे भाई समान मित्र के एक्सीडेंट की ही मिली...। उसी पल वह बिना रूके चल पड़ा...। आते ही वह डाक्टर से बात करने चला गया । वह निशीथ का मित्र ही नहीं एक सर्जन भी है, जानकर डाक्टर ने उसे आपरेशन थियेटर में आने की इजाजत दे दी । जब तक आपरेशन नहीं हुआ तब तक वह भी आपरेशन थियेटर में डाक्टर के साथ रहा ।


आपरेशन सफल हुआ है, जानकर तनाव से खिंची नसों को थोड़ा विश्राम मिला, दिल को थोड़ा सकून मिला । तब सासूमाँ के आग्रह पर घर चली गई । उस रात उसे ऐसी नींद आई जैसेकि वर्षो से सोई नहीं है वैसे भी जब अपनों का साथ हो तो इंसान कठिन से कठिन विपदाओं को भी हँसते-हँसते झेल लेता है । कुछ ही घंटों में इस शाश्वत सत्य से उसका परिचय हो गया था । 


पंद्रह दिन बाद निशीथ को अस्पताल से छुट्टी मिल गई । सबने चैन की साँस ली, निशीथ को आराम की आवश्यकता थी अतः यह निर्णय लिया गया कि यहाँ रहने से तो अच्छा है कि निशीथ को घर...दिल्ली ले चलें...। वहाँ भी एक बार उसका पूरा चैकअप करा लिया जाये । कुछ अन्य टेस्ट जिनकी इस अस्पताल में सुविधा नहीं है, तुषार के अनुसार करवाने आवश्यक थे क्योंकि सफल आपरेशन के बावजूद निशीथ के सिर का दर्द समाप्त नहीं हो रहा था...।


मंजिल पर पहुँचने ही वाले थे कि जिस गाड़ी से वे जा रहे थे, उस गाड़ी का ब्रेक अचानक फेल हो जाने के कारण, वह किनारे लगे पेड़ से जा टकराई । सभी को थोड़ी बहुत चोटें आई लेकिन पीछे की सीट पर लेटे निशीथ का सिर आगे की सीट से इतनी जोर से टकराया जिससे कि उसके सिर से बेताहशा खून बहने लगा...शायद घाव पूरी तरह भरा नहीं था । तुषार अपनी चोट की परवाह किये बिना खून को रोकने का प्रयत्न करने लगा । निशीथ की हालत देखकर एक भले मानुष से लिफ्ट तुरंत मिल गई थी किन्तु फिर भी अस्पताल पहुँचते –पहुँचते तक उसकी हालत काफी नाजुक हो गई । उधर निशीथ की हालत देखकर घबड़ाई स्नेहा के पेट में हलचल शुरू हो गई, उसे भी आपात कक्ष में तुरंत भर्ती करवाना पड़ा । 


स्नेहा की नाजुक स्थिति देखकर आपरेशन द्वारा आपात डिलीवरी करवाने का डाक्टर ने निर्णय लिया । जिस समय स्नेहा आपरेशन थियेटर में एक नये जीवन को देने का प्रयास कर रही थी ठीक उसी समय निशीथ के जीवन की डोर टूट गई...सच जीवन मरण पर किसी का जोर नहीं है जिसे जाना होता है उस पर चाहे लाख पहरे लगा दो वह चला ही जाता है और आने वाला लाख पहरे तोड़कर आ ही जाता है । अगर इंसान की इच्छानुसार ही सब होता जाए तो संसार से दुखों का नामोनिशान ही मिट न जाये...!! सच इंसान सोचता कुछ है और होता कुछ और है....शायद यही जीवन का शाश्वत सत्य है । 


स्नेहा की नाजुक हालत को देखकर निशीथ की मृत्यु की खबर को उससे छिपाने का उसके घर वालों ने काफी प्रयास किया किन्तु कब तक उससे इतनी बड़ी बात को छिपाकर रखा जा सकता था ? भेद खुलना था, खुल ही गया...। उनके चेहरे पर छाई उदासी न चाहते हुए भी सब कह गई...वह जीते जी ही मर गई थी । उसका न खाने का मन करता और न ही किसी से बातें करने का । बस टकटकी लगाये अपनी पुत्री को देखती रहती...क्या यह भी उसी की तरह मनहूस है जो पैदा होते ही पिता को खा गई, या उसकी अपनी मनहूसियत ने उसे एक बार फिर अकेला कर दिया...। मन कहता कि जो हो गया सो हो गया अन्य घटनाओं की तरह इस घटना को भी एक हादसा समझकर भूल जाए और नये सिरे से अपनी जिंदगी प्रारंभ करे...लेकिन क्या ऐसा संभव हो पायेगा ? क्या उसकी बच्ची को भी उसी के जैसा ही जीवन जीना पड़ेगा...?


कभी माँ समान सासूजी, कभी पिता समान ससुरजी तो कभी मौसी आकर उसके मन के सूनेपन को अपनी हल्की-फुल्की बातों से भरने का प्रयास करती लेकिन उसकी हँसी तो निशीथ के साथ ही चली गई थी । उसकी यादें उसे न चैन से जीने दे रही थीं और न ही मासूम की मासूमियत उसे मरने दे रही थी । कभी सोचती ऐसे जीवन से तो मरना ही श्रेयस्कर है किंतु अब वह अकेली तो नहीं है, उसके पास तो निशीथ का अंश है जिसके लिये उसे जीना ही है...बार-बार यह वाक्य मन ही मन दोहराती लेकिन क्षण भर में ही उसके स्वयं से किये प्रण उसे धोखा दे जाते और वह एक अंधी खाई में डूबने उतरने लगती ।   


आज उसे अस्पताल से छुट्टी मिलने वाली है...अब वह कहाँ जायेगी ? क्या ससुराल वाले उसे अपने साथ ले जायेंगे या वह मौसी के पास, मौसी के साथ चली जाये । अभी सोच ही रही थी कि सासू माँ तथा पिता समान श्वसुरजी उसे डिस्चार्ज करवाने की सारी फारमेल्टी पूरी कर उसे लेने उसके पास आये...उनकी आँखों में छिपे दर्द को पहचान कर वह चुपचाप उनके साथ चली आई ।


मौसी भी कुछ दिन उसके पास रहने के पश्चात् जाने लगीं तो वह पहली बार फूट-फूट कर रोने लगी, अपने मन की बात उनके सामने रखने पर वह बोलीं ,‘ बेटी, तू पढ़ी लिखी होकर भी ऐसा सोचती है...कोई इंसान मनहूस कैसे हो सकता है ? अगर ऐसा होता तो तेरी गोद में हँसती खेलती बच्ची न होती...सुख-दुख के पल हर इंसान के जीवन में आते हैं, हाँ यह अवश्य है कि किसी के जीवन में हादसे कुछ ज्यादा ही होते हैं...लेकिन हर हादसे के बाद एक नया जीवन प्रारंभ होता है, यह भी एक अटल सत्य है । हिम्मत रख मेरी बच्ची, जो चला गया उसे तो कोई लौटाकर नहीं ला सकता लेकिन जो कुछ है उसी में अपनी खुशी ढूँढ । खुशनसीब है तू कि तुझे इतनी प्यार करने वाली ससुराल मिली है, सब कुछ ठीक हो जायेगा, मेरी बच्ची ।’ उनकी आँखो से बहते आँसुओं को देखकर वह समझ नहीं पा रही थी कि वह उसे दिलासा दे रही हैं या स्वयं को ।    


समय के कालचक्र को कौन रोक पाया है वह तो अनवरत गति से चलता रहता है....दिन रात उसके जीवन में भी आ जा रहे थे लेकिन न तो दिन का उजाला उसके जीवन को रोशन कर पा रहा था और न ही रात का अँधेरा उसके जीवन के अँधेरे को ढँक पा रहा था । जी तो वह रही थी लेकिन जीने की सारी आंकाक्षा समाप्त हो गई थी...संतोष था तो इतना कि उसकी बच्ची को दादा-दादी का प्यार मिल रहा था ।


कभी-कभी तुषार आकर अपने कहकहों से उसके मन के सूनेपन को भरने का प्रयास करता...। उसी ने बच्ची का नाम निशा रखा था निशीथ की निशा...। प्यार से सब उसे निशू बुलाने लगे...। जब भी निशा को वेक्सीन लगवानी होती, माँजी उसे ही साथ भेजतीं और वह भी खुशी-खुशी उसके साथ चला जाता था...। उसे आश्चर्य होता जब वह निशीथ के समान ही आइसक्रीम की दुकान पर गाड़ी खड़ा करके आइसक्रीम खाने की जिद करने लगता...या कभी हलके रंग साड़ी पहन लेती तो कहता,‘ और कोई रंग नहीं मिला पहनने के लिये...क्या बुढ्ढों जैसी पसंद है तुम्हारी...?’


एक दिन उसे सफेद रंग की साड़ी पहने देखकर बोला,‘ यह सफेद रंग देख-देखकर बोर हो गया हूँ ...अस्पताल में भी यही रंग और यहाँ भी यही रंग...आखिर कुछ तो अंतर होना चाहिए घर और अस्पताल में...। ’ तुषार का वाक्य सुनकर वह चौंक ही गई थी...यही वाक्य उसे निशीथ से सुनने को मिला था जब उसने एक बार स्कूल के किसी फंक्शन के लिये खरीदी सफेद साड़ी पहन ली थी...सच में दोनों की रूचियों में गजब की समानता थी । 


मन की बात उससे कही तो वह बोला,‘ रूचियाँ एक जैसी क्यों नहीं होंगीं, मेरा बचपन का दोस्त था वह...शायद आप नहीं जानती हमने कक्षा एक से मेडिकल की पढ़ाई साथ-साथ की थी...एम.एस करने मैं बाहर क्या गया कि वह मुझे सदा के लिये छोड़कर ही चला गया ।’ कहते हुए उसकी आँखों में नमी तिर आई थी...।  


एक दिन वह निशा को सुलाकर लेटी ही थी कि माँजी उसके कमरे में आई तथा बोली ,‘ बेटी, मैं तुझसे कुछ कहना चाहती हूँ ।’


प्रश्नवाचक मुद्रा में उसे अपनी ओर देखते देखकर वह पुनः बोली,‘ बेटी, यह सच है कि निशीथ जहाँ हमारा पुत्र था वहाँ तेरा पति भी था । उसके जाने से जहाँ हम दुखी हैं उससे भी ज्यादा तेरी तरफ से चिंतित भी हैं । बेटी, स्त्री के लिये पति का क्या महत्व है, यह एक स्त्री से अधिक कोई नहीं समझ सकता है । एक स्त्री का सारा साजश्रंगार, खुशियाँ पति के साहचर्य में ही निहित होती है...। पहले तू हमारी बहू थी लेकिन अब हमारी बेटी है । भला कोई भी माता-पिता अपनी बेटी को ऐसे घुट-घुटकर जीते हुए देखकर सुख से कैसे रह सकते हैं...? बेटी, मैं तुझ पर कोई दबाव नहीं डाल रही हँू सिर्फ एक प्रस्ताव रख रही हूँ , यह तेरे ऊपर निर्भर है कि तू इसे माने या न माने...।’

एक गहरी दृष्टि उस पर डालकर वह पुनः बोली,‘ बेटी, बच्चे को माँ के प्यार के साथ-साथ पिता के प्यार की...संरक्षण की भी आवश्यकता होती है तभी उसका सर्वागीढ़ विकास संभव हो पाता है । तुझे बुरा न लगे तो एक बात पूछूँ ।’


‘ आप मुझे बेटी भी कह रही हैं और आज्ञा भी ले रहीं हैं...आप माँ है आप जो चाहे पूछ सकती हैं ।’ स्नेहा ने कहा । 


‘ बेटी, तुषार तुझे कैसा लगता है ? अगर तेरी सहमति हो तो मैं तुषार से बातें करके देखूँ ...।’


‘ माँजी, आप यह क्या कह रही हैं ? मैंने तो यह कभी सोचा ही नहीं...निशीथ का स्थान मैं किसी और को कैसे दे सकती हूँ ? मैं निशीथ की यादों के सहारे अपनी जिंदगी काट लूँगी पर दूसरे विवाह की बात तो मैं स्वप्न में भी नहीं सोच सकती और फिर क्या आप स्वयं निशू के बिना रह पायेंगी ? ’ स्नेहा माँजी के अप्रत्याशित प्रस्ताव को सुनकर आश्चर्यचकित स्वर में बोली । 


‘ यह सच है कि निशू के बिना रह पाना हमारे लिये संभव नहीं होगा लेकिन क्या हम अपने स्वार्थ के लिये तुम्हारे दरवाजे पर दस्तक लगाती खुशियों को लौट जाने दें...। मैं जानती हूँ बेटी, इस तरह का निर्णय लेना आसान नहीं है अतः जो भी निर्णय लेना सोच समझ कर लेना...। साथ ही यह मत भूलना कि जीवन इतना आसान नहीं है विशेषकर स्त्रियों के लिये...। जीने के लिये अनेकों समझौते करने पड़ते हैं । कभी-कभी इंसान ये समझौते स्वयं अपनी इच्छानुसार करता हैं तो कभी-कभी परिस्थितिवश करने पड़ते हैं...। आखिर हम तो पके फल की तरह है न जाने कब टपक जायें...। तुषार को हम सब अच्छी तरह से जानते हैं...उसकी आँखों में मैंने तेरे लिये, निशू के लिये चाहत देखी है...। निशू हमारी पोती ही नहीं निशीथ का अंश भी है, हम नहीं चाहते कि कभी उसे किसी अभाव में जीना पड़े...दर-दर की ठोकरें खानी पड़े । वैसे भी बेटी किसी के जाने से जीवन रूक नहीं जाता, उसे चलना ही पड़ता है ।’ उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए आँखों में भर आये आँसुओं को आँचल से पोंछती हुई वह चली गई थी । 


स्नेहा की आँखों में आँसू भर आये...उसने अपनी माँ को तो नहीं देखा पर मौसी से माँ जैसा प्यार अवश्य पाया था पर सासू माँ से माँ जैसा प्यार मिलना उसके जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी । उसके पिता ने उसे अपनी माँ की मृत्यु का जिम्मेदार ठहराकर, उसे मनहूसियत का जो आवरण उढ़ाया था उसे आज सासूमाँ ने अपने प्रेम से उतारकर उसे बेटी जैसा मानसम्मान भी दिया है । यहाँ तक कि वे उसकी खाली झोली में संसार की सारी खुशियाँ डालकर उसके लबों पर मुस्कान लाना चाहती हैं...।


पर वह उनका प्रस्ताव कैसे स्वीकार करे ? उसने तो सिर्फ निशीथ को चाहा है, तुषार के साथ तो वह माँजी के कहने पर सिर्फ निशीथ का मित्र होने के कारण चली जाती है या बातें कर लिया करती है...। उसने इस दृष्टि से कभी सोचा ही नहीं फिर अपने स्वार्थ के लिये किसी की इच्छाओं और भावनाओं से खेलना क्या उचित होगा...? ऐसा करके क्या वह तुषार या उसके माता पिता की नजरों से गिर नहीं जायेगी ? कहीं ऐसा न हो कि वह माँजी का प्रस्ताव सुनकर भड़क जायें और दो परिवारों की मित्रता में ग्रहण लग जाए...।


माँजी को भ्रम हो गया होगा...तुषार भला उसके साथ विवाह क्यों करना चाहेगा...? उसके लिये क्या लड़कियों का अकाल पड़ गया है...? अगर वह उसके साथ विवाह कर भी लेता है तो क्या पूरी जिंदगी उसे इस एहसास के साथ नहीं बितानी पड़ेगी कि वह उस पर दया कर रहा है...!! माना आज वह निशू से स्नेह करता है पर क्या कालांतर में जब उसके स्वयं के बच्चे होंगे तो क्या वह समान व्यवहार कर पायेगा...? नहीं-नहीं वह अपने सुख के लिये निशू की जिंदगी में जहर नहीं घोलेगी...। जैसी जिंदगी उसने स्वयं जी है, अपनी पुत्री को नहीं जीने देगी...। वह माँजी को साफ-साफ शब्दों में अपना फैसला सुना देगी...। कुछ वर्षो को छोड़ दें तो उसने सारी जिंदगी अपनी परेशानियों को स्वयं सहा है । उनसे जूझते हुए अपना मार्ग तलाशा है तो फिर अब क्यों कमजोर पड़ रही है...?


अचानक उसे मौसी के शब्द याद आये... मैंने तेरा परिश्रम और विश्वास देखा है...किसी पर निर्भर रहने की बजाय स्वयं पर विश्वास करना सीख...स्वयंसिद्धा बन बेटी, स्वयंसिद्धा बन...तभी तू इस बेदर्द जमाने से टक्कर ले पायेगी ।’  


वह स्वयंसिद्धा बनेगी...वह दूसरा विवाह कर क्यों किसी की नजरों में दया का पात्र बने ? क्यों अपने तथा अपनी बेटी के जीवन की रक्षा की भीख माँगे जब उसके पास सासूमाँ और श्वसुरजी जैसे अपने हैं ? क्या अपने स्वार्थ के लिये इस उम्र में उन्हें अकेले छोड़कर जाना उचित होगा ? नहीं...कभी नहीं...वह उनका सहारा बनेगी । अपनी बेटी को भी किसी की दया पर नहीं वरन् सम्मान से पालेगी ही नहीं वरन् रहना भी सिखायेगी । वह विवाह से पूर्व भी नौकरी किया करती थी । अनुभव और योग्यता उसके पास है ही, प्रयत्न करेगी तो उसे नौकरी अवश्य मिल जायेगी...। इस निर्णय के साथ ही पिछले कुछ महीनों से उसके मन में चलता द्वंद थम सा गया । अपने निर्णय को कार्यान्वित करने के लिये वह सुबह की किरण का इंतजार करने लगी...।  

 


                                                    

        

 



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