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Sudha Adesh

Tragedy


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Sudha Adesh

Tragedy


अंततः

अंततः

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जीवन अनंत है , निरंतरता ही जीवन है । जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आते हैं । कभी अपनों के द्वारा दिए दुख की पीड़ा हमें सोने नहीं देती तो कभी दुख अपनों से दूर होने की वजह बनते जाते हैं । दूरी और क्षणिक दुख की पीड़ा तो इंसान सह भी ले पर जो पीड़ा जब तक इंसान के शरीर की किसी कमी को इंगित करते हुए पैदा की गई हो जिस पर इंसान का अपना कोई वश न हो मर्मान्तक होती जाती है ।


इंसानी जीवन की सबसे बड़ी कमी है विकलांगता... इस कमी से पीड़ित व्यक्ति को न केवल अपने कार्यकलापों में अनेकों प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है वरन दुनिया की हीन दृष्टि से भी दो-चार होना पड़ता है । अगर उसे अपने घर वालों का सहयोग मिलता है तो वह काफी हद तक सामान्य जीवन जीने का प्रयत्न करता हुआ जीवन में आगे बढ़ने लगता है वरना उसका जीवन अबूझ संसार की अंधेरी सुरंगों में खोने लगता है । ऐसा व्यक्ति न केवल स्वयं के लिए वरन समाज के लिए भी बोझ बनने लगता है । समाज की दूषित सोच यह समझ ही नहीं पाती कि अगर व्यक्ति की एक इंद्रिय काम नहीं करती है तो उसकी अन्य इंद्रियां अधिक सक्रिय हो जाती हैं । अगर उसे उसकी सामर्थ्य के अनुसार कार्य करने का अवसर प्रदान किया जाए तो वह अद्भुत कार्य कर सकता है । 


यह तो हुई विकलांगता की बात पर अगर स्वस्थ व्यक्ति केवल रंगभेद, नस्लभेद या बलात्कार के कारण अपनों तथा समाज की दुर्भावना का शिकार होकर अपना आत्मविश्वास खोने लगे तो यह हमारे समाज की खोखली सोच को ही दर्शाता है ऐसे इंसान को हेय या दया दृष्टि से देखना, उसे अपने परिवार का अंश मानने से इनकार करना एक ऐसी मानसिकता है जो मानव दर्शन और मानव जीवन के सिद्धांतों के विपरीत है । मानव जीवन समानता के सिद्धांत पर खड़ा है व्यक्ति को समान अधिकार मिले यह प्रत्येक इंसान का मौलिक अधिकार है , फिर विरोधाभास क्यों ?


अगर इस मानसिकता की शिकार लड़की हो तो स्थिति और शोचनीय हो जाती है । उसके घर वाले यह सोच- सोच कर परेशान होने लगते हैं कि कौन इसे पसंद करेगा इसका विवाह कैसे होगा इत्यादि इत्यादि .. पर यह भी सच है कि अगर उसके अपने, उसका आत्मविश्वास न टूटने दें तथा उसके हुनर को तराशें, सँवारें तो कोई कारण नहीं वह सर्वप्रिय ना बन पाए । इंसान शारीरिक सौंदर्य के कारण नहीं वरन अपने आंतरिक सौंदर्य के कारण पहचाना जाता है । वस्तुतः इंसान की पहचान उसकी कद ,काठी ,रंग नहीं उसके गुण, उसकी योग्यता होती है । अगर ऐसा न होता तो सामान्य कद काठी के महात्मा गांधी महात्मा बन पाते । अंधत्व के साथ जीवन प्राप्त करने वाली हेलेन केलर और सूरदास का नाम स्वर्णाक्षरों में ना लिखा जाता । अरुणिमा अपने नकली पैरों से एवरेस्ट फतह नहीं कर पाती ।


जहां रंगभेद, नस्लभेद, दहेज प्रथा, बलात्कार तथा विकलांगता हमारे समाज का कुरूप चेहरा है वहीं भ्रष्टाचार ,आतंकवाद ,सामाजिक बुराइयां ...अगर समय रहते इन पर लगाम नहीं कस पाये तो हम आगे बढ़ने किबबजाय पीछे ही खिसकते जाएंगे । प्रत्येक इंसान की अपनी सीमाएं हैं । बेहतर हो वह अपनी सीमाओं में रहकर ही अपने कर्तव्यों का निर्वहन करे । सीमा का उल्लंघन ना उसके लिए शोभनीय है और न समाज के लिए । समाज को सुदृढ़ बनाना है तो उसकी एक- एक इकाई को सुरक्षित रखना और उसे उचित सम्मान देना समाज का ही कर्तव्य है । अगर समाज अपना कर्तव्य भली प्रकार निभा पाये तो कोई कारण नहीं कि कहीं कोई असंतोष पनपे ।


 एक बात और कहना चाहूँगी, कुछ रिश्ते जन्म के होते हैं तथा कुछ हमारे सामाजिक परिवेश से जन्म लेते हैं । कभी-कभी हमारी भावनाएं ,अंतरंगता ऐसे रिश्तो को जन्म के रिश्ते से भी अधिक महत्वपूर्ण बना देती हैं । यही रिश्ता कायम हुआ था पूर्णिमा और आनंदी तथा कृष्णा और आकांक्षा के मध्य । पूर्णिमा जहाँ आनंदी को चाची कहती थी वही पूर्णिमा की पुत्री कृष्णा आनंदी को दादी पर उनकी पुत्री आकांक्षा को दीदी कहती थी क्योंकि आकांक्षा को बुआ कहलवाना अच्छा नहीं लगता था । कृष्णा ने उसकी बात का मान रखा । उसी रिश्ते से वह अंत तक उसकी अच्छी मित्र बनी रही ।


कुविचारों का कर अंत, सुविचारों से 

खिला दे रेगिस्तान में कमल अपने आदर्शों से 

भू पर लहलहा दे फसल प्रेम के जल से 

पराए भी होंगे अपने ,जुड़ेंगे दिल दिल से ।


सुधा आदेश


अंततः 


दार्जिलिंग के इस ओपन एयर रेस्टोरेंट में बैठे-बैठे मैं बर्फ से आच्छादित कंचनजुंगा पहाड़ियों का सौंदर्य आत्मसात कर ही रही थी कि सेल फोन बज उठा । स्नेहा को पाकर मैंने व्यग्रता से फोन उठाया मेरे कुछ पूछने और कहने से पूर्व भी वह कह उठी , ' कैसी हो ममा , डैड कैसे हैं , कैसा लग रहा है वहाँ ?'


' हम ठीक हैं । तुम्हारे डैड कॉफी लेने गए हैं , आते ही होंगे । तुम और अभिनव कैसे हो , कब लौटे सिंगापुर से ? फोन क्यों नहीं किया ? हमने कई बार फोन किया पर अनरिचेबिल बता रहा था । हम चिंता में थे ।'


'ममा, स्टॉप... स्टॉप । एक साथ इतने सारे प्रश्न... मैं "कुआलालम्पुर से बोल रही हूँ । अभिनव ने यहाँ का भी प्रोग्राम बना रखा था । कल हम जेंटिंग आयरलैंड जाएंगे । मैं भी पिछले 2 दिन से लगातार आपको संपर्क करने का प्रयास कर रही हूँ किन्तु मिल ही नहीं पा रहा था । शायद कनेक्टिविटी प्रॉब्लम थी । आपसे दूर रह कर लग रहा है कि आई लव यू टू मच ममा एंड रियली मिस यू लॉट ।'


' वी बोथ लव यू टू मच एंड आल्सो मिस यू टू बेटा... बेटा इस समय जितना तुम दोनों एक साथ बिताओगे, एक दूसरे के करीब आओगे, उतना ही रिश्ता प्रगाढ़ होगा अतः हम दोनों की चिंता छोड़ कर घूमो फिरो । ओ.के. बेटा इंजॉय योर हनीमून होल हारटेडली ।' आँखों में बरबस आए आँसुओं को पोंछते हुए मैंने कहा ।


'ओ.के .ममा, पापा को नमस्ते कहना यू ओलसो एंजॉय योर हनीमून ।' गुड बाय कहकर उसने फोन रख दिया था ।


 स्नेहा का अंतिम वाक्य सुनकर मुझे हँसी आ गई थी । यह बच्चे भी बिना सोचे समझे कुछ भी कह देते हैं । एक हमारा समय था अपने माता-पिता से इस तरह की बातें करना तो दूर ,कहने की सोच भी नहीं सकते थे । सब कुछ इतना ढका छुपा होता था मानो कोई गुनाह कर रहे हों । शायद यही पीढ़ी अंतराल है और तो और हमारे इस तथाकथित हनीमून की टिकटें भी स्नेहा ने ही बुक कराई थीं । 


उम्र के इस पड़ाव पर हनीमून लोग क्या कहेंगे... कह कर मैंने कहीं भी घूमने जाने के उसके प्रस्ताव का विरोध किया था पर स्नेहा मानी ही नहीं ...। तब उसने संजीदगी से हनीमून शब्द की व्याख्या करते हुए कहा था …


' ममा, मैं नहीं जानती कि 'हनीमून ' शब्द किसने विकसित किया तथा इसका प्रचलन कब और कहाँ से प्रारंभ हुआ ? मैं तो सिर्फ इतना जानती हूँ कि यह शब्द प्रतीक मात्र है विवाहित जोड़ों के लिए एक दूसरे को समझने का... इसमें उम्र की बाधा क्यों ? कम से कम कुछ समय तो विवाहित युगल दुनिया जहाँ से मुक्ति पाकर स्वच्छंद रह सकें । विवाह के तुरंत पश्चात ही क्यों, मन में अगर उमंग और उत्साह है तो हर उम्र में हनीमून के लिए जाया जा सकता है । अगर ऐसा ना होता तो अवसर पाते ही हर उम्र के लोग छुट्टियां लेकर घर से बाहर घूमने नहीं निकल पड़ते । घूमने फिरने से नीरस को आए जीवन को न केवल ऊर्जा मिलती है वरन इंसान भविष्य की कुछ योजनाएं बनाकर बदरंग हो आए जीवन में , नये रंग भरकर ,उनकी मधुर यादों के सहारे जीवन के कठोर धरातल की सच्चाई को सहन कर पाने की क्षमता प्राप्त कर पुनः नव उत्साह के संग जीवन के रण संग्राम में उत्तर सकता है।'


 स्नेहा की बेबाक बातें सुनकर मुझे भी महसूस हो रहा था कि वह बड़ी ही नहीं, समझदार भी हो गई है । हमारा रिश्ता माँ बेटी से अधिक मित्र का रहा है तभी वह अपनी बात इतनी आसानी से कह गई । सचमुच मधुयामिनी के लिए कोई समय सीमा या बंधन नहीं होता । दो प्रेमी युगल जहाँ भी जब भी मिलन की चाह लिए मिलते हैं वहाँ उनका मिलन अवश्यंभावी हो जाता है । उनके प्यार और विश्वास को नई नींव देने का नाम ही मधुयामिनी है । यह सच है कि वक्त गुजरने के साथ जिस्मानी से अधिक रूहानी प्यार की आवश्यकता होती है । एक ऐसे साथ की आवश्यकता होती है जिसके विश्वास के साए तले नर या नारी अपनी समस्याओं का हल ढूंढ सकें अपने सुख-दुख बांट सकें । 


मेरी जिंदगी में एक समय ऐसा आया था कि अपने माता-पिता के विरोध के बावजूद ' एकला चलो रे ' का मंत्र अपनाकर मैंने अकेले ही चलने की ठान ली थी... चली भी पर एकाएक स्नेहा मेरी जिंदगी में एक खुशबू की तरह आई और मैं अपने सारे पूर्वाग्रह त्यागकर उसे अपनाने को मजबूर हो गई थी । शशांक मेरी जिंदगी में जैसे आया था वैसे चला भी गया था । मैंने भी अपने जीवन की किताब से उसे दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका था पर स्नेहा हम दोनों के बीच ऐसा संपर्क सूत्र बन गई थी जिसके कारण न चाहते हुए भी मुझे शशांक से संपर्क बनाए रखना पड़ा । अनियंत्रित परिस्थितियों द्वारा बना यह संबंध अंततः उस पड़ाव पर आ पहुँचा जिस पर वर्षों पूर्व पहुँच कर भी मैं प्यासी रह गई थी । अचानक मेरे जीवन की पुस्तक का एक एक पन्ना मेरे सामने परत दर परत खुलने लगा …।


#######



 आज से 30 वर्ष पूर्व की दिसंबर माह की सर्द सुबह थी । मैं और मेरी छोटी बहन श्वेता कॉलेज जाने की तैयारी कर रही थीं तथा माँ पूर्णिमा रसोई घर में नाश्ता बना रही थीं । उसी समय घंटी बजी माँ ने कहा , ' कृष्णा देखना तो कौन आया है ?'


दरवाजा खोला तो आनंदी दादी को खड़ा पाया । आनंदी दादी हमारी दादी की अभिन्न मित्र ही नहीं हमारी पड़ोसन भी थीं जिन्हें हम सब भी दादी ही बुलाया करते थे ।


' प्रणाम दादी ।'


' खुश रहो बेटा, तुम्हारी माँ कहाँ हैं ?'


'दादी, माँ किचन में हैं । माँ दादी आई हैं ।' कहकर मैं अंदर चली गई ।


आनंदी दादी किचन में चली गईं तथा माँ से कहा, ' पूर्णिमा बहू , मेरी ननद शिवानी तथा ननदोई नरेन्द्र का पुत्र शशांक जो अमेरिका में नौकरी कर रहा है , एक महीने के लिए भारत आया हुआ है । मैं उसे बचपन से जानती हूँ । अगर बात बन गई तो राज करेगी तेरी बेटी... सबसे अच्छी बात तो यह है नरेंद्र भी सेवामुक्ति के पश्चात यहीं इंदिरा नगर में आकर बस गया है ।'


' माँ नाश्ता.. ।' वे दोनों बात कर ही रही थीं कि मैंने और श्वेता ने कॉलेज जाने के लिए तैयार होकर किचन में प्रवेश करते हुए कहा ।


 ' हाँ बेटा, नाश्ता तैयार है ...यह लो ।'कहते हुए माँ ने दोनों को एक-एक पेट पकड़ाई फिर आनंदी दादी की ओर उन्मुख होकर कहा ,' चाची , आप भी नाश्ता करके जाइएगा । मनीष सुबह की सैर के लिए गए हैं । आते ही होंगे उनसे भी बात कर लीजिएगा ।'


' नहीं बहू ,अभी बहुत काम बाकी है । तू तो जानती ही है आज मेरा सोमवार का व्रत है । मंदिर से लौट रही थी तो सोचा कि तुझे बताती जाऊँ । तुझे तो पता ही है तेरे सुदेश चाचा को सुबह 9:00 बजे तक नाश्ता चाहिए । समय के बड़े पाबंद हैं फौज से रिटायर हुए समय बीत गया पर फौजी तेवर आज भी बरकरार हैं और फिर आकांक्षा भी आई हुई है डिलीवरी के लिए । उसकी भी तबीयत ठीक नहीं चल रही है । अच्छा चलती हूँ फिर आऊँगी तब आराम से बातें करेंगे । अब तो भरपेट मिठाई की खानी है । अपनी श्वेता है ही ऐसी जो भी देखेगा देखता ही रह जाएगा ।'


' चाची ...।'


 माँ ने बेचैनी से कहते हुए कृष्णा और श्वेता की ओर नजर घुमाई तो पाया वे दोनों उनकी बातों से बेखबर एक दूसरे से बातें करते हुए नाश्ता कर रही हैं । संतोष की सांस लेते हुए वे आनंदी चाची को छोड़ने के लिए बाहर आई तथा धीरे से उनसे कहा.. 


' चाची, कृष्णा बड़ी है और आप श्वेता की बात कर रही हैं।'


'दुनियादारी सीख बहू , बड़ी नहीं तो छोटी ही सही... विवाह तो करना ही है । वैसे भी ऐसा रिश्ता बार-बार नहीं मिलता । '


'चाची आपने तो कभी दोनों में भेदभाव नहीं किया फिर आज क्यों ?' व्यथित होकर माँ ने कहा ।


' बहू, इंसान को कभी कभी व्यवहारिक बनना पड़ता है । मैंने शशांक की माँ मिताली से पहले कृष्णा के बारे में बात की थी पर वह तैयार नहीं हैं । उन्हें गोरी लड़की चाहिए तब मैंने उनसे श्वेता की बात की तब मिताली ने कहा ठीक है देख लेते हैं । अगर लड़के को लड़की पसंद आ गई तो रिश्ता कर लेंगे । चिंता ना कर बेटी, तेरी कृष्णा है ही इतनी गुणी कि एक दिन उसके गुणों का पारखी भी मिल जाएगा ।' व्यथित स्वर में उन्होंने उत्तर दिया तथा चली गईं ।


' अच्छा ममा हम भी चलते हैं । आज प्रैक्टिकल है , आने में शायद देर हो जाए ।' मैंने अपना बैग उठाकर बाहर जाते हुए कहा।


' ममा, मुझे भी आज आने में देर हो सकती है । कल मेरी सहेलियाँ कालेज के पश्चात ' कभी-कभी ' मूवी देखने का कार्यक्रम बना रही थीं अतः जाना ही पड़ेगा ।' श्वेता ने इठलाते हुए कहा ।


' शीघ्र आने का प्रयत्न करना । समय ठीक नहीं है...।' चलते समय माँ के शब्द हमारे कानों से टकराये ।


#######



 उस दिन मैं पूरे दिन अनमयस्क रही । आनंदी दादी की बातें सुनकर मन ही मन व्यथित थी । श्वेता के साथ बातें करते हुए भी मेरे कान माँ और दादी की बातों की ओर लगे थे । मैं जानती थी कि छिप कर दूसरों की बातें सुनना अच्छी बात नहीं है लेकिन न चाहते हुए भी जहाँ मेरा नाम आता था, ध्यान चला ही जाता था । मैं समझ नहीं पा रही थी कि रूप तो ईश्वरीय देन है फिर यह भेदभाव क्यों ? 


दुनियादारी सीख बहू, बड़ी नहीं तो छोटी ही सही... विवाह तो करना ही है वैसे भी ऐसा रिश्ता बार-बार नहीं मिलता। बार-बार दादी के कहे शब्द मेरे मन मस्तिष्क पर पत्थरों की तरह प्रहार कर रहे थे । माँ का परेशान चेहरा देखकर मैं समझ गई थी कि माँ आनंदी दादी की बातों से बेहद आहत हैं .. शायद उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ऐसा आनंदी दादी कह रही हैं जिन्होंने हर अच्छे और बुरे वक्त में उनका साथ दिया है । 


माँ ने बताया था कि आनंदी दादी और सुदेश दादाजी मेरे दादाजी अखिलेश और अलका दादी के अभिन्न मित्र रहे हैं । अखिलेश एवं सुदेश दादाजी ने साथ-साथ इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी । सुदेश दादाजी फौज में चले गए तथा दादाजी सिविलियन बनकर देश सेवा में योगदान देते रहे । कार्यक्षेत्र अलग होने के बावजूद दोनों का संपर्क बना रहा । आखिर उन्होंने एक ही जगह सेटल होने का मन बनाया तथा घर बनवाने के लिए जमीन भी पास- पास ले ली जिससे जीवन के उत्तरार्ध में उन्हें एक दूसरे के सानिध्य में रहने का सुख मिल जाए पर इंसान सोचता कुछ है और होता कुछ है .... ।


माँ के विवाह को कुछ ही दिन हुए थे कि एक दिन दादा जी ऑफिस से आए तो अत्यंत परेशान थे । पापा और दादी ने उनसे बहुत पूछा पर उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया । दादी जानती थी कि वे रेलवे क्रॉसिंग पर बनते फ्लाईओवर के प्रोजेक्ट से जुड़े हुए हैं । उसमें धांधली हो रही है । दादाजी ने इसकी शिकायत अपने सीनियर ऑफिसर से की थी पर उसने उन्हें चुप रहने के लिए कह दिया । तब उन्होंने संबंधित मंत्री के पास पत्र भेजा पर कोई कार्यवाही नहीं हुई शायद सबकी मिलीभगत थी । 


दादा जी अपने कार्य के प्रति जिम्मेदारी तथा ईमानदारी के कारण धांधली और अव्यवस्था के विरुद्ध लड़ना चाहते थे । उन्होंने प्रयास भी किया पर हर जगह से असहयोग तथा चुप रहने की शिक्षा उन्हें मानसिक रूप से परेशान करने लगी थी । एक दिन दादाजी अपने स्कूटर से घर लौट रहे थे कि पीछे से आते ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी । वह दूर जाकर गिरे । उन्हें बहुत चोट आई थी । सूचना मिलने पर जब तक पापा पहुँचे तब तक उनकी मृत्यु हो चुकी थी । उन्हें अस्पताल तक ले जाने का अवसर ही नहीं मिल पाया ।


प्रथम दृष्टया यह एक्सीडेंट का केस लग रहा था पर जब सारे घटनाक्रम पर गौर किया तो ऐसा महसूस हुआ कि यह एक्सीडेंट नहीं हत्या का मामला है क्योंकि पापा जब पुलिस में शिकायत दर्ज करवाने गए तो थाना इंचार्ज रिपोर्ट दर्ज करने में आनाकानी करने लगा । जब पापा ने इस केस को मुख्यमंत्री तक ले जाने की बात की तब उसने केस दर्ज कर लिया था पर इसके साथ ही पापा को धमकी भरे पत्र मिलने लगे । इस प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों की इस प्रतिक्रिया ने यह सिद्ध कर दिया था कि अपने मंसूबों पर पानी फिरते देखकर इन्हीं लोगों ने दादा जी को अपने रास्ते से हटाया है । दादी को जब इन धमकियों का पता चला तो उन्होंने पापा पर केस बंद करवाने के लिए दबाव बनाना प्रारंभ कर दिया था क्योंकि वह नहीं चाहती थीं कि अपने पिता की तरह पापा भी किसी अनहोनी का शिकार हो जायें । अंततः दादी की जिद के आगे पापा को झुकना पड़ा था । 


दादा जी के अंतिम यात्रा की रस्में चल रही थी कि संवेदना प्रकट करने आए कुछ नाते रिश्तेदारों ने इस घटना के लिए माँ के पैरों को दोष देना प्रारंभ कर दिया । अवसाद के उन कठिन क्षणों में भी दादी सबके सामने ढाल बनकर खड़ी हो गई थीं तथा कहा था, ' यह मेरी बहू ही नहीं , मेरे पुत्र की अर्धांगिनी भी है । इसका मुख देख रही हो, इसे भी उतना ही दुख है जितना मनीष को ...। अखिलेश एक व्यवस्था का शिकार हुए हैं इसमें इसका क्या दोष ? अगर आप सबको हमारी इतनी ही चिंता है तो उस व्यवस्था के खिलाफ हमारा साथ दीजिए जिसने मेरे पति की जान ली है । '


उस समय दादी का साथ आनंदी दादी ने दिया था । दादी के कठोर रवैये ने बड़बोलेपन की शिकार महिलाओं को मुँह छुपाने के लिए मजबूर कर दिया था । दादी की सदाशयता से माँ को ऐसा लगा मानो उनकी डूबती नैया को तिनके का सहारा मिल गया है । उस घटना ने माँ पर ऐसी छाप छोड़ी थी कि दादी का उनके हृदय में स्थान अपनी माँ से भी बढ़कर हो गया था । माँ ने दादी की देखभाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उन्हें अवसाद से उबारने का हर संभव प्रयास किया था पर दादाजी की असामयिक मृत्यु से दादी पर बुरा असर पड़ा था । वह ज्यादा दिन उनके साथ नहीं रह पाई थीं । एक हार्टअटैक ने उनकी चलती सांसो को रोक दिया था ।


दादा -दादी जी के जाने के पश्चात माँ -पापा के जीवन में एक अजीब सा सूनापन पसर गया था । पापा ने स्वयं को काम में ऐसा डुबो लिया कि न दिन का पता चलता था न ही रात्रि का । ऐसे समय आनंदी दादी ने ही माँ के सूनेपन को अपने प्यार से भरा था विशेषकर मेरे माँ की कोख में आने के समय... । यह न कर वह न कर ...की ढेर सारी हिदायतों के साथ वह माँ के खानपान पर भी विशेष ध्यान रखने लगीं थीं । जच्जगी के पश्चात मेरी देखभाल की पूरी जिम्मेदारी उन्होंने उठा ली थी । हलीदा , गुड़ और सोंठ के लड्डू , घी से तर हलवा । माँ मना करती तो कहतीं, ' बेटी , इस समय औरत का पुनर्जन्म होता है । इस समय खानपान में जरा सी चूक रह गई तो पूरी जिंदगी भुगतना पड़ेगा । इस समय तू सिर्फ अपने लिए नहीं वरन इस मासूम बच्ची के लिए भी खा रही है ।' 


ममता से भरपूर उनके वचन सुनकर माँ उनकी कोई बात टाल नहीं पाती थीं । माँ ने बताया था समय से 15 दिन पूर्व ही मेरा जन्म हो गया था । वह भी कृष्ण जन्माष्टमी के दिन रात्रि के 12:00 बजे...। उस समय पापा अपनी बिजनेस डील के सिलसिले में बाहर गए हुए थे । मुझे अपनी गोद में उठाकर आनंदी दादी ने कहा था,' पूर्णिमा तेरे घर भगवान कृष्ण पधारे हैं कन्या रूप में । वही बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें, सुतवां नाक, होठों पर मुस्कान और उनके जैसा ही सांवला रंग । मैं तो इसे कृष्णा कह कर ही बुलाऊंगी ।'


 इसके साथ ही मेरा नाम कृष्णा पड़ गया था । माँ तरह-तरह के उबटन लगाकर मुझे सजाती संवारती । एक दिन माँ मुझे उबटन लगा रही थीं कि पापा ने कहा ' तुम तो कौवे को हंस बनाने पर तुली हो । '


'आपकी बेटी है अगर आप ही ऐसी बात कहेंगे तो दूसरे तो कहेंगे ही ।' माँ ने क्रोधित स्वर में उत्तर दिया था । 


' सच्चाई को स्वीकार करना सीखो । इन उबटन वगैरह से कुछ नहीं होगा ।'


' होगा या नहीं, यह तो मैं नहीं जानती पर मन में संतोष तो रहेगा कि मैंने अपने प्रयास में कोई कमी नहीं छोड़ी ।


' माँ कौआ और हंस क्या होता है ?' पापा के जाते ही मैंने पूछा था ।


' बेटा दोनों पंछी होते हैं ।'


'कौआ और हंस... पापा क्या कह रहे थे ? ' प्रश्नयुक्त नजरों से मैंने पूछा था ।


' कुछ नहीं बेटा चल तुझे नहला दूँ ।' ढाई वर्षीय पुत्री के मन में चलते प्रश्नों को सुनकर माँ ने बात बदलनी चाही थी ।


######


मेरे जन्म के 3 वर्ष पश्चात श्वेता का जन्म हुआ । दूधिया रंग से ओतप्रोत सुंदर कन्या... पापा को तो जैसे खजाना ही मिल गया । ' मेरी बेटी ' कहकर वे उसे गोद में लेकर घूमते रहते । मैं श्वेता को उस उनकी गोद में खेलते देखकर उनकी गोद में चढ़ने का प्रयत्न करती तो वह यह कह कर झिड़क देते…' काली कलूटी अपनी माँ के पास जा, अभी मैं अपनी बेटी के साथ खेल रहा हूँ ।


' कृष्णा भी तो आपकी बेटी है । 'उनके व्यवहार से मुझे सहमता देखकर माँ मुझे अपनी गोद में लेकर कहती ।


'मेरी बेटी तो श्वेता है । इतना सांवला रंग हमारे खानदान में किसी का नहीं है । पूरी नीग्रो लगती है, पता नहीं किसके ऊपर गई है ।'


' नीग्रो ...आप जानते हैं आप क्या कह रहे हैं । आज यह छोटी है , मासूम है । जब थोड़ी समझदार होगी तो आपके इन शब्दों का इस पर क्या असर होगा, आपने सोचा है ।' माँ ने तेज स्वर में कहा था ।


' मैं जानता हूँ पर इसे देखकर ना जाने क्यों मेरे मन में वितृष्णा पैदा हो जाती है तथा मैं स्वयं को काबू में नहीं रख पाता ।' 


 उस समय माँ- पापा के बीच होती तकरार से इतना तो समझने लगी थी कि पापा मुझसे अधिक श्वेता को प्यार करते हैं । वैसे भी एक छोटे बच्चे में भी इतनी समझ तो विकसित हो ही जाती है कि सही गलत में भेद कर पाए विशेषतया तब , जब उसके स्वयं के बारे में कहा जा रहा हो । माँ पापा की ऐसी बात सुनकर परेशान हो जाया करती थीं ।


 यह निर्विवाद सत्य है कि हर माँ के लिए अपना बच्चा चाहे जैसा भी हो प्यारा ही होता है और वह चाहती है कि सभी उसकी प्रशंसा करें अतः माँ ने उसको तरह-तरह के लेप लगाकर गोरा बनाने का प्रयास नहीं छोड़ा था । उन्हें ऐसा करते देखकर एक दिन पापा ने चिढ़कर कहा,' जब देखो तब इसी के साथ लगी रहती हो, यह नहीं कि श्वेता पर भी थोड़ा ध्यान केंद्रित करो ।'


' श्वेता अभी छोटी है । कृष्णा में हीन भावना न पनपे अतः अभी श्वेता से अधिक कृष्णा को मेरे साथ की अधिक आवश्यकता है और फिर माँ होने के नाते श्वेता को जितनी देखभाल की आवश्यकता है उतना तो मैं कर ही रही हूँ । फिर यह बेबुनियाद आरोप क्यों …?' ना चाहते हुए भी माँ के मुँह से निकल गया ।


 पापा ने कोई उत्तर नहीं दिया था अक्सर पापा की ऐसी वैसी बातें सुनकर माँ कुढ़ कर रह जाया करती थीं । जब अपने ही वार करें तो दंश और गहरा होता जाता है । माँ के मन में एक चिंता पनपने लगी थी कि मेरी मासूम बच्ची उम्र बढ़ने के साथ कहीं दुनिया के व्यंग्य वाणों का शिकार होकर हीन भावना की शिकार ना हो जाए अतः स्वयं को तसल्ली देने के लिए अपने प्रयोग भी जारी रखतीं । माँ का मूल मंत्र था इंसान को कभी हार नहीं माननी चाहिए शायद इसी में उसकी सफलता का राज छुपा है ।



######


 हम दोनों बहनों में तीन वर्ष का अंतर था । हर गुजरता पल जिंदगी के खट्टे -मीठे रूपों से परिचय करवा रहा था । एक ही माँ की कोख से जन्म लेने के बावजूद मेरे और श्वेता के स्वभाव और रंग रूप में जमीन आसमान का अंतर था । एक शांत और गंभीर नदी के ठहरे जल के सदृश, वहीं दूसरी चंचल हिरणी की तरह कुलांचे भरती, पहाड़ी नदी के समान उफनती, कल -कल के शोर से धरती और आकाश को गुंजायमान करती, एक सांवले किंतु तीखे नाक नक्श वाली तथा दूसरी दूधिया रंग से ओत प्रोत आकर्षक कन्या...।


' ममा श्वेता गोरी और मैं काली क्यों हूँ ?' एक दिन मैंने स्कूल से आकर माँ से प्रश्न किया था ।


' क्या हुआ बेटा, किसी ने कुछ कहा क्या ?'


' मम्मा रुचि कह रही थी कि लगता ही नहीं है कि तुम दोनों बहने हो क्योंकि श्वेता गोरी और तुम काली हो ।' रुचि का साथ सुरेखा ने भी दिया था ।


' बेटा, तुम्हें भगवान ज्यादा प्यार करते हैं इसलिए उन्होंने तुम्हें अपना रंग दे दिया है । देखो भगवान कृष्ण और श्रीराम भी तो तुम्हारी तरह सांवले हैं फिर भी लोग उनको पूजते हैं । जानती हो क्यों ?' माँ ने उसे अपने अंक में लेते हुए कहा ।


' क्यों माँ …?'


'उनके गुणों के कारण... समझदार लोग इंसान के गुण देखते हैं ना कि रंग रूप को । अतः अपने रंग को लेकर अपने मन में कोई भी दुर्भावना ना पाल मेरी बच्ची । अपने गुणों का विकास कर , पढ़ने में मन लगा । देखना एक दिन यही लोग जो तुझे चिढ़ाते हैं , तेरी योग्यता और गुणों के कारण तुझे मान सम्मान देंगे । वस्तुतः व्यक्ति की योग्यता ही व्यक्ति को सुंदर या कुरूप बनाती है । यही कारण है कि कभी-कभी सुंदर व्यक्ति भी योग्यता के अभाव में हँसी का पात्र बन जाता है ।'


 माँ ने मुझे घर के मंदिर में लगी फोटो दिखाकर संतुष्ट करने का प्रयास किया था किंतु मैं कभी भी उनके उत्तर से संतुष्ट नहीं हो पाई थी । 


एक दिन पापा ऑफिस से आकर बैठे ही थे कि श्वेता ने उनकी गोद में बैठते हुए कहा , 'पापा अगले महीने मेरी बर्थडे आ रही है । मुझे अपनी बर्थडे पर बड़ी सी डॉल चाहिए ।


' पापा मुझे भी...।' कहते हुए मैंने उनकी गोद में बैठना चाहा ।


' अरे कृष्णा यह तूने क्या किया ? मेरा शर्ट गंदा कर दिया । जैसी काली तू है वैसे ही तेरे हाथ हैं । जा, जाकर हाथ मुँह धोकर आ ।' मुझे हटाते हुए पापा ने कहा ।


' काली.. क्या कहा आपने ?' माँ ने तीव्र स्वर में कहा था ।


' सत्य सुना तुमने, एक तो रंग काला ...ऊपर से साफ भी नहीं रहती ।' पापा ने क्रोध से कहा ।


' बच्ची है । शर्ट पर जरा सा दाग लग गया तो आपको इतना बुरा लग रहा है पर इस मासूम बच्ची के मन पर आप कितने गहरे दाग लगा रहे हो, एहसास भी है । यह कोई गैर नहीं , आपका ही अंश है ।' मुझे डरा सहमा देख माँ ने मुझे अपने अंक में समेटते हुए कहा ।


' बहुत प्यारी है तुम्हें ...तो जरा इसे साफ़ रखा करो ।' कहते हुए पापा ने श्वेता को गोद से उतारा और अपने कमरे में चले गए ।


' ममा हाथ तो मेरे भी गंदे हैं फिर पापा ने दीदी को ही क्यों डांटा ?' नन्हीं श्वेता ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी ।

श्वेता की बात सुनकर माँ मौन रह गई थीं । शायद वह पापा के विरुद्ध कुछ कहकर अपनी बच्चियों के मन में कोई द्वेष नहीं पैदा करना चाहती थीं । माँ हम दोनों को लेकर दूसरे कमरे में चली गईं । उस समय मैं 8 वर्ष की थी । अब तक मुझे समझ में आने लगा था कि मेरे सांवले रंग के कारण पापा मुझे प्यार नहीं करते हैं । पर इसमें मेरा क्या अपराध ? बाहर तो बाहर घर में भी... यही कारण था कि पापा तथा अन्य लोगों के जब तक किए व्यंग्य वाणों से घायल होकर मैं माँ की गोद में छिप कर रोने लगती थी । इस बार भी ऐसा ही हुआ था ।


 उस रात माँ की बेचैनी तथा उसके कुछ वर्ष पश्चात लिए निर्णय को मैं बाद में समझ पाई थी... शायद उन्हें पापा की बौनी मानसिकता पर क्रोध आया था । वैसे तो सदा से ही रंगभेद ,नक्सलवाद की आलोचना होती रही है । गोरे लोग रंगभेद के कारण काले लोगों से नफरत करते थे, उन्हें अपना दास बना कर रखते थे । महात्मा गांधी भी इसी भेदभाव के कारण अपनी बैरिस्टर की पढ़ाई छोड़कर अंग्रेजो के खिलाफ आंदोलन में कूद पड़े थे । गोरे तो चले गए, स्वतंत्रता भी मिल गई पर हम भारतीय अभी भी रंगभेद से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं । आश्चर्य तो तब होता है जब हम अपने ही बच्चों से रंगभेद , नस्लवाद की मानसिकता के कारण भेदभाव कर कटुता के बीज बोने लगते हैं... रंग रुप तो ईश्वर ही देन है फिर इतना नफरत क्यों ?


पापा तो पापा धीरे-धीरे श्वेता भी पापा के पद चिन्हों पर चलने लगी थी । अपने ही घर में वैमनस्यता के बीज बोए जाते देख माँ परेशान हो उठी थीं । आखिर ऐसा कब तक होता रहेगा ? क्या होगा जब इन बीजों की फसल लहलहाने लगेगी …? इन प्रश्नों से छटपटाती माँ की अंतरात्मा उन्हें विचलित करने लगी थी । घर में दो गुट स्पष्ट नजर आने लगे थे ।


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 उस दिन पापा के ऑफिस में पार्टी थी । पापा माँ और श्वेता को तो ले जाने के लिए तैयार थे पर मुझे नहीं । उनके इस रवैए के कारण माँ ने भी जाने से मना कर दिया । उस दिन माँ की सहनशीलता का बांध टूट गया था । उस दिन वह मुझे अपने सीने से चिपका कर बहुत देर तक रोती रही थीं । माँ ने निश्चय कर लिया था कि वह अपनी पुत्री के प्रति किसी को भी भेदभाव नहीं करने देंगी । करने भी क्यों दें , बच्चे की हर कमी के लिए चाहे वह बच्चे के लिंग से संबंधित हो या उसके रंग रूप, बुद्धि और चातुर्य से संबंधित हो, समाज की उंगलियां सदा स्त्री की ओर ही क्यों उठती हैं ? जबकि यह निर्विवाद सत्य है कि बच्चे का जन्म माता-पिता दोनों के क्रोमोजोम में स्थित जींस के मिलने से होता है । जिनके जींस जितने ज्यादा प्रभावशाली होंगे , बच्चा उसी पर अधिक जाएगा । कभी-कभी एक या दो पीढ़ी छोड़कर भी बच्चों में वंशानुगत गुण दोष आते हैं । 


माँ को किसी से पता चला था कि पापा की परदादी भी छोटे कद की तथा साँवली थीं । शायद कृष्णा उन पर गई हो ...पर दुनिया को सबसे क्या उसे तो ताने देना या बात का बतंगड़ बनाना ही आता है । पर जब बच्चे का अपना पिता ही बच्चे के साथ पराए पन का व्यवहार करें तो दुनिया का मुँह माँ के लिए बंद कर पाना संभव ही नहीं हो सकता । यही बात माँ को अक्सर परेशान किया करती थी तथा पापा से तकरार का कारण भी बनती थी । उन्हें लगता था कि जब तक उनकी पुत्री छोटी है उनकी बात का अर्थ नहीं समझ पाती है तब तक तो ठीक है किंतु बड़े होने पर कहीं वह कुंठित या हीन भावना की शिकार ना हो जाए । 


दूसरे दिन माँ ने मुझे स्कूल जाने से रोक लिया तथा पापा के ऑफिस तथा श्वेता के स्कूल जाने के पश्चात उन्होंने मेरे और अपने कुछ कपड़े तथा मेरी कुछ किताबें बैग में रख लीं तथा एक पत्र डाइनिंग टेबल पर रख कर मुझसे चलने के लिए कहा ।


'माँ हम कहाँ जा रहे हैं ?'


माँ ने मेरी बात का कोई उत्तर नहीं दिया तथा ऑटो रुकवा कर उसमें बैठकर ऑटो वाले को पता बताया तथा चल दीं । करीब आधे घंटे पश्चात ऑटो एक घर के सामने रुका माँ ने मुझसे कहा, ' कृष्णा यह मेरी बहुत अच्छी मित्र सीमा का घर है । कुछ दिन हम यही रहेंगे ।'


' माँ, पापा और श्वेता कैसे रहेंगे ? उन्हें खाना बनाकर कौन देगा ?' मैंने जिज्ञासा वश पूछा था ।


' तेरे पापा हैं न श्वेता की देखभाल करने के लिए ।' माँ ने निर्लिप्त स्वर में उत्तर दिया था ।


उस दिन मैं यह सोचकर बहुत घबरा गई थी कि क्या माँ पापा का घर छोड़ कर आ गई हैं ? क्या पापा माँ और मुझे लेने आएंगे ? अगर नहीं आए तो ...।


माँ ने मेरे मन की स्थिति समझकर कहा, ' बेटा, हम कुछ दिन ही यहाँ रहेंगे ।'


 सीमा आँटी जो राजकीय विद्यालय में शिक्षिका थीं, हमारा ही इंतजार कर रही थी । हमारे पहुँचते ही हमारा सामान एक कमरे में रखते हुए उन्होंने कहा , 'पूर्णिमा, यह तुम्हारा कमरा है । जब तक तुम फ्रेश हो, मैं चाय बनाती हूँ और बेटा आप ...लो यह कहानी की कुछ किताबें । अनिश्चय की स्थिति में मैं किताबें पलटने लगी तथा माँ सीमा आँटी के साथ किचन में चली गईं । कमरे में बैठे-बैठे भी मेरे कान उनकी ओर ही लगे हुए थे ।


'पूर्णिमा , तुम आई हो बहुत अच्छा लग रहा है । बुरा ना मानना पूर्णिमा पर क्या ऐसे बिना बताए घर छोड़ना उचित है । कम से कम अपनी मासूम बच्चियों का ख्याल रखते हुए इस समस्या का दूसरा हल भी निकाल सकती थीं ।'


' सब कुछ करके हार गई सीमा । जब कोई अन्य उपाय नहीं बचा तब सोचा यह अंतिम प्रयास, कुछ दिनों की दूरी शायद मनीष की मनःस्थिति में परिवर्तन ला पाए ।' माँ की आवाज कहीं दूर से आती प्रतीत हो रही थी ।


तो क्या माँ ने मेरे कारण घर छोड़ा है ? मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूँ ? लगभग एक हफ्ता होने जा रहा था । माँ की सूनी होती आँखें तथा दिल का दर्द मुझसे छुपा नहीं था । एक दिन मुझसे रहा नहीं गया तथा माँ से कहा…


' माँ, बहुत दिन हो गए हैं । अब घर चलो ।'


' चलेंगे बेटा , पर कुछ दिन और रुक कर ।' माँ ने कहा ।


एक दिन माँ मुझे पढ़ा रही थीं कि घंटी बजी । मैंने दौड़ कर दरवाजा खोला तो सामने सीमा आँटी तथा उनके पीछे पापा को खड़ा पाया...।


' ममा , पापा आए हैं ।' कहते हुए मैं पापा से चिपक गई तथा पुनः कहा , ' पापा आपके बिना हमें अच्छा नहीं लग रहा है । श्वेता कैसी है ? उसकी बहुत याद आती है । हमें अपने घर ले चलिए ।'


कितनी प्यारी और मासूम बच्ची है कृष्णा और मैं व्यर्थ ही इससे नफरत करता रहा था । अपनी पुत्री की प्यारी मासूम बातों ने मनीष के दिल को झकझोर दिया । उन्हें अपने पूर्व के व्यवहार पर शर्मिंदगी होने लगी ।


' बेटा , मैं आपको और आपकी मम्मा को ही लेने आया हूँ ।' पापा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा ।


 ' पूर्णिमा जीजाजी तुम्हें ढूंढते -ढूंढते स्कूल आए थे । उनकी चिंता देखकर मैं उन्हें मना नहीं कर पाई तथा अपने साथ ले आई ।' सीमा ने सफाई देते हुए कहा ।


' पूर्णिमा , मुझे क्षमा कर दो । कुछ दिन की दूरी ने मुझे एहसास करा दिया है कि तुम मेरी जिंदगी का अहम अंग बन चुकी हो । मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता। श्वेता भी तुम दोनों को याद कर रोती रहती है । सीमा ने ठीक ही कहा है पति -पत्नी के रिश्ते में प्यार और विश्वास के साथ एक दूसरे की भावनाओं का आदर करने की इच्छाशक्ति भी होनी चाहिए । मैं जानता हूँ तुम भी मुझसे अलग नहीं रहना चाहतीं । तुमने जो किया वह कृष्णा के लिए किया है । मैं क्षमा प्रार्थी हूँ । भविष्य में मैं तुम्हें कोई शिकायत का मौका नहीं दूँगा ।'


 पापा ने सीमा आँटी को धन्यवाद दिया तथा माँ से क्षमा माँग कर सम्मान पूर्वक घर ले आए ।


 घर आते ही माँ श्वेता को लेने आनंदी दादी के घर गईं । श्वेता माँ को देखकर उनसे लिपट कर रोने लगी । माँ ने उसे गोद में उठाकर प्यार किया पर आनंदी दादी चुप न रह पाई । उनके प्रश्न पर माँ ने सिर्फ इतना कहा ...


'चाची, क्या आप सोचती हैं कि मैंने यह सब खुशी- खुशी किया ? इसके अतिरिक्त मेरे पास अन्य कोई उपाय भी तो नहीं था शायद अब मेरा खुशहाल घर का सपना साकार हो पाएगा ।'


'शायद तेरा सोचना सही हो क्योंकि इस एक हफ्ते में मनीष में काफी बदलाव आया है । कहाँ-कहाँ नहीं खोजा उसने तुम्हें ...तेरे मायके भी फोन किया था । वहाँ न पाकर तेरे सभी मित्रों से पूछा । कहीं न मिलने पर सीमा का ख्याल आया जिसके बारे में तूने उसे कुछ दिन पूर्व ही बताया था । आज वह श्वेता को मेरे पास छोड़कर सीमा को ढूँढने गया था । लगता है तुम दोनों वही मिले हो पर तू अपने मायके क्यों नहीं गई ?


' चाची, मेरी सोच थी कि मनीष सर्वप्रथम हमें वही ढूंढेंगे । वहाँ रहने पर शायद मुझे यह लाभ नहीं मिलता जो मैं चाहती थी । इसके अतिरिक्त मैं मनीष के बारे में वह सब बता कर मायके में उनका अपमान नहीं करना चाहती थी ।'

 

तूने ठीक किया बेटा इज्जत इंसान बहुत मेहनत से कमाता है पर गँवाने में समय नहीं लगता । गनीमत है मनीष ने तुम्हारी कहीं चले जाने की बात उन्हें नहीं बताई वरना वे नाहक परेशान होते ।'


' अच्छा चाची चलती हूँ, देखूँ घर को...मेरे न रहने से पता नहीं कैसा हाल है ।'


'ठीक है बेटा संभाल अपना घर परिवार ...।'


इस घटना के पश्चात पापा का व्यवहार मेरे प्रति सदा के लिए बदल गया था ।'


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 सब कुछ ठीक-ठाक होने के बावजूद कहीं ना कहीं अपने रंग रूप को लेकर मेरे अंतर्मन में एक गांठ बनती गई । जिसके कारण में अपरिचितों से मिलने में कतराने लगी थी । बस एक आकांक्षा दीदी ही मेरे दिल का हाल समझती थीं तथा पढ़ाई में भी मेरी हर संभव मदद कर दिया करती थीं । कुछ दिनों पूर्व भी उनका विवाह हो जाने के कारण मैं स्वयं को बेहद एकाकी महसूस करने लगी थी । 


स्कूल में भी मेरे ज्यादा मित्र नहीं बन पाते थे । स्कूल में पल्लवी ही एकमात्र मित्र थी जो अपनी विकलांगता के कारण मुझसे भी अधिक दुखी रहती थी । उसे बचपन में पोलियो हो गया था काफी इलाज के बावजूद उसका पैर ठीक नहीं हो पाया था । उसके लंगड़ा कर चलने के कारण कक्षा में सहपाठी उसका मजाक बनाया करते थे । उनकी बातें सुनकर वह रोने लगती थी । तब मैं ही उसकी ढाल बनकर सब से मोर्चा लेने का प्रयत्न किया करती थी । मेरे इस प्रयत्न पर वे हृदयहीन यह कहने से नहीं चूकते थे ...वाह क्या राम मिलाई जोड़ी है एक काली दूसरी, लंगड़ी ।


 नतीजा यह हुआ कि हम एक दूसरे के करीब आते गए । धीरे-धीरे हम दोनों ने किसी की भी बात पर ध्यान देना छोड़ कर अपना सारा ध्यान पढ़ाई में लगा दिया । एक दिन इंग्लिश टीचर प्रतिमा का ध्यान मेरी ओर गया । मैं कक्षा की पहली लड़की थी जो सारा होमवर्क करके लाती थी तथा जिसके निबंधों में मौलिकता रहती थी । स्कूल में डिबेट कंपटीशन हो रहा था । प्रतिमा मेम ने मुझे एक टॉपिक दिया तथा उस पर कुछ लिखकर लाने के लिए कहा । उस टॉपिक पर मेरे विचारों ने प्रतिमा मैम को अत्यंत प्रभावित किया । उन्होंने मुझे वाद विवाद प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए न केवल प्रेरित किया वरन तैयारी में भी मार्गदर्शन किया । मेरी प्रसन्नता का पारावार न रहा जब वाद विवाद प्रतियोगिता में मुझे प्रथम स्थान मिला । तब न केवल प्रतिमा मेम वरन प्रधानाचार्य से भी मुझे बधाई मिली थी ।


जब मैं प्राइज लेकर घर आई तो मम्मी पापा की आँखों में आँसू आ गए थे । मम्मा ने गले से लगाया तो पापा ने भी ढेरों आशीष दिए । उस दिन मुझे महसूस हुआ था कि ममा ठीक कहती हैं कि किसी व्यक्ति की पहचान उसके रंग रूप से नहीं वरन गुणों के कारण होती है । उस एक पल ने मेरी जिंदगी बदल दी थी । तबसे मैं लगातार आगे बढ़ते गई । डिबेट ,ड्रामे में भाग लेने के साथ-साथ हर कक्षा में भी अव्वल आती । खुशी का ठिकाना न रहा जब आठवीं कक्षा में अपने स्कूल के चार सेक्शन में प्रथम तथा पल्लवी द्वितीय आई । तब न केवल अपने स्कूल के वार्षिक कार्यक्रम में प्रथम आने के लिए प्राइज मिला वरन स्कूल की बेस्ट गर्ल से भी नवाजा जाना बेहद सुकून दे गया था ।


नवमी कक्षा के पश्चात मेरे और पल्लवी के रास्ते अलग हो गए । पल्लवी ने आर्ट के विषय चुने तथा मैंने साइंस के ...। वह वकील बनना चाहती थी जबकि मैं डॉक्टरेट कर अध्यापिका । मैंने और पल्लवी ने अपने -अपने क्षेत्र में सफलता का सिलसिला न केवल कायम रखा वरन स्कूल और बाद में कॉलेज में भी वाद-विवाद एवं सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं में भाग लेकर अपनी दक्षता का भी लोहा मनवाते रहे । मेरी बढ़ती उपलब्धियों के कारण जो लोग अब तक मेरे रंग रूप को लेकर ताने देते आए थे वही अब मेरा उदाहरण अपने बच्चों के सामने पेश कर उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करने लगे थे। यही स्थिति पल्लवी की भी थी ।


बहुत सारे अंतर विरोधियों के बावजूद ममा ने मेरी और श्वेता की उचित परवरिश के साथ उचित संस्कार देने का भरपूर प्रयास किया था पर फिर भी अपने स्वभाव के कारण मैं धीरे-धीरे आत्मकेंद्रित होती चली गई और श्वेता चंचल हिरनी की तरह उन्मुक्त होती गई । वह प्रत्येक नई और अच्छी चीज पर अपना हक समझने लगी थी । 


श्वेता अक्सर मेरे कपड़े पहन कर कॉलेज या पार्टी में चली जाया करती तथा गंदे होने पर इधर-उधर पटक देती थी । तब मैं ही उन्हें धोकर और प्रेस करके वार्डरोब में रखती थी । मैं अपने कपड़े तो सहेजती ही थी, साथ में श्वेता के कपड़ों तथा अन्य सामान को भी सहेज देती क्योंकि श्वेता को सिर्फ पहनना आता था सहेजना नहीं । कोई भी नया कपड़ा आता , पहले श्वेता ही पहनती । वह कॉलेज भी नित नई -नई ड्रेस पहनकर तथा अच्छी तरह सज संवर कर जाना चाहती थी जबकि मैं नए और अच्छे कपड़ों को विशिष्ट अवसरों पर ही पहनना चाहती थी । यद्यपि जब भी ममा कपड़े या अन्य सामान खरीदतीं तो दोनों के लिए बराबर खरीदतीं लेकिन उसमें से जो भी श्वेता को पसंद आ जाता वह उसे अपने शरीर से लगाते हुए कहती, 'ममा, देखो यह रंग मेरे ऊपर कितना अच्छा लग रहा है । इसे मैं ले लूँ । ' 


ममा के उत्तर देने से पूर्व भी मैं कहती, ' यदि तुम्हें अच्छा लग रहा है तो ले लो मेरे पास तो वैसे ही बहुत है । '


' थैंक्यू दीदी ...।' कहते हुए वह मेरे गले से झूल पड़ती ।


श्वेता , पापा और मेरी शह के कारण मनमानी करने लगी थी । मैं श्वेता को बेहद चाहती थी... चाहती भी क्यों ना वह मेरी छोटी बहन होने के साथ-साथ मेरी मित्र भी थी । उसकी छोटी-छोटी हरकतों पर ध्यान न देना मेरी आदतों में शुमार हो गया था । माँ को श्वेता का मेरी हर चीज छीन लेना अच्छा नहीं लगता था । ऐसी घटनाओं पर माँ को मुझ पर बेहद क्रोध आता था । उन्हें महसूस होता था कि मैं अपनी छोटी बहन की खुशियों के लिए अपनी खुशियों का बलिदान कर रही हूँ । क्यों नहीं मैं अपने अधिकार के लिए लड़ती ?


 माँ के समझाने पर मैं कहती,' ममा, संतुष्टि जीवन का सबसे बड़ा सुख है । यदि संतुष्टि नहीं है तो मानव के लिए संसार की समस्त सुख सुविधाएं निरर्थक हैं । मुझे क्षणिक सांसारिक वस्तुओं से कोई मोह नहीं है । इनकी अपेक्षा मैं मन की स्वच्छता, सुंदरता एवं आत्मानुशासन को महत्वपूर्ण मानती हूँ और यही कामना है कि मैं इनकी प्राप्ति हेतु सतत प्रयत्नशील रहूँ ।'


' तू नहीं सुधरेगी ।' मेरी बात को सुनकर ममा की किंचित क्रोध से कहतीं । 


 ऐसा नहीं था कि श्वेता मुझे चाहती नहीं थी किंतु पिता के अत्यधिक लाड प्यार ने उस रूप गर्विता लड़की को थोड़ा दंभी बना दिया था । तभी उसका सारा समय अपनी खूबसूरती निखारने तथा साज संवार में ही चला जाता था । वह तरह-तरह के उबटन लगाती, इंपोर्टेड पाउडर ,लिपस्टिक का उपयोग करती । नित नई- नई ड्रेस के बारे में सोचने और बनवाने में तथा इधर-उधर घूमने में उसका काफी समय चला जाता था । 


भरपूर आत्मविश्वास से युक्त अपनों के सहयोग से मैं निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती जा रही थी किंतु आज आनंदी दादी की बातों ने मेरे आत्मविश्वास को चूर-चूर कर दिया था । अपनी जिस कमी को मैं भूल चुकी थी आज वही मेरे सम्मुख एक बार फिर मुँह उठाए खड़ी थी ।


' दीदी, मैं टिफिन घर ही भूल आई । प्लीज दीदी, आप ले आओ । आप अपनी प्रैक्टिकल क्लास में थोड़ी देर से पहुँचोगी तो कोई कुछ नहीं कहेगा पर अगर मैं लेट हो गई तो सिन्हा सर क्लास में घुसने नहीं देंगे । मैं आपसे बाद में आकर ले जाऊंगी । ' श्वेता ने साइकिल चलाते हुए कहा ।


' ठीक है ।' श्वेता की आवाज सुनकर विचारों के वलयों से बाहर आते हुए मैंने कहा तथा साइकिल घर की ओर मोड़ ली । 


 घर लौटकर घंटी बजाने ही जा रही थी कि पापा की आवाज सुनाई पड़ी,'सूचना तो तुम बहुत अच्छी दे रही हो पूर्णिमा । आज ही नरेंद्र जी से बात करके आता हूँ ।'


' बड़ी तो कृष्णा है पर विदेश से लौटे लड़की को क्या अपनी कृष्णा पसंद आएगी ? आजकल तो लोग मन की सुंदरता की जगह तन की सुंदरता पर अधिक ध्यान देते हैं ।' मां ने चिंतित स्वर में कहा था । चाहकर भी शायद माँ पापा को आनंदी दादी की पूरी बात नहीं बता पा रही थीं ।


' इसमें चिंता की क्या बात है , कह दूँगा मेरी दो बेटियां हैं जो भी पसंद आए उससे अपने पुत्र का विवाह कर दें । इससे न कृष्णा को बुरा लगेगा और ना ही श्वेता को ।' सहज स्वर में पापा ने कहा था ।


' हाँ , दो ही तो बेटियां हैं । कितनी चाहत थी एक बेटा हो जाए । शास्त्रों में लिखा है जब तक पुत्र अग्नि न दे, मोक्ष नहीं मिलता है ।' ममा ने पापा की बात दोहराते हुए अपने मन की व्यथा कही । 


'पूर्णिमा, बार-बार वही बात कितनी बार तो कह चुका हूँ मुझे बेटा नहीं, बेटी की ही चाह थी। भगवान ने मेरी इच्छा पूरी कर दी । वैसे भी जो प्राप्य है उसी में संतोष कर जीवन को सुखमय बनाना ही मानव धर्म है । बेटियां आजकल पुत्रों से कम है क्या ? मेरा तो यही प्रयत्न है कि दोनों उचित शिक्षा प्राप्त कर अपने पैरों पर खड़ी हो सकें , फिर उन्हें किसी उपयुक्त वर को सौंपकर हम निश्चिंतता का जीवन व्यतीत कर सकें ।


' पर मोक्ष...।'


' फिर वही बात ...अगर बेटा नालायक निकल गया तो मोक्ष तो दूर इसी जन्म में नर्क भुगतना पड़ेगा । देख नहीं रही हो अपने माँ- पापा को ...।' इस बार तीव्र स्वर में पापा ने कहा था ।


ममा को पापा से ऐसे उत्तर की आशा नहीं थी । दरअसल ममा, दो भाई और एक बहन हैं । उनके पिता अच्छे पद से रिटायर हुए हैं । पैसे की भी कोई कमी नहीं है पर आज यह स्थिति है कि उनके दोनों भाइयों में से कोई भी उन्हें अपने पास नहीं रखना चाहता । वह अकेले रहते हैं । इसके साथ ही उन्होंने एक वृद्ध आश्रम में भी एक कमरा बुक करा लिया है ...अगर स्वास्थ्य कारणों से कभी अकेले नहीं रह पाए तो वहीं चले जाएंगे । 


एक बार नानी बहुत बीमार पड़ गई थी ममा ने अपने माता- पिता से अपने साथ रहने की पेशकश की पर वह नहीं माने क्योंकि नानी का कहना था अब तो ऐसी परिस्थितियां अक्सर ही आयेंगी...। कब तक मैं बार-बार बेटी के पास आकर रहूँगी ? जैसा होगा वैसा कर लेंगे ।


तब नाना -नानी की परेशानी देख ममा ने स्वयं अपने भाइयों से बात की तो बड़े भाई विजय ने झल्ला कर कहा ,' मेरे पास स्वयं की ही इतनी परेशानियां हैं । उनको निपटायें या माता-पिता को संभालें ।'


 छोटे भाई अजय ने भी टका सा जवाब दे दिया ,'दीदी , मुझे तो ऑफिस से ही समय नहीं मिलता । सरिता बीमार चल रही है । उससे अपना ही काम नहीं होता, वह माँ पापा को कैसे संभाल पाएगी ? बुरा ना मानो दीदी, एक बात कहूँ, कुछ दिन तुम ही माँ-पापा को अपने पास रख लो ।'


माँ चुप रह गई थीं । कहती भी तो क्या कहती ! नाना -नानी उनके पास आना ही नहीं चाहते थे । ममा ने फोन रख दिया था । उन्हें पता था उनकी पत्नी सरिता इस वाद -विवाद को खूब मजे लेकर सुन रही होगी तथा कहा भी होगा, ' ठीक कहा जी आपने, करना कोई नहीं चाहता बस सब उपदेश देना ही जानते हैं हम ही क्यों उनकी जिम्मेदारी लें।'


 और अजय बिना कोई प्रतिवाद किए सदा की तरह अपने काम में लग गया होगा । ना जाने क्यों तब माँ को अपने भाइयों पर बहुत क्रोध आया था । वे दोनों माता- पिता की जायदाद में हिस्सा तो चाहते हैं पर उन्हें अपने पास रखना मंजूर नहीं था । नाना -नानी के न आने पर ममा कुछ दिन स्वयं उनके पास जाकर उनकी सेवा कर आया करतीं थीं । 


एक बार ममा के लौटते समय नानी ने मुझे अपने पास बिठाते हुए भरी आँखों से कहा था, ' ना जाने क्यों लोग बेटी के होने पर मातम मनाते हैं । तू बहुत खुशनसीब है पूर्णिमा , तेरी पुत्रियां है कभी इन्हें कोई दुख ना होने देना । '


इस सबके बावजूद ममा के मन में असंतोष ...यह सच है कि पुत्र और पुत्री दोनों से ही परिवार रूपी इकाई को संपूर्णता मिलती है । एक स्त्री होने के नाते ममा के दर्द को समझ सकती थी पर यह मोक्ष ...समझ से परे था । ना चाहते हुए मैंने घंटी बजा दी । ममा मुझे देखकर चौंकी थीं । टिफिन छूट गया था, जानकर उन्होंने संतोष की सांस ली । मैंने टिफिन उठाया और कॉलेज चली आई पर मन में नाना- नानी के प्रति संवेदना जाग उठी थी । ना जाने कैसे लोग हैं जो माता-पिता से कर्तव्यों की आस तो करते हैं पर समय आने पर अपने कर्तव्यों को भूल कर उन्हें विवशता भरी जिंदगी जीने के लिए मजबूर कर देते हैं ।


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श्वेता को जब पता चला कि विदेशवासी शशांक के साथ उसके रिश्ते की बात चल रही है तो उसका अधिकांश समय ब्यूटी पार्लर के चक्कर लगाने में व्यतीत होने लगा । कभी फेशियल, कभी हेयर कटिंग तो कभी मैनीक्योर ,पेडीक्योर...। एक दिन उसने कहा मम्मा कुछ मोटी हो गई हूँ, सोच रही हूँ, कुछ दिनों के लिए हेल्थ क्लब ज्वाइन कर लूँ, कुछ तो स्मार्टनेस आ जाएगी ।'


 ममा चाहकर भी नहीं कह पाई थीं । दो-चार दिन में स्मार्टनेस कैसे बढ़ जाएगी ? दर्जनों महंगे से महंगा सूट रखे होने के बावजूद भी उसके मुख से यही निकलता मम्मा एक भी अच्छा सूट नहीं है मेरे पास । क्या पहनूँगी ।'


' सूट का क्या होगा ? मेरी कोई भी बनारसी साड़ी पहन लेना ।'


'मम्मा , आप भी कौन सी सदी की बातकर रही हो !! भला विदेश में रहने वाला लड़का साड़ी पहनने वाली लड़की को कैसे पसंद करेगा ?' 


 सच में श्वेता पापा के साथ जाकर जरी के काम का गुलाबी रंग का सूट खरीद लाई । पता नहीं कैसे उसके अवचेतन मन में यह बात समा गई थी कि शशांक उसे ही पसंद करेगा ।


 श्वेता का अतिउत्साह देख कर मुझे भी लगने लगा था कि मेरे जैसी साँवली लड़की को भला कोई क्यों पसंद करेगा ? निज सोच के कारण निर्लिप्त मन से मैं पूर्व की भांति अपनी दिनचर्या में व्यस्त रही । 


नियत तिथि पर शशांक आ गया । पापा ने नरेंद्र जी को सपरिवार घर आने की दावत दे दी । दावत तो एक बहाना थी मुख्य उद्देश्य तो लड़का लड़की को आपस में मिलवाना था । बिना दीपावली के ही घर में दीपावली जैसा माहौल बन गया था । पूरे घर की साफ -सफाई की गई । नए पर्दे बनवाए गए, यहाँ तक कि खाने के लिए भी नई क्रोकरी खरीदी गई । दिखावे पर इतना खर्च करने के लिए ममा के टोकने पर पापा ने कहा , ' मैडम परेशान क्यों हो रही हो ...यही क्रोकरी हम विवाह में दे देंगे । एक बार प्रयोग में लाने पर खराब तो नहीं हो जाएगी ।'


आखिर वह दिन भी आ गया जब शशांक को आना था । शाम के नाश्ते के साथ- साथ रात्रि भोज का भी इंतजाम था । मैं कॉलेज से छुट्टी लेकर जहाँ ममा के साथ रसोई में लगी हुई थी वही श्वेता ब्यूटी पार्लर में मेकअप कराने गई थी ।


' कृष्णा बेटा तू भी पार्लर जाकर मेकअप करवा आ । किचन मैं संभाल लूंगी । ममा ने मुझे काम में लगा देखकर कहा था ।'


' ममा, सुंदरता तो मन की होती है । तन की सुंदरता तो क्षणिक ही है वैसे भी जो जैसा है वैसा ही रहेगा .. पार्लर जाने से कुछ बदल तो नहीं जाएगा । फिर देखने तो वे श्वेता को आ रहे हैं फिर मुझे सजने संवरने की क्या आवश्यकता है ?'


' बेटा, ऐसी बात नहीं है । तेरे पापा ने उनके सम्मुख तुम दोनों का प्रस्ताव रखा है ।' ममा ने यथासंभव स्वर को मुलायम बनाते हुए कहा ।


' ममा, हम साग-भाजी नहीं है कि कोई भी हमें छांट कर खरीद ले ।' 


सदा शांत एवं संयत स्वर में बोलने वाली कृष्णा के स्वर की रुक्षता से ममा स्तंभित रह गई थीं । उस समय उन्होंने मुझसे कुछ भी कहना उचित नहीं समझा । संध्या को ममा ने मुझसे मनुहार करते हुए कहा, ' जा बेटी , तू भी तैयार हो जा । मेरी वार्ड रोब से जो भी साड़ी तुझे पसंद हो, निकालकर ढंग से पहले ले । वे लोग आने ही वाले होंगे ।'


' ममा, मुझे विवाह ही नहीं करना है । पहले आप तैयार हो जाओ । स्वागत के लिए तो पहले आपको ही जाना पड़ेगा । तब तक मैं सलाद इत्यादि काट लेती हूँ ।'


' मैडम ,आप अभी तक तैयार नहीं हुईं । अभी- अभी आनंदी चाची का फोन आया है कि वह लोग चल दिए हैं । बस अभी 10 मिनट में पहुँचते होंगे ।' पापा ने अंदर प्रवेश करते हुए कहा ।


' बस 2 मिनट...।' कहते हुए ममा तैयार होने चली गईं ।


' बेटी , जा तू भी तैयार हो जा । बस किसी तरह तुम दोनों बहनों के हाथ पीले कर गंगा नहा लूँ, बस एक यही इच्छा बची है । वैसे भी तू तो हीरा है मेरी बच्ची लेकिन सच्चे हीरे की पहचान कोई जोहरी ही कर सकता है । ' मुझे काम में लगा देखकर पापा ने कहा था ।


पापा के स्वर की आद्रता मुझे व्यथित कर गई थी ऊपर से कठोर देखने वाला लौह पुरुष जीवन के किन्हीं लम्हों में विचलित हो सकता है, इसका एहसास मुझे पहली बार हुआ था ।


' पापा , आप व्यथित क्यों हो रहे हैं ? जीवन का उद्देश्य विवाह ही तो नहीं होता । मुझे अभी बहुत कुछ करना है । आप प्रसन्नता पूर्वक श्वेता का विवाह शशांक से कर दीजिए । सच पूछिए मुझे इस बात से जरा सा भी असंतोष , दुःख या आत्मग्लानि नहीं होगी वरन संतोष ही होगा कि मेरी छोटी बहन एक अच्छे घर जा रही है । आप मेरी चिंता मत करिए पापा । आप शांत मन से मेहमानों का स्वागत कीजिए । मैं कपड़े बदल कर आती हूँ ।' मैंने संयत स्वर में कहा था ।


' पापा , वे लोग आ गए हैं । ' सजी-धजी श्वेता ने प्रफुल्लित स्वर में आकर कहा ।


' ठीक है बेटा , अपने मम्मी को शीघ्र भेजो ।' कहते हुए पापा शीघ्रता से बाहर की ओर गए उनके पीछे-पीछे ममा अपनी साड़ी के पल्लू को संभालते हुए आगे बढ़ी ।


' आइए नरेंद्र भाई साहब एवं भाभी जी हम आपका ही इंतजार कर रहे थे । आने में कोई परेशानी तो नहीं हुई ।' उनका स्वागत कर अंदर लेकर आते हुए पापा ने पूछा था ।


' परेशानी कैसी ? अपना ही शहर है फिर आनंदी भाभी के घर तो हम कई बार आ चुके हैं ।' नरेश जी ने बैठते हुए उत्तर दिया था ।


' बैठो बेटा... पाँच वर्ष पश्चात अपने देश लौटे हो, कैसा लग रहा है हमारा हिंदुस्तान ?'


'अंकल , हिंदुस्तान की बात ही अनोखी है । यह अपना देश है । इसकी मिट्टी की सुगंध , यहाँ के कण-कण में व्याप्त प्रेम और स्नेह के बंधन भला और कहाँ नसीब होंगे ?' शशांक में नम्रता से उत्तर दिया था ।


' बहुत सुंदर विचार है तुम्हारे वरना आज का युवा तो विदेश की क्षणिक झलक से दिगभ्रमित हो जाता है और तुम तो पाँच वर्ष वहाँ रहने के पश्चात भी वैसे के वैसे ही हो ।' सम्मोहित से पापा ने कहा था ।


' आपकी पुत्रियां कहाँ है ? आनंदी भाभी आपके परिवार की अत्यंत प्रशंसा कर रहीं थीं ।' मिताली ने पूछा ।


' वह तो आनंदी चाची का बड़प्पन है । वर्षों से साथ रहने के कारण उनका हमारे प्रति सहज स्नेह है ।जो स्वयं अच्छे होते हैं , उन्हें सब अच्छे लगते हैं ।' संकुचित स्वर में मां ने उत्तर दिया था ।


इसी बीच श्वेता कोल्ड ड्रिंक लेकर आ गई । गौरांग सांचे में ढली देह, माथे पर लहराती लटें, करीने से सजी धजी युवती को देख सबकी नजर उसकी ओर उठ गईं। पापा ने श्वेता का सबसे परिचय कराया । मंद -मंद मुस्कान के साथ उसने सबको कोल्ड ड्रिंक दी और वहीं बैठ गई । 


नरेंद्र जी ने उससे कुछ प्रश्न किए । उनका उत्तर प्राप्त कर वह पापा से बातें करने लगे । श्वेता भी शशांक के साथ सहजता से बातें करने लगी । लग ही नहीं रहा था कि वे दोनों पहली बार मिल रहे हैं । शशांक अत्यंत ही हँसमुख और हाजिर जवाब था । विदेश के किस्से सुना सुना कर उसने सबको मोहित कर रखा था । 


बातचीत चल ही रही थी कि कृष्णा ने नाश्ते की ट्रे लेकर हॉल में प्रवेश किया । हल्की पीली, पतले लाल बॉर्डर वाली, जरी की शिफॉन की साड़ी , लंबी काली लहराती चोटी , सुतवां नाक, सुडौल शरीर, माथे पर छोटी सी बिंदी, हल्की लिपस्टिक, श्रम से ललाट पर उभर आई पसीने की छोटी-छोटी बूंदें , सौम्य मुस्कुराहट से गाल में पड़ने वाले गड्ढों में खोकर शशांक सुध- बुध खो बैठा था । जब मैंने उसके हाथ में नाश्ते की प्लेट पकड़ाई तो अनायास ही वह बुदबुदा उठा …' सुंदर... अति सुंदर ।'


' जी...।' कुछ न समझते हुए मैंने उसकी ओर देखा ।


शशांक को अपनी ओर देखते पाकर मैंने शर्म से निगाहें नीची कर लीं ।


' बेटा , यह है मेरी बड़ी बेटी कृष्णा । एम.एस.सी . फिजिक्स में इसने कॉलेज में टॉप किया है । अब रिसर्च कर रही है ।' पापा ने मेरा परिचय कराते हुए कहा ।


' बहुत ही शांत स्वभाव है । लगता है इनके मुँह में जबान ही नहीं है । केवल आँखों से ही बातें करती हैं ।' शशांक ने मेरी ओर देखते हुए कहा ।


' बेटा, पूरी फिलॉस्फर है । दिन-रात पढ़ाई में ही लगी रहती है । नेशनल साइंस टैलेंट एग्जाम में इसकी द्वितीय पोजीशन आई थी ।' शशांक को उसमें दिलचस्पी लेते देखकर पापा ने गर्व से कहा । 


' यह तो इन्हें देखने से ही प्रतीत हो रहा है । '


पापा के मुख से अपनी प्रशंसा में निकले शब्द तथा शशांक की प्रतिक्रिया सुनकर मैं आदतन सकुचा उठी थी ।


' बेटा, कृष्णा के हाथ के बने समोसे और गुलाब जामुन खाकर तो देखो बहुत अच्छे बनाती है ।' मां ने प्रशंसात्मक स्वर में कहा ।


' बस बस हो चुकी दीदी की प्रशंसा... शशांक जी न्यूयॉर्क के बारे में आप क्या बता रहे थे ?' श्वेता ने चिढ़ते हुए कहा था ।


' वह भी बताएंगे लेकिन पहले तुम्हारी दीदी के हाथ के गरमा गरम समोसे और गुलाबजामुन तो खा लें । न जाने कितने वर्ष बीत गए गुलाब जामुन खाए बिना... है ना ममा ।' सुशांत ने अपनी मम्मी की ओर देखते हुए कहा ।


' हाँ बेटा, मुझसे तो अब इतनी मेहनत नहीं कि जाती ।' मिताली ने अपनी अस्वस्थता का रोना रोते हुए कहा ।


 उसके पश्चात तो शशांक का लगभग पूरा समय ही मेरी पढ़ाई , रुचि अभी इत्यादि के बारे में जानने में ही निकल गया । श्वेता की पढ़ाई में कभी भी रुचि नहीं रही थी अतः वह बोर होने लगी । बीच-बीच में उसकी खिसियाहट देखकर प्रशांत ने कहा , ' न्यूयॉर्क , वाशिंगटन अपनी आँखों से ही देख लेना । मुँह से वर्णन करने में उतना मजा कहाँ आता है ।' शशांक की कही बात ने श्वेता को स्वप्न महल में पहुँचा दिया था ।


 विदा के समय पापा ने नरेंद्र जी की ओर प्रश्न सूचक मुद्रा में देखा तो उन्होंने कहा, ' उत्तर तो हम कल ही दे पाएंगे ...लेकिन आप की मेहमान नवाजी ने हमारा मन मोह लिया है । उसके लिए हार्दिक धन्यवाद ।'


शशांक के सहज, सुंदर एवं आकर्षक व्यक्तित्व ने माँ और पापा का मन मोह लिया था तथा मन में एक ही इच्छा जागृत हो उठी थी ...काश शशांक हमारे घर का सदस्य बन जाए ।


 दूसरे दिन सुबह से ही पापा और माँ को नरेंद्र जी के उत्तर का इंतजार था करीब 10:00 बजे फोन की घंटी बजी । पापा ने शीघ्रता से फोन उठाया । नरेंद्र जी की आवाज थी …' बधाई हो समधीजी आपकी बड़ी पुत्री कृष्णा हमारे शशांक को पसंद है । वह इसी महीने विवाह करना चाहता है ।'


' धन्यवाद भाई साहब , आपने हमारी लाज रख ली । हमारी कृष्णा साँवलीअवश्य है लेकिन है बहुत ही गुणवंती । आपको अपने निर्णय पर कभी पछतावा नहीं होगा । हम शीघ्र शगुन लेकर पहुँचेंगे ।' प्रसन्नता से चहकते हुए पापा ने उत्तर दिया था ।


' पूर्णिमा कहाँ हो तुम ? शशांक को हमारी कृष्णा पसंद है । आज मेरी प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं है । बड़ी के कुंवारी रहते अगर हम छोटी का विवाह कर देते तो शायद अपनी ही नजरों में गिर जाते । ईश्वर ने हमारी लाज रख ली ।' पापा ने ममा को आवाज देते हुए जोर से कहा । पापा की प्प्रसन्नता देखने लायक थी ।


पापा की बातें सुनकर अवाक रह गई थी मैं और झल्ला पड़ी थी श्वेता…।


' झूठा कहीं का ...वैसे ही कह रहा था वाशिंगटन और के बारे में क्या बताऊँ, स्वयं भी देख लेना ।' कहते हुए श्वेता रो पड़ी थी ।


' उसने झूठ थोड़े ही था बेटा । अपनी इकलौती साली को नहीं घुमाएगा तो किसे घुमाएगा ? वैसे भी तुम ऐसा क्यों कर रही हो ? कृष्णा तुम्हारी बड़ी बहन है । विवाह तो पहले उसी का होना है । समय पर तुम्हारे लिए भी शशांक से भी अच्छा वर मिल जाएगा ।' पापा ने उसे समझाते हुए कहा था ।


 श्वेता का व्यवहार देखकर अब पापा को भी एहसास होने लगा था कि श्वेता की परवरिश में उनसे ही कोई कमी रह गई है । सच तो यह है श्वेता की यह मानसिकता उनके कारण ही निर्मित हुई है । वही उसे बार-बार एहसास कराते रहे हैं कि वह सुंदर है पर ऐसा करते हुए वह भूल गए थे कि उम्र के इस पड़ाव पर प्रत्येक लड़की सुंदर दिखती है । 


वैसे भी सुंदरता किसी एक की बपौती नहीं है । सौंदर्य तो देखने वाले की आँखों में निहित होता है । यही कारण है जो वस्तु एक को अच्छी लगती है , वही दूसरे को अच्छी नहीं लगती है । वस्तुतः प्रत्येक व्यक्ति की नजर में सुंदरता की परिभाषा एवं मापदंड अलग अलग हैं । कोई गोरे रंग को ही सुंदरता का मापदंड मानता है । किसी के लिए व्यक्ति के रंग का कोई महत्व नहीं होता, उसके कंटीले और आकर्षक नैन नक्श तथा साँचे में ढली देहायष्टि ही आकर्षित करने के लिए काफी है जबकि किसी को बाह्य सौंदर्य की अपेक्षा आंतरिक सौंदर्य , व्यक्ति की योग्यता और गुण आकर्षित करते हैं । शायद उनकी पुत्री कृष्णा के साँवलेपन में छिपे नैसर्गिक सौंदर्य के साथ-साथ उसकी योग्यता तथा बात करने का विशिष्ट आत्मविश्वास युक्त अंदाज़ के साथ स्वाभाविक और सहज व्यवहार ही शशांक को लुभा गया था ।


 श्वेता की अप्रत्याशित प्रतिक्रिया को देखकर मैंने कहा , ' परंतु पापा , मेरी पढ़ाई ...मैं अभी विवाह करने की स्थिति में नहीं हूँ । मैं विवाह की बात पक्की होने से पूर्व एक बार शशांक से बात करना चाहती हूँ क्योंकि कल तक मैंने विवाह के बारे में सोचा ही नहीं था ।'


' जैसी तेरी इच्छा ...लेकिन बेटा इतना याद रखना इतना अच्छा घर वर ऐसे ही नहीं मिल जाता । अपनी नादानी से इतने अच्छे रिश्ते को ठुकरा मत देना । पढ़ाई का क्या तू बाद में भी पूरी कर सकती है ।' पापा ने उसे समझाते हुए कहा था ।


' ठीक है पापा ,मैं आपकी बात का पूरा ध्यान रखूँगी । आज शाम को आप शशांक को चाय पर बुला लीजिए ।' 


श्वेता इस रिश्ते से असहज हो उठी थी अतः वह शशांक के आने से पूर्व ही अपनी सहेली से मिलने चली गई ।


एकांत पाकर शशांक ने मुझसे पूछा, ' क्या मैं आपको पसंद नहीं हूँ ?'


' नहीं , ऐसी बात नहीं है । कल तक मैंने विवाह जैसे विषय पर सोचा ही नहीं था । बचपन से लेकर आज तक मैंने अपने रंग को लेकर सबकी उपेक्षा ही पाई है । यह सच है कि ममा -पापा से मुझे सदा प्यार और स्नेह ही प्राप्त हुआ है किंतु अन्य लोगों के व्यंग्य बाणों से घायल माँ पापा की आँखों में समाए दर्द को मैंने समय-समय पर महसूस किया है । आज आपकी स्वीकारोक्ति पाकर मेरे दिल में अजीब सी हलचल मच गई है मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ ।' मैंने झिझकते हुए उत्तर दिया ।


'पूछिए आप क्या पूछना चाहतीं हैं । बंदा आपकी सेवा में हाजिर है ।' शशांक ने अपने चिर परिचित अंदाज में कहा ।

आप की स्वीकारोक्ति पाकर मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा है । मैं जानना चाहती हूँ कि आपने मुझे किस आधार पर पसंद किया है । आपको कभी अपने मित्रों के सम्मुख मेरे रंग को लेकर शर्मिंदा होकर, अपने निर्णय पर पछताना तो नहीं पड़ेगा !! कहीं आपका निर्णय क्षणिक तो नहीं... अतः सोच विचार करके निर्णय लीजिए । वैसे भी मेरे जीवन का उद्देश्य पढ़ाई ही है । मैं कुछ बनकर अपने अभिशप्त जीवन से मुक्ति पाना चाहती हूँ । वैसे भी आपका रिश्ता श्वेता के लिए आया था । वह आपको पसंद करने लगी है । आपसे विवाह कर मैं ताउम्र उसकी अपराधी नहीं बनना चाहती हूँ । '


' मुझे पता नहीं था कि आप अपने रंग को लेकर हीन भावना से ग्रस्त हैं । वास्तव में मैंने सदैव गुणों की पूजा की है । विज्ञान और सामाजिक क्षेत्र में आपके ज्ञान की पताका ने मेरे हृदय में जगह बना ली है । लड़कियों को मैंने सदा बनाव श्रृंगार में ही लिप्त पाया है । आप मुझे उन सबसे अलग अनूठी लगीं, बनाव श्रृंगार से दूर , कोमलता स्निग्धता से भरपूर व्यक्तित्व की स्वामिनी ...जो न केवल स्वयं के लिए वरन दूसरों के लिए भी कुछ करने का साहस रखती है । जहाँ तक पढ़ाई का प्रश्न है आप जारी रख सकती हैं । वैसे भी मैं भी एक या दो वर्ष पश्चात भारत अपने देश लौटना चाहता हूँ । अपने देश की मिट्टी, अपने देश की संस्कृति से भला किसे प्यार नहीं होगा !! सिर्फ इस देश में ही आपके जैसी निर्मल , स्वच्छ मनोभावों वाली नारियां मिल सकती हैं । अन्यत्र तो फूल पर मंडराने वाली तितलियां ही मिलेंगीं जो सच्चे अर्थों में कभी जीवन साथी बन ही नहीं सकतीं । मैं तुम्हारे बाह्य सौंदर्य के साथ आंतरिक सौंदर्य पर भी मुग्ध हूँ । आशा है तुम अपने इस सौंदर्य पारखी को निराश नहीं करोगी । जहाँ तक श्वेता का प्रश्न है वह मेरी पसंद नहीं है । जीवनसाथी मैं जिन गुणों की कामना करता हूँ , वह उसमें नहीं हैं । उसमें बचपना इतना है कि उसके साथ दो कदम चलना भी मेरे लिए कठिन होगा । फिर भला मैं उससे विवाह कैसे कर सकता हूँ ।' कहकर शशांक ने मेरे हाथ पर अपना हाथ रख दिया ।


पता नहीं कब वह आपसे तुम पर उतर आया था । मैंने अपना हाथ धीरे से हटा लिया । चेहरा शर्म से लाल हो उठा था । मन एकाएक कल्पना के अद्वितीय अनुपम संसार में गोते लगाने लगा था । ऐसा महसूस हो रहा था कि मेरे ह्रदय के वीणा के तार झंकृत हो उठे हैं । मन में सुसुप्त आकांक्षाओं का उद्दाम सागर हिलोरे लेने लगा है । बिना मौसम के ही सावन की स्वर लहरियों की शहनाई से धरती और गगन गुंजायमान हो उठा है और अंततः आत्मविभोर होकर मैंने अनजाने ही विधि के हाथों नतमस्तक होकर मौन स्वीकृति दे दी ।


' सॉरी कृष्णा ...मैं अचानक भावनाओं में बह गया था । तुम्हें बुरा लगा होगा ।' लजाई शर्माई कृष्णा को हाथ हटाते देखकर शशांक ने क्षमा याचना के स्वर में कहा ।


' ओ.के .।' कहकर मैं चली आई थी ।


हफ्ते भर पश्चात खूब धूमधाम से दोनों की सगाई हो गई । साथ ही 15 दिन पश्चात विवाह की तारीख भी निकाल दी गई । समय कम था किंतु काम अधिक ...अतः युद्ध स्तर पर तैयारियां प्रारंभ हो गई थीं । 


 शशांक के व्यवहार से श्वेता का दिल टूट चुका था । सदा चहकने वाली चुलबुली श्वेता अब खामोश हो गई थी । उसकी सहेलियां चिढ़ातीं... दीदी से बिछड़ने का गम अभी से खाए जा रहा है । जब वह चली जाएगी तो क्या होगा ?


मैं श्वेता के मौन का रहस्य जानती थी लेकिन मजबूर थी । शशांक ने मेरा साथ चाहा था । पापा और ममा ने भी श्वेता को यह कहकर चुप करा दिया था कि विवाह तो पहले बड़ी बहन का ही होना चाहिए , यही हो रहा है तो फिर परेशानी क्यों ? 


पर कहते हैं कि इंसान सोचता कुछ है और होता कुछ और है । वैसे भी सावन जब भी आता है तब ठंडी नरम रेशमी बयारों के साथ पावस भी लाता है । पावस की श्वेत धवल, छोटी-छोटी बूंदे जब पृथ्वी का आलिंगन करती है तब पृथ्वी सोंधी सोंधी खुशबू चतुर्दिक विषयों में बिखेर कर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करती है किंतु यह प्रसन्नता क्षणिक होती है क्योंकि छोटी-छोटी बूंदें अचानक ही बड़ी बूंदों में परिवर्तित होकर उसी मिट्टी को कीचड़ बना देती हैं , प्रलय ला देती है, जीवन अस्त व्यस्त होता है । यही उसके साथ हुआ था । 


अभी प्रसन्नता कंठ से नीचे उतरी भी नहीं थी कि एक अनहोनी घट गई । शगुन दिए हफ्ता भी नहीं बीता था कि पल्लवी ने अपने एडवोकेट बनने की छोटी सी पार्टी में यह कहकर आमंत्रित किया, ' तेरी वजह से ही यह पार्टी कर रही हूँ कृष्णा... फिर तू चली जाएगी अतः अवश्य आना , साथ में श्वेता को भी लाना ।'


यद्यपि श्वेता की जाने की बिल्कुल भी इच्छा नहीं थी किंतु मैंने अपनी सौगंध लेकर उसे पल्लवी की इस पार्टी में चलने के लिए यह सोचकर तैयार कर लिया कि शायद उससे श्वेता का मन बदल जाए । सदा से ही यदि हम दोनों बहने साथ जाया करती थी तो स्कूटर श्वेता ही चलाती थी । आज भी स्कूटर की चाबी श्वेता के हाथ में ही थी । यद्यपि श्वेता का मन काफी अशांत था । पिछले कुछ दिनों में ही उसने शशांक को लेकर न जाने कितने सपने देख डाले थे ।


 आज भी स्कूटर की चाबी श्वेता के हाथ में थी । यद्यपि श्वेता का मन काफी अशांत था । पिछले कई दिनों में ही उसने शशांक को लेकर न जाने कितने स्वप्न देख डाले थे । सबसे अधिक वह इस बात से उत्साहित थी कि वह अपने दोस्तों में पहली होगी जो विदेश जाएगी । कितनी ईर्ष्या करेंगी उसकी सहेलियां प्रतिमा , मीना , नमिता एवं कविता ...लेकिन सारे स्वप्न क्षण भर में ही टूट गए थे । सबसे ज्यादा दुख तो उसे इस बात का था कि विदेशवासी शशांक ने उसे छोड़कर उसकी काली कलूटी बहन को पसंद किया है । कृष्णा उसकी बड़ी बहन है पर ईर्ष्या की चिंगारी ने बहन को ही उसका सबसे बड़ा शत्रु बना दिया था ।


 सड़क खाली थी अतः विचारों में कोई विराम नहीं लग पा रहा था । तभी सामने से एक ट्रक आता दिखाई दिया । अचानक श्वेता के मन में एक विचार आया... यदि स्कूटर को ट्रक से टकरा दूँ तो ना मैं रहूँगी और ना ही तिल-तिल जलाता यह असहनीय तनाव ...तभी एक विचार आया... यदि दीदी... हाँ हाँ यही ठीक है । नहीं ...नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकती । वह मेरी बहन हैं । जीवन इतना सस्ता तो नहीं होता कि एक झटके में ही समाप्त कर दिया जाए । जब तक वह कोई निर्णय ले पाती तब तक ट्रक एकदम सामने आ गया । वह घबराकर स्कूटर से कूद गई । स्कूटर ट्रक से टकराकर 10 फीट दूर जाकर गिरा और इसके साथ ही मैं छिटक कर दूर जा गिरी थी ।


 चारों तरफ भीड़ इकट्ठी हो गई ...दोनों को अर्थमूर्छित अवस्था में अस्पताल पहुँचाया गया । श्वेता को तो प्रारंभिक उपचार के पश्चात छोड़ दिया गया किंतु मेरी हालत काफी गंभीर थी । अस्पताल पहुँचते ही ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया । सिर में चोट आई थी तथा पैर में भी मल्टीपल फ्रैक्चर था । श्वेता की आँखों से आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे । वह रोते हुए बार-बार यही कह रही थी, ' मेरे कारण ही यह एक्सीडेंट हुआ ... मैं चाहती तो इस दुर्घटना को रोक सकती थी । आज दीदी की जो हालत है वह मेरे ही कारण है ।'


 सच्चाई से बेखबर पापा और मम्मा उसके प्रलाप को अपनी बहन के प्रति उसके अतिशय प्रेम को समझ रहे थे तथा उसे यह कहते हुए सांत्वना दे रहे थे , ' जो होना था बेटा वह हो गया । इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है ।' 


कुछ विधि के विधान की माया से भ्रमित चुप थे । कहाँ तो कुछ दिनों पश्चात घर में शहनाई बजने वाली थी कहाँ यह घटना... डॉक्टर ने बताया कि ऑपरेशन सफल रहा है पर पैर में मल्टीपल फ्रैक्चर के कारण रॉड डालनी पड़ी है । ठीक होने में 3 से 6 महीने लग सकते हैं । जैसी स्थिति है उसे देखते हुए अभी कह नहीं सकते कि पैर पूर्णतया ठीक हो पाएगा या कोई विकृति रह जाएगी । 


श्वेता मेरे पास से हिल ही नहीं रही थी जिस बहन से उसे सदा प्यार और स्नेह ही मिलता रहा, उसकी एक उपलब्धि ने उसे ईर्ष्यालु बना डाला, यह आत्मग्लानि उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी । 2 दिन में ही उसके चेहरे की कांति क्षीण हो गई थी तथा एक नई श्वेता का उदय हुआ था जो दूसरों के लिए जीना सीख रही थी ।


होश में आने पर पहले मैंने श्वेता के बारे में ही पूछा उसको पास ही बैठे पाकर संतोष की सांस लेते हुए कहा,' थैंक गॉड तू ठीक तो है ।'


' दीदी, मुझे क्षमा कर दो । आज मेरे कारण ही तुम्हारा यह हाल हुआ है अगर मैं ठीक से से स्कूटर चलाती तो ऐसा कभी नहीं होता ।' मेरे शब्द सुनकर श्वेता ने रोते हुए कहा ।


 यही हाल पल्लवी का था जो दुर्घटना का समाचार सुनकर चली आई थी तथा लगातार उस मित्र के ठीक होने की दुआ कर रही थी जिसने बुरे समय में उसका मनोबल ही नहीं बढ़ाया पर सहायता भी की थी वह भी स्वयं को उस घटना का जिम्मेदार मान रही थी उसे लग रहा था ना वह उस दिन पार्टी में उसे बुलाते ना यह अनहोनी घटती ।


 उसी समय डॉक्टर चेकअप के लिए आ गए उन्होंने कहा अभी पेशेंट की हालत नाजुक है इनके सामने ऐसी कोई भी बात ना की जाए जिससे इन्हें सदमा पहुँचे । शशांक और उसके मम्मी -पापा भी आए थे । शशांक अपनी मंगेतर के शरीर को सफेद पट्टियों में लिपटा देखकर जड़ ही हो गया था । 


घटनाक्रम कुछ इतनी तेजी से बदला कि अब शशांक की ममा मिताली शशांक का विवाह श्वेता के साथ करने के लिए दबाव डालने लगीं । उनका कहना था शशांक के जाने का समय नजदीक आ रहा है । 5 वर्ष के पश्चात इस बार घर लौटा है । अबका गया पता नहीं कब आएगा । अगर इस बार उसका विवाह नहीं करा पाए तो वह कहीं विदेशी मैम को ही न ले आए । इस आशंका ने उनका सुख चैन छीन लिया था अतः इस बार वह उसे अकेले नहीं जाने देना चाहतीं थीं । दूसरा रिश्ता इतने कम समय में मिलना संभव नहीं था वैसे भी उन्हें मेरी अपेक्षा श्वेता अधिक पसंद थी लेकिन शशांक ने मेरे नाम पर अपनी पसंद का ठप्पा लगाकर उन्हें चुप करा दिया था । इस अनहोनी घटना की आड़ में उन्हें अब अपनी इच्छा पूरी करने का अवसर मिल गया था । इस अवसर को वह हाथ से नहीं जाने देना चाहतीं थीं । शशांक से जब उसकी ममा मिताली ने अपने मन की बात का जिक्र किया तो वह बौखला गया किंतु उन्होंने रो-रो कर अपनी ममता का वास्ता देकर आखिर उसे मन ही लिया । नरेंद्र जी ने भी पत्नी की इच्छा के आगे झुका दिया ।


नरेंद्र जी ने जब अपनी पत्नी मिताली की इच्छा पापा के सम्मुख प्रकट की तो वह एकाएक सोच ही नहीं पाए कि क्या करें ? यदि इस आग्रह को स्वीकार करते हैं तो क्या वह अपनी बड़ी बेटी के अधिकार का हनन नहीं करते यदि वह मना कर देते हैं तो इस जगह न कृष्णा का विवाह हो पाएगा और ना ही श्वेता का ...हे ईश्वर ! क्या लड़की का पिता होना इतना बड़ा अपराध है जो उचित अनुचित में भेद करना भूल जाता है । वह समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें ? कशमकश में उलझे वह अपना सिर धुनने लगे ।


' क्या हुआ ?' उनकी हालत देखकर माँ ने पूछा तो पापा ने नरेंद्र जी और मिताली की पेशकश ममा को बताई तो वह चौंक गईं…


' नहीं नहीं ...यह नहीं हो सकता । मैं कृष्णा के साथ यह अन्याय नहीं होने दूँगी ।'


' मैं तुम्हारी बात से सहमत हूँ पर अगर हम मना कर देते हैं तो यहाँ न कृष्णा का विवाह हो पाएगा और न ही श्वेता का...। वैसे भी न्याय अन्याय की व्याख्या करने वाले हम कौन होते हैं ?शायद ईश्वर भी नहीं चाहता कि शशांक कृष्णा का विवाह हो अन्यथा ऐसा नहीं होता ।


' न हो तो न हो...ईश्वर की इच्छा के बारे में तो मैं नहीं जानतीं पर जो इंसान संवेदनशील हो , दूसरों की भावनाओं की परवाह न कर सिर्फ अपना ही सोचे, ऐसे घर में मैं अपनी पुत्री का विवाह कदापि नहीं करूँगी । वैसे भी कृष्णा इस समय हॉस्पिटल में है । ऐसी स्थिति में हम भला श्वेता से उसका विवाह कैसे कर सकते हैं ? वह भी तब जब उसकी शशांक से सगाई हो चुकी है । जिस घर के सदस्यों ने जरा से एक्सीडेंट से घबराकर विवाह तोड़ दिया तो क्या वे लोग श्वेता के साथ ऐसी ही कोई घटना घटने के पश्चात उसे छोड़ नहीं देंगे ? मैं अपनी बेटी के साथ कोई अन्याय नहीं होने दूँगी ।'


' तू गलत सोच रही है पूर्णिमा । वह विवाह तोड़ नहीं रहे हैं, बिगड़ी बात को बना रहे हैं । शशांक इस समय विवाह के लिए आया है और यदि यह विवाह अभी नहीं हो पाया तो पता नहीं कितने वर्षों के लिए टल जाएगा... । कृष्णा को ठीक होने में अभी पता नहीं कितना समय लगेगा ? यदि उन्हें रिश्ता तोड़ना ही होता तो वे इस घर से कोई रिश्ता ही नहीं रखते । यह तो तुम्हारा सौभाग्य है कि उन्होंने अपने होनहार बेटे के लिए श्वेता का हाथ माँग लिया है ।' आनंदी दादी ने घर में कदम रखते ही माँ की बात सुनकर अपनी प्रतिक्रिया दी ।


'पर चाची...।'


' पर वर कुछ नहीं , अधिक मत सोच... जोड़ियाँ ऊपर से बनकर आती हैं ।' आनंदी दादी एक बार पुनः माँ को व्यावहारिक बनने का परामर्श देकर चली गई थीं ।


 उनकी अपनी ही पुत्री आकांक्षा ने अपनी माँ की बात का विरोध किया था । वह समझ नहीं पा रही थी कि इन बड़ों को हो क्या गया है ... एक मासूम लड़की जो शारीरिक पीड़ा से तड़प रही है उसका दिल तोड़ने को उतावले हो गए हैं । तन की पीड़ा तो शायद वह सहन कर भी ले पर क्या वह अपनों ही द्वारा दी गई मन की पीड़ा को सहन कर पाएगी ? अगर विवाह इतना ही आवश्यक है तो क्या यह लोग कृष्णा के ठीक होने का इंतजार नहीं कर सकते ? यह सोचकर वह नरेंद्र तथा मिताली के साथ-साथ शशांक से भी बात करने के इरादे से उनके घर गई । शशांक उनकी बात सुनकर सिर झुका कर उठ गया पर मिताली ने उससे कटु स्वर में कहा, ' तुम छोटी हो अपनी हद में रहो हमें पता है हम क्या कर रहे हैं और क्यों ?'


 मिताली के कटु वचनों ने आकांक्षा को बेहद आहत किया था । क्या में में कुछ वर्षों का अंतर इतना छोटा बना देता है कि वह सही गलत का अंतर न समझ पाए । आकांक्षा चाह कर भी समझ नहीं पा रही थी कि मिताली ऐसा क्यों कर रही हैं ? कुछ महीने पश्चात भी तो शशांक दुबारा भारत आकर कृष्णा से विवाह हो सकता है । आखिर विवाह की इतनी जल्दी क्या है ? 


माँ से आकांक्षा ने बात की तो उन्होंने उसे चुप रहने की सलाह दी । वह अपनी ननद की बहू मिताली के स्वभाव से भलीभांति परिचित थीं । वह एक बार जो ठान लेती हैं उसे करके ही मानती थीं... जो उसका विरोध करता था वह उस से नाता ही तोड़ देती थीं । वह नहीं चाहती थी कि रिश्तो में दरार आए । इसी मानसिकता के तहत वह मिताली के कहने पर पूर्णिमा को व्यवहारिक बनने का उपदेश देकर चली गई थीं जबकि इस प्रकरण से मन ही मन वह भी बेहद दुखी थी । 


श्वेता को पता चला तो एक बार उसके मन में फिर सुनहरे स्वप्न जागृत होने लगे लेकिन स्थिति की नजाकत समझकर उसने चुप रहना ही श्रेयस्कर समझा । आखिर उस मंडप में जिसमें मुझे बैठना था, श्वेता के साथ शशांक ने फेरे ले लिए और मैं दूर अपने बेड पर लेटी लेटी भाग्य के क्रूर मजाक को देखती रही । अपनों के ही हाथों एक बार फिर छली गई थी । आकांक्षा दी और पल्लवी ही उस समय मानसिक और शारीरिक दर्द के अहसास में मेरा संबल बनी थीं ।


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2 महीने के अंदर वीजा इत्यादि की फॉर्मेलिटी पूरी करके श्वेता अमेरिका चली गई । प्रारंभ में प्रत्येक 10 -15 दिन में श्वेता के पत्र आते । उसके पत्रों में वहाँ के सुख और ऐशोआराम की तारीफ के पुल बंधे रहते । वहाँ के रहन-सहन की चकाचौंध में वह कोई दूसरी ही युवती बन गई थी । माँ -पापा भी उसे सुखी देखकर निश्चिंत हो गए थे । उसके आए पत्र को दिन में तीन चार बार ऐसे पढ़ते जैसे कि दोबारा पड़ने पर उन्हें कोई नई बात मिल जाएगी ।


 माँ- पापा का उत्साह देखकर मेरे मन में शूल चुभने लगते । पता नहीं पिछले कुछ दिनों से मैं अपने स्वभाव के विपरीत ईर्ष्यालु होती जा रही थी । शशांक पर भी मुझे क्रोध आता आखिर कैसी चाहना थी उसकी जो मुझे सब्जबाग दिखाकर, एक छोटे से एक्सीडेंट का बहाना कर, वह मुझसे सदा के लिए दूर हो गया । दुख तो मुझे इस बात का था कि वह एक बार भी मुझसे मिलने नहीं आया था ... सिर्फ एक छोटा सा पत्र भेज दिया था क्षमा याचना का । मैं कर भी क्या सकती थी ,जब भाग्य ने ही मेरे साथ दगा किया तो दोष देती भी तो किसे देती ?


लगभग एक वर्ष बीत गया था । चलने में मुझे अब भी कठिनाई होती थी । फिर भी मैंने लगन से अपनी थीसिस पूरी कर ली तथा उसी कॉलेज में लेक्चरर के रूप में नियुक्ति मिल गई । जीवन को एक मंजिल मिल गई थी । कभी ममा- पापा मेरे विवाह की बात चलाते तो मैं दृढ़ता से मना कर देती । सोचती जब भाग्य ने मेरे लिये काँटे बोए हैं तो फूलों की चाहना क्यों करूँ ? वैसे भी शशांक के लिए मेरे मन में प्यार का पहला फूल खिला था । यह जानते हुए भी कि अब उस फूल पर मेरी छोटी बहन का अधिकार है , उसे मसल नहीं पा रही थी । प्यार के उन अनगिनत फूलों को दिल में संजोए मैंने कर्म को ही अपने जीवन का लक्ष्य बनाने का निश्चय कर लिया । मन ही मन बस एक ही चाहना थी कि यदि छात्र छात्राओं को उनके मनवांछित लक्ष्य तक पहुँचाने में कामयाब हो पाई तो अपने जीवन को परिपूर्ण समझूंगी ।


 दिन गुजर रहे थे । एक दिन श्वेता के पत्र से नाना -नानी बनने की सूचना प्राप्त कर माँ- पापा की खुशियों का ठिकाना ना रहा । उसी पत्र में मुझे भी मौसी बनने की बधाई दी थी लेकिन कुछ ही क्षणों में हमारी खुशियों को विराम लग गया । श्वेता इतनी पास नहीं थी कि हम स्वयं जा पाते । अतः माँ- पापा ने श्वेता को डिलीवरी के लिए भारत भेजने का प्रस्ताव रखते हुए शशांक को एक पत्र लिखकर भेज दिया । उनका मानना था कि पहली डिलीवरी मायके में ही होनी चाहिए ।


श्वेता का उत्तर पाकर निराशा हुई । श्वेता ने लिखा था .. ममा , आप चिंता मत करिए यह बहुत ही एडवांस देश है । यहाँ हर तरह की सुविधा है । हमें कोई परेशानी नहीं होगी । वैसे भी अगर हमारा बच्चा यहाँ पैदा होता है तो उसे यहाँ, पैदा होने के कारण यहाँ की नागरिकता स्वतः ही मिल जाएगी जिसके कारण भविष्य में हमें कोई परेशानी नहीं होगी । 


तब क्या उनका वहीं बसने का इरादा है ? कहाँ तो शशांक कह रहा था कि वह 2 वर्ष से अधिक वहाँ नहीं रहेगा ...आज अचानक मुझे महसूस हुआ कि मैंने जो चेहरा शशांक का देखा था ,वह नकली था । मेरे दिल का कुहांसा दूर होने लगा तथा मैंने अपने लक्ष्य की ओर दृढ़ता से कदम बढ़ाने प्रारंभ कर दिए ।


श्वेता का पत्र पढ़कर दोनों घरों में तनाव रहा, फिर धीरे-धीरे खुशखबरी की प्रतीक्षा होने लगी । मई माह की एक गर्म शाम थी । सुबह से ही सूरज आग के गोले बरसा रहा था । कूलर की हवा भी गर्म तन को ठंडक प्रदान नहीं कर पा रही थी । मुझे दो-तीन दिनों से बुखार ने जकड़ रखा था अतः छुट्टी पर थी । पता नहीं क्यों मन बेहद उदास था । न जाने क्यों ऐसा महसूस हो रहा था काश ! मेरा भी कोई साथी मित्र या हमसफ़र होता जिससे मन की बातें कर पाती । माता-पिता तो माता-पिता ही हैं , चाह कर भी वे ऐसे मित्र नहीं बन पाते जिनसे इंसान जीवन में आई छोटी-मोटी उलझनों का समाधान प्राप्त कर सके । मैं शायद अकेलेपन का श्राप लेकर ही इस दुनिया में आई हूँ, सोचकर आँखों में आँसू आ गए ।


आँसुओं को पोंछने का प्रयास कर ही रही थी कि तभी माँ चाय लेकर आई । मेरी आँखों में आँसू देखकर प्यार से मेरे माथे पर हाथ रखकर चिंतित स्वर में पूछा , ' क्या बात है बेटा , क्या बहुत तकलीफ हो रही है ? डॉक्टर को बुलाऊँ । मैं तो बेटा अब सठियाने लगी हूँ । कुछ याद ही नहीं रहता । लगता है तुझे दवा देना भूल गई । अभी देती हूँ ।' 


 ' बेटा , एक बार फिर कहती हूँ कि विवाह के लिए तैयार हो जा । समाज में इसीलिए विवाह का प्रावधान रहा है जिससे कि स्त्री पुरुष एक दूसरे के सुख- दुख बाँटते हुए प्रसन्नता पूर्वक जी सकें । माता-पिता आखिर कब तक साथ निभाएंगे । ' ममा ने उसे दवा देते हुए कहा ।


' ममा ,आप तो व्यर्थ ही घबरा जाती हो । मामूली बुखार है , एक-दो दिन में ठीक हो जाएगा ।' ऊपर से शांत देखने का अभिनय करते हुए मैंने कहा ।


 यद्यपि मेरे मन में भी यही भाव उठ रहे थे जिनकी आशंका ममा ने व्यक्त की थी पर अपने दिल का क्या करती है जो कुछ सुनने और समझने के लिए तैयार ही नहीं है । मन की बात ममा से कहूँ भी तो कहूँ कैसे ? प्यार जीवन में एक बार होता है । इस दिल में एक को जगह दे चुकी हूँ । अब दूसरे के लिए जगह कहाँ बची है !! यह बात और है कि उसने मुझे धोखा दिया । आज वह मेरी छोटी बहन का पति है । सब कुछ जानते हुए भी मैं उसे भूल नहीं पा रही हूँ । अब उसका नाम अपने दिल में छुपाए किसी दूसरे के साथ जीवन बिताना क्या उस व्यक्ति के साथ बेवफाई नहीं होगी ? यह बात अलग है कि जिसे चाहा वह मुझे नहीं मिल पाया और ना ही मिल पाएगा पर फिर भी मैं अपनी सारी जिंदगी उसकी यादों के सहारे बिताना चाहती थी ।


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 एक दिन शाम को घंटी बजी । दरवाजा खोलते ही नरेंद्र जी ने घर में प्रवेश किया चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं । वे एकदम हारे थके लुटे हुए से प्रतीत हो रहे थे ।


' क्या हुआ भाई साहब ? सब ठीक तो है न, आप परेशान क्यों हैं ?' पापा ने पूछा ।


 बिना कोई उत्तर दिए बदहवास परेशान नरेंद्र जी को सोफे पर बैठता देखकर देख पापा ने कहा, ' पूर्णिमा, पानी लाओ । नरेंद्र भाई साहब आए हैं ।'


माँ पानी लेकर आईं । आवाज सुनकर मैं भी बाहर बैठक में आ गई । पानी भी नरेंद्र जी के गले से नहीं उतर रहा था । गिलास को वैसा का वैसा ही मेज पर रखकर नरेंद्र जी ने स्वयं को संभालते हुए कहा, ' भाईसाहब, बच्ची को हमारी गोद में डालकर श्वेता हमसे सदा के लिए रूठ कर चली गई ।'


 माँ रोने लगी थीं तथा पापा अवाक बैठे रह गए थे । 


' अभी हफ्ता भरपूर ही तो फोन पर उससे बात हुई थी । वह एकदम स्वस्थ थी । ऐसे वह हमसे मिले बिना अचानक कैसे जा सकती है ? क्या उस एडवांस देश के डॉक्टर भी उसे नहीं बचा पाए ? ' बदहवास स्वर में मैंने कहा ।


 तुरंत ही मैं अपने प्रश्न की निरर्थकता पर संकुचित हो उठी थी । जीवन की नश्वरता का भयानक रूप सामने आया था । सुनहरी सुबह अचानक ही काली रात्रि में परिवर्तित हो चुकी थी । 


'बेटी , होनी को कोई नहीं टाल सकता । डॉक्टर चाहे यहाँ के हो या वहाँ के, भाग्य के लिखे को कोई नहीं मिटा सकता । मृत्यु तो चिरंतन सत्य है जिससे आज तक कोई नहीं बच पाया है ।' नरेंद्र जी ने मनोभावों पर काबू पाते हुए कहा ।


' भाई साहब , क्या हुआ हमारी बेटी को ?' पापा ने आँसू पोंछते हुए संयत होकर कहा ।


माँ अभी भी रोए जा रही थीं । पापा का प्रश्न सुनकर वह भी नरेंद्र जी की ओर प्रश्न वाचक नजरों से देखने लगीं ।


' फोन पर इतना ही बताया कि डिलीवरी नॉर्मल हुई थी । पर पर उसी रात्रि में श्वेता को तीव्र ज्वर ने जकड़ लिया । जब तक डॉक्टर कुछ समझ पाते, उसने दम तोड़ दिया । बेचारी माँ बनने का सुख भी नहीं भोग पाई । शशांक अगले हफ्ते ही बच्ची को लेकर भारत आ रहा है । इतनी छोटी बच्ची की देखभाल कौन करेगा , यही मन मस्तिष्क को मथ रहा है । '


' अपनी बहन की निशानी की देखभाल मैं करूँगी ।' अनायास मेरे मुँह से निकल गया ।


' सच बेटी , अगर यह जिम्मेदारी तू संभाल ले तो हम सब निश्चिंत हो जाएंगे ।' नरेंद्र जी ने मेरी ओर उन्मुख होकर कहा ।


' आप चिंता मत कीजिए चाचा जी, वह मेरी भी तो बेटी है ।' भावुक स्वर मैंने कहा।


' बेटा , तुमने हमारी सारी उलझनों और समस्याओं का समाधान कर दिया । ईश्वर तुम्हारी जैसी बेटी सबको दे ।' नरेंद्र जी ने भावविह्वल होकर कहा ।


 थोड़ी देर पश्चात नरेंद्र जी ने पुनः कहा.' भाई साहब, श्वेता आपकी बेटी थी जो हमारी बहू थी । आपका खून का संबंध था तो हमारा धर्म का...। मुझे अभी कहना तो नहीं चाहिए लेकिन अगर आप उचित समझे तो कृष्णा का हाथ शशांक के हाथ में दे सकें तो हमें पर बहुत बड़ी कृपा होगी । उसकी उजड़ी बगिया में फिर से बाहर आ जाएगी तथा बेटी को उसकी माँ मिल जाएगी । वैसे भी आप सभी जानते हैं कि शशांक ने कृष्णा का ही साथ चाहा था लेकिन अपनी माँ की जिद के आगे उसने हथियार डाल दिए थे । वैसे भी श्वेता तो उसके जीवन में अब हवा का एक झोंका बनकर ही रह गई है। '


 कहते- कहते नरेंद्र जी का स्वर दयनीय हो आया था । उनकी बात सुनकर माँ और पापा जड़ हो गए थे । उनकी जुबान पर ताला लग गया था । वह अनिमेष ठगे से निःशब्द नरेंद्र जी को निहारने लगे... । नरेंद्र जी उनकी मनःस्थिति को समझ कर परेशान हो उठे थे । शायद इतनी जल्दी उन्हें यह प्रस्ताव नहीं रखना चाहिए था पर वह कृष्णा के द्वारा कही बात से अपनी भावनाओं पर अंकुश नहीं रख पाए तथा दिल की बात जुबां पर आ गई थी । माँ-पापा की कोई प्रतिक्रिया न पाकर उन्हें अपनी गलती का एहसास हो गया था किंतु तीर हाथ से निकल चुका था अतः उन्होंने झिझकते हुए कहा , ' मैंने सिर्फ प्रस्ताव रखा था । वैसे भी दुख में इंसान को उचित अनुचित का ध्यान कहाँ रहता है !! अगर आपको बुरा लगा हो तो कृपया मुझे क्षमा कर दीजिएगा । ' 


नरेंद्र जी कहकर चले गये । माँ ने मेरी ओर देखा तो मुझे शून्य में निहारते पाया । बार-बार नरेंद्र जी के शब्द मेरे मन मस्तिष्क में तहलका मचा रहे थे । कृष्णा का हाथ शशांक के हाथ में दे सकें तो हम पर बड़ी कृपा होगी । वैसे भी शशांक चाहता तो कृष्णा को ही था लेकिन अपनी माँ की ज़िद के आगे उसने हथियार डाल दिए थे । शशांक का मुझ से विवाह न करने का कारण जो भी रहा हो पर अब वह मेरी छोटी बहन का पति है मैं उसकी बच्ची की तो जिम्मेदारी उठा सकती हूँ पर उससे विवाह नहीं कर सकती ।


 ममा को नरेंद्र जी के प्रस्ताव पर कोई आपत्ति नजर नहीं आ रही थी पर नरेंद्र जी का ऐसे नाजुक क्षण में इस प्रस्ताव को रखना ही उनके गले से नहीं उतर पा रहा था । कृष्णा को चोट लगी तो झट से श्वेता का हाथ थाम लिया और अब जब श्वेता नहीं रही तो बच्चे को पालने के लिए कृष्णा को अपनाने के लिए तैयार हो गए ।


 यह अजीब मानसिकता पापा की समझ से परे थी लेकिन इसके बावजूद उनके मन में बार-बार आ रहा था कि एक न एक दिन विवाह तो शशांक को करना ही है यदि कृष्णा तैयार हो जाए तो वह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी से मुक्ति पा जाएंगे तथा कृष्णा के प्रति हुए अन्याय का प्रतिकार भी शायद संभव हो पाए । अब जब बात उठी ही गई है तो क्यों ना लगे हाथों कृष्णा से ही पूछ लिया जाए , सोचकर उन्होंने मुझसे पूछा …


 ' बेटा नरेंद्र जी के प्रस्ताव पर तेरा क्या विचार है ?'


' पापा मैंने नवासे के पालन पोषण की बात की थी न कि शशांक से विवाह की ।' मैंने निर्विकार भाव से कहा ।


' लेकिन बेटा ...यदि वह दुर्घटना नहीं हुई होती तो तू आज शशांक की पत्नी होती ।' ममा ने पापा की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा ।


' ममा, जो नहीं हो सका , उसे बार-बार दोहराने से क्या लाभ ?' अनजाने ही उसका स्वर तिक्त हो आया था ।


' बेटा , इन बदली हुई परिस्थितियों में यदि तू उसका हाथ थाम लेगी तो एक टूटा हुआ घर फिर से बस जाएगा । वैसे भी तू शशांक को आज भी चाहती है, यह मैं मन की आँखों से देख सकतीं हूँ ।' 


' माँ, आप कैसी बातें कर रही हैं ? अभी श्वेता की अर्थी उठी भी नहीं होगी और आप लोग उसकी याद में दिया जलाने की वजह बजाये उसकी अर्थी पर अपने सपनों के महल खड़े करने लगे । धिक्कार है आपकी सोच पर... आपने सोच भी कैसे लिया कि जिस शशांक ने मुझे मेरे बुरे वक्त में मेरा साथ नहीं दिया , उससे विवाह के लिए मैं तैयार कैसे हो जाऊंगी ? नहीं माँ , ऐसा कभी नहीं होगा । वैसे भी ममा मैं अपनी ही अनुजा के पति से विवाह कर पाप का भागीदार नहीं बनना चाहती ।' ममा की बात को बीच में ही काटते हुए मैंने तीव्रता से कहा एवं अंदर चली गई ।


यह सच है कि आज भी मैं एकांत में शशांक के हाथों के स्पर्श को अपने हाथों पर महसूस करके रोमांचित हो उठती हूँ । कभी-कभी उसके साथ का एहसास इतना प्रबल हो उठता है कि तन -मन जलने लगता है तब घंटों शावर के नीचे बैठी रहकर अपने तन -मन की आग बुझाने को विवश हो जाती हूँ । न जाने कैसी तड़प है , न जाने कैसा प्यार है कि उसे मैं उसे चाह कर भी नहीं भूल पाई हूँ । आज अगर मैं उससे विवाह करने के लिए तैयार हो जाती हूँ तो क्या यह उसी तरह नहीं होगा जैसे वह बचपन में श्वेता की उतरन पहना करती थी । कपड़ों की बात और है पर पति... नहीं नहीं ...अब मैं शशांक से विवाह नहीं कर सकती , नहीं कर सकती । मैं मन ही मन गुदगुदा उठी थी ।


' लेकिन क्या तुम शशांक को देख कर मन पर काबू रख पाओगी ? किसी से कितना भी झूठ बोलो लेकिन स्वयं से झूठ नहीं बोल सकतीं । सच सच बताओ क्या आज भी तुम शशांक से प्यार नहीं करती ? क्या प्यार करने वाला मन उसका साथ नहीं चाहेगा ?' अवचेतन मन ने मुझे झकझोर था ।


' बिल्कुल नहीं... यह सच है कि आज भी मैं सुशांत से प्यार करती हूँ क्योंकि वह मेरे जीवन में आया पहला पुरुष ही नहीं वरन उसने ही पहली बार मुझे स्वीकृति प्रदान कर मुझे मेरे स्त्रीत्व से, स्वयं से मेरी पहचान करवाई थी लेकिन एक दूसरा सच यह भी है कि उसने मेरे आत्मविश्वास को जगाकर , ऐसे समय मुझे छोड़ा था जब मुझे उसके साथ की, भावात्मक लगाव की अति आवश्यकता थी । अब जब मैं अपने पैरों पर खड़ी हूँ तो फिर उस भोली सूरत के पीछे छिपे मतलबी आदमी को क्यों स्वीकार करूँ ।' 


' पर उसे अपनी माँ के कहने पर श्वेता से विवाह करना पड़ा था । तुमने नरेंद्र जी की बात नहीं सुनी ।' एक बार फिर अवचेतन मन ने कहा ।


' कारण चाहे जो भी रहा हो पर अब मैं शशांक से विवाह नहीं कर सकती... इसके बावजूद अगर वे नवासे की जिम्मेदारी मुझे सौंपते हैं तो इस जिम्मेदारी को अवश्य निभाऊंगी ।' मन की पुकार को रौंदते हुए मैंने निर्णय ले लिया था ।


' लेकिन यदि तुम शशांक से विवाह नहीं करोगी तो वह क्यों अपना बच्चा तुम्हें सौंपेंगे ?' अवचेतन मन ने उसे चिढ़ाते हुए कहा ।


' मैंने कहा ना कि यदि वह नवासे की जिम्मेदारी मुझे सौपेंगे तब न ।'


' अगर नहीं सौंपी तो क्या तुम्हारी उस बच्चे के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है ? है तो वह तुम्हारी बहन की निशानी , बच्चे पर जितना हक माँ का होता है उतना ही मौसी का भी होता है , तभी मौसी को भी माँसी अर्थात माँ जैसी कहा गया है ।


' तुम कहना क्या चाहती हो । क्यों मेरे पीछे पड़ी हो ? जाओ मुझे अपने दायरे में रहने और जीने दो । मैं किसी का हक नहीं छीनना चाहती लेकिन अगर कोई मुझे जिम्मेदारी देता है तो पीछे भी नहीं हटूँगी पर यह मेरा अटूट निर्णय है कि मैं शशांक से विवाह नहीं करूँगी चाहे वह मुझे मौसी का अधिकार दे या ना दे ।


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 शशांक लौट आया था । विदेशी अनुभव के कारण उसे नौकरी शीघ्र ही मिल गई थी । विवाह के लिए मेरे इंकार के पश्चात शशांक ने भी पुनर्विवाह से इनकार कर दिया था । मेरे तथा शशांक के माता-पिता ने मुझे और शशांक को समझाने की अत्यंत चेष्टा की किंतु दोनों को ही अपने कारागार में बंद पाकर अंततः वे भी चुप हो गए ।


 विवाह करने से इनकार करने के बावजूद भी शशांक ने मुझे मौसी के अधिकार से वंचित नहीं किया था शायद वह स्नेहा को मुझे सौपकर अपनी गलती का प्रायश्चित करना चाहता था या वह मेरे अतिरिक्त किसी अन्य पर विश्वास नहीं कर पा रहा था । उसने अपनी माँ मिताली को स्नेहा को मुझे सौंपने के लिए भेजा । उन्होंने स्नेहा को मेरी गोद में डालते हुए नम आँखों से कहा था …


 ' ले बेटा , पकड़ अपनी बेटी को , तेरे जैसा ही रंग , तेरी ही जैसी आँखें हैं लगता है तेरे ऊपर ही गई है ।' 


उनकी बात सुनकर मैं समझ नहीं पाई कि उनके शब्द सहज है या वह कटाक्ष कर रही हैं । उन्होंने गोरे रंग के कारण श्वेता को अपनी बहू बनाया था । पोती को श्वेता के नहीं , मेरे रंग में पाकर कहीं हताशा में तो वह उसे मुझे नहीं सौप रही हैं वरना कोई दादी अपने नवासे को ऐसे ही किसी को नहीं सौंप देता है या सशंक के कारण वह स्नेहा को मुझे सौंपने को विवश हो गईं हैं ।


' बहन जी रंग ईश्वरीय देन है । आप निश्चिंत रहिए इससे हमारे यहां कोई परेशानी नहीं होगी । 'माँ ने उन्हें दिलासा दिया था ।


नन्हीं स्नेहा को अपनी गोद में पाकर मैंने शशांक की माँ के कहे कटु वचनों को अपने दिल के कोने में दफन कर दिया । नन्हीं स्नेहा मेरे आँचल के साए में पलने लगी । एक कोमल फूल ने मेरी बगिया में मुस्कुराकर ,खिलखिलाकर मेरे सूने जीवन को खुशियों से सराबोर कर दिया था । मेरे जीवन में एक नई उमंग, नए उत्साह का संचार हो गया था । निरुद्देश होते जा रहे जीवन को मानो एक नई राह मिल गई थी ।


सप्ताह में एक बार स्नेहा से मिलने की आज्ञा शशांक ने माँ पापा से ले ली थी । छोटी स्नेहा को छोड़कर मेरा कॉलेज जाने का भी मन नहीं करता था । एक बार मन की बात माँ से कही तो उन्होंने कहा…


' बेटा, नौकरी छोड़ने की बात उचित नहीं है । अभी स्नेहा छोटी है इसलिए तुझे ऐसा लग रहा है । दो-तीन वर्ष पश्चात जब वह स्कूल जाने लगेगी तो तेरा यही समय काटे नहीं कटेगा । फिर यह सोच तू विद्या दान का पुण्य कार्य कर रही है। ना जाने कितने बच्चों की जिंदगी ज्ञान के प्रकाश से भर रही है । तेरी अनुपस्थिति में मैं हूँ ना स्नेहा की देखभाल के लिए ।'


 माँ के शब्दों ने मेरे मन में छाए अंधकार को समाप्त कर दिया था । नन्ही बच्ची को स्नेहा नाम माँ ने ही दिया था । आखिर उसी ने दो घरों को स्नेह के धागों में जोड़ रखा था । उसके कारण ही रिश्ते, रिश्ते न रहकर एक ऐसी मित्रता में परिवर्तित होते जा रहे थे जिसमें न चाहना थी और ना ही पावना ...। उनके लिए एक दूसरे की प्रसन्नता ही सर्वोपरि थी । वास्तव में स्नेहा सबके स्नेह की पात्र बन गई थी ।


 स्थिति यह हो गई थी कि अब कॉलेज से मैं शीघ्र घर आकर अपना समय स्नेहा के सानिध्य में व्यतीत करना चाहती थी । उसका एक-एक काम करते मुझे अत्यंत ही प्रसन्नता का अनुभव होने लगा था । धीरे-धीरे मन की कलुषता तिरोहित होने लगी थी जिसके कारण अब मैं शशांक के साथ भी सहजता से पेश आने लगी थी । फिर भी पता नहीं संकोच था या अपराध बोध , वह अधिकतर मेरी अनुपस्थित में ही स्नेहा से मिलने आया करता था ।


ममा ने स्नेहा की पूरी जिम्मेदारी ले ली थी । वही उसकी मालिश करतीं । रंग में निखार लाने के लिए तरह-तरह के उबटन लगाकर नहलाती , वही उसकी मालिश और कसरतें कराकर बेजान शरीर में ताकत का संचार करने का प्रयत्न करतीं । तब ऐसा महसूस होता कि एक माँ को बच्चे की परवरिश के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ता !! उन्हें अफसोस तो इस बात का था कि उस मासूम को माँ का दूध नहीं मिल पा रहा है । कभी-कभी वह उसके सामने रंग को लेकर भी चिंतित हो उठती थीं ।


 एक बार माँ ने मन की दुश्चिंता मेरे सम्मुख प्रकट की तो मैंने कहा , ' ममा, यह आप कह रही हो जिन्होंने हर परिस्थिति से लड़कर मुझे अपने लक्ष्य तक पहुँचने का हौसला दिया । माँ जमाना बदल रहा है, उसके साथ सोच भी... हम स्नेहा के मन मस्तिष्क में ऐसी कोई भावना आने ही नहीं देंगे । वह अपने गुणों के कारण इस संसार में अपना मुकाम बनायेगी ।'


' हाँ बेटी , तेरा कहा सच हो । ' ममा के मुख से निकले शब्द, उनके मस्तिष्क के साथ तारतम्य स्थापित नहीं कर पा रहे थे । मैं जानती थी कि एक बार की चोट इंसान को सदा के लिए भीरू बना देती है ।


पल पल स्नेहा को बढ़ते देखना अनिवर्चनीय आनंद दे जाता था । स्नेहा के मुख से निकले पहले शब्द ' माँ ' को सुनकर मैं भावविभोर हो गई थी । उतना ही महत्वपूर्ण मेरे लिए वह दिन था जिस दिन उसने पहला कदम रखा था । उसके पश्चात उसके मुख से निकलता एक-एक शब्द अलग - अलग कहानी कहता गया । हर नई चीज को देखकर उसके बारे में पूछना, उसका दैनिक स्वभाव बनता जा रहा था । मुझे भी उसकी प्रत्येक जिज्ञासा का समाधान करने में आनंद आने लगा था । माँ से अब वह संभाले नहीं संभालती थी । मैंने सोचा कि उसे नहलाने खिलाने और घुमाने में उनका हाथ बंटाने के लिए नौकरानी रख लेनी चाहिए । मैंने नौकरानी के लिए अपनी कुछ सहेलियों से कह दिया ।


 एक दिन एक औरत काम माँगने के लिए आई । नाम था लीला । लीला को देखकर लग ही नहीं रहा था कि वह काम वाली है । करीने से पहनी साड़ी, माथे पर बड़ी सी बिंदी ,कानों में झुमके तथा बातचीत में नफ़ासत ...।


' क्या तुमने कहीं काम किया है ?'


' नहीं ...।'


जब कहीं काम ही नहीं किया तो बच्ची को कैसे संभाल पाओगी ?'


' काम नहीं किया तो क्या हुआ मैम साहब ? एक स्त्री के साथ मैं एक माँ भी हूँ । मेरे तीन बच्चे हैं । मुझे काम की बहुत आवश्यकता है वरना मेरे बच्चों की पढ़ाई छूट जाएगी । अगर आप चाहेंगी तो बेबी को संभालने के साथ घर के कामों में भी मैं माँजी का हाथ भी बंटा दिया करूँगी ।' कहते हुए आवाज में दयनीयता आ गई थी । 


मैंने और कुछ पूछना मुनासिब नहीं समझा और उसे काम पर रख लिया । वैसे भी स्नेहा के लिए मुझे ऐसी ही साफ सुथरी कामवाली चाहिए थी । सबसे बड़ी बात केवल मुझे ही नहीं , उसे भी काम की आवश्यकता है । उससे भी अधिक लीला की इस बात ने मुझे प्रभावित किया कि वह अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए काम करना चाहती है ।


लीला स्नेहा को संभालने के साथ, बेहद चुस्ती फुर्ती तथा सफाई से घर के अन्य काम किया करती थी । वास्तव में मुझे ऐसी ही काम वाली की आवश्यकता थी जो स्नेहा को संभालने के साथ-साथ खाना बनाने में भी माँ की सहायता कर सके तथा वक्त जरूरत पड़ने पर घर को भी संभाल सके । 


लीला ने हमारी आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं को ढाल लिया था । वह न केवल खाना बनाने में माँ की मदद किया करती थी वरन समय मिलने पर हफ्ते भर का नाश्ता भी बना कर रख दिया करती थी । स्नेहा तो उसके हाथ से ही खाना चाहती थी । वह उसके लिए कभी सूप बनाती तो कभी पूरी सब्जी तो कभी उसकी मनपसंद मैगी… । कभी मैं व्यस्त होती तो वह देर रात तक रुकने के लिए भी तैयार हो जाती । ममा को भी उसके आने से काफी आराम हो गया था । सच तो यह था कि उसके आने के पश्चात मैं भी निश्चिंत हो गई थी ।


 एक दिन लीला आई । उसके माथे पर चोट का निशान देखकर जिज्ञासा बस पूछ बैठी तो पता चला कि माथे पर चोट उसके पति के क्रोध में थाली फेंकने के कारण आई है ।नउसके साथ उसने जो कहा उसे सुनकर मैं आश्चर्यचकित रह गई । जिंदगी किसी के साथ इतना भयानक मजाक भी कर सकती है उसके शब्दों में…


' जिंदगी ठीक-ठाक चल रही थी मेमसाहब । मेरा पति रमेश एक ऑफिस में बड़े बाबू के पद पर काम कर रहा था । एक दिन वह रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया । लगा धरती घूम गई है । उसे नौकरी से सस्पेंड कर दिया गया । हालत यह हो गई कि जात बिरादरी में मुँह दिखाना भी मुश्किल हो गया । आजकल वह जमानत पर छूटकर घर बैठा हुआ है । नशे का आदी तो वह पहले से ही था, अब गम भुलाने के लिए पूरा दिन नशा कर नशे में धुत रहने लगा है । आखिर वह दिन भी आ गया जब बच्चों की फीस देने के लिए पैसे तो दूर, खाने के भी लाले पड़ने लगे । कुछ कहने पर चीखने चिल्लाने और लड़ाई झगड़ा करने के साथ वह आवश्यकता पड़ने पर घर की चीजें भी बेचने लगा है ।


मेरे मेरे दो लड़कियाँ शिखा, रूपा तथा एक लड़का प्रेम है जो पढ़ते हैं । फीस के लिए उन्होंने जब रुपए माँगे तब रमेश ने कहा... कहीं काम करो । क्यों मेरे पैसे बर्बाद कर रहे हो ? मेमसाहब , मैं स्वयं ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हूँ । अब पढ़ाई का महत्व समझ में आने लगा है अतः जब स्कूल से फीस भरने का नोटिस आया तो मुझ घरेलू औरत को घर से बाहर कदम निकालना पड़ा । आपके घर के अतिरिक्त एक और घर में मैं काम करने लगी हूँ तथा बचे समय में ब्लाउज सिलकर तथा साड़ी में फॉल लगाकर इतना तो कमा ही लेती हूँ कि घर की दाल रोटी चला सकूँ । 


अब मुझे पैसे कमाते देखकर उसकी दारू की भूख बढ़ गई है । कल उसने मुझसे पैसे माँगे । जब मैंने पैसे देने से इनकार कर दिया ,तब उसने थाली फेंककर मुझे मारी।' यह कहकर वह रोने लगी ।


 लीला की स्थिति देखकर मुझे बेहद दुख हो रहा था । यही कारण था कि उसकी हर संभव सहायता करने का आश्वासन मैंने उसे दे दिया । मेरी बात सुनकर उसने भावविह्वल स्वर में कहा…


' मेम साहब, आप जैसे लोग आज के जमाने में बहुत कम मिलते हैं । आपकी बात सुनकर मेरे मन को बहुत तसल्ली मिली । अब मुझे अपने बच्चों की पढ़ाई की चिंता नहीं रही है । आप हैं तो उनको उनकी मंजिल मिल ही जाएगी ।'


 शिखा और रूपा लीला की दोनों पुत्रियाँ स्नेहा को खिलाने कभी -कभी आ जाया करती थीं । कभी वे उसे पार्क घुमाने ले जातीं तो कभी घर के आँगन में उसके साथ आइस- पाइस खिला करतीं ।स्नेहा भी उनके साथ बहुत ही खुश रहा करती थी ।


 बड़ी लड़की शिखा आठवीं कर रही है तथा छोटी रूपा छठवीं में तथा सबसे छोटा लड़का इस साल चौथी की परीक्षा देगा । हर तरह की कठिनाई सहकर भी लीला अपने बच्चों को पढ़ाना चाहती है जिससे कि वह अपने पैरों पर खड़े होकर जीवन में आई कठिनाइयों का सामना कर सकें... काबिले तारीफ थी उसकी जिजीविषा...।


 एक दिन लीला काफी उदास थी । पूछने पर उसने कहा , 

' मेमसाहब , एक आप ही हो जो हमारे दुख दर्द समझती हैं वरना और मेमसाहब लोगों को तो सिर्फ काम से ही मतलब है जैसे हम इंसान नहीं मशीन है । आज आने में थोड़ी देर क्या हो गई बंगाली मेमसाहब हम पर बरस पड़ीं । मेम साहब हमने कभी सोचा भी नहीं था कि हमें यह काम करना पड़ेगा पर जिंदगी अभी न जाने क्या क्या दिखाएगी ।' कहते हुए उसकी आंखों से आंसू बहने लगे ।


' ऐसा मत सोचो । कभी कभी जिंदगी में बुरा समय आता है पर जो इसे साहस से झेल लेता है वही सुंदर भविष्य पाता है मैंने उसे दिलासा देते हुए कहा । 


' मेमसाहब यह सब बातें दिल रखने के लिए कही जाती हैं पर हम तो इतना जानते हैं कि जब एक बार जीवन बिखर जाता है तो बिखरता ही जाता है ।


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 ' मनीष, कृष्णा, पूर्णिमा... कहाँ हो तुम ..?' आनंदी दादी ने बदहवास घर में प्रवेश करते हुए कहा ।


' क्या हुआ चाची ?' पापा ने बाहर आते हुए कहा । साथ में मैं और ममा भी थे ।


'मनीष तुम्हारे चाचा सुबह की सैर के लिए गए थे । पीछे से आती एक बाइक ने उन्हें टक्कर मार दी है । वह गिर पड़े । नवीनचंद्र ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराकर मुझे सूचना दी है । जल्दी अस्पताल ले चलो ।' आनंदी दादी ने चिंतित स्वर में कहा ।


नवीनचंद्र हमारे पड़ोसी तथा सुदेश दादा जी की सुबह की सैर के साथी हैं । आनंदी दादी को लेकर पापा और माँ अस्पताल गए । गिरते समय दादाजी का शरीर सड़क के किनारे पड़े पत्थर से टकरा गया था जिसके कारण उनका ब्रेन हेमरेज हो गया था ।


 डॉक्टरों के लाख प्रयत्न करने के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका । आकांक्षा दीदी तो तुरंत आ गई थी परंतु न्यूयॉर्क वासी अजय और बीना मृत्यु के दो दिन पश्चात ही आ पाए थे । वह जब तक नहीं आए तब तक दादाजी का शरीर बर्फ की शिला पर रखवा दिया गया था जिससे शरीर को सुरक्षित रखा जा सके । ना जाने कैसा दस्तूर है दुनिया का जिस आदमी को हम जान से भी अधिक चाहते हैं उसके मरणोपरांत उसके शरीर को कुछ घंटे रखना भी कठिन हो जाता है । अजय के आते ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया । एक जिंदगी इतिहास बन गई ।


 अजय और बीना महाप्रयाण की रस्मों के पूर्ण होते ही चले गए पर आकांक्षा रुकना पड़ा था । वह एकाएक अपनी माँ को छोड़कर कैसे जा सकती थी ? उसने आनंदी दादी से अपने साथ चलने के लिए कहा था पर आनंदी दादी ने मना कर दिया था । वह उस घर को छोड़कर नहीं जाना चाहती थीं जिसमें उनके पति की यादें बसी हुई थीं । अवसर पाकर आकांक्षा दी मेरे पास आईं । स्नेहा और दिव्या खेलने लग गईं तथा वह मेरे पास बैठ गईं …।


' क्या बात है दीदी आप बहुत परेशान लग रही है ?' उनका चिंतातुर चेहरा देखकर मैंने पूछा था ।


'कृष्णा, दिव्या आजकल पढ़ाई की अपेक्षा सजने संवरने में अधिक ध्यान देने लगी है । उस पर मेरी किसी बात का कोई असर नहीं होता है । छुट्टियों में उसे टी.वी . और मूवी देखने के अतिरिक्त अन्य कोई काम ही नहीं रहता है । टी.वी. या मूवी की एक्ट्रेस ने कौन सी ड्रेस पहनी है, उस ड्रेस के साथ कौन सी ज्वेलरी पहन रखी है, इसी बात पर न केवल उसका ध्यान रहता है वरन यही सहेलियों से बात करने का उसका टॉपिक भी रहता है । स्वयं भी टी.वी . एक्ट्रेस की तरह व्यवहार करना तथा मुझसे भी उन्हीं की तरह सजने संवरने के लिए कहना उसका स्वभाव बनता जा रहा है ।' 


' दीदी आपने उसे समझाया नहीं कि टीवी की दुनिया वास्तविकता से कोसों दूर है । यह सब मनोरंजन या ग्लैमर की दृष्टि से भले उचित हो पर वास्तविक जिंदगी है में इसे अपनाया नहीं जा सकता है ।'


' कहती हूँ कृष्णा पर उसके कानों पर जूं ही नहीं रेंगती । बहुत ही जिद्दी होती जा रही है । मुँह से जो निकला, बस तुरंत चाहिए ।'


' दी, इच्छायें तो अनियंत्रित होती हैं, कहीं तो ब्रेक लगाना ही पड़ेगा ।'


' यही बात मैं विनय से कहती हूँ पर वह कहते हैं 12 वर्ष पश्चात तो हमें संतान सुख मिला है, वह भी पुत्री के रूप में ...पता नहीं कैसा भाग लेकर आई है !! कम से कम यहाँ तो उसे अपनी इच्छा पूरी कर लेने दो । वैसे भी इंसान कमाता किसलिए है अगर हम अपने बच्चों की इच्छायें पूरी नहीं कर पाए तो कमाने से क्या लाभ ?' 


 ' बस यही मनःस्थिति बच्चों को बिगाड़ने लगती है दी । मेरा मानना है कि बच्चों को भी पैसे का महत्व पता होना चाहिए क्योंकि खर्च करना आसान है पर कमाना बेहद कठिन...पर आप चिंता मत करिए दी, अभी वह बच्ची है धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा ।' 


' बच्ची... वह दसवीं में पढ़ रही है कृष्णा ।'


' आपकी चिंता जायज है दी । पर यह उम्र ही ऐसी है जब बच्चे दूसरों की कम सुनते हैं अपने मन की अधिक करना चाहते हैं ।' 


' कृष्णा एक हमारा समय था, जब भी छुट्टियां होती कुछ न कुछ नया सीखने में जुट जाते थे । चाहे सिलाई हो, या डॉल मेकिंग का कोर्स , बेकरी या तरह- तरह की आइसक्रीम बनाने के क्रैश कोर्स और नहीं तो चित्रकला बुनाई, कढ़ाई में अपना समय बिताते थे । इससे न केवल जानकारी बढ़ती थी वरन कुछ नया करने का विश्वास भी पैदा होता था । आजकल तो बच्चों को इन सब चीजों से कोई मतलब ही नहीं रहा है शायद यही कारण है कि बच्चों की क्रिएटिविटी धीरे-धीरे कम होती जा रही है ।' 


' माँ कुछ खाने को दो ना भूख लगी है ।' स्नेहा ने आकर कहा ।


' चलो देती हूँ ।' 


 व्यवधान के कारण हमें अपनी बातों का रुख बदलना पड़ा । सच कुछ रिश्ते जन्म के होते हैं तथा कुछ सामाजिक परिस्थितियों, लगाव एवं आवश्यकता के फलस्वरुप उत्पन्न होते हैं । माँ और आनंदी दादी तथा आकांक्षा दीदी तथा मेरे बीच कुछ ऐसा ही रिश्ता था । यद्यपि आनंदी दादी और माँ के बीच कायम रिश्ते के कारण आकांक्षा मेरी बुआ लगतीं पर आकांक्षा दीदी नहीं चाहती थी कि मैं उन्हें बुआ कहकर बुलाऊँ अतः उनकी इच्छा अनुसार मैंने उनको दीदी कहना प्रारंभ कर दिया था । 


आकांक्षा दी मुझसे उम्र में पंद्रह वर्ष बड़ी हैं पर उम्र के बढ़ने के साथ अंतर कम होता गया और हम दोनों अच्छी मित्र बनती गईं । हम आपस में अपनी हर समस्याएं शेयर करते, एक दूसरे की उलझनें सुलझाने में सहायता करते , सबसे बड़ी बात एक दूसरे के सुख- दुख में काम आते । सच तो यह है कि शशांक के साथ मेरा रिश्ता टूटने के पश्चात, जीवन से विरक्ति की ओर बढ़ते मेरे मन को आकांक्षा दी और कुछ हद तक पल्लवी ने मुझे मेरे मन के अंधकूप से बाहर निकालने में सहायता की थी । मेरे दिल के जख्मों को अपने प्यार के मरहम से भरने का प्रयास किया था । मैं अगर अपनी थीसिस पूरी कर पाई तो सिर्फ उनके ही कारण । मेरे टूटते आत्मविश्वास को आकांक्षा दी ने यह कहकर बल प्रदान किया था... कृष्णा समय से पहले और भाग्य से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता । सोच शशांक तेरे योग्य था ही नहीं । अभी तेरी मंजिल विवाह नहीं , थीसिस पूरी करना है शायद इसीलिए यह घटना घटी ।


 मैंने उनकी बात गांठ में बाँध ली थी आज मैं जो कुछ हूँ आकांक्षा दीदी के कारण ही हूँ... ।


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 काल का चक्र अपने नियमित अंदाज में घूम रहा था । स्नेहा अब स्कूल से सीनियर स्कूल में आ गई थी । बाल्यावस्था से किशोरावस्था में प्रवेश करते स्नेहा में गुणात्मक परिवर्तन आ रहा था । पढ़ाई के साथ बनाव श्रृंगार में उसकी रूचि बढ़ने के साथ अब मुझसे भी तरह-तरह के प्रश्न पूछने लगी थी । एक दिन उसने पूछा , 'मम्मा आप पापा के साथ क्यों नहीं रहती हैं । क्या आप दोनों में झगड़ा हुआ है ।'


' नहीं ऐसी कोई बात नहीं है ।'


' तब आप अलग क्यों रहती हैं ? आप अगर डैड के साथ रहतीं तो डैड को स्वयं खाना नहीं बनाना पड़ता और ना ही मुझे डैड से मिलने ऐसे अकेले जाना पड़ता । मैं भी कविता और वनिता की तरह वीक एन्ड में अपने ममा और डैड के साथ कहीं घूमने या पिकनिक मनाने जाना चाहती हूँ ।' कहकर वह अपना आक्रोश जताने लगी थी ।


स्नेहा की बातें सुनकर मैं उसकी बातों का सीधे-सीधे उत्तर न देकर उसे अन्य बातों में उलझा देती लेकिन ऐसा कब तक ? एक न एक दिन तो उसे उसके प्रश्न का उत्तर देना ही होगा । मैं जानती थी कि अपने लाख प्रयत्नों के पश्चात भी मैं स्नेहा को परिपूर्ण जीवन प्रदान नहीं कर पा रही हूँ । बच्चों के स्वाभाविक विकास के लिए माता-पिता दोनों के प्यार की आवश्यकता होती है मैं अपनी तरफ से उसे सदा खुश रखने का प्रयत्न करती , उसे ढेर सारा प्यार देकर उसको संतुष्ट करने का प्रयास करती लेकिन पता नहीं कहाँ चूक हो जाती ...स्नेहा अतृप्त ही रह जाती । कभी लगता कि वह अपने पापा के साथ एक दिन बिताकर अधिक संतुष्ट हो जाती है । तब मैंने यह प्रतिबंध भी हटा दिया था कि वह अपने पापा से हफ्ते में सिर्फ एक दिन ही मिल सकती है । स्नेहा मेरी खुशी है, जीवन की खुशबू है, मैं उसे मुरझाने भला कैसे दे सकती थी ।


 एक दिन अवसर प्राप्त कर इस संदर्भ में शशांक से बात की , उसने कहा कि अभी स्नेहा बच्ची है । सच बात बताने पर पता नहीं कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करें ...उचित समय आने पर बता देंगे ।


 समझ में नहीं आ रहा था कि उचित समय कब आएगा ? एक दिन स्नेहा फिर अपने साथ ऐसे ही अनेकों प्रश्न लिए उपस्थित थी...उसके किसी भी प्रश्न का उत्तर मेरे पास नहीं था । अब उसे अपनी माँ गलत और अपने पापा सही नजर आने लगे थे । उसे लग रहा था कि माँ के अहम के कारण ही माँ पापा के बीच इतनी दूरी आ गई है । उस दिन स्नेहा ने मेरा साथ छोड़ कर ,अपने पापा के साथ रहने की जिद ठान ली थी ।


 आखिर मुझसे स्नेहा का दर्द देखा नहीं गया । मैंने सारी बातें स्नेहा को बता दीं पर चाहकर भी यह नहीं बता पाई कि पहले शशांक के साथ मेरे विवाह की बात हुई थी पर एक एक्सीडेंट में घायल होने के पश्चात शशांक ने मेरी छोटी बहन श्वेता से विवाह कर लिया था । मेरी बात सुनकर उसने अविश्वास से कहा, ' आप झूठ बोल रही हैं । आप ही मेरी माँ हैं ।' 


' हाँ, मैं ही तेरी माँ हूँ बेटा ।'


'फिर आप मुझे यह झूठी कहानी क्यों सुना रही हो ?'


' बेटा , जब तेरी माँ हमें छोड़ कर गई थी तब तेरे पापा ने अपनी पत्नी और मेरी छोटी बहन की निशानी यह कह कर मुझे सौंप दी थी कि मैं तेरा लालन-पालन तेरी माँ बनकर करूँ । मैंने तुझे तेरी माँ बनकर ही पाला है । तू ही मेरी जिंदगी, मेरे जीने का सहारा है मेरी बच्ची ।'


' मैं आपसे नफरत करती हूँ । आपने मुझसे मेरी पहचान छिपाई । मैं आज तक आपको अपनी माँ समझती रही जबकि आप मेरी माँ नहीं मेरी मौसी हैं ।'


' मौसी भी तो माँ जैसी ही होती है ।'


' माँ जैसी होती है पर माँ तो नहीं ।' कहकर वह रोने लगी ।


स्नेहा के रोने की आवाज सुनकर माँ- पापा भी आ गए । सारी बातें पता लगने पर स्नेहा का व्यवहार देखकर हम समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें ? स्नेहा चीख -चीख कर कह रही थी... 


'आप सबने मुझे धोखा दिया है। अब मैं आपके पास नहीं रहूँगी । मैं पापा के पास जा रही हूँ । उनसे पूछुंगी मेरे पापा होते हुए उन्होंने मुझ से सच क्यों छुपाया ?'


' बेटा शांत हो जा।'


' शांत कैसे रहूँ ? आपने मुझसे झूठ बोला और मैं शांत रहूँ ।' स्नेहा ने रोते हुए कहा ।


' हमने सच जानबूझकर नहीं छुपाया बेटा । सच तो यह है, बड़े होकर जब तूने मुझे माँ कहकर पुकारा ,तब मेरे सूने मन का मातृत्व जाग उठा । मेरी गलती बस इतनी रही बेटा कि मैं तुझे स्वयं को माँ कहने से रोक नहीं पाई । इस छोटे से माँ शब्द ने मेरे तेरे बीच एक ऐसा प्यार भरा अहसास भर दिया था कि चाहकर भी मैं तुझे सच्चाई नहीं बता पाई । मैं चाहती थी कि उचित समय पर, मैं तुझे सच्चाई से अवगत करा दूँगी । समय पूर्व सच बता कर कच्ची उम्र में , मैं तेरी मासूमियत को असमय ही मुरझाने नहीं देना चाहती थी । समय के साथ मैं भूल ही गई थी कि तू मेरी नहीं वरन मेरी बहन की बच्ची है पर आज तेरे प्रश्नों ने मुझे सच्चाई बताने के लिए मजबूर कर दिया है । सच बात जानकर अब तुम स्वयं सही गलत का फैसला ले सकती हो ।' 


उसी समय शशांक आ गए । उन्होंने सारी बात सुन ली थी । उन्हें देखकर स्नेहा उससे चिपककर रोने और उलाहना देने लगी । तब शशांक ने उसे अपने पास बिठाकर सारी स्थिति से अवगत कराया । तब जाकर वह शांत हुई । अब वह अपनी माँ के बारे में जाने के लिए उत्सुक उठी थी । श्वेता की सारी पुरानी फोटोस उसे निकाल कर दिखाई गई तब जाकर वह सहज हो पाई थी ।


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स्नेहा की समस्याओं में उलझी कुछ दिनों से मैं आकांक्षा दीदी बात नहीं कर पाई थी । बात ही कुछ ऐसी थी कि उनसे कहती भी तो क्या कहती !! अब सब कुछ ठीक था कुछ अपनी सुनाने कुछ उनकी सुनने के लिए फोन मिला लिया । अपनी बात बता पाती उसके पूर्व भी आकांक्षा दीदी ने कहा ...


' कृष्णा परेशान ही कर रखा है इस लड़की ने । एक दिन दिव्या ने स्कूटी के लिए जिद की । विनय ने स्कूटी दिलवा दी । स्कूटी मिलते ही उसे पंख मिल गए हैं । घर में टिकती ही नहीं है । पैसों के लिए अलग चिक -चिक करती रहती है । मेरा मानना है कि बच्चे को पैसे दो पर हिसाब लो । जहाँ उससे हिसाब माँगती हूँ , वह तुनकते लगती है । विनय से कहती हूँ तो उनका वही रटा रटाया उत्तर... बच्चों पर विश्वास करना सीखो । वैसे भी हमारी एक ही बेटी है । उसे अपने सारे शौक पूरे कर लेने दो । पता नहीं कैसा घर वर मिले... ।


विनय की शह पर दिव्या बिगड़ती ही जा रही है । मैं तो उसे उसकी दुश्मन लगने लगी हूँ । अब तो हालत यह है कि हर दूसरे तीसरे दिन पार्टी , पैसों की माँग... एक दिन परेशान होकर मैंने उससे कहा, रोज-रोज पार्टी अटेंड करती रहोगी तो पढ़ाई कब करोगी ? तब उसने झुंझलाकर कहा रात में तो पढ़ती हूँ । कल रात लौटने में देर होने पर मैंने उसके मित्र को फोन किया तो पता चला कि वह काफी पहले निकल चुकी है । परेशान होकर मैं वहीं बरामदे में चहलकदमी करने लगी । तभी दिव्या की स्कूटी गेट के अंदर घुसी उसके साथ आया लड़का उसे बाय करता हुआ चला गया । 


लड़के के बारे में पूछा तो दिव्या ने कहा कि वह मेरा मित्र है । जब भी उसके भले के लिए कुछ कहती हूँ तो चिढ़कर कहती है कि मम्मा आप तो मेरी जासूसी करती रहती हो । क्या आपको मुझ पर विश्वास नहीं है ? जब मैंने उससे कहा मुझे तुझ पर तो विश्वास है बेटा, पर दुनिया वालों पर नहीं । तब उसने कहा कि ऐसा वही कहते हैं जिन्हें स्वयं पर विश्वास नहीं होता । तब मैंने उससे कहा अति आत्मविश्वास वाली ही धोखा खाते हैं । तब उसने क्या कहा पता है ।' 


' क्या कहा ?' कृष्णा के मुख से न चाहते हुए भी निकल गया ।


' उसने कहा आप का मतलब है कि मैं किसी को मित्र ही नहीं बनाऊं ।' 


' तुमने कहा नहीं बेटा , मित्र बनाओ पर अच्छी तरह परख कर, विशेषकर लड़कों से मित्रता करते हुए ।' 


' कृष्णा, ठीक यही कहा था मैंने ...साथ में यह भी कह दिया कि उनके साथ अकेले मत जाओ । ड्रेस भी सोच समझ कर पहना करो । बस मेरी इस बात पर दिव्या भड़क गई तथा कहा मम्मा बार-बार मेरी ड्रेस के बारे में क्यों इंगित करती रहती हो !! कॉलेज में सभी लड़कियां इसी तरह की ड्रेस पहन कर आती हैं । तब मैंने कहा बेटा, मैं तुझे ऊँच-नीच समझा रही थी । स्त्री की दौलत उसका चरित्र है अगर वही नहीं रहा तो धन दौलत, मान सम्मान सब व्यर्थ है पर वह मेरी बात पूरी होने से पहले ही जा चुकी थी ।'


' दीदी यह उम्र ही ऐसी है । इस समय शरीर में होते हार्मोनल परिवर्तन युवाओं के तन के साथ मानसिक स्थिति में भी परिवर्तन ला देते हैं । इसलिए बाल्यावस्था और किशोरावस्था के मध्य के इस काल को संक्रमण काल भी कहा गया है । ज्यादा रोक-टोक करने पर बच्चों को अपने माता-पिता ही शत्रु नजर आने लगते हैं इसलिए कहा भी गया है कि एक उम्र के पश्चात माता-पिता को बच्चों के साथ मित्रवत व्यवहार करना चाहिए । अब दिव्या बड़ी हो चुकी है । बात-बात पर टोकना आज की पीढ़ी को पसंद नहीं है । प्यार से ही उन्हें समझाया जा सकता है ।'


' मैं तो उससे मित्रवत व्यवहार करना चाहती हूँ पर वह कुछ सुने तब ना ।'


' बच्ची है, धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा ।आप चिंता मत करिए ।'


' चिंता कैसे न करूँ कृष्णा ...सब करके हार गई । पता नहीं क्या करेगी यह लड़की ? जब देखो तब मैं अपनी ही परेशानी लेकर बैठ जाती हूँ । तू बता कैसी है हमारी स्नेहा ?'


 स्नेहा के बारे में बताने पर आकांक्षा दीदी ने कहा, ' अब तेरी समस्या भी हल हो गई वरना तू भी डर के साए में ही जी रही थी ।'


' दीदी, सच डर के साए में जीना मृत्यु से भी अधिक भयंकर होता है पर दिव्या के रंग ढंग देखकर मुझे भी स्नेहा की चिंता सताने लगी है । कुछ तो लाड प्यार का परिणाम कुछ नई हवा का असर, आज के बच्चे किसी की कुछ सुनना ही नहीं चाहते हैं । यद्यपि यह सोचना गलत है कि अगर एक गलत रास्ते पर चल रहा है तो दूसरा भी चलेगा ही... वैसे भी मैंने उसे स्त्री की मर्यादा और सीमा रेखा में रहने की शिक्षा दी है पर ध्यान तो रखना ही पड़ेगा ।' कृष्णा ने कहा ।


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 स्नेहा अब दसवीं में आ गई थी । इसके साथ ही वह सतरंगी स्वप्न बुनने लगी थी । वह अपने पापा की तरह इंजीनियर बनना चाहती थी । इसके लिए उसने कोचिंग भी ज्वाइन कर ली थी तथा अपने उद्देश्य की प्राप्ति हेतु कड़ी मेहनत कर रही थी । 


इस बीच माँ - पापा ने उत्तर के चार धामों की यात्रा पर जाने की इच्छा जताई । मैंने भी उनकी इच्छा का मान रखते हुए उनकी यात्रा की बुकिंग करा दी । नियत तिथि पर वे तीर्थयात्रा पर निकल गए । जब से वह यात्रा पर गए थे प्रत्येक दिन सुबह शाम फोन करके अपनी यात्रा के बारे में बताते रहते थे । उन्होंने चारों धामों गंगोत्री, यमुनोत्री ,केदारनाथ और बद्रीनाथ के दर्शन अच्छी तरह से कर लिए थे । वे अपनी यात्रा सफलतापूर्वक संपन्न होने के कारण बेहद प्रसन्न थे । 


लौटने वाले दिन उन्होंने चलने के पश्चात फोन करके अपने लौटने की सूचना दे दी थी। रात्रि में उस दिन उन्हें हरिद्वार रुकना था । कुशल क्षेम जानने के लिए शाम को मैंने फोन किया तो फोन अन रिचेबिल बता रहा था । थोड़ी- थोड़ी देर पश्चात फोन करने पर एक ही उत्तर आने पर मैं परेशान हो उठी थी । दूसरे दिन भी यही हाल रहा । अभी सोच ही रही थी कि क्या करूँ , तभी घंटी बजी, दरवाज़ा खोला तो शशांक को खड़ा पाया…


' क्या मम्मा- पापा का फोन आया ? 'शशांक ने मुझे देखते ही प्रश्न किया ।


' नहीं पर तुम ऐसे क्यों पूछ रहे हो ? '


' कृष्णा ,अभी -अभी मैंने टी.वी . पर देखा कि देवप्रयाग के पास लैंडस्लाइड हो गया है । तब से मैं परेशान हूँ तथा पता लगाने तुम्हारे पास चला आया ।' 


' नहीं नहीं... उनके साथ ऐसा नहीं हो सकता । वह घूमने नहीं , चार धाम की यात्रा करने गए हैं ।' मैंने शशांक की बात सुनकर बदहवास स्वर में कहा तथा उन्हें ममा -पापा को फोन मिलाने का प्रयत्न करने लगी पर वही उत्तर पाकर परेशान उठी । क्या करूँ कुछ समझ नहीं पा रही थी ?


' जिस टैक्सी से माँ-पापा गए थे , उसके मालिक का नंबर तुम्हें पता है ।' अचानक शशांक ने पूछा ।।


' हाँ, मैंने पापा से पूछ कर नोट किया था ।' मैंने डायरी निकालकर नंबर शशांक को देते हुए कहा ।


शशांक ने टैक्सी मालिक को फोन किया उसने कहा, ' हम भी प्रयास कर रहे हैं पर कॉन्टैक्ट नहीं हो पा रहा है जैसे ही पता चलेगा बता देंगे ।'


वह दिन हमारे लिए बेहद तनाव भरा था । उस दिन अगर शशांक साथ नहीं होता तो पता नहीं मेरा क्या हाल होता ? किसी तरह वह रात काटी । माँ-पापा का कुछ पता न लगने पर दूसरे दिन लीला को स्नेहा के पास रात में रुकने का निर्देश देकर, सुबह टैक्सी से हम गंतव्य स्थल की ओर चल पड़े । हमारे जैसे अनेक लोग उपस्थित थे जो अपने परिजनों को ढूंढ रहे थे । किसी के प्रियजन मिले तथा किसी को अपने प्रियजनों का कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था । उपस्थित ऑफिसर से पूछने पर एक ही उत्तर मिल रहा था …


 ' हम सभी फँसे यात्रियों को निकालने का भरपूर प्रयास कर रहे हैं । जब पता चलेगा तब आपको बता देंगे ।'


 ऑफिसर के निर्लिप्त और संवेदनहीन स्वर ने मेरे मन मस्तिष्क को झिंझोड़कर रख दिया था । शांत मन से सोचा तो पाया...इसमें ऑफिसर की क्या गलती है ? वह तो सिर्फ अपना कर्तव्य निभा रहा है । दिन तो उन्हें ढूँढते-ढूँढते, अच्छी खबर की आस में बीत गया । 


 रात्रि को विश्राम के इरादे से होटल गए किन्तु कमरा नहीं मिला । कई होटल घूमने के पश्चात अंततः एक होटल में एक कमरा मिला । एक तो तनाव दूसरा एक ही कमरे में रहने के कारण रात्रि में नींद नहीं आई । 


यही हाल दूसरे दिन रहा । तीसरे दिन माँ पापा तो नहीं मिले पर उनके सामान ले यह सच बयान कर दिया जिससे हम मुँह चुराते फिर रहे थे । उनके अवशेषों से उनकी अंतिम यात्रा संपन्न कर हम खाली हाथ लौट आए थे । जीवन में अजीब सा सूनापन छा गया था । मनुष्य चाहे जितना भी बड़ा हो जाए पर माता-पिता का वरद हस्त उसे जीवन की समस्त परेशानियों ,चिंताओं , उलझनों से उबारने की सामर्थ्य रखता है । वह उनकी गोद में सिर रखकर रो सकता है , उनके बलशाली कंधे का सहारा लेकर जीवन संग्राम की हर चुनौतियों से लड़ सकता है । उनको खोने के पश्चात वही इंसान दुनिया की भीड़ में अकेला रह जाता है । यही मेरे साथ हुआ...। मैंने स्वयं को अंतःकवच में बंद कर लिया था ।


दिन रात पहले की तरह होते थे पर मेरी तो मानो दुनिया ही बदल गई थी । जिसकी सुबह माता-पिता के आशीर्वाद से प्रारंभ होती थी तथा रात एक नई सुबह की आशा के साथ समाप्त होती थी वहाँ अब अंधेरा ही अंधेरा नजर आने लगा था । हर दिन लगता जैसे मैंने जो देखा सुना था, वह झूठ था । माँ-पापा तीर्थ यात्रा पर गए हैं , उनके साथ ऐसा हादसा हो ही नहीं सकता । वह एक दिन अवश्य लौट आयेंगे पर हर गुजरते दिन के साथ आस धूमिल होती गई ।


शायद यही इंसानी फितरत है कि वह तमाम दर्दे गमों को दिल में दफन कर, बिना रुके ,बिना थके ,निरंतर चलता जाता है । स्नेहा से जुड़ाव ने धीरे-धीरे सब सहज कर दिया ।


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 एक बार लीला बिना बताए गायब हो गई । हफ्ते भर पश्चात आई तो बुझी बुझी सी थी । पता नहीं मैं उसके प्रति कभी कठोर नहीं हो पाई थी । उसकी हालत देखकर मैंने उसे पानी देते हुए कारण पूछा तो उसने संयत होकर कहा , ' मेम साहब, रूपा ने हमें कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा । उसने भाग कर शादी कर ली ।'


' क्या..? लड़का क्या करता है ?' आश्चर्य से मैंने पूछा था ।


' लड़का पुलिस में है पर वह अपनी जात का नहीं है ।'


' तुम भी कैसी बातें कर रही हो ? आजकल जाति पांति कौन देखता है ? पुलिस में है तो अच्छा ही होगा । लड़की सुखी रहे ,बस यही कामना करो ।'

 

' आप ठीक कह रही हैं मैम साहब ...पर समाज को कौन समझाए ? उसे तो बातें बनाने का मौका चाहिए । अगर रूपा उससे शादी करना चाहती थी तो मुझसे कहती तो सही, मैं कुछ उपाय निकाल ही लेती । पर भाग कर शादी करके उसने न केवल हमारा विश्वास छीन लिया है वरन लोगों को भी हमारी हँसी उड़ाने का अवसर दे दिया है । समाज तो समाज रूपा के पिता को संभालना मुश्किल हो रहा है । इस सबका जिम्मेदार वह मुझे मान रहे हैं । पैसा कमाने के लिए घर से बाहर निकलने के कारण बच्चों पर ध्यान नहीं दे पा रही हूँ न । अब उनको कौन समझाए है अगर मैं घर से बाहर नहीं निकलती तो घर का खर्च कैसे ?


 मन का दर्द बयान कर लीला काम में लग गई लेकिन मैं पुरुष की बौनी मानसिकता पर मन ही मन उबल पड़ी । क्या समझता है वह अपने आपको ? खुद गलत काम करे , नशे में पड़ा रहे पर अगर औरत घर चलाने के लिए बाहर निकलती है तब भी उसका ही दोष ? क्या वह स्वयं घर में रहते हुए बच्चों पर नजर नहीं रख सकता था ? यह तो वही बात हुई , चित भी मेरी पट भी मेरी ।


सुधा आदेश


क्रमशः 


अंततः 17/प्रतिलिपी में ऐड 18.6


 छुट्टी का दिन था मैं इस स्नेहा के लिए उसका मनपसंद पिज़्ज़ा बना रही थी कि घंटी बजी । दरवाजा खोला तो देखा आकांक्षा दी है । उन्हें देखकर आश्चर्य मिश्रित स्वर में कहा…


' आकांक्षा दीदी, आप ...कब आईं ? दिव्या कैसी है ? हमारे जीजा जी भी आए हैं या आप अकेले ही आई हैं ।' 


' कृष्णा , इस लड़की ने हमें कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा ।' कहकर आकांक्षा दी रोने लगीं ।


' दीदी , संभालिये स्वयं को ।'


' स्वयं को कैसे संभालूँ ? बात ही ऐसी है ।'


' सारी बात मुझे बताइए ...शायद मैं आपकी कुछ सहायता कर सकूँ ।' पानी का गिलास देते हुए मैंने कहा ।


पानी पीकर आकांक्षा दी ने संयत स्वर में कहा,' कृष्णा एक दिन मैं शॉपिंग करके लौट रही थी कि देखा दिव्या किसी लड़के के साथ बाइक पर बैठी जा रही है । अपना स्कूटर होते हुए भी भला वह दूसरे के स्कूटर पर कहाँ जा रही है, इस समय तो उसे अपनी क्लास में होना चाहिए , सोचते हुए मैंने ऑटो वाले से उसका पीछा करने के लिए कहा पर जब तक ऑटो बैक हुआ वे आँखों से ओझल हो गए । मैं मन मार कर घर लौट आई । मैंने उसके कुछ मित्रों के घर फोन किया पर सबने यही कहा कि हमें पता नहीं , हमें तो उसने कुछ बताया ही नहीं । इंतजार करने के अतिरिक्त अब मेरे पास अन्य कोई उपाय ही नहीं था ।


विनय भी ऑफिस से आ गए थे । दिव्या के ना आने पर वह भी चिंतित थे । घड़ी की सुइयाँ खिसकती जा रही थीं तथा उसके साथ ही हमारी चिंताएं भी बढ़ रही थीं । रात के 10:00 बज चुके थे । हम समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें ? बार-बार लड़का तथा साथ में बाइक पर सवार दिव्या का चेहरा आँखों के सामने से घूम जाता । मन अनहोनी की आशंका से काप उठता । कोई सूचना न पाकर सोचा जाकर पुलिस में शिकायत दर्ज करा दें । हम निकलने ही वाले थे की फोन की घंटी बजी । विनय ने फोन उठाया किसी आदमी का स्वर था…


'शायद आप उस लड़की के पिता है जिसे मैंने अभी लोहिया हॉस्पिटल में भर्ती करवाया है । उसके बैग से प्राप्त मोबाइल में ' होम नाम से फीड 'नंबर को पाकर, आपको फोन कर रहा हूँ । उसकी हालत अच्छी नहीं है आप शीघ्र आ जाइए ।'


 विनय ने तुरंत गाड़ी निकाली तथा हम चल पड़े… । मन में तरह-तरह के विचार आ रहे थे । क्या उसका एक्सीडेंट हो गया है ? पता नहीं कितनी चोटें आई होंगी !! कितनी बार कहा है स्कूटर धीरे चलाया करो पर मानती ही नहीं है । हवा की तरह बातें करती है अगर कुछ कहो तो कहेगी धीरे ही चलाना है तो साइकिल पर ना जाऊँ ।


 वास्तव में नई पीढ़ी को समझाना बेहद ही कठिन है । वह अपने ही दिमाग से सोचना और करना चाहती है पर इसमें उसका भी क्या दोष ?इस उम्र में लगभग सभी ऐसा ही सोचा और किया करते हैं , सोच कर मैं मन को सांत्वना देने का प्रयास कर ही रही थी कि अस्पताल में घुसते ही सामने से एक आदमी आता मिला । हमें बदहवास देखकर उसने पूछा …


 ' क्या आप लोग वही हैं जिन्हें मैंने फोन किया था ।'


' हाँ, उसे हुआ क्या है ?'


' वही जो नहीं होना चाहिए था । वह तो अपना काम करके , इसका काम तमाम करना चाहता था पर इसकी चीत्कार सुनकर हम पहुँच गए और वह भाग गया । कैसे माँ-बाप हैं आप जो बच्चों को इतनी छूट दे रखी है ? आखिर इसे उस लड़के के साथ सुनसान पार्क में जाने की आवश्यकता ही क्या थी ? वह भी रात में ...स्वयं ही गई होगी । कोई जबरदस्ती तो उसे वहाँ ले नहीं गया होगा ।' वितृष्णा से उस आदमी ने कहा । उसके साथ खड़ी औरतों के चेहरे पर भी कुछ ऐसे ही भाव थे ।


उनकी बात सुनकर मैं अवाक रह गई थी । आखिर वही हुआ ना जिसका मुझे सदा से डर रहा था । कितना समझाया था कि सब पर विश्वास मत किया कर पर अपनी ही करके रही । अब भुगतना तो पड़ेगा ही ।


डॉक्टर से बात की तो उसने कहा, ' बहुत जोर जबरदस्ती हुई है इसके साथ । मेंटल शॉक की स्टेट में है । रिकवर करने में थोड़ा समय लगेगा । अभी नींद का इंजेक्शन देकर सुला दिया है ।' 


डॉक्टर की आँखें भी यही कहतीं प्रतीक प्रतीत हो रही थीं कि कैसे माता माता पिता है आप, जो बच्चे पर नजर नहीं रख पाए ? 


कृष्णा अजीब मनःस्थिति में हम दिव्या के कमरे में गए । मासूम सूरत , चेहरे पर आँसुओं की लकीरों के साथ उसके चेहरे पर तनाव स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा था । उसकी ऐसी हालत देखकर हम दोनों ही एक-दूसरे से नजरें चुरा रहे थे । कृष्णा अब विनय को मेरी चिंता समझ में आ रही पर अब क्या कर सकते थे !! बार-बार यही प्रश्न मन मस्तिष्क में घूम रहा था क्या बच्चों पर विश्वास करना गलती है ? पर यदि कोई किसी के विश्वास को ही भंग कर दे तो… क्या उसी लड़के ने उसके साथ यह कुकर्म किया है जिसके साथ वह स्कूटर पर बैठी जा रही थी …? कितनी खुश नजर आ रही थी वह !! इस तरह का उसे अगर जरा भी अंदेशा होता तो क्या वह उसके साथ जाती ? 


सच ऐसी घटनायें ऐसे ही झूठे और मक्कार लोगों के द्वारा होती हैं जो विश्वासपात्र बनने का नाटक कर भोली-भाली वाली युवतियों को अपने बुने जाल में फ़ांस कर ताउम्र उन्हें तड़पने के लिए छोड़कर, उनकी बर्बादी पर खुश होकर अपने पुरुषोंचित्त अहंकार में मस्त स्वयं को सर्वे सर्वा समझते हैं । 


कृष्णा हम अभी सोच ही रहे थे कि अखबार और टी.वी . वाले आकर हमसे तरह-तरह के प्रश्न पूछने लगे । हम कुछ नहीं जानते, हमें कुछ नहीं कहना , कहकर हमने उनसे बचने का प्रयत्न किया पर सुबह अखबार में खबर प्रकाशित हो ही गई । यहाँ तक कि टी.वी . में भी समाचार प्रसारित हो गया कि अमुक मोहल्ले की लड़की के साथ रेप हुआ है । अभी वह बेहोश है अतः अभी अपराधी का पता नहीं चल पाया है ।


 मीडिया पर हमें क्रोध आ रहा था जो हमारी कठिनाइयों को और बढ़ा रहा था । क्या इस तरह ढिंढोरा पीट कर मासूम बच्ची को न्याय दिलवाया जा सकता है ? न्यायपालिका की जो हालत है उससे इंसान न्याय पाने से पहले मर जाना ही पसंद करेगा । 


 दिल पर हथौड़ों के प्रहार हो थे । विनय भी बहुत परेशान पर थे । उन्हें लग रहा था कि उनकी ही शह के कारण दिव्या की यह हालत हुई है। वह अस्पताल के गलियारे में इधर से उधर घूम रहे थे । 


तभी महिला मुक्ति आंदोलन से जुड़ी महिलाएं दिव्या का हाल पूछने आ गईं । वे अपराधी को कड़ी से कड़ी सजा दिलवाना चाहती थीं । कृष्णा , एक लड़की की माँ होना कांटों का ताज पहनने के बराबर है ...खासतौर से तब जब लड़की सुंदर हो नादान हो और जवानी की ओर कदम बढ़ा रही हो । कितनी ही शंकायें , कितने ही संदेह मन को घेरे रहते हैं । उस पर भी यदि वह बच्ची माँ की परेशानी को ना समझ पाए , उसे ही रूढ़िवादी, परंपरावादी इत्यादि अनेक अलंकरणों से सुसज्जित कर सदैव कटघरे में खड़ा कर अपमानित करे तो बेचारी माँ अंतः कवच में सिमटने के अतिरिक्त कर भी क्या सकती है ।' कहकर आकांक्षा दी सुबुक पड़ीं ।


आकांक्षा दी ने सिलसिलेवार जो बताया उसे सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए । क्या हो गया हमारे समाज को ...सारी मान्यताओं, रूढ़िवादिता को तोड़ते हुए हमारा समाज किधर जा रहा है । मैं समझ नहीं पा रही थी कि आकांक्षा दी को कैसे सांत्वना दूँ । तभी उनकी आवाज सुनकर मैं विचारों के घेरे से बाहर आई ।


' कृष्णा मैं सोच रही थी कि क्या ये लोग दिव्या को न्याय दिलवा पायेंगी । अपराधी अगर पकड़ा भी गया तो ज्यादा से ज्यादा उसे 5 वर्ष 8 वर्ष की कैद मिल जाएगी ।

 और उसे सजा दिलवाने में पीड़ित लड़कियों को जो झेलना पड़ेगा वह क्या मौत से बदतर नहीं होगा !! मौत तो केवल एक बार आती है पर यहाँ तो उसे रोज मरना होगा , रोज उस हादसे के साथ जीना होगा । कौन उसका हाथ थामेगा …? यदि दया दिखलाते हुए कोई साहस भी कर ले तो क्या गारंटी वह उसके छींटे लगे दामन पर और छींटे नहीं उछालेगा... । 


हमारे जैसे मध्यमवर्गीय लोगों को न्याय दिलवाने की इस प्रक्रिया में न जाने कितने वर्ष लग जाएंगे । दिव्या का तो जीवन ही बर्बाद हो जाएगा । उस समय मेरे मन में आया कि मैं अपनी बच्ची के साथ ऐसा कुछ नहीं होने दूँगी । एक बार जो हो गया उसकी आग में उसे और नहीं जलने दूँगी । एक एक्सीडेंट समझकर उस हादसे को स्वयं भी भूलने का प्रयत्न करूँगी तथा दिव्या से भी ज्यादा पूछताछ ना कर सहज जीवन जीने के लिए प्रेरित करूँगी । मैं उसे यहाँ से दूर कहीं दूर ले जाऊँगी जहाँ वह नया जीवन शुरू कर सके । इस भयानक हादसे को भूल सके ।


इस दृढ सोच के साथ दिव्या को आँखें खोलते देखकर मैं उसके पास गई । मुझे देखकर उसने रोते हुए कहा , ' मम्मा , मैं बहुत बुरी हूँ , मैंने आपकी बात नहीं मानी । उसने मुझे धोखा दिया ।'


' नहीं बेटी, तू तो मेरी बहुत ही प्यारी बच्ची है । जो भी हुआ वह तेरे जीवन का एक हादसा मात्र था ...उसे भूल जा । आज से नया जीवन प्रारंभ कर । मैं इस बारे में तुझसे कोई प्रश्न नहीं करूंगी । अगर तुझे बदला लेना ही है तो स्वयं को मजबूत बना । अपने पैरों पर खड़े होकर ही तू एक मर्द जात से बदला ले सकती है । हादसे हर इंसान के जीवन में आते हैं । कुछ हादसे जीवन को कुछ सीख, नया आयाम दे जाते हैं पर इंसान वही है जो इन हादसों से सबक लेते हुए आगे बढ़ता जाए न कि कुंठित होकर बैठ जाए । बेटा, बदला इंसान को क्रूर बनाता है वही क्षमा इंसान में आत्मबल पैदा करती है ।'


कृष्णा मेरे प्यार भरे वचन सुनकर दिव्या मेरी गोद में मुँह छुपा कर रो पड़ी थी । उसकी स्थिति देखकर हमने निर्णय लिया कि उसे कहीं और रखकर पढ़ाया जाए । स्थान परिवर्तन से शायद उसे उसका खोया आत्मविश्वास आत्मबल मिल सके । इस विचार के मन में आते ही सर्वप्रथम मेरे मस्तिष्क में तुम्हारा ही नाम आया और मैं तुम्हारे पास चली । क्या तुम मेरी मदद करोगी ? भरी आँखों से आकांक्षा दी ने मुझसे प्रश्न किया ।


' दीदी , आप कैसी बात कर रही हैं ? आप आदेश दीजिए ।'मैंने मन के झंझावातों से बाहर निकलते हुए कहा ।


' क्या तुम दिव्या का दाखिला अपने स्कूल में दाखिला करवा सकती हो ?'


 ' क्यों नहीं दीदी , पिछले स्कूल की टी .सी . ले आइए । अगर आप मुझ पर विश्वास कर सकती हैं तो दिव्या को मेरे पास भी छोड़ सकती है । '


' तुम पर मुझे पूरा विश्वास है कृष्णा पर अपने नसीब पर नहीं ...। अब तो हर कदम फूक-फूंक कर रखना है । तुम तो जानती हो, माँ अकेली रह गई है अतः कुछ दिन उनके पास रहकर दिव्या को संभालना चाहती हूँ । माँ से कह दूँगी कि इस उम्र में तुम्हारा अकेले रहना हमसे देखा नहीं जाता अतः दिव्या का यहाँ दाखिला करा देती हूँ पर हमें ध्यान रखना होगा कि इस घटना का किसी को भी पता ना चले ...और हाँ मैं उसकी टी.सी. ले आई हूँ ।' आकांक्षा दी ने अपने पर्स से टी.सी .निकालकर मुझे देते हुए कहा ।


' मैं कल ही दिव्या का दाखिला करवा देती हूँ... दीदी सब ठीक हो जाएगा । ईश्वर पर विश्वास रखिए ।' उनके हाथ से टी. सी. लेते हुए मैंने उन्हें दिलासा दिया था ।


आकांक्षा दी का सोचना ठीक निकला । जहाँ आनंदी दादी का सूनापन दूर हुआ वहीं उनके सानिध्य में दिव्या को अपनापन महसूस हुआ और उसने एक नया जीवन प्रारंभ कर दिया । अब उसके जीवन का उद्देश्य पढ़ाई बन गई थी । वह एकदम बदल गई थी । उसको अपने उद्देश्य में लगा देख मैं खुशी से भर उठती थी । सबसे अच्छी बात तो यह थी कि दिव्या का साथ पाकर स्नेहा भी अपनी पढ़ाई के प्रति सीरियस हो गई थी ।


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 कॉलेज से आकर मैं अखबार पढ़ ही रही थी कि लीला ने चाय का कप मुझे पकड़ाया तथा अपना कप लेकर मेरे पास बैठेते हुए कहा ,' मेम साहब, शिखा कह रही थी कि रूपा के घर टीवी है, फ्रिज है और तो और वे दोनों मोटर बाइक में घूमते हैं । बहुत खुश हैं दोनों ...।' कहते-कहते लीला की आँखों में एक अनोखी चमक आ गई थी । 


 जहाँ बच्चों के उपेक्षात्मक रवैये से माता-पिता दुखी रहते हैं वहीं उन्हें सुखी देखकर उनकी आँखें जुड़ा जाती हैं , इस निर्विवाद सत्य का एहसास आज लीला की आँखों में झलकती खुशी देखकर हुआ था ।


' तुम भी जाकर मिल आओ ।' उसकी खुशी देखकर मैंने कहा ।


' नहीं मैम साहब , अगर मैंने ऐसा किया और शिखा के बापू को पता चल गया तो वह हमें घर से बाहर निकाल देंगे । वह तो शिखा की सहेली दीपा रूपा के घर के पास रहती है उससे मुझे यह सब पता चला है । ' लीला ने कहा ।


लीला अपने मन की बात उससे शेयर कर काम।करने लगी ...इस बार बेटी से न मिल पाने की बेचैनी उसके चेहरे पर स्पष्ट झलक आई थी । हाय बेचारी औरत... समर्थ होने पर आज भी उसे अपने हर निर्णय के लिए पुरुष की सहमति चाहिए ...चाहे वह आवारा ,निकम्मा और कापुरुष ही क्यों ना हो ? न जाने कब हम औरतें इस स्थिति से निजात पा पायेंगी ? मन में उमड़ते-घुमड़ते प्रश्नों को परे ढकेल कर कृष्णा ने भी अपनी आँखें अखबार पर टिका दीं ।



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 एक दिन स्नेहा को स्कूल भेजकर कृष्णा स्वयं कॉलेज जाने की तैयारी कर रही थी कि फोन की घंटी टनटना उठी । दूसरी तरफ शशांक का पड़ोसी विमल था …


' कृष्णा ,शशांक को चक्कर आ गया है । उसे लेकर मैं लोहिया अस्पताल जा रहा हूँ तुम भी पहुँचो ।'


' क्या हुआ शशांक को ?' मैंने पूछा ।


' अन्य बातें बाद में करेंगे । तुम जल्दी आओ ।'


 मैं समझ नहीं पा रही थी कि शशांक को अचानक हुआ क्या है ? विमल को हमारे रिश्ते का पता था अतः उसने मुझे सूचना देना आवश्यक समझा । स्कूल में फोन द्वारा छुट्टी लेने की सूचना देकर जब तक मैं अस्पताल पहुँची तब तक शशांक का चेकअप प्रारंभ हो गया था । उसे हार्टअटैक आया था । डॉक्टर ने बताया कि अगर थोड़ी और देर हो जाती तो स्थिति को संभालना कठिन हो जाता फिर भी 48 घंटे ऑब्जरवेशन में रखना होगा ।


 विमल ने बताया सुबह दूध लेने के लिए शशांक के द्वारा दरवाजा न खोलने पर दूधवाले ने उसे सूचित किया । विमल के कई बार घंटी बजाने के बावजूद शशांक ने दरवाजा नहीं खोला तब सशंकित मनः स्थिति में उसने डुप्लीकेट चाबी से दरवाजा खोला । शशांक को जमीन पर गिरा देखकर उसने मुझे फोन किया और उसे अस्पताल ले आया । दूधवाले की प्रत्युन्नमती तथा विमल की तत्परता ने शशांक को असमय अस्पताल पहुँचा दिया था वरना पता नहीं क्या होता ।


 शाम को स्नेहा को उसके पापा से मिलाने लेकर गई । शशांक को आई.सी. यू .में एडमिट देखकर वह रोने लगी तथा पूछा, ' ममा, ठीक तो हो जाएंगे ना पापा । ' 


वह अपने पापा के पास से हिलना ही नहीं चाह रही थी । 48 घंटे हम सबके लिए बेहद तनाव भरे थे । उस समय विमल भाई ने हमारी बहुत सहायता की ।


 डिस्चार्ज होने पर एक बार मन किया कि शशांक को अपने ही घर चलने के लिए कहे पर मन में पैठी ग्रंथि ने मुझे अपने विचारों पर अमल करने से रोक दिया था । स्नेहा सप्ताह भर अपने पापा के पास रही । स्नेहा की परेशानी और शशांक की हालत देखकर दिल ने कई बार मुझसे शशांक के पास रुककर उसकी देखभाल करने के लिए कहा पर मस्तिष्क ने साथ नहीं दिया । सिर्फ मिलकर ही चली आती थी पर मन वहीं पड़ा रहता था । उचित दवाइयों और देखभाल के कारण धीरे-धीरे शशांक ठीक होने लगा पर दवाइयां खाने के साथ अब उसे ताउम्र परहेजी खाना ही खाना था ।


अतीत को मन की परतों में दफन तो कर दिया था पर इन दिनों कभी-कभी वह नागफनी की तरह चुभ- चुभ कर दंश देने ही लगता था । कभी-कभी मुझे लगता कि कहीं मैं अनजाने ही तो शशांक के दुख का कारण नहीं बन गई हूँ !! सामान्य परिस्थितियों में वह किसी भी लड़की से विवाह कर सामान्य जीवन व्यतीत कर सकता था । मैं जानती थी कि वह अपराध बोध से ग्रस्त है, तभी उसने दूसरा विवाह नहीं किया है । मन के पूर्वाग्रह से ग्रस्त मैं कोई भी निर्णय लेने में स्वयं को असमर्थ पाती थी । शशांक के इस रुख के कारण उसके माता-पिता अपने छोटे पुत्र प्रियांश के साथ रहने चले गए थे ।


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 समय कट रहा था । कॉलेज में परीक्षाएं होने वाली थीं अतः स्नेहा कुछ अधिक ही व्यस्त थी । हायर सेकंडरी की परीक्षा देने के पश्चात वह आई.आई.टी. की कोचिंग कर रही थी । दिव्या का आज ग्रेजुएशन का अंतिम पेपर था । उसके साथ ही वह सिविल सर्विस की भी तैयारी कर रही थी । मैं कॉलेज से आकर अभी बैठी ही थी कि दिव्या और स्नेहा मेरे सामने आकर खड़ी हो गईं…


' क्या बात है दिव्या ? आज तो तुम्हारे पेपर समाप्त हुए हैं क्या कहीं घूमने जाने का इरादा है ?'


' नहीं आंटी ...अगले महीने 28 मई को नानी का 75 वां जन्मदिन है । उनके जन्मदिन की प्लैटिनम जुबली को हम सब बच्चे खूब धूमधाम से मनाना चाहते हैं । अचल मामा और बीना मामी भी इस अवसर पर न्यूयॉर्क से आ रहे हैं । हम नानी को सरप्राइज देना चाहते हैं । हम आपकी सलाह चाहते हैं कि हम कैसे इस प्रोग्राम का आयोजन करें ?' दिव्या ने उसकी ओर देखते हुए कहा ।


' यह तो बहुत अच्छी बात है । तुम अपनी नानी के जीवन से संबंधित कुछ तथ्य इकट्ठे करो ...मसलन वह कब और कहाँ पैदा हुईं ? उनके माता-पिता का नाम तथा उनकी शिक्षा से संबंधित जानकारी के साथ उनका विवाह कब हुआ ? कब तुम्हारी माँ और मामा का जन्म हुआ ? कब तुम्हारी माँ और मामा का विवाह हुआ ? कब तुम लोग अर्थात उनके नाती पोतों ने जन्म लिया ? मेरा कहना है कि उनके पूरा जीवन वृतांत के फोटो एकत्रित कर , उनकी एक स्लाइड बना लो जिसे प्रोजेक्टर की सहायता से उपस्थित सभी लोगों को दिखाया जा सके ।'


' यह तो बहुत अच्छा आईडिया है आँटी । मैं नानी से ही एक दिन सारी बातें पूछती हूँ ।' दिव्या ने खुशी से उछलते हुए कहा ।


' इसके साथ बेटा तुम्हें आमंत्रित लोगों की सूची बनाने के साथ किसी अच्छे स्थान का चयन करना होगा जहाँ यह प्रोग्राम हो सके । अपनी नानी के निकटस्थ लोगों से उनके बारे में अपने विचार शेयर करने के लिए कह सकती हो । इसके साथ ही छोटा सा गीत -गजल का प्रोग्राम हो जाए तो बहुत ही अच्छा रहेगा ।'


' माँ केक भी तो बनवाना पड़ेगा ।' स्नेहा ने कहा ।


' हाँ बेटा... पर वह तो बाद की बात है । उसके पहले अन्य तैयारियाँ अति आवश्यक हैं ।' 


' आप ठीक कहती हैं आँटी ...और कुछ आवश्यकता पड़ी तो मैं आपसे पूछ लूँगी , अब चलती हूँ ।'


' रुको बेटा , आज मैंने स्नेहा की पसंद के गुलाब जामुन बनाए हैं तुम भी खाकर जाओ ।'


 दोनों को गुलाब जामुन खाते देखकर स्नेहा को बहुत अच्छा लग रहा था । सच दोनों बहुत प्यारी लग रही थीं ...कितनी प्रगाढ़ मित्रता है दोनों में ...। जब तक वे दोनों दिन में एक बार मिल न लें , लगता है उनका खाना ही हजम नहीं होता है । दिव्या को देखकर लग ही नहीं रहा था कि यह वही दिव्या है जो कभी जीवन के कष्टदाई अंधेरों से गुजरी है । अंधेरों का साया न केवल उससे दूर हो गया है वरन एक नई दिव्या का जन्म हुआ है । रंग रूप में निखार के साथ वह आत्मविश्वास से भरपूर युवती बन गई है जो सारी जिम्मेदारियों के साथ समस्त रिश्तो को बखूबी निभाना जानती है…। इसी कारण आज वह अपनी नानी का जन्मदिन विशिष्ट तरीके से मनाना चाह रही है । आकांक्षा का निर्णय सही था । जगह में बदलाव दिव्या के लिए अच्छा सिद्ध हुआ था । 


' ममा मैं भी दीदी के साथ दीदी के घर जा रही हूँ, जल्दी ही आ जाऊँगी ।' 


' ठीक है बेटा ।'


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उन दोनों के जाने के पश्चात दरवाजा बंद कर अंदर जा ही रही थी कि सामने से बदहवास सी शिखा आती दिखाई दी । मन में ढेरों प्रश्न लिए उसे देखकर रुक गई । उसकी ओर प्रश्नवाचक नजरों से देख ही रही थी कि शिखा ने रोते हुए कहा, ' आँटी जी रूपा को उस शैतान ने मार डाला । पुलिस उसकी बॉडी पोस्टमार्टम के लिए लेकर गई है ।'


' रूपा को मार डाला ... क्या कह रही हो तुम ?' मैंने आश्चर्य से पूछा ।


' और कौन ? उसके पति ने... इस बेमेल विवाह का आखिर यही तो अंत होना था । काश ! रूपा पहले समझ पाती । माँ तो सुनकर पागल सी हो गई है । समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें ?क्या आप कुछ पैसों से सहायता कर सकेंगी ? आप तो जानती ही हैं घर की हालत...।' शर्मिंदगी से शिखा ने कहा । उसकी आँखों से आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे ।


 मैंने पर्स से ₹2000 निकाल कर उसे दे दिए ,

 वह उन्हें लेकर चली गई । बेमेल विवाह का यही तो अंत होना था... इस छोटी सी लड़की ने इतनी बड़ी बात कह दी । सच कभी कभी हालात इंसान को समय से पूर्व भी परिपक्व बना देते हैं । 


शिखा रुपये लेकर चली गई किंतु मेरे मन मस्तिष्क पर रूपा का भोला भला चेहरा छाने लगा... गोरा रंग बड़ी बड़ी आँखें, नम्र स्वभाव ,उससे भी मोहक थी उसकी खनकदार हँसी तथा पल भर में ही अनजान को भी अपना बना लेने की क्षमता ...। वह हर काम खुशी -खुशी और सलीके से किया करती थी । उसे देखकर कभी-कभी मुझे लगता था कि गुदड़ी में भी लाल छुपे रहते हैं ।


रूपा मेरे घर नियमित रूप से काम नहीं करती थी पर कभी-कभी छुट्टी के दिन अपनी माँ के साथ उसका हाथ बंटाने आ जाया करती थी । रूपा बेहद मेहनती लड़की थी ।अपनी बहन शिखा की तरह वह भी पढ़ाई के साथ ट्यूशन भी करती थी । दसवीं की परीक्षा देने के पश्चात वह खाली थी । कभी-कभी वह मुझसे मिलने आ जाया करती थी । अपनी पढ़ाई के साथ अपने स्कूल की ढेरों बातें मुझसे करती । मुझे उसकी आँखों में अनेक स्वप्न तैरते नजर आते । वह खूब पैसा कमाना चाहती थी । कभी वह अफसर बनना चाहती तो कभी स्कूल की टीचर... उसे बच्चों से बेहद प्यार था । कभी मुझसे कहती आँटी क्या आप अपने कालेज में मेरा दाखिला करवा देंगी जिससे मैं उच्चशिक्षा प्राप्त कर सकूँ । इसी कारण जब मुझे लीला से पता चला कि उसने भाग कर शादी कर ली है तो मैं दंग रह गई थी । उस घटना के कुछ दिन पूर्व भी रूपा मेरे पास आई थी पर उसके व्यवहार से ऐसा कुछ नहीं लग रहा था कि वह ऐसा भी कुछ कर सकती है ।


सच किसी के मन की थाह पाना बेहद कठिन है । कभी-कभी जिसे हम बेहद अपना समझते हैं उसका इस तरह का व्यवहार मन को तोड़ देता है । यही लीला के साथ हुआ था । अपनी दोनों बेटियों शिखा रूपा में वह रूपा को अपने बेहद नजदीक पाती थी । वह छोटी होने के कारण न केवल उससे चिपकी रहती थी वरन उसकी छोटी-छोटी तकलीफों को अपनी वाकपटुता से क्षण भर में दूर कर देती थी । 


रूपा का मानना था कि जिंदगी सुख -दुख का दरिया है फिर क्यों सदा दुखी रहकर हाथ में आए सुख के थोड़े पलों के आनंद से स्वयं को वंचित रखें । सुख के इन थोड़े से पलों की खातिर उसने ऐसा कदम उठा लिया था जिसके कारण उसके अपने भी पराए हो गए थे । प्यार करना कोई गुनाह नहीं है पर उसका मार्ग गलत था । न जाने क्यों उसे ऐसा कदम उठाना पड़ा और अब यह घटना... छोटी सी उम्र में ही उसने सब कुछ सह लिया । 


पता नहीं क्या हो गया है हमारे समाज को पहले दिव्या और अब यह रूपा... सोचकर मन उदास हो गया था । मुझे आकांक्षा दीदी के शब्द एक बार फिर याद आने लगे... सच कृष्णा एक लड़की की माँ होना कांटों का ताज पहनने के बराबर है । खासतौर से तब जब लड़की सुंदर हो , नादान हो और जवानी की ओर कदम बढ़ा रही हो । कितनी ही शंकाएं, कितने ही संदेह मन को घेरे रहते हैं । उस पर भी यदि वह लड़की माँ की परेशानी को ना समझ पाए ...उसे रूढ़िवादी, परंपरावादी इत्यादि अनेक अलंकरणों से युक्त कर सदैव कटघरे में खड़ा कर अपमानित करे तो बेचारी माँ अंतः कवच में सिमटने के अतिरिक्त कर भी क्या सकती है ।


मन नहीं लगा तो टी.वी. खोलकर बैठ गई । न्यूज़ चैनल पर यह घटना पूरे जोर-शोर से दिखाई जा रही थी । रूपा और गणेश कहीं घूमने गए थे । लौटने में रात हो गई । कुछ गुंडों ने उन दोनों को घेर लिया । दोनों पर चाकू छुरी से वार कर वे जेवर ,नगदी छीनकर भाग गए । रूपा ने वहीं दम तोड़ दिया । रूपा को बचाने के चक्कर में उसके पति गणेश को भी चोटें आईं । वह अस्पताल में एडमिट था । 


खबर सुनकर मुझसे रहा नहीं गया । मैं लीला के घर गई अर्थी उठने की तैयारी हो रही थी । सबका रो -रोकर बुरा हाल था पर लीला एक कोने में गुमसुम बैठी निःशब्द सबको निहार रही थी । चेहरे पर डरावना सूनापन पसर गया था । आसपास क्या हो रहा है उससे उसको कोई मतलब ही नहीं रहा था । शायद उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसकी बेटी रूपा चली गई है ।


' आँटी जी हमने ही सब काम किया । उसकी ससुराल की तरफ से कोई नहीं आया । माना जीजू अस्पताल में हैं । उन्हें भी कुछ चोटें आई हैं पर इतनी भी नहीं कि वह दीदी की अंतिम यात्रा पर नहीं आ पाते । लगता है दीदी की मृत्यु के साथ ही उनका प्यार भी मर गया है या मेरा शक ठीक था कि जीजू ने ही योजना बनाकर मेरी बहन की हत्या करवाई । कोई शक न करे इसलिए खुद भी चोट खा ली ।' मुझे देखकर शिखा ने मेरे पास आते हुए कहा । रो-रोकर उसकी आँखें सूज गईं थीं । 


 नन्हीं सी जान ने बहन के साथ हुए हादसे को तो सह लिया था पर उसके पति की बेवफाई को वह सहन नहीं कर पा रही थी । मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहूँ, कैसे सांत्वना प्रदान करूँ ? शिखा को अपने सीने से लगाकर मौन संवेदना प्रकट की तो वह फफक -फफक कर रो पड़ी । कभी-कभी जो काम अनेकों शब्द नहीं कर पाते वहीं काम मौन क्रियाकलाप कर जाते हैं ।


समय बड़े से बड़े जख्मों को भर देता है कुछ दिनों बाद लीला पुनः काम पर आने लगी पर अब उसमें वह उत्साह और उमंग नहीं रही थी ।


######


 उस दिन बहुत ही सुनहरा दिन था । आनंदी दादी के जन्मदिन का आयोजन ग्रांड होटल में किया गया था । सुबह से ही दिव्या और स्नेहा काफी व्यस्त थीं । आकांक्षा दी, विनय, अचल और बीना अपने बेटे बहू पल्लव और अंजलि के साथ आ गए थे पर कार्यक्रम की सारी जिम्मेदारी इन दो बच्चों ने अपने हाथों में ले रखी थी । 

अवसर पाकर आकांक्षा दी मेरे घर आई तथा कहा…


 ' कृष्णा , तुमने मेरी बच्ची में अद्वितीय परिवर्तन ला दिया है । आभारी हूँ मैं तुम्हारी...।'


' दीदी , मेरे लिए जैसी स्नेहा है वैसे ही दिव्या है । सच तो यह है ये दोनों मेरी बच्चियाँ नहीं है पर इनके द्वारा मेरा मातृत्व सार्थक अवश्य हुआ है । मैंने उन्हें उचित परिवेश देने का प्रयास किया है । दिव्या के अंदर आया परिवर्तन मेरे कारण नहीं , उसकी अदम्य आत्मशक्ति के कारण संभव हो पाया है । आपने मुझ पर भरोसा किया, इसके लिए मैं आपकी आभारी हूँ ।' कहते-कहते मेरी आँखें अश्रुपूरित हो उठीं थीं ।


' कृष्णा सिर्फ जनने से ही कोई माँ नहीं बन जाता । तुमसे अच्छी माँ कोई हो ही नहीं सकती । आकांक्षा दी ने मुझे अंक में समेटे हुए कहा ।


' माँ आँटी, प्लीज ऐसे ही रहिए और हाँ थोड़ा सा मुस्कुरा दीजिए । दो मित्रों के बीच इससे अच्छा पोज़ हो ही नहीं सकता ।' स्नेहा ने क्लिक करते हुए कहा ।


' शरारती कहीं की... आजकल बच्चे भी….।' कहते हुए मेरे चेहरे पर हँसी आ गई थी ।


 ' सच कृष्णा मोबाइल ने इन बच्चों को थोड़ा ज्यादा ही स्मार्ट बना दिया है । मुट्ठी में बंद यह छोटा सा उपकरण न जाने कितने काम का है । चाहे तो इससे बातें कर लो, गाने सुन लो , इंटरनेट के द्वारा देश-विदेश से कनेक्ट रहो, जब मन चाहे टेक्स्ट, एसएमएस कर दो और मौके बेमौके जब चाहे किसी को इसमें कैद कर दो ।' कहते हुए आकांक्षा दी मुस्कराईं ।


' ममा और आँटी आप दोनों बात ही करती रहेंगी, तैयार नहीं होंगी। एक घंटे पश्चात आप दोनों को दादी को लेकर होटल ग्रांड पहुँचना है । अन्य सभी पहले ही वहाँ पहुँच जाएंगे ।' स्नेहा ने हमसे कहा ।


' तू भी तैयार नहीं हुई …जा तैयार हो जा । तुम्हें तो हमसे भी पहले निकलना है । हम भी तैयार हो जायेंगे पर जरा फोटो तो दिखा । ' मैंने उससे कहा ।


' बस माँ, तैयार होने ही जा रही हूँ ।' उसने फोटो दिखते हुए कहा । सचमुच फोटो बहुत अच्छी आई थी ।


 पल्लव और अंजलि चले गए थे । वे केक लेकर सीधे होटल पहुँचेंगे । हम वहाँ तैयार होते तो माँजी को शक हो जाता है अतः इधर आ गए । अन्य लोग भी आते होंगे । यहीं से हम सब निकलेंगे । आप दोनों माँजी को लेकर आ जाइएगा ।' बीना ने कहा । साथ में दिव्या भी थी ।


 आकांक्षा दी ने आनंदी दादी को मंदिर चलने के लिए तैयार किया तथा वही साड़ी पहनने का इसरार किया जो उनके जन्मदिन के उपलक्ष में खरीदी गई थी । इसके पश्चात वह स्वयं तैयार होने लगीं । इसी बीच मैं गाड़ी लेकर उनके घर पहुँच गई ।


मंदिर दर्शन के पश्चात मैंने गाड़ी होटल के सामने पार्क की । होटल के सामने गाड़ी पार्क करते देखकर आनंदी दादी ने कहा, ' तुम लोग मुझे कहाँ ले आई ?'


'दादी जी, दिव्या और स्नेहा ने हम सबको यही आने के लिए कहा था ।' मैंने आकांक्षा दी की ओर देखते हुए उत्तर दिया ।


जैसे ही आनंदी दादी के साथ हमने हॉल में प्रवेश किया ' हैप्पी बर्थडे नानी के स्वर से हॉल गूँज उठा ... इसके साथ ही उनके ऊपर फूल बरसने लगे ।


' यह क्या... तुम लोगों ने मुझे पहले क्यों नहीं बताया ?'


' हम आपको सरप्राइस देना चाहते थे । दिव्या और स्नेहा ने आगे बढ़कर उनका हाथ पकड़ लिया तथा उनके लिए बनाए विशेष मंच की ओर ले जाने लगीं । 


वेलकम ड्रिंक और उसने स्नैक्स के पश्चात दिव्या ने कार्यक्रम प्रारंभ किया । सबसे पहले आनंदी दादी की सबसे पुरानी मित्र लता को उनके साथ बिताए कुछ पल शेयर करने के लिए बुलाया । उसके पश्चात एक के बाद एक उनके मित्र, सगे संबंधी स्टेज पर आते गए तथा उनके साथ बिताए क्षणों को शेयर करते गए ।


 उनकी बातें सुनकर आनंदी दादी की आँखों में कभी नमी आती तो कभी खुशी ...। जब दिव्या ने उनके जीवन वृतांत को प्रोजेक्टर द्वारा दिखाया तो वह अपने आँसू नहीं छुपा नहीं पाई । उन्होंने दिव्या और स्नेहा को अपने पास बुलाकर अपने गले से लगाते हुए कहा , ' बेटा आज तुम दोनों ने मुझे जो खुशी दी है, वह मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी । जुग जुग जियो मेरे बच्चों ...।' 


' दादी अभी तो सरप्राइज बाकी है ।' दिव्या और स्नेहा ने एक साथ कहा ।


' अब क्या बाकी है ?'


' आपको केक काटना है । '


' केक और मैं ...।' आश्चर्य से आनंदी दादी ने कहा ।


' हाँ नानी, आप केक काटेंगी । बिना केक काटे ,बर्थ डे कैसे सेलिब्रेट होगा ।' दिव्या ने कहा ।


' पर ...।


' पर वर ,कुछ नहीं नानी ...।'


तभी होटल का वेटर एक सजी टेबल पर केक लेकर आया ।


' उठिए नानी ...।' एक बार फिर दोनों उनका हाथ पकड़कर टेबल तक ले गईं और कई फ्लैश लाइटों के बीच आनंदी दादी ने केक काटा । एक बार फिर' हैप्पी बर्थडे 'के स्वर से हॉल गुंजायमान हो गया ।


खाने-पीने के पश्चात कार्यक्रम का समापन हुआ । कार्यक्रम बहुत ही अच्छा और वेल प्लांड था सभी दिव्या और स्नेहा की प्रशंसा करते नहीं थक रहे थे विशेषता स्लाइड वाले शो को...।


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 मैं स्कूल की कॉपियां चैक कर ही रही थी कि लीला मेरे पास आकर बैठ गई …


' क्या बात है लीला ? सब ठीक है ना ।' मैंने उसकी ओर देखकर पूछा ।


' मेम साहब, शिखा की सहेली दीपा कह रही थी कि वह लड़का अब दूसरा विवाह कर रहा है ।' 


'क्या…? अभी तो उस घटना को बीते महीना भर भी नहीं हुआ है ?' मैंने आश्चर्य से कहा ।


' शिखा तो पहले ही कह रही थी पर अब तो मुझे भी ऐसा लगने लगा है मेमसाहब कि उसने मेरी फूल सी बेटी की हत्या करवा दी । उसके पिता उसका विवाह दूसरी जगह करना चाहते थे जहाँ उसे लाखों का दहेज मिल रहा था । उस समय उसने उनकी बात नहीं सुनी । जब उसका मन रूपा से भर गया तब उसे अपने पिता की बात ठीक लगने लगी और उसने एक ही झटके में उसे अपनी जिंदगी से निकालकर फेंक दिया । उस पर शक न हो इसलिए उसने अपने ऊपर भी एक दो वार करवा लिए । वैसे भी वह पुलिस वाला है उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है ।


' पर यह सब तुमने इतने विश्वास के साथ कैसे कह रही हो ?' 


'मेम साहब दीपा से ही पता चला कि कुछ दिनों से रूपा और गणेश में झगड़ा चल रहा था । घटना से कुछ दिन पहले उन दोनों में काफी झगड़ा हुआ था । गणेश ने रूपा को मारने की धमकी भी दी थी । यहाँ तक कि उसके किसी से मिलने जुलने पर भी पाबंदी लगा दी थी । एक दिन जब दीपा रूपा से मिलने गई तो बाहर ताला लगा था । रूपा ने उसे देखकर बिना कुछ कहे खिड़की से एक कागज का टुकड़ा बाहर फेंका तथा अंदर चली गई । उसमें उसने अपने ऊपर हुए अत्याचार के बारे में लिखा था । पहले तो दीपा ने पति -पत्नी का आपसी झगड़ा समझकर किसी से कुछ भी ना कहने की सोची फिर उसे लगा कि जब उसने यह कागज का टुकड़ा चुपके से उसे दिया है तो वह चाहती है कि वह उसकी कुछ सहायता करे । दूसरे दिन वह हमसे मिलने आ ही रही थी कि उसने देखा गणेश रूपा को घुमाने ले जा रहा है । रूपा भी खुश लग रही थी । सब कुछ सामान्य समझकर उसने अपना विचार त्याग दिया । उसके हफ्ते भर बाद ही यह घटना घट गई । गणेश के दूसरे विवाह की बात सुनकर अब दीपा को भी लग रहा है कि वह दुर्घटना रूपा को अपनी जिंदगी से निकालने के लिए कहीं गणेश ने ही तो सुनियोजित ढंग से नहीं करवाई ? यही सोचकर कल वह हमसे मिलने आई थी और उसने वह कागज का टुकड़ा भी हमें दिया है । यह टुकड़ा क्या है , उसकी दर्द भरी दास्तान से भरा पड़ा है। 


 मेम साहब, रूपा दर्द भरी दास्तान अपने दिल में छुपाकर चली गई । एक बार वह हमसे मिलने आई थी पर उसके पिता के डर से मैंने उससे यह कहकर मिलने से मना कर दिया था कि तू अब हमारे लिए मर गई है । ऐसे में वह अपना दर्द कहती भी तो किससे कहती ? हम जो उसके अपने थे उन्होंने उससे संबंध ही तोड़ लिए थे और जिसने उसे अपना समझा उसने उसे दगा दे दिया । मैं ही उसकी हत्यारिणी हूँ... मैं ही अपराधी हूँ ।' कहकर वह बिलख पड़ी ।


मैं सोच रही थी कि कहने मात्र को ही हम प्रगतिशील विकासशील 21वीं सदी के हैं पर आज भी हम अंधे युग में जी रहे हैं जहाँ सदैव जिसकी लाठी उसी की भैंस वाली कहावत चरितार्थ होती रहती है ।


 लीला का बिलखना मुझे बेचैन कर रहा था पर समझ नहीं पा रही थी कि कैसे उसे समझाऊं, किन शब्दों में उसे सांत्वना दूँ । जेसिका लाल हो या नताशा सिंह, शिवानी भटनागर हो या मधुलिका शर्मा या निर्भया या यह रूपा... सब अपने दुख अपनी तड़प अपने साथ ही छिपाए चली गईं । इनके अतिरिक्त और भी ना जाने कितनी ही मासूम कन्याएं ऐसे स्वार्थी मर्दो की हवस का शिकार हुई होंगी या हो रही हैं पर शायद ही किसी अपराधी को सजा मिली हो । इन सब लड़कियों का अपराध क्या था ...सिर्फ यही ना कि इन्होंने एक ऊँची उड़ान भरनी चाही थी । 


उड़ना तो सभी चाहते हैं पर ताकतवरों ने अपने स्वार्थ के लिए उनके पंख असमय ही काट दिए और हम इस अन्याय को देखते हुए भी चुप हैं । ना जाने यह कैसी न्याय व्यवस्था है, कैसा कानून है जिसमें अपराधी अपराध करने को स्वच्छंद हैं जबकि निरपराधी दंड भोग रहे हैं । कुछ दिनों में इन सब घटनाओं को लोग भूल जाएंगे पर जिनके अपने चले गए वे ताउम्र जीवन की इस त्रासदी को भोगते हुए खून के आँसू पीते हुए न जी पायेंगे और ना ही मर पायेंगे ...विशेषता लीला जैसे लोग जिनको अपनी जान से भी ज्यादा अपनी इज्जत अपने संस्कार अपने मूल्य प्यारे होते हैं ।


' मेम साहब, क्या आप मेरी बेटी को न्याय दिलवाएंगी ।' अचानक लीला ने कहा ।


' तुम क्या कह रही हो ? इसमें तो बहुत पैसा खर्च होगा उस पर अदालत के चक्कर अलग लगेंगे ।' चौकते हुए मैंने कहा ।


' मैं सब करूँगी ...जितना चाहे खर्चा हो मैं कमाऊंगी पर आप मुझसे वायदा कीजिए कि कोई अच्छा सा वकील ढूंढ कर आप रूपा को न्याय दिलवाने का प्रयास करेंगी । आप सिध्द करवा देंगी कि गणेश ने दूसरे विवाह के लिए रूपा का खून किया जिससे कि वह किसी दूसरी रूपा को अपनी हवस का शिकार न बना सके ।' उसकी आँखों में प्रतिशोध झलक रहा था तथा वह उत्तर की आकांक्षा में लगातार मेरी ओर देखे जा रही थी ।


' ठीक है, मैं प्रयत्न करूँगी । कल तुम दीपा को मेरे पास लेकर आना और यह वह पत्र भी जो दीपा ने तुम्हें दिया था ।'


मेरा इतना कहते ही लीला की आँखों में खुशी के आँसू भर आए । मैंने अपनी सहेली पल्लवी को फोन मिलाया तथा सारी बातें बताते हुए केस लड़ने के लिए आग्रह किया । उसने तुरंत हामी भर दी । 


दूसरे दिन लीला और दीपा को लेकर मैं पल्लवी के पास गई । सारी बातें सुनकर उसने कहा , ' बस यह पत्र ही हमारा सहारा है । दीपा तुम क्या कोर्ट में आकर सारी बातें कह सकती हो ।'


' बिल्कुल कह सकती हूँ । मैं अपनी सहेली को न्याय दिलवाने का पूरा प्रयत्न करूँगी ।'


' गुड ...अब हम केस दायर कर सकते हैं ।'


लीला और दीपा को बाहर बैठने का आदेश देकर मैंने पर्स से 2000 निकालकर पल्लवी को दिए । 


' मुझे छोटा मत बनाओ कृष्णा, जब तुम अपनी नौकरानी की लड़की के लिए केस लड़कर उसे न्याय दिलवाना चाहती हो तो क्या मुझे समाज सेवा का एक अवसर नहीं दोगी ? मैंने बहुत से केस लड़े और जीते भी, पैसा भी बहुत कमाया , अब अपनी संतुष्टि के लिए इस केस को निस्वार्थ लड़ने दो । मैं इस केस को जीतने के लिए अथक प्रयास करूँगी । छोटी से छोटी बात की तह तक जाऊँगी क्योंकि मैं जानती हूं कि मोस्ट केसेज आर वन ओर लॉस्ट बिफोर ट्रायल बिगिंस । यह सच है कि किसी भी रोग का समूल नाश करना संभव नहीं है पर प्रयास तो किया ही जा सकता है । आखिर समाज में फैले इस संक्रामक रोग का अंत होना ही चाहिए , अपराधी को सजा मिलनी ही चाहिए तभी शायद ऐसी घटनाओं पर रोक लग सके ।' कहते हुए पल्लवी ने मेरी पेशकश ठुकरा दी ।


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 एक दिन स्कूल से आकर बैठी ही थी कि दिव्या ने मेरे पैर छूते हुए कहा, ' आंटी, मुझे आशीर्वाद दीजिए । रिजल्ट निकल गया है , मैं फर्स्ट डिवीजन विद डिस्टिंक्शन पास हो गई हूँ ।'


' बेटा ,यह तो होना ही था आखिर तूने इतनी मेहनत जो की थी अब अपने मुख्य उद्देश्य में लग जा ,मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि तू अपने लक्ष्य को हासिल कर ले ।'


' आंटी , अगले महीने ही प्रिलियम है ,देखिए क्या होता है ?'


' सब अच्छा होगा ।। बस अपने लक्ष्य की ओर ध्यान केंद्रित रखना ।'


दिव्या ने सिविल सर्विसेज की तैयारी प्रारंभ कर दी । कोचिंग तो उसने पहले ही ज्वाइन कर ली थी । अब वह तन-मन से परीक्षा की तैयारी में लग गई । वह रात के 2:00 बजे तक पढ़ती तथा सुबह 6:00 बजे उठकर फिर पढ़ाई प्रारंभ कर देती । आखिर उसकी मेहनत और लगन रंग लाई । प्रिलियम में सफलता पाने के पश्चात वह मैन एक्ज़ाम की तैयारी में लग गई । मुख्य परीक्षा का जब रिजल्ट निकला तब प्रथम बार में ही उसका नाम सफल प्रतियोगी की लिस्ट में पाकर हम सबकी खुशी का ठिकाना ना रहा । 


विनय का मानना था कि लड़कियों के लिए सिविल सर्विसेज अच्छी है पर दिव्या ने पुलिस सर्विस को चुना । कारण पूछने पर वह चुप रह गई । हमने भी इस बात को ज्यादा तूल नहीं दिया आखिर हमारी बच्ची ने अपनी मंजिल पा ली थी । उसकी खुशी में ही हमारी खुशी थी ।


अब मेरा सारा ध्यान स्नेहा पर था । उसने हायर सेकंडरी की परीक्षा 94% अंकों से पास की थी । वह आई.आईटियन बनना चाहती थी । 


समय के साथ मेरे मन में शशांक के प्रति नफरत की दीवार कम होने लगी थी । अलग-अलग रहते हुए भी हम दोनों हर संभव तरीके से स्नेहा की हर इच्छा पूरी करने का प्रयत्न करते । उससे संबंधित हर मसले पर आपस में सलाह लेकर ही कोई फैसला करते । कभी -कभी उसे लेकर घूमने भी चले जाते । स्नेहा ने भी शायद अपनी स्थिति से समझौता कर लिया था । तभी अब वह ज्यादा सवाल जवाब नहीं करती थी ।


आखिर वह दिन भी आ गया जब आई.आई.टी . की प्रवेश परीक्षा में स्वयं को प्रथम 10 प्रतियोगियों में पाकर स्नेहा रो पड़ी तथा मेरी गोद में सिर छुपाते हुए कहा, ' ममा अगर आप मुझ पर भरोसा नहीं जताती तो मैं अपना लक्ष्य कभी प्राप्त नहीं कर पाती ।


' बेटा , मैंने तो तुझे राह दिखाई है सफल तो तू स्वयं अपने परिश्रम और योग्यता से हुई है । वैसे भी अभी तो तू सफलता की सिर्फ एक सीढ़ी चढ़ी है । अभी जीवन में अनेकों ऐसी सीढ़ियां आएंगी , पैर भी डगमगाएँगे पर मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि तू निरंतर ऊँचाइयों पर चढ़ती जाएगी ।' स्नेहा के आँसू पोंछते हुए मैंने प्यार से कहा ।


वरीयता तथा उसकी चॉइस के आधार पर उसे दिल्ली आई.आई.टी . में दाखिला मिला । हम खुश थे कि वह अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही है । छुट्टियों में आती तो बिना त्यौहार के ही जो त्यौहार मन जाता । अब भी उसके मन में एक कसक थी कि वह अपने ममा -पापा दोनों के साथ एक साथ नहीं रह पाती है । उसका समय बंट जाता है । 


जैसे-जैसे उसका कोर्स समाप्त होने आ रहा था वैसे वैसे उसकी आँखों में नया सपना पनपने लगा था ...आई.आई.एम. से मैनेजमेंट का कोर्स करना...। यद्यपि पढ़ते पढ़ते ही उसका प्लेसमेंट हो गया किन्तु अपने दूसरे स्वप्न के लिए उसने वह ऑफर ठुकरा दिया । यद्यपि मुझे स्नेहा का यह कार्य अतिवादी लगा था किन्तु शशांक का कहना था कि अगर वह अपना एक और स्वप्न पूरा करना चाहती है तो उसे कर लेने देना चाहिए जिससे उसे यह ना लगे कि उसने जो चाहा वह हमने उसे करने नहीं दिया ।


 हमारी प्रसन्नता का पारावार न रहा जब उसने आई.आई.टी . में मेरिट प्राप्त की । हमने उसकी इच्छा का आदर किया आखिर वह अपने दूसरे स्वप्न में भी कामयाब रही । उसे आई.आई. एम. बेंगलुरु में दाखिला मिला । बेंगलुरु दूर था पर स्नेहा के सपने के लिए दिल पर पत्थर रख लिया । वैसे भी संचार के साधनों ने आज दूरी कम कर दी है ।


समय पंख लगाकर उड़ता जा रहा था । एक दिन वह बालकनी में अकेली बैठी डूबते सूर्य को निहार रही थी कि शशांक आ गया । अचानक उसे आया देखकर प्रश्नवाचक दृष्टि से मैंने उसे देखा तो उसने कहा, ' स्नेहा ने मुझे तुम्हारे पास पहुँच कर फोन करने के लिए कहा है ।'


'सब ठीक तो है ना ।' चिंतातुर स्वर में मैंने पूछा ।


' आवाज से तो सब ठीक ही लग रहा था ।' कहते हुए शशांक ने स्नेहा को फोन मिलाया ।


' पापा स्पीकर ऑन करिए । ' फोन उठाते ही स्नेहा ने कहा ।


' स्पीकर ऑन कर दिया है क्या बात है बेटा ? सब ठीक है ना ।' अब शशांक के स्वर में चिंता झलक आई थी । 


' पापा सब ठीक कहाँ से होगा ? आप और मम्मा अलग-अलग रहते हो !! अब अगर मुझे कोई खुशखबरी दोनों को एक साथ देनी हो तो.... जब मुझे कुछ नहीं सूझा तब यह उपाय अपनाया ।' 


' खुशख़बरी ...जल्दी बता बेटा , हम दोनों के मुँह से एक साथ निकला ।' 


' सब्र करो माँ पापा. . आज मुझे एक मल्टीनेशनल कंपनी के द्वारा 25 लाख का ऑफर मिला है ।' 


' सच बेटा ...।'


' हाँ पापा ममा...कोर्स समाप्त होते ही मुझे ज्वाइन करना होगा ।


' बहुत-बहुत बधाई बेटा . इस खुशी में अपने सभी मित्रों को ट्रीट दे देना । मैं अभी दस हजार तेरे अकाउंट में ट्रांसफर कर देता हूँ ।'


' थैंक यू पापा , क्लास में जाना है फिर बात करूँगी । बाय पापा -ममा ।'


 कैंपस सलेक्शन द्वारा स्नेहा को एक मल्टीनेशनल कंपनी में 25 लाख का पैकेज मिला है ...सुनकर शशांक के पैर तो मानो जमीन पर ही नहीं पड़ रहे थे । उसने आनन-फानन में अपने सभी मित्रों को पार्टी के लिए एक होटल में आमंत्रित कर लिया । शशांक के कहने पर मैं भी अपने कुछ मित्रों के साथ पार्टी में गई थी । सबको हमारे संबंधों के बारे में पता था अतः सोचने की कोई बात ही नहीं थी ।


######


' अब हमें स्नेहा के विवाह के संबंध में सोचना चाहिए ।' एक दिन मैंने अवसर पाकर शशांक से कहा ।


' विवाह भी हो जाएगा, पहले उसे सेटिल तो हो जाने दीजिए ।' शशांक ने कहा था ।


 स्नेहा निरंतर सफलता की सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ती जा चली जा रही थी पर कहते हैं कि कुछ ईर्ष्यालु लोग अच्छाई मैं भी बुराई ढूंढ ही लेते हैं । हमारे कुछ ऐसे ही शुभचिंतक दबी बुझी जुबान से यह कहने से नहीं चूकते... ठीक है उसे बहुत अच्छा जॉब मिल गया है पर इतनी पढ़ी-लिखी एवं सांवली लड़की के लिए वर ढूंढना आसान नहीं होगा । उनकी बातें सुनकर मैं कुढ़ कर रह जाती । तब ऐसा लगता कि कुछ लोगों को किसी भी तरह से चैन नहीं मिलता है । शायद मन की कुंठा ही ऐसे लोगों से यह सब कहलवा देती है ।


कंपनी ज्वाइन करने के कुछ दिन पश्चात मैंने स्नेहा से विवाह के संदर्भ में बात की तो उसने कहा, ' मम्मा अभी से मेरे पैरों में जंजीर मत डालो । अभी मुझे थोड़ा सेटल हो जाने दो । वैसे भी जब तक मुझे समझने वाला, मेरी कद्र करने वाला लड़का मुझे नहीं मिलेगा , मैं विवाह नहीं करूँगी।' 


शशांक ने भी स्नेहा की बात का समर्थन कर दिया था पर मेरे माथे पर बल पड़ गए थे । आखिर यह कैसी सोच है, विवाह तो समय से ही हो जाना चाहिए ।' मिस्टर राइट ' की खोज में कब तक कुंवारी बैठी रहेगी ? पर आजकल के बच्चे किसी की सुनते ही कहाँ है !! आखिर इसी तरह 2 वर्ष और बीत गए । एक बार हफ्ते भर की छुट्टी लेकर स्नेहा घर आई । मैंने सोचा कि इस बार उसे विवाह के लिए मना ही लूँगी । एक दिन अवसर देखकर मैंने स्नेहा से विवाह की बात की ।


' मुझे विवाह करना ही नहीं है ।' प्रत्युत्तर में उसने कहा ।


' पर क्यों बेटा ?'


' मम्मा विवाह ही तो जिंदगी का मकसद नहीं होता । यही तो आप कहती हो । मैं आपके ही नक्शे कदम पर चलना चाहती हूँ ।'


' मेरी बात और थी बेटा ।'


'क्या आप लड़की नहीं थीं ? क्या आपकी विवाह करने की इच्छा नहीं थी ?' मेरी बात काटते हुए स्नेहा ने कहा ।


' बेटा मेरा मकसद विवाह करना नहीं, अध्यापिका बनकर समाज सेवा करना था ।' 


' झूठ ममा झूठ...आप मुझसे झूठ बोल रही हैं । सच को इंसान चाहे कितना भी छिपाने का प्रयत्न करे, एक न एक दिन सामने आ ही जाता है । ' स्नेहा ने मेरी बात काटते हुए कहा तथा मेरे सामने एक एल्बम रख दी ।


 ' यह तुझे कहाँ से मिली ?' एल्बम देख कर चौक कर मैंने उससे पूछा ।


' मम्मा , आज तक आपने सच क्यों छुपाया ? आपकी पापा से सगाई हुई थी फिर विवाह श्वेता ममा से क्यों हुआ ? ' मेरी बात का कोई उत्तर न देते हुए उसने मुझसे प्रश्न किया ।


 जो बात में इतने दिन तक छुपाए रही वह अचानक ऐसे सामने आ जाएगी , मुझे एहसास ही नहीं था । यह एल्बम शायद उसे माँ- पापा की अलमारी से मिली थी । अब छुपाने से कोई फायदा नहीं था । 


सच से परिचित होने पर उसने कहा, ' मम्मा, आप कहती हैं कि क्षमादान से बड़ा कोई दान नहीं है । अगर इंसान को अपनी गलती का एहसास हो जाए तो उसे क्षमा कर देना चाहिए ।'


'हाँ पर...।'


' मम्मा , अब मैं समझी कि पापा ने दूसरा विवाह क्यों नहीं किया । वह आज भी आपको चाहते हैं शायद आप के प्रति अपने व्यवहार के कारण वह स्वयं को क्षमा न कर पाए हों पर आप तो उन्हें क्षमा कर सकती हैं । शायद उनका प्रायश्चित पूरा हो जाए ।'


' पर बेटा, मैंने तो उन्हें कब का क्षमा कर दिया ।'


' नहीं ममा , आपने उन्हें क्षमा नहीं किया... अगर आपने उन्हें क्षमा कर दिया होता तो ...।'आगे के शब्द जैसे उसके तालु से ही चिपक गए थे ।


' तो क्या बेटा ?'


' अगर आप डैड से विवाह कर मेरी माँ बनने को तैयार हो तो मैं भी विवाह कर लूँगी ।'अचानक उसने कहा और आशा भरी नजरों से मुझे देखने लगी ।


' क्या मैं तेरी मम्मा नहीं हूँ ? क्या मैं अपने किसी दायित्व को निभाने में असमर्थ रही हूँ? ' उसके आग्रह पर मैंने आत्मविगलित स्वर में पूछा था ।


' मम्मा , मेरे कहने का यह तात्पर्य नहीं है । आपने मेरी जैसी परवरिश की वैसी तो श्वेता मॉम भी नहीं कर पातीं पर आपको और डैड को मैं इस तरह तिल-तिल जलते नहीं देख सकती । हर पीड़ा का एक दिन अंत होता है फिर इस पीड़ा का अंत क्यों नहीं !! क्या आप दोनों एक नहीं हो सकते ?'


' लेकिन बेटा अब हम इन रिश्तों से परे जा चुके हैं ' 


' ममा, डैड तो अकेले रह ही रहे हैं पर मेरे विवाह के पश्चात आप भी अकेली रह जायेंगी । साथ ही साथ मैं भी सदा दो टुकड़ों में बैठी रहूँगी । मेरा एक टुकड़ा आपके पास रहेगा और एक डैड के पास ...आखिर कब तक मैं ऐसा जीवन जीऊँगी और क्या वह लड़का जिससे मेरा विवाह होगा, ऐसा जीवन स्वीकार कर पाएगा ? क्या उसका परिवार आप दोनों के रिश्ते को समझ पाएगा ? ' उसने पीड़ायुक्त स्वर में कहा था ।


: पर बेटा जो तुम चाहती हो , अब नहीं हो सकता , लोग क्या कहेंगे ?'


' मम्मा विवाह की कोई उम्र नहीं होती और जहाँ तक लोगों की बात है वे तो किसी को भी नहीं छोड़ते ।'


 तुम सब कुछ जानने के पश्चात भी मुझ से ऐसी उम्मीद करती हो ?' विवशता एक बार फिर मेरे स्वर से झलक उठी थी ।


' ममा ,मैं जानती हूँ कि डैड से गलती हुई थी लेकिन यह भी उतना ही सच है कि आप और डैड एक दूसरे को बहुत चाहते हो जिसकी वजह से न आपने विवाह किया और न ही डैड ने ... फिर इस सत्य को आप स्वीकार क्यों नहीं कर पा रही हैं ? मुझे अपना कर आपने अपनी बहन के प्रति अपना दायित्व निभा दिया । मुझे तो माँ मिल गईं और आपको संतान लेकिन डैड तो संतान के रहते हुए भी निःसंतान ही रहे । क्या उन्होंने मुझे आपको सौंप कर अपना प्रायश्चित पूरा नहीं कर लिया ? एक गलती की सजा उन्हें कब तक भुगतनी होगी ? कभी तो इसका अंत होना ही चाहिए । मेरा बचपन तो आप दोनों की गोद एक साथ पाने में विफल रहा । क्या अब भी मुझे कभी आपसे मिलने और कभी डैड से मिलने अलग-अलग आना पड़ेगा ? मम्मा अब मैं आप दोनों को एक साथ देखना चाहती हूँ । मैं भी अन्य बच्चों की तरह एक सामान्य परिवार चाहती हूँ ।' कहकर स्नेहा सुबकने लगी थी ।


 स्नेहा की बातें सुनकर मैं भाव विह्वल हो उठी, उसे अपने गले से लगाते हुए आत्मविगलित स्वर में कहा, ' रो मत बेटी, जैसा तू चाहती है वैसा ही होगा पर क्या तुमने अपने पापा से बात की ।' 


' नहीं ...अगर आप अपनी सहमति देती हैं तो मैं उनकी सहमति ले ही लूँगी ।'


कभी-कभी अपनों की खुशी के लिए इंसान को झुकना ही पड़ता है, यही मेरे और शशांक के साथ हुआ । अपने सारे अहम और नफरत का परित्याग कर , स्नेहा की इच्छा अनुसार अंततः हमने कोर्ट मैरिज कर ली थी । इस विवाह से आनंदी दादी बेहद प्रसन्न थीं ।उन्होंने स्नेहा को गले से लगा कर कहा, ' बेटा तूने दो सूखी डालियों को को अपने प्यार से लहलहाकर एक करने का सुखद कार्य किया है । ईश्वर तुझे सदा सुखी रखे ।'


आकांक्षा दीदी भी बहुत प्रसन्न थीं । उनका मानना था कि एक ही नदी की परिस्थिति जन्य दो विपरीत दिशाओं में बहती धाराओं को एक दिन मिलना ही था । दिव्या इस सुखद क्षण का आनंद जिले में राजनीतिक पार्टियों द्वारा निज हितार्थ कराए गए उपद्रव के कारण नहीं ले पाई थी आखिर कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी पुलिस अधीक्षक होने के कारण उसी की थी ।


######


 स्नेहा की पूर्ण परिवार की कल्पना साकार हो गई थी । वह बेहद प्रसन्न थी । इसके साथ ही उसने अपने विवाह की सहमति दे दी थी । हम भी उसके लिए रिश्ते देखने लगे ...आखिर एक दिन एक अच्छा रिश्ता आ ही गया । लड़का भी आईआईटियन था । उसने एम.एस . अमेरिका से की थी तथा वहीं काम कर रहा था । उसका जीजा अमित स्नेहा का बॉस था । अमित स्नेहा के काम और व्यवहार से अति प्रसन्न था अतः वह स्नेहा का विवाह अपने साले अभिनव से कराना चाहता था । उसने अपने मन की बात स्नेहा की... स्काइप पर स्नेहा और अभिनव की बात कराई । उन दोनों की स्वीकृति प्राप्त कर उसने स्नेहा से उसके घर का पता लेकर रिश्ते का पैगाम भिजवाया था ।


रिश्ता अच्छा था डिमांड भी नहीं थी । अमित ने विवाह के पश्चात स्नेहा का भी अमेरिका के शिकागो शहर की उसी ब्रांच में स्थानांतरण का प्रस्ताव भी रखा था जिसमें अभिनव काम कर रहा था । अमित ने स्नेहा की स्वीकृति के पश्चात ही रिश्ते का पैगाम भेजा था अतः उनके मना करने का प्रश्न ही नहीं था । बात आगे बढ़ी स्नेहा के होने वाले सास-ससुर तथा ननद ने स्नेहा से मिलने की इच्छा प्रकट की तो हमने उन्हें आमंत्रित कर लिया । 


अभिनव के माता-पिता एवं बहन स्नेहा से मिलकर बेहद प्रसन्न हुए एवं इस रिश्ते पर अपनी स्वीकृति की मोहर लगा दी । वे अत्यंत ही कुलीन सज्जन और संस्कारी लगे । लड़के को हम साक्षात तो नहीं देख पाए पर उसके विभिन्न पोज की फोटोस उसे हेंडसम और स्मार्ट दिखा रही थीं । मन से बहुत बड़ा बोझ हट गया था फिर भी मन की दुश्चिंता समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रही थी । बार-बार मन में यही आ रहा था कि इतना हैंडसम लड़का उनकी सामान्य कद काठी की बेटी को उचित मान-सम्मान दे भी पाएगा !! कहीं ऐसा तो नहीं वह उसे देखने के पश्चात मना कर दे । स्नेहा 

के साथ भी कहीं वैसा ही ना हो जैसा कभी उसके साथ हुआ था । अनेकों प्रश्नों के साथ मन में एक कशिश यह भी थी कि बेटी हमसे इतनी दूर चली जाएगी ... उसको देखने के लिए भी आँखें तरस जायेंगी । 


मन की बात शशांक से कही तो उसने कहा, ' तुम व्यर्थ चिंता करती हो । आखिर अभिनव के माता-पिता, जीजा- जीजी ने उसे स्नेहा के रंग-रूप कद-काठी के बारे में बता ही दिया होगा । वैसे भी हमारी स्नेहा में क्या कमी है ? इंटेलिजेंट है , होनहार है ,अच्छा कमा रही है ...जमाना बदल रहा है, साथ ही लोगों का नजरिया भी... समझदार लोग आज लड़कियों के रूप रंग को नहीं वरन योग्यता को महत्व देते हैं । वास्तव में योग्यता ही व्यक्ति को सर्वगुण संपन्न बनाती है ।


अभिनव को दो महीने पश्चात आना था तभी विवाह की तारीख तय की गई थी । हम विवाह की तैयारियों में जुट गए । इस बीच स्नेहा और अभिनव में स्काइप और व्हाट्सएप वीडियो कॉल के जरिए अपने -अपने विचारों के आदान-प्रदान के साथ फोटोस भेजने का सिलसिला भी चलता रहा । आज के युग में शायद दूर बैठे व्यक्ति से विचारों के आदान-प्रदान का इससे अच्छा तरीका और कुछ हो ही नहीं सकता है ।


 जैसे-जैसे विवाह की तारीख पास आती जा रही थी वैसे वैसे काम का बोझ बढ़ता जा रहा था । विवाह की समस्त रस्मों तथा रिश्तेदारों के रहने के लिए ' होटल अवध ' बुक करा लिया था पर फिर भी काम समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा था । शॉपिंग के अतिरिक्त कार्ड छपवाना और वितरित करने का काम भी बाकी था । सिर्फ महीना भर बचा था । समय कम पर काम अनेक... आनंदी दादी ने जहाँ हर रस्मो रिवाज से परिचय करवाया वही आकांक्षा दी तथा पल्लवी मेरे साथ विवाह की शॉपिंग में सदा साथ रहीं । उस समय लीला और उसकी बेटी शिखा ने पूरा घर संभाल लिया था । यद्यपि शिखा का विवाह हो गया था पर स्नेहा की विवाह का समाचार सुनकर वह भी आ गई थी । सच अगर अपनों का साथ ना हो तो इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभा पाना बेहद कठिन होता है ।


वह दिन भी आ गया जब दोनों परिवार स्नेहा के साथ एयरपोर्ट पर अभिनव को लेने पहुँचे । मेरा मन धक-धक कर रहा था पर अभिनव और स्नेहा को आपस में सहजता से बातें करते देखकर सारी दुश्चिंतायें निर्मूल सिद्ध हुईं । तब महसूस हुआ कि शशांक ठीक ही कह रहे थे ...आजकल लोगों का नजरिया बदल रहा है । समझदार लोग आज लड़कियों के रंग रूप को नहीं वरन योग्यता को महत्व देते हैं । वास्तव में योग्यता ही व्यक्ति को सर्वगुण संपन्न बनाती है ।


पूरे विवाह में दिव्या, स्नेहा के साथ साए की तरह लगी रही थी । मुझे भी अभिनव सुलझा हुआ इंसान लगा था । विवाह के धूम-धड़ाके के पश्चात विदाई की बेला आ गई थी । कल जो चेहरे खुशी से पुलक रहे थे उन्हीं पर अब उदासी छाई हुई थी । मेरी आँखें बरस पढ़ना चाह रही थीं किंतु मैं उनमें समाए आँसुओं को यत्न पूर्वक रोके हुए थीं। स्नेहा के बिना मैं कैसे रह पाऊँगी, समझ नहीं पा रही थी । इंसानों के बनाए न जाने कैसी रीति रिवाज हैं, न जाने कैसी विवशता है कि जिसे वह अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता है, जिसको कभी एक पल के लिए भी अपनी आँखों से ओझल नहीं करना चाहता ,उसे ही एक अजनबी के हाथों सौंपने को विवश हो जाता है ।


' कहाँ हो तुम कृष्णा ? विदा का समय हो रहा है ।' शशांक की आवाज ने मुझे चौका दिया था ।


 मैं पूजा घर में बैठी , बेटी के सुखी जीवन की मंगल कामना करती , अंतर कवच में कैद सोच ही नहीं पा रही थी कि बाहर निकलूँ या ना निकलूँ क्योंकि अगर मैं बाहर निकली तो न तो अपने आँसुओं को रोक पाऊँगी ,न ही स्नेहा को खुशी-खुशी विदा कर पाऊँगी !! मैं जानती थी कि मेरी आँखों में आँसू देख कर स्नेहा भी सहज नहीं रह पाएगी । मेरा मानना था कि नई दुनिया ,नए घर में प्रवेश आँसुओं के साथ नहीं वरन नई उमंग और नए उत्साह के साथ करना चाहिए ।


' मम्मा मैं जानती थी कि आप यहीं होंगीं । ममा बस यही संतोष अपने साथ लेकर जा रही हूँ कि अब आप अकेली नहीं हैं । डैड भी आपके साथ हैं ।' स्नेहा ने अंदर आते हुए कहा । 


पीछे पीछे शशांक थे । उनका चेहरा भी उनके दिल का हाल बयान कर रहा था । विदा होती बेटी को प्यार से निहारते हुए अनायास ही उसे गले से लगाकर मैं सुबक पड़ी थी ।


स्नेहा और अभिनव को अगले ही दिन सिंगापुर के लिए निकलना था । पटफेरे की रस्म के लिए जब वह आई तो उसने हमें एक लिफाफा पकड़या ।


' यह क्या है बेटा ?'


' आप स्वयं ही देख लो ।'


लिफाफा खोला तो दार्जिलिंग का टूर पैकेज देखकर हम चौंक गए । हमारे मना करने पर उसने कहा, ' प्लीज ममा पापा मना मत कीजिएगा । यह तोहफा मेरे और अभिनव की तरफ से है । वैसे भी विवाह के पश्चात आप दोनों कहीं नहीं गए हैं ।'


' अरे कहाँ खो गई थीं ? कॉफी ठंडी हो रही है । मैं कब का कॉफी लेकर आ गया हूँ ,तुम्हें पता ही नहीं चला । ऊँचे नीचे पहाड़ी इलाकों में पैदल चल पाना मुश्किल होगा, अतः यहाँ के कुछ दर्शनीय स्थलों देखने के लिए टैक्सी लेकर आया हूँ । कॉफी पी लो फिर चलते हैं ।' प्यार भरी नजरों से मुझे देखते हुए शशांक ने हाथ बढ़ा दिया था ।


कॉफी पीते हुए मैं शशांक की ओर देखते हुए सोच रही थी कि मन की गति भी कितनी अजीब है । पल में यहाँ पल में वहाँ... कहते तो हैं कंप्यूटर से तेज कुछ भी नहीं है या उसकी मेमोरी से अधिक किसी की मेमोरी नहीं है पर मुझे लगता है इंसान भी कंप्यूटर से कम तो नहीं है । सारी यादें अवचेतन मन (हार्ड डिस्क ) में स्टोर होती जाती हैं । जरा सा कंकड़ ( क्लिक ) डालते ही , यादें हमारे हृदय पटल (स्क्रीन) पर चलचित्र की भांति उभरने लगती हैं । अच्छी बुरी यादें कच्चे-पक्के चिटठे की तरह हमारी संपूर्ण चेतना को झकझोर कर रख देती हैं । कुछ पलों में ही हम अपना संपूर्ण जीवन जी लेते हैं । 


' चलो चलें ...।' शशांक ने उठते हुए अपना हाथ उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा ।


चलो ...तुम्हारे साथ तो अब मैं बिना थके, बिना रुके आजीवन चल सकती हूँ , चाहे जहाँ चाहे ले चलो , सोचते-सोचते कृष्णा ने शशांक का हाथ थाम लिया था ।


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दार्जिलिंग से 13 किमी0 दूर टाइगर हिल से सूर्योदय के दृश्य ने जहाँ मन मोहा वहीं बर्फ से आच्छादित कंचनजंघा पहाड़ियों पर सूर्य की किरणें स्वप्नलोक की अनुभूति करवा रही थीं । हमें बताया गया कि अपनी ऊँचाई के कारण दार्जीलिंग का रेलवे स्टेशन यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल है । दार्जिलिंग से 6 किमी0 की दूरी पर धूम स्थान में स्थित हरा भरा बतासिया लूप हिमालियन रेलवे की ऊंचाई को कम करने के लिए बनाया गया है । सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग के लिए आती-,जाती टॉय ट्रेन जब इस स्थान से गोल-गोल घूम कर गुजरती है ,वह दृश्य देखने लायक होता है । 


 इसके अतिरिक्त दार्जिलिंग में हिमालयन पर्वतारोहण संस्थान, रॉक गार्डन,इत्यादि मुख्य पर्यटक स्थल हैं । यहाँ स्थित टी फैक्टरी में जाकर चाय की पत्तियां बनाने की विधि देखने के साथ चाय भी पी तथा खरीदी भी ।


चार दिन दार्जिलिंग में बिताने के बाद हम सिक्किम की राजधानी गंगटोक गये । गंगटोक पूर्वी हिमालय रेंज में शिवालिक पहाड़ियों के ऊपर 1437 मी0 की ऊंचाई पर स्थित मनमोहक पर्यटन स्थल है । इंस्टीट्यूट ऑफ तिब्बतोलॉजी में बौद्ध धर्म से संबंधित प्राचीन अवशेष एवं ग्रन्ध संग्रहित हैं । रूमटेक मठ, ताशी व्यू पॉइंट, गणेश टोंक, हनुमान टोंक गंगटोक के मुख्य आकर्षण हैं । सच इन पर्वतीय क्षेत्रों में हाथ में हाथ डाले प्राकृतिक सौंदर्य को निहारते हुए घूमना असीम आनंद दे जाता है ।


दार्जिलिंग और गंगटोक की घाटियों के मनमोहक सौंदर्य के बीच कुछ दिन व्यतीत करने के पश्चात हम लौटे ही थे कि स्नेहा और अभिनव आ गए । वीजा की फॉर्मेलिटी पूरी हो गई थी , उन्हें 15 दिन पश्चात ही निकलना था ।


स्नेहा से बिछड़ने का दुख था वहीं उसकी खनकती हँसी और चेहरे पर दमकता तेज बयां कर रहा था कि वह अभिनव के साथ संतुष्ट है ।


 केवल 60 किलो सामान ही ले जा सकते हैं अतः ले जाने के लिए अति आवश्यक सामान ही रखा गया । मैंने स्नेहा की मनपसंद चकली के साथ मसाले , अचार इत्यादि रखने चाहे तो अभिनव ने कहा, ' ममा, आप परेशान ना हों, अब तो वहाँ भी इंडियन शॉप में सब मिलने लगा है । '

आखिर उनके जाने का दिन भी आ गया । उनको विदा करके जब हम लौट रहे थे तो मन का आकाश सूना हो आया था । आँखें बरसने को आतुर थीं पर तभी स्नेहा की सास विनीता ने कहा, ' आप चिंता मत कीजिए बहन जी , अभिनव स्नेहा को कभी कोई कष्ट नहीं होने देगा ।'


' बहन जी , बस इसी आस के सहारे ही हमने अपनी फूल सी बेटी को विदा किया है वरना अपने दिल के टुकड़े को किसी अनजान आदमी के साथ, अनजान जगह भेजना सहज नहीं होता ।' 


अब बस फोन का ही सहारा रह गया था । लगभग हर दिन स्नेहा और अभिनव नियम से फोन करते । व्हाट्सएप वीडियो कॉल करके इधर-उधर की ढेर सारी बातें ऐसे करती कि लगता हम लोग आमने-सामने बैठकर ही बातें कर रहे हैं । तब लगता दुनिया कितनी छोटी है । इतनी बातें तो यहाँ रहने वाले नाते रिश्तेदारों से भी नहीं हो पातीं हैं जितना पराए देश में बैठी लड़की से हो जाती हैं । वह वहाँ की एक - एक बात बताती । उसे देख कर हम भी खुश रहते । व्हाट्सएप वीडियो कॉल द्वारा हमने भारत में बैठे-बैठे ही उसका घर ,बेडरुम ,लिविंग रूम, किचन देख लिया था । स्नेहा बहुत ही करीने से घर रखती है । लगता ही नहीं था कि यह वही स्नेहा है जिसे अपने कमरे की सफाई के लिए सदैव टोकना पड़ता था । कहीं किताबें पड़ी रहती थीं तो कहीं कपड़े ...जिम्मेदारी सचमुच इंसान को जिम्मेदार बना देती है।


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 ' कृष्णा, देखो इस अखबार में छपी खबर.... दिव्या का स्थानांतरण यहाँ इस शहर में हो गया है ।' एक दिन आकांक्षा दी ने घर के अंदर प्रवेश करते हुए कहा ।


' सच यह तो बहुत अच्छा समाचार है । क्या तुम्हारी दिव्या से बात हुई ?' 


' फोन किया था पर स्विच ऑफ बता रहा है ।'


तभी फ़ोन की घंटी बजी दिव्या है, कहकर आकांक्षा ने फोन उठाया…


' ममा आपने फोन किया था ।'


' हाँ, तुम्हारे यहाँ स्थानांतरण की खबर पढ़कर मैंने इस खबर की पुष्टि करनी चाहिए थी ।'


' ऑर्डर तो मुझे अभी मिला है माँ और अखबार वालों ने खबर भी छाप दी ।' उसने आश्चर्य से कहा ।


 ' बेटी मीडिया आजकल चार कदम आगे ही रहती है । बेटी, तू कब तक आ रही है । हम सब तेरा यहां बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं ।'


' कुछ फॉर्मेलिटी पूरी करनी होगी । बस उसके बाद पहुँच जाऊँगी । काफी दिनों पश्चात साथ रहने को मिलेगा ।' दिव्या के स्वर में उल्ल्हास झलक रहा था ।


' उसके आने से फिर हमारे जीवन में चहल-पहल हो जाएगी वरना इस स्नेहा के जाने के पश्चात घर सूना सूना लगने लगा है ।' फोन पर आकांक्षा की बात समाप्त होते ही मैंने प्रतिक्रिया व्यक्त की ।


' तुम सच कह रही हो कृष्णा , बस अब तो एक ही आकांक्षा रह गई है की दिव्या विवाह करके अपना घर बसा ले ।' कहते हुए आकांक्षा के चेहरे पर मायूसी झलक आई थी ।


' समय पर सब हो जाएगा दीदी ...आपने वह कहावत सुनी होगी कि इंसान को समय से पहले और भाग्य से ज्यादा कभी कुछ नहीं मिलता ।'


' पर इंसान अपना भाग्य भी तो स्वयं ही बनाता है । अगर वह गलती नहीं हुई होती तो अब तक दिव्या की गोद में बच्चा खेल रहा होता ।'


' शायद आपकी बात सच है पर अब शायद दिव्या वह मुकाम हासिल नहीं कर पाती जो आज उसके पास है । '


' मैं मानती हूँ कि आज दिव्या के पास नाम और शोहरत है पर माँ होने के कारण यह भी जानती हूँ कि मन से आज भी वह बेहद अकेली है । दूसरों से तो दूर वह हमसे भी अपनी बात शेयर नहीं करना चाहती ।'


' दीदी, दिव्या को अपनी जिंदगी जीने दो । समय आने पर वह स्वयं की किसी का हाथ थाम लेगी ।'


' पता नहीं वह समय आएगा भी या नहीं ।'


' दीदी अवश्य आयेगा । धीरज रखिये ।' कहकर मैंने उनके कंधे पर हाथ रखकर सांत्वना देने का प्रयास किया था ।


 मैंने आकांक्षा दी को समझाने का प्रयत्न किया था पर न जाने क्यों मुझे अपने ही शब्द को खोखले लग रहे थे । चोट खाई स्त्री जल्दी किसी पर विश्वास नहीं कर पाती, मैं तो स्वयं भुक्तभोगी थी ।


 हम सब दिव्या के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे । आखिर वह दिन भी आ गया जब दिव्या को आना था । हमारे अतिरिक्त पुलिस स्टाफ़ भी उसके स्वागत में एयरपोर्ट पहुँचा हुआ था । बड़ी कठिनाई से हम उससे मिल पाए । उसे तुरंत ही उसे ड्यूटी ज्वाइन करनी थी । इतने बड़े पद पर रहने पर व्यक्ति को अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं, भावनाओं पर अंकुश लगाना ही पड़ता है । घर आते- आते उसे रात के 8:00 बज गए नई जगह, नया काम...उसे परिश्रम तो करना ही पड़ेगा यह हम भी जानते थे ।


दिन बीतते गए । पुलिस की नौकरी थी अतः हर दूसरे तीसरे वर्ष ही दिव्या का स्थानांतरण होता रहता था । विनय रिटायर हो गए थे । उसके प्रति चिंता ने विनय और आकांक्षा को उसके साथ ही रहने को मजबूर कर दिया था । विवाह के प्रति दिव्या की सोच में कोई परिवर्तन नहीं आया था । दिन प्रतिदिन दिव्या का व्यवहार रूखा होता जा रहा था । आकांक्षा सोचती शायद कार्य के प्रति अतिसंलग्नता ने उसे रूखा एवं संवेदनहीन बना दिया है ।


समय के साथ दिव्या के चेहरे से मुस्कान गायब होती जा रही थी। यांत्रिक रीति से उसे दिन रात काम में लगा देख आकांक्षा दी के साथ अब मैं भी चाहने लगी थी कि दिव्या घर बसाकर सेटिल हो जाए । मान-सम्मान, धन दौलत इंसान के जीवन में बहुत महत्व रखती है पर यह भी सच है कि बिना घर .. बिना साथी के इंसान अधूरा है । थका हारा इंसान सांझ तले जब घर लौटता है तो अपनों का प्यार भरा इंतजार उसकी सारी थकान, सारा तनाव हर लेता है । इंसान को कभी -कभी अपनी खुशी के लिए भी जीना चाहिए पर हर बार वह कोई ना कोई बहाना बनाकर विवाह की बात टाल देती या कहती मेरा काम ही ऐसा है जहाँ घर नाम की चीज के लिए गुंजाइश ही नहीं है । मैं विवाह करके किसी की जिंदगी बर्बाद नहीं करना चाहती ।


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 वरिष्ठता के आधार पर अब मेरी कॉलेज की मुख्याधिपिका के पद पर प्रोन्नति हो गई थी जिसकी वजह से काम बहुत बढ़ गया था ।


एक दिन हम बालकनी में बैठे सूरज की प्रथम किरण के साथ चाय की चुस्की का आनंद लेते हुए अखबार पढ़ रहे थे कि फोन बज उठा । फोन उठाया तो फोन पर हॉस्टल की वार्डन सरला थी …


' मेम, चिना ने आत्महत्या कर ली है ।'


' क्या ...।' 


सरला की सूचना ने मुझे स्तब्ध कर दिया था । चिना आसाम से थी । उसने इसी वर्ष कॉलेज में दाखिला लिया था । अभी कुछ दिन पूर्व ही उसने कुछ लड़कियों के द्वारा अपने प्रति होते दुर्व्यवहार की शिकायत मुझसे की थी । तब मैंने उन लड़कियों को चेतावनी देकर तथा उसे समझा कर भेज दिया था और आज यह घटना...मैं स्वयं को बेहद असहज महसूस कर रही थी …


' हाँ मेम, मुझे समझ में नहीं आ रहा है क्या करूँ ? '


' तुम तुरंत पुलिस को फोन करो उसके कमरे में किसी को घुसने मत देना । मैं अभी पहुँचती हूँ ।' सरला की आवाज सुनकर मैंने चैतन्य होते हुए कहा । 


शशांक को घटना की जानकारी देकर जब तक मैं होस्टल पहुँची पुलिस आ चुकी थी । जाँच पड़ताल चल रही थी । चिना ने अपने कमरे के पंखे से लटककर आत्महत्या की थी । उसकी मित्र तनीषा का रो-रोकर बेहाल थी । उसका कहना था कि चिना पिछले कुछ दिन से बेहद परेशान थी । लड़कियाँ कभी उसके रंग को लेकर तो कभी उसके काले घुंघराले बालों को लेकर , यहाँ तक कि उसके बात करने के तरीके तथा खान-पान को लेकर भी छींटाकशी करने से नहीं चूकती थीं । नतीजा यह हुआ कि वह पढ़ाई में पिछड़ने लगी थी । कल रिजल्ट आया तो स्वयं को असफल पाकर उसने स्वयं को कमरे में बंद कर लिया । रात्रि में खाना भी नहीं खाया और सुबह यह घटना .. ।


पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर पार्थिव शरीर को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया तथा दो लड़कियों को हिरासत में भी ले लिया गया । शाम तक चिना के माता-पिता भी आ गए । अपनी बेटी की दशा देखकर वह स्वयं पर काबू न रख पाए तथा उसके पार्थिव शरीर से लिपटकर बिलख-बिलखकर रो पड़े । हम सब विवश थे । वह मासूम अपनी ही सखियों किये जा रहे अपमान से मानसिक रूप से इतनी आहत हुई कि उसे यह अतिवादी कदम उठाना पड़ा । अंतिम क्रिया संपन्न कराकर दुखी मन से रात्रि तक ही मैं घर लौट पाई थी । 


शशांक मेरा इंतजार कर रहे थे । उनको शब्दशः बताने के पश्चात भी मन मस्तिष्क में हलचल मची हुई थी । हम सब एक ही भगवान की संतान हैं । यह बात अलग है कि देश, जलवायु और वातावरण के कारण हर व्यक्ति के स्वभाव यहाँ तक की शक्ल सूरत में भी अंतर आ जाता है । रंगभेद, नस्लभेद पर टिप्पणियां करना क्या उचित है ? ऐसा करते हुए हम व्यक्ति की भावनाओं का ख्याल क्यों नहीं रखते ? क्या हो गया है हमारी पीढ़ी को ? क्या ऐसे लोग वह सब यह सब अपने मनोरंजन या छुद्र मानसिक पिपासा की शांति के लिए करते हैं ?क्या इस घटना से ऐसा करने वाले कुछ सबक ले पाएंगे ? प्रश्न अनेक थे पर किसी का भी उत्तर मेरे पास नहीं था ।


पूरी रात करवटें बदलते रही । स्वयं को बेहद असहज तथा कुछ हद तक असफल महसूस कर रही थी ।अगर उस दिन मैंने चिना की बातों को गंभीरता से लिया होता तो शायद आज यह घटना न घटती । सुबह 6:00 बजे के अलार्म के साथ उठी । चाय बनाने के लिए किचन में गई ही थी कि घंटी बजी ।


दरवाज़ा खोला तो सामने लीला थी…


' आज इतनी जल्दी ...।'


' बात ही कुछ ऐसी थी । कल आप मिली नहीं थीं । आपसे कहे बिना रहा नहीं जा रहा था अतः जल्दी चली आई ।


' क्या बात है ?'


' मैम साहब, गणेश और रूपा के फैसले की सुनवाई पूरी हो गई है । फैसला अगले हफ्ते होगा । अगर गणेश को सजा मिल गई तो मैं समझूंगी हम गरीबों को भी न्याय मिलता है ।' 


' अवश्य मिलेगा... भगवान पर भरोसा रखो ।' मन में खुशी लाते हुए मैंने कहा । 


कल की ह्रदय विदारक घटना के पश्चात लीला की बात में थोड़ा सुकून पहुँचाया था ।


' मेम साहब, मैं आपकी बात काट नहीं रही हूँ पर भगवान होता तो क्या रूपा के साथ ऐसा होने देता ?' कहकर वह काम में लग गई ।


 इस अनपढ़ औरत ने बहुत बड़ी बात कह दी थी । हम इंसान अक्सर जीवन में घटी, हर छोटी-बड़ी बात को ईश्वरीय शक्ति से जोड़कर देखने लगते हैं । कुछ घटनाओं को छोड़ दें तो यथार्थ में इंसान को अधिकतर अपनी अच्छाइयों, बुराइयों और गलतियों का फल इसी जहाँ में मिलता है पर इस शाश्वत सत्य को नकार कर, इंसान तमाम सांसारिक बुराइयों में संलिप्त रहकर, गंगा में डुबकी लगाकर, अपने पापों को धोकर मुक्त होने का प्रयास करता रहता है ।


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 स्कूल में दशहरे की छुट्टियां हो गई थीं अतः आकांक्षा और विनय के आग्रह पर हम हफ्ते भर के लिए उनके पास उनसे मिलने के लिए इलाहाबाद चले गए । दिव्या हमसे मिलकर बेहद प्रसन्न हुई तथा महाराज ( खाना बनाने वाले ) को फटाफट पनीर पकोड़े के साथ रात का मेनू भी बता दिया ।


' कृष्णा , आज बहुत दिनों बाद दिव्या के चेहरे पर मुस्कान देख रही हूँ वरना घर आकर भी यह या तो फोन या फाइलों से जूझती रहती है । ' दिव्या को महाराज को आदेश देता देखकर, आकांक्षा ने कहा । 


दूसरे दिन नाश्ता करके शशांक और विनय घूमने निकल गए । मैं और आकांक्षा लॉन में बैठे सुबह की गुनगुनी धूप का आनंद लेते हुए बातें करते हुए अखबार के पन्ने भी पलट रहे थे । तभी आकांक्षा ने एक समाचार पढ़कर अखबार मेरी ओर बढ़ाया…


 लॉ कॉलेज की एक लड़की को उसके कॉलेज के ही कुछ लड़कों ने अपहरण करके रेप किया तथा एक्सीडेंट का केस बनाने के उद्देश्य से अर्थमूर्छित अवस्था में उसे मरने के लिए सड़क पर फेंक दिया पर वह बच गई...दिव्या खन्ना इस केस की छान बीन के रही हैं ,वह दिन दूर नहीं है जब अपराधियों को उनके किए की सजा मिलेगी । पीड़िता निवा श्रीवास्तव ने पूर्ण सहयोग करने का वचन दिया है । 


समाचार पढ़कर मैंने आकांक्षा की तरफ देखा । मेरी आँखों प्रश्न तैरता देख कर उसने कहा …


'' कृष्णा यूँ तो दहेज हत्या , अपहरण एवं बलात्कार की घटनाएं रोज ही अखबार में छपती रहती हैं पर मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि दिव्या इस पीड़ित लड़की को न्याय दिलवाने की बात क्यों कर रही है ? व्यर्थ में झंझट में पड़ रही है यह लड़की... न घर की रहेगी न घाट की ...कौन उसका हाथ थामेगा ? मुझे दुख तो इस बात का है कि भुक्तभोगी दिव्या उस को न्याय दिलवाने के नाम पर उसकी छीछालेदर ही करवाएगी । '


मैं भी अनिश्चय की स्थिति में थी...मैं जानती थी ऐसे केस का निपटारा जल्दी नहीं होता । रूपा का केस मेरे सम्मुख था । सात वर्ष से मुकदमा चल रहा है पर अभी तक उसका निपटारा नहीं हो पाया है । लीला उस दिन कह रही थी कि हफ्ते भर में फैसला हो जाएगा पर बचाव पक्ष के वकील ने अपने मुवक्किल की बीमारी का बहाना बनाकर फैसले की तारीख टलवा दी है । अब न जाने कब फैसला आएगा ? 


शाम को दिव्या घर आई उसे चाय देते हुए आकांक्षा अपने मन के द्वंद को छुपा नहीं पाई तथा मन का संशय उसके सामने रख दिया । उसकी बात सुनकर तिलमिलाकर दिव्या ने कहा...


 ' ममा ,हमारी ऐसी ही सोच अपराधियों को अपराध करने के लिए प्रेरित करती है । हम औरतें अगर अपने ऊपर हुए अन्याय के प्रति आवाज नहीं उठाएंगी तो कौन उठाएगा ? जहाँ तक बदनामी का प्रश्न है निवा ने कोई गुनाह नहीं किया है । बिन किये अपराध की सजा मन ही मन भुगतते हुए वह पूरी जिंदगी कुंठा में क्यों गुजारे ? अपराधियों को निःशंक क्यों घूमने दे ? क्या इसलिए कि वे बेखौफ होकर इसी तरह की दूसरी घटना को अंजाम दे सकें ?'


' बेटी, स्त्री का चरित्र ही उसकी सबसे बड़ी पूँजी है । अगर एक बार उसके चरित्र पर दाग लग गया तो मिटाए नहीं मिटता । 'आकांक्षा ने पुनः कहा ।


' मम्मा स्त्री को देह के दायरे में बांधकर परिभाषित मत करो । देह से परे भी उसका अपना एक अस्तित्व है , अस्मिता है । देह पर अत्याचार हो सकता है पर अस्मिता पर नहीं .. देह मैली हो सकती है पर चरित्र नहीं, देह नश्वर है पर स्त्री की सोच सर्वभौमिक है । उसे किसी दायरे में बाँधकर रखना स्त्री का अपमान करना है । आज की स्त्री की परिवर्तित सोच उसे हर आतताई, अनाचारी से प्रतिशोध लेने के लिए प्रेरित कर रही है । आखिर क्यों न ले प्रतिशोध ? स्त्री ही आखिर कब तक अग्नि परीक्षा देती रहेगी ? सृष्टि को रचने वाली, सँवारने वाली , अपने ही कुपूतों ,नाशुक्रो को कब तक माफ करेगी ? परिवर्तन तो धरा का नियम है मम्मा , आज की स्त्री कमजोर नहीं है । मैं कमजोर थी जो चुप रह गई पर वह लड़की कमजोर नहीं है । आज उस जैसी ही लड़कियों की हमारे समाज को आवश्यकता है । कम से कम अपराधी को सजा दिलवाकर कुंठा से मुक्त हो सकेगी । मेरी तरह ताउम्र बिन किये अपराध की सजा तो नहीं भोगेगी ।' कहते हुए दिव्या सुबक पड़ी थी । मानो उस रात का एक-एक पल उसकी आँखों में तिर आया हो ।


जब तक आकांक्षा कुछ कहती, दिव्या उठी और अपने कमरे में चली गई ।


' कृष्णा , आज मुझे अपनी ही बेटी ही अनचीन्ही लग रही है । जिस दिव्या को मैं कठोर, अनुशासित ,कर्मठ कार्य के प्रति समर्पित समझती रही थी, वह अंदर ही अंदर इतनी खोखली हो चुकी है , मैंने सोचा भी न था । तो क्या वह आज भी उस घटना को नहीं भूली है... कम से कम अपराधी को सजा दिलवाकर कुंठा से मुक्त हो सकेगी ...बार-बार दिव्या की यह बात मेरे मनमस्तिष्क पर हथौड़ी की तरह प्रहार कर रही है ।'


' दीदी, जैसे-जैसे मैं इस संदर्भ में सोच रही हूँ दिल के बंद दरवाजे खुलते जा रहे हैं । सच ही कह रही है दिव्या... हम भले ही दुनिया के सामने नाटक कर लें पर स्वयं क्या सच्चाई को झुठला पाते हैं ? मन ही मन हीन भावना के शिकार होकर दुनिया से तो क्या स्वयं से ही मुँह चुराने नहीं लगते हैं !! इससे तो अच्छा है कि सच्चाई को स्वीकार करते हुए दिल में चुभे नश्तर को एक झटके से निकालकर , बेदर्दी से मसलते हुए निकाल फेंके । दर्द एक बार होगा नासूर तो नहीं बनने पाएगा तभी शायद जिंदगी सहज बन पाए ।' मैंने कहा ।


' तुम ठीक कह रही हो कृष्णा । आज मुझे भी एहसास हो रहा है कि मेरी वजह से मेरी बेटी की जिंदगी दांव पर लग गई । उसका दर्द आज मैं महसूस कर पा रही हूँ पर उस समय मैंने वही किया जो मुझे ठीक लगा था । दिव्या का कथन आज मुझे यह सोचने के लिए मजबूर कर रहा है कि समय के साथ जीवन के समीकरण बदल रहे हैं उसके साथ सोच भी.. ।' कहते हुए आकांक्षा अपराध बोध से ग्रसित उठी थी...।


दिव्या ने हमारे सम्मुख एक नई औरत का खाका खींच दिया था । आग की भीषण लपटों से कुंदन बन निकली लड़की जो सब वर्जनाओं से मुक्त हो चुकी है । वह देह की सीमाओं से परे आत्माभिमान और आत्मसम्मान से जीना चाहती हैं । पुरुषों के एक छत्र साम्राज्य को चुनौती देती, तेजी से आगे बढ़ती, हर जगह अपने निशान छोड़ती, अपनी पहचान बनाने में जुटी है । उसके शब्दों से हमारे मन में एक द्वंद छिड़ गया था तथा इसके साथ ही आस की एक नई किरण भी उजास फैलाने लगी थी ... शायद इस तरह के प्रयत्नों तथा स्त्री के जागरूक होने से बाल विवाह, दहेज प्रथा, हत्या, बलात्कार और स्त्री को प्रताड़ित करने के केसों में अब कमी आ जाए ।


' मैं मीटिंग में जा रही हूँ मम्मा , आने में देर हो सकती है । खाने पर इंतजार मत करना और हाँ कल सुबह संगम पर स्नान का प्रबंध करवा दिया है । सुबह 5:00 बजे गाड़ी आ जाएगी । ' थोड़ी देर पश्चात बाहर जाते हुए दिव्या ने कहा ।


 थोड़ी देर पहले सुबकती दिव्या को अति आत्मविश्वास के साथ बाहर जाते देख हमारी आँखें जुड़ा गई थीं ।


' दीदी, कोई बात थोड़ी देर के लिए भले ही दिव्या को दंश दे दे पर अपनी परेशानी की वजह से वह अपने कर्तव्य से मुख नहीं मोड़ेगी । हर समस्या का डटकर मुकाबला करेगी । अपने ऊपर हुए अन्याय का प्रतिकार वह भले ही न कर पाई हो पर दूसरे के ऊपर हुए अन्याय पर वह चुप नहीं बैठेगी , उसे न्याय दिलवा कर रहेगी ।' अचानक मेरे मुख से निकला ।


' सच कृष्णा , दिव्या का यह रूप देखकर मन पर छाए काले घने बादलों का स्थान प्राची की रुपहली किरण ने ले ली है । आज मुझे अपनी दिव्या की सुलझी सोच पर गर्व हो आया है ।' कहकर आकांक्षा ने सुकून की सांस ली ।


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दीपावली पर घर की सफाई चल रही थी । अलमारी व्यवस्थित करने के लिए खाली की तो एक डायरी मिली । उसमें शशांक की रचनाएं थीं कुछ पूरी तो कुछ आधी अधूरी ...। पढ़ने लगी तो पढ़ती ही गई …दिल में दर्द का विशाल सागर समेटे शशांक का एक अलग ही रूप नजर आया …


दर्द दिल में था जुबां भी थी खामोश 

अश्क बंद पलकों से निकलकर चुपके से बेबस बना दिया ।

हम तो अकेले ही चाहते थे सुलगना

 तुमने निकलकर जहाँ को भी सुलझा दिया ।


 माना सुलगना तासीर नहीं थी हमारी 

पर वक्त ने हमें बौना बना दिया ।


राख के ढेर में निज को तलाशते तलाशते थक चले कदम, इंसान इंसा है खुदा नहीं, किस्मत तूने बता दिया ।


 चलना ही जिंदगी, रुकना राही मौत 

घबराए मन, बहती सांसों को बहकने न दिया ।


रूठी हो भले ही पराजय नहीं शब्दकोश में मेरे

 चलूँगा भले ही थके कदम, संकल्प आज मैंने लिया ।


शशांक को लिखने का भी शौक है । कुछ रचनाएं लिखी तथा कुछ छपी भी थीं , मुझे आज ही पता चला। इधर-उधर बिखरी रचनाओं को एकत्रित कर ,एक संकलन के रूप में प्रकाशित करवाकर , शशांक को सरप्राइज़ देने के विचार ने मेरे मन में एक नई चेतना भर दी । उनकी पुस्तक छपवाने के क्रम में न जाने क्यों ऐसा महसूस हुआ था कि नामी प्रेस वाले नए लेखकों को छापना ही नहीं चाहते हैं , वहीं छोटे प्रेस वाले लेखकों से किताब छपवाने का इतना पैसा माँगते हैं कि वह बेचारा अपनी इच्छा की पूर्ति ही नहीं कर पाता है । एक प्रकाशक आखिर शशांक की पुस्तक को प्रकाशित करने के लिए तैयार हो गया मेरी पेशकश पर उसने कहा…


' कृष्णा जी, प्रशांत जी की कविताएं उत्कृष्ट हैं । मैं भी एक लेखक हूँ । आपकी जैसी स्थिति से गुजर कर ही मैंने इस प्रेस की स्थापना की है। जिसमें उदीयमान रचनाकारों की रचनाओं की पुस्तकों का ' नो लॉस नो प्रॉफिट ' में प्रकाशन हो सके । जहाँ लेखक का शोषण और उत्पीड़न नहीं मानवर्धन हो । आखिर किसी लेखक की कितनी भी रचनाएं नामी पत्र-पत्रिकाओं में क्यों न प्रकाशित हुई हों पर एक अच्छे रचनाकार की यही चाहत होती है कि उसकी रचनाएं चिरकाल तक सुरक्षित रहें । यह तभी संभव है जब बिखरे हर मोती को एक माला के रूप में गूँथा जाए ...शायद इससे अच्छी साहित्य सेवा और कोई हो ही नहीं सकती । रचनाओं में प्रवाह और सुधार आ सके इसलिए मैंने शहर के साहित्य प्रेमियों के लिए एक संस्था ...रचना बनाई है जिसकी बैठक हर शनिवार को मेरे घर पर होती है जहाँ कविताओं के दौर के साथ नई छपी पुस्तकों पर चर्चा भी होती है अगर शशांक जी चाहें तो हमें ज्वाइन कर सकते हैं ।' 


'जी अवश्य रवींद्र भाई , पर अभी नहीं क्योंकि मैं शशांक की पुरानी रचनाओं को पुस्तक रूप में प्रकाशित करवा कर उन्हें सरप्राइस देना चाहती हूँ । इस पुस्तक के प्रकाशन के पश्चात अगर शशांक आपकी संस्था को ज्वाइन करना चाहेंगे तो अवश्य करेंगे ।


पुस्तक को प्रेस में दिया ही था कि एक दिन स्नेहा का फोन आया …' ममा, आप और पापा वीजा के लिए अप्लाई कर दो । मैं आपके लिए टिकिट भेज रही हूँ ।'


बेटी के पैसों से विदेश यात्रा... शशांक मान ही नहीं रहे थे पर मुझे लग रहा था कि अगर हमने स्नेहा की बात नहीं मानी तो उसे दुख होगा ।


'अगर हमने स्नेहा की बात नहीं मानी तो उसे दुःख होगा जितना किराया होगा उतना हम दे आएंगे । ' मैंने अपने मन की बात शशांक से कहते हुए उसे समझाने की कोशिश करते हुए कहा ।


' वह तो ठीक है पर फिर भी रुपए और डॉलर में खर्च करना एक बराबर तो नहीं हो सकता ...फिर 6 महीने की छुट्टी मैं नहीं ले पाऊंगा ।'


माना हम उनकी बराबरी नहीं कर सकते किंतु क्या बेटी और दामाद की इच्छा का मान रखना हमारा कर्तव्य नहीं है । 6 महीने न सही दो-तीन महीने तो रह ही सकते हैं ।'


थोड़ी ना नुकुर के पश्चात शशांक ने अपनी सहमति दे ही दी । वीजा की फॉर्मेलिटी पूरी होने पर 3 महीने की छुट्टी के लिए भी अप्लाई कर दिया । वीजा मिलने सूचना मिलते ही अपने आने की सूचना से स्नेहा को अवगत कराया तो वह बेहद प्रसन्न हुई तथा उसने अपनी कुछ इच्छाएं भी बताईं... जैसे लाल मिर्च का भरवां अचार, आम का अचार, महाराष्ट्रीयन चूड़ा, मसाले वाली मठरी, आटे के मेवे वाले लड्डू ,बेसन की बर्फी ...फरमाइश सुनकर यह सोचकर मन जुड़ा गया कि बाहर रहकर भी हमारे बच्चे अपने देश की माटी से जुड़े हुए हैं तभी तो उन्हें केक पेस्ट्री की नहीं वरन लड्डू की चाह है ।


 उनकी फरमाइश की सारी चीजों के साथ ढेरों उपहार लेकर हम सात समुंदर पार उनके पास शिकागो पहुँच ही गए । हमारे उपहार पाकर स्नेहा और अभिनव बेहद प्रसन्न हुए । पूरे हफ्ते तो वे दोनों व्यस्त रहते थे लेकिन शनिवार और इतवार को वे आसपास के दर्शनीय स्थल घुमाकर हमारी सारी बोरियत दूर करने का प्रयास करते । 


शिकागो की सबसे ऊँची 108 मंजिल की इमारत, सी.एस. टावर की 103 मंजिल पर बनी ऑब्ज़र्वेटरी से दूर-दूर तक फैली मिशीगन लेक के अतिरिक्त इलिनोइस, इंडियाना तथा विस्कोसिन स्टेट के साथ शिकागो की स्काई लाइन ( ऊँची-ऊँची इमारतें ) )खूबसूरत नजारा पेश कर रही थी ।


नेवी पियर देखकर लगता था कि हम एक नई दुनिया में ही आ गए हैं । नेवी पियर मिशीगन लेक पर स्थित हारबर है । आधे घंटे की वोटिंग खुशनुमा एहसास दे गई थी । यहाँ जाइंट व्हील में बैठकर शिकागो का एरियल व्यू देखने को मिला । एक भारतीय अनीश कपूर कांसेप्ट पर आधारित 24.5 एकड़ में बने मिलिनियम पार्क की 33 फीट लंबा, 42 फीट ऊँचा तथा 100 टन वजन का 168 स्टेनलेस स्टील की प्लेटों को जोड़कर बनाई बीन जैसी संरचना में अपनी विभिन्न आकर की आकृतियां हमें आश्चर्यचकित कर रही थीं । 


स्वामीनारायण मंदिर, बहाई टेम्पल म्यूसियम यहाँ के मुख्य आकर्षण हैं । सबसे अच्छी बात यह लगी कि यहाँ सभी वाहन चालक ट्रैफिक रूल को फॉलो करते हैं। वैसे तो बिना पैदल साइन के आये कोई भी पैदल यात्री सड़क पार नहीं करता है पर आश्चर्य तो तब होता जब सिग्नल होने के बावजूद अगर कोई पैदल यात्री सड़क पार नहीं कर पाता है तो जब तक वह सड़क पार नहीं कर लेता था गाड़ियां चलती ही नहीं थीं । गजब का रोड सेंस है वहाँ के लोगों में । वहाँ का माहौल और वातावरण देखकर हमें महसूस हुआ... । इंसान चाहे कितना भी व्यस्त क्यों ना हो अवसर मिलने पर घूमने अवश्य जाना चाहिए जिससे दूसरी जगह की संस्कृति और आचार- विचार से परिचय प्राप्त कर मानसिक परिपक्वता प्राप्त कर सकें । 


घूमने फिरने के साथ ही मैं स्नेहा की छोटी-मोटी फरमाइश... कभी आलू के पराठे तो कभी ब्रेड रोल और नहीं तो बेसन का हलवा बनाकर खिलाकर संतुष्टि का अनुभव करती । स्नेहा तो स्नेहा अभिनव भी बड़े चाव से मेरे हाथ की बनी चीजें खाता । उसका व्यवहार इतना सहज और सरल था कि उसे देखकर लगता ही नहीं था कि वह हमारा दामाद है । स्नेहा के समान वह भी हमारे साथ बैठकर ढेरों बातें करता । कुछ हमारी पूछता , कुछ अपनी सुनाता । चुटकुलों का तो उसके पास भंडार था ...और कुछ नहीं तो बात -बात पर चुटकुले सुनाकर हँसने के लिए मजबूर का देता था । तब सोचती ऐसा दामाद भाग्यशालियों को ही मिलता है ।


अजीब तो तब लगता जब कभी अभिनव स्नेहा से पहले ऑफिस से आ जाता तथा मेरे मना करने के बावजूद भी चाय नाश्ता बनाने लगता । उसको ऐसा करते देख एक दिन मैं किचन में घुस गई तथा उसको आराम करने की सलाह देते हुए चाय नाश्ता बनाने लगी ।


' ममा, मेरा कार्य करना आपको बुरा क्यों लगता है ...आखिर जब स्नेहा मेरे बराबर ही कमा रही है तब क्या घर की आधी जिम्मेदारी बाँटना मेरा कर्तव्य नहीं है ।' मेरे रोकने पर अभिनव ने कहा ।


अभिनव के शब्द मुझे खुशी से सराबोर कर गए । आज के बच्चे हमारी पीढ़ी से ज्यादा समझदार और एडजेस्टेबल हैं । अभिनव स्नेहा को सदा खुश रखेगा , सोचकर जहाँ मन में संतुष्टि मिली, वहीं महसूस हुआ शायद बदलती मानसिकता आज समय की माँग है वरना आम भारतीय परिवार मैं अगर स्त्री कमाती है तब भी उसे बराबरी का दर्जा नहीं मिल पाता । एक समय ऐसा आता है कि घर बाहर के दो पाटों में पिसती औरत पना निज अस्तित्व ही गँवा बैठती है । 


 यहाँ हर सामान ही डिज़ाइनर होता । चाहे वह सोफा हो या दीवार पर लगी सीनरी । हजारों डॉलर वे दोनों यूँ ही इन सब चीजों पर खर्च कर डालते हैं । बुरा तब लगता जब वे फिजूलखर्ची करते । फ्रिज व्यर्थ के सामानों से भरा रहता । तरह-तरह के जूस , फ्रोजन फूड और भी न जाने क्या क्या... सामान समाप्त नहीं होता कि और ले आते कभी-कभी तो उपयोग में ना आने पर एक्सपायर होने पर फेंक देते हैं ।


' ममा ,आप कहाँ खो गईं ? चलिए आज बाहर ही खाना खाते हैं 'स्नेहा ने ऑफिस से आकर मुझे सोच में डूबा देखकर कहा ।


' अरे क्या खाना है । मैं बना देती हूँ । व्यर्थ पैसा फूँकने से क्या फायदा ?' स्नेहा की बात सुनकर मन में उथल-पुथल मचाती बात आखिर जुबान पर आ ही गई ।


'पैसा तो हाथ का मैल है मम्मा ,जीवन को घसीटना नहीं जीना चाहिए ।


' पर बेटा, जीवन का मकसद उड़ाना खाना भी तो नहीं होना चाहिए । अभी प्लानिंग नहीं कर पाए तो बाद में परेशानी होगी ।'


'अरे छोड़ो भी. स्नेहा का बाहर खाने का मन है तो आज बाहर ही खाते हैं । कहो, कहाँ चलना है बेटा ? आज का डिनर मेरी तरफ से ...।' शशांक ने बेटी का समर्थन करते हुए कहा ।


'अरे , अब ऐसे ही बैठी रहोगी या चलोगी भी । स्नेहा का मन भी तो रखना है । आखिर बेटी है हमारी...।' मुझे आश्चर्य से अपनी ओर देखते हुए शशांक में मुझसे कहा ।


एक-एक पैसे को समझ बूझ कर खर्च करने वाले शशांक के मुँह से उपरोक्त शब्द सुनकर चौक गई थी पर अब कहने सुनने से कोई फायदा नहीं था अतः तैयार होने चली गई ।


थैंक्स गिविंग डे पर मिले लोंग वीकेंड में शशांक और स्नेहा ने ऑरलैंडो में डिजनी वर्ल्ड, नासा और मियामी घुमाने का प्लान बना डाला था । डिज्नीवर्ल्ड में एनीमल किंगडम, मैजिक किंगडम, apcot तथा हॉलीवुड स्टूडियो , सी वर्ल्ड घूमकर अच्छा लगा । मियामी में समुद्र की लहरों से खेलते हुए एक अलग ही अनुभव हो रहा था । नासा की बात तो अनोखी थी । आईमैक्स थियेटर एस्ट्रोनॉट वाल ऑफ फेम, शटल लांच एक्सपीरियंस , स्पेस सेंटर टूर इसके मुख्य आकर्षण हैं । इसके साथ ही उन्होंने आसपास के दर्शनीय स्थलों की सैर कराई हर स्थान खूबसूरत था । 


धीरे-धीरे 2 महीने गुजर गए । बेटी के सुखी घर संसार से तृप्त थे । ऐसा लगता कि आज की पीढ़ी हमारी पीढ़ी के विपरीत सही मायने में काम करना एवं भरपूर एन्जॉय करना जानती है । सब सुविधा होने के बाद कुछ तो ऐसा था जिसे हम मिस कर रहे थे ... ना जाने क्यों अब अपनों और अपने देश की बहुत याद आ रही थी । कभी-कभी महसूस होता कि हमारे आँगन में लगा अमरूद का पेड़ यहाँ तक कि फुलवारी भी हमें पुकार रही है । यद्यपि लीला को पानी देने के लिए कह आई थी पर इंसान चाहे लाख प्रयत्न कर ले पर मोह के बंधनों को तोड़ पाना आसान नहीं होता । शायद उम्र के साथ-साथ बंधन और भी प्रगाढ़ होते जाते हैं अगर ऐसा न होता तो क्या हम अपने देश को छोड़कर यहाँ आते और अब लौटने की चाहत ...सच यह रिश्ते ही जीवन को प्यार के सूत्र में बांधते हैं । 


 अपने देश की धरती की पुकार दिल में हलचल मचाने लगी थी अतः कुछ अपनी सुनाने तथा कुछ वहाँ की जानने के लिए आकांक्षा को फोन मिला लिया तो उसने बहुत हैरान परेशान स्वर में कहा …


 ' अच्छा किया जो तूने फोन कर लिया । मैं तुझसे बात करना ही चाह रही थी ।'


' क्या बात है दीदी ? '


' कृष्णा , दिव्या भी हमेशा कुछ ना कुछ ऐसी समस्या खड़ी कर देती है कि समझ में नहीं आता कि क्या करूँ ? '

' अब क्या किया मेरी राजकुमारी ने ?'


' विवाह के लिए तो पहले ही तैयार नहीं थी तेरी राजकुमारी ...अपने सूनेपन को भरने के लिए अब एक बच्चा गोद लेना चाहती है ।'


' इसमें बुराई क्या है दीदी ? एक बच्चे का जीवन संवर जाएगा ।'


बुराई तो कुछ नहीं है कृष्णा, पर रहेगा तो वह गैर का ही ...चाहे हम उस पर कितना ही प्यार क्यों न उड़ेंले...इस पर भी वह लड़का नहीं, लड़की गोद लेना चाह रही है । अगर कोई उसे समझा सकता है तो सिर्फ तू ही, हम तो उसके दुश्मन हैं ।' 


'दीदी, बुरा ना मानो तो एक बात कहूँ दी ।'


' कह कृष्णा...।'


' दीदी, दिव्या ने एक पुरुष से चोट खाई है । शायद इसीलिए वह उसके बाल रूप को भी स्वीकार नहीं कर पा रही है । उसकी इच्छा का सम्मान कीजिए । वैसे भी लड़कों को गोद लेने के लिए बहुत से परिवार मिल जाएंगे पर लड़की को गोद लेने का साहस बहुत कम कर पाते हैं । दिव्या एक कन्या को गोद लेकर उसको नई जिंदगी देना चाहती है तो उसे रोकिए मत , उसकी खुशी में सम्मिलित होकर उसका हौसला बढ़ाइए ।'


' कृष्णा तुम कठिन से कठिन समस्या का चुटकी में समाधान कर देती हो । हम आज ही उसे अपनी स्वीकृति दे देते हैं । बहुत ही खुश होगी ।'


' क्या रूपा के हत्यारे को सजा मिली ? निवा श्रीवास्तव का क्या हुआ ?' कृष्णा ने बात बदलते हुए कहा ।


' निवा के आरोपी को 7 वर्ष की सजा हो गई पर कृष्णा पल्लवी नहीं रही ।' आकांक्षा ने दुःखी स्वर में कहा ।


' क्या कैसे ? ' कृष्णा ने आश्चर्य चकित स्वर में पूछा ।


' हफ्ते भर पूर्व वह अपने गृह नगर मुजफ्फरनगर में अपने भतीजे के विवाह में सम्मिलित होने गई थी । एक दिन वह शॉपिंग करने बाजार गई थी तभी भरे बाजार में हुए एक बम विस्फोट में उसकी मृत्यु हो गई । एक आतंकवादी संगठन ने उसकी जिम्मेदारी ली है । मैं पिछले कुछ दिनों से परेशान थी अतः सूचित नहीं कर पाई ।'


आगे आकांक्षा दी ने क्या कहा कृष्णा को कुछ सुनाई नहीं पड़ा । मन में बार-बार यही कह रहा था कि आखिर ये खून खराबे होते किसलिए हैं ? आखिर किनकी महत्वाकांक्षाएं है इनसे पूरी होती हैं ? क्यों इंसान इंसान के खून का प्यासा हो जाता है ? जेहाद के नाम पर ऐसा कृत्य करने वाले भूल जाते हैं ऐसे कृत्यों में खुदा कभी उनका साथ नहीं देगा ...अगर उसे खून खराबा पसंद होता तो सृष्टि नहीं रचता, पृथ्वी पर सौंदर्य ही नहीं बिखेरता, खून की होली खेलते हुए ये लोग ना जाने किस दुनिया की बात करते हैं... !! शायद यह लोग 

 यह नहीं जानते हैं कि नफरत से नहीं वरन प्यार से दिल एवं बड़ी से बड़ी जंग जीती जाती हैं ।


' कहाँ खोई हुई हो कृष्णा ? लो चाय पियो । तुम्हें फोन पर बातें करते देख चाय बना लाया लेकिन क्या बात है बहुत उदास लग रही हो ।'


पल्लवी के बारे में बताया तो शशांक भी उदास हो गए तथा कहा, ' पता नहीं क्या हो गया है हमारे देश के युवकों को , जो अपनी उर्जा नकारात्मक एवं विध्वंसात्मक कार्यों में लगा रहे हैं ।'


' आप सच कह रहे हैं । काश ! ऐसे लोग समझ पाते कि ऐसा करके वे न केवल अपना वरन राष्ट्र का भी अहित कर रहे हैं । पल्लवी जैसे न जाने कितने लोग होंगे जो अपनों को रोता छोड़ कर चले गए होंगे । क्या होगा उनके छोटे बच्चों का ? उनके बूढ़े माता-पिता का ? कौन है उन्हें संभालेगा ? क्या वे इस हादसे को भुला पाएंगे ?


' चाय ठंडी हो रही है ।'


' यह तो चाय है पर जिनके दिल के अरमानों पर पानी डाल दिया गया हो , वह क्या करें ? इस हादसे में मैंने अपनी अभिन्न मित्र पल्लवी को तो खोया ही है । रूपा को न्याय दिलवा पाने की आस बुझ गई है । ना जाने कैसा विधि का विधान है ।'


' जिस घटना पर तुम्हारा वश नहीं उस पर सोचने और शोक मनाने से क्या फायदा ? हाँ अगर बिगड़ी बात को बनाया कैसे जाए इस पर विचार करना हो तो कर सकती हो ।' 


शशांक ठीक ही कह रहे थे ...अगर रूपा को न्याय दिलवाना है तो कोई दूसरा वकील ढूंढना होगा, सोच कर मन को तसल्ली देने का प्रयास किया तथा इसके साथ ही मुझे लगा अब मेरा देश , मेरा कर्तव्य मुझे पुकार रहा है….अब घर लौटने की इच्छा होने लगी थी । 


अभिनव और स्नेहा के ऑफिस से आते ही घर लौटने की बात कही तो वे चौंक गए तथा आग्रह युक्त स्वर में कहा , 'इतनी जल्दी , अभी तो हमारा मन ही नहीं भरा । प्लीज कुछ दिन और रुक जाइए ना ।' 


कुछ प्रश्न उत्तरों के पश्चात आखिर हमारी बात मान कर अभिनव ने हमारे लौटने की बुकिंग कराने का आश्वासन दिया अब हमें लौटने की तारीख का इंतजार था पर उसके पूर्व हमें अचल और बीना के पास न्यूयॉर्क भी जाना था भारत से चलने से पूर्व उन्होंने हमसे वायदा लिया था कि अमेरिका प्रवास के दौरान हम उनके पास अवश्य आयें । उनके आग्रह को ठुकरा पाना हमारे यह संभव नहीं था बेहद मान सम्मान देते थे वे हमें । यही कारण था कि हमने भारत वापसी की टिकट के साथ हफ्ते भर न्यूयॉर्क रहने की अपनी इच्छा जाहिर करते हुए अभिनव को न्यूयॉर्क का भी टिकट बुक कराने का आग्रह किया था ।



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 एक दिन ऑफिस से आकर स्नेहा ने मुझे टिकट पकड़ाते हुए कहा …


 ' ममा, मुझे बिजनेस डील के सिलसिले में एक हफ्ते के लिए बाहर जाना है । मेरा जाना अति आवश्यक है , टाल भी नहीं सकती । आप भी बीना मामी से मिलने न्यूयॉर्क जाने के लिए कह रही थीं । इस बीच आप उनसे मिल आओ । शेष समय आपके साथ ही छुट्टी लेकर बिताऊंगी । ' 


 नियत तिथि को हम न्यूयॉर्क चले गए । अचल और बीना ने तहे दिल से हमारा स्वागत किया । अचल के ऑफिस जाते ही बीना हमें कहीं न कहीं घूमने जाने का कार्यक्रम बना लेती । समुद्र के बोचोबीच बने टापू पर स्तिथि , आजादी की प्रतीक, कॉपर की बनी, 151 फीट ऊंची ' स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी ' देखकर हम दंग ही रह गये । इसे देखने के लिए केवल शिप जिसे यहाँ फैरी कहा जाता है, से ही जाया जा सकता है । स्टेचू ऑफ लिबर्टी को देखने के पश्चात इसी फैरी से हम एलिस आइसलैंड गये । एलिस आइसलैंड न्यूयॉर्क हार्बर का प्रवेश द्वार है ...हमें बताया गया कि विभिन्न देशों से समुद्र मार्ग से आये लगभग 100 लाख से अधिक लोगों ने इस प्रवेश द्वार से अमेरिका में प्रवेश किया । उनकी याद में यहाँ मेमोरियल बना है ।


अंपायर स्टेट बिल्डिंग की 103 मंजिल की 86 मंजिल पर स्थित ऑब्जर्वेटरी डेक से दिखती स्काई लाइन न्यूयॉर्क की विशालता का अनुभव करा गई । मैडम तुसाद म्यूजियम में मोम की मूर्तियाँ जीवंत लग रही थीं ।टाइम स्क्वायर ने जहाँ इस बात का एहसास कराया कि न्यूयॉर्क कभी नहीं सोता वहीं वर्ल्ड ट्रेड सेंटर मेमोरियल में उपस्थित जनसमूह इस बात का एहसास करा गया कि संवेदनाएं इस देश में अभी भी जिंदा है ।


 अगले सप्ताह अचल और बीना ने नियाग्रा जाने का प्रोग्राम बना रखा था । अमेरिका तथा कनाडा के बोडर पर स्तिथ, नियाग्रा रिवर द्वारा बनाये ,विश्व प्रसिद्ध घोड़े की नाल के आकार के 51 मीटर की ऊंचाई से गिरते झरने को देखकर हम अभिभूत थे … मेड ऑफ मिस्ट अर्थात वह जहाज जिससे पर्यटकों को झरने के एकदम पास ले जाया जाता है । जहाज में बैठते ही हमें रेनकोट दिया गया जिससे झरने के पास जाने पर कपड़े गीले न हों । जाते ऐसा महसूस हुआ कि हमारे भारत में भी एक से एक झरने हैं पर टूरिज्म डिपार्टमेंट की अनदेखी के कारण कोई भी इतना विकसित नहीं हो पाया है । 


इसके बाद हमने नियाग्रा के के कुछ अन्य दर्शनीय स्थल जर्नी बिहाइंड फाल, नियाग्रा फ्यूरी ,नियाग्रा फॉल डिस्कवरी सेंटर , गोट आइसलैंड तथा वाइट वाटर लेक , केव ऑफ विंड भी देखने गए । प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर इस स्थान ने हमारा मन मोह लिया ।


हम नियाग्रा से लौटे ही थे कि बीना को अपने पिता के परलोक गमन की सूचना मिली । पिता से उसे गहरा लगाव था फिर उसकी माँ भी जिंदा हैं । ऐसे समय में माँ को अपने बच्चों का ही सहारा होता है । वैसे भी अमेरिका में रहते हुए भी बीना अपने परिवार के हर सुख -दुख में काम आई है फिर ऐसे समय वह कैसे न जाती ? वह हमारे कारण पेशोपेश में पड़ी हुई थी । 


उसकी दुविधा देखकर मैंने उससे कहा, ' बीना ऐसी स्थिति में तुम्हारा अपनी माँ के पास रहना आवश्यक है । हम मिल तो लिए ही हैं , तुम बेहिचक चली जाओ । हमारी बात मान कर बीना चली गई तथा हमें भी समय से पूर्व ही शिकागो लौटना पड़ा । 


स्नेहा थी नहीं, सोचा अभिनय भी ऑफिस में होगा । घर की चाबी हमारे पास है ही अतः उसे फोन करके व्यर्थ क्यों डिस्टर्ब किया जाए ? हम सीधे घर पहुँच गए । घर में प्रवेश करते ही बेडरूम से आती तेज आवाजों ने हमारा ध्यान आकर्षित किया । क्या स्नेहा समय से पहले लौट आई है ? क्या अभिनय भी आज ऑफिस नहीं गया ? आश्चर्य इस बात का था कि सदा शांत रहने वाले इस जोड़े में झगड़ा किस बात पर हो रहा है ? ना चाहते हुए भी हम बेडरूम के दरवाजे के पास खड़े होकर उनकी बातें सुनने लगे । 


पुरुष आवाज तो अभिनव की थी पर स्त्री आवाज स्नेहा की नहीं, किसी और की थी । वह अंग्रेजी में बोल रही थी …


' यू चीट ...पहले तुमने हमसे विवाह का वायदा किया । इतने दिनों तक हम से फ्लर्ट करता रहा । फिर हमें बताएं बिना उस इंडियन को ले आया फिर भी हम चुप रहे । हमें लगा शायद आम हिंदुस्तानी की तरह अपने पेरेंट्स को खुश करने के लिए तुम उस इंडियन से विवाह करके यहाँ ले आए हो पर अब तो तुम मुझसे मिलना ही नहीं चाहते हो। अब तो हमें आपस में मिले बिना महीनों गुजर जाते हैं । तुम चाहते क्या हो ? शक्ल न सूरत ...पता नहीं तुम कैसे उसके साथ रह लेते हो ? पर अब मैं और सहन नहीं करूँगी । मुझे या उसे ...दोनों में से तुम्हें किसी एक को चुनना होगा वरना ...।'


' वरना क्या ....। 'तेज आवाज में अभिनव ने कहा ।


' मैं उस इंडियन को सब कुछ बता दूँगी ।'


 आगे हमसे कुछ सुना नहीं गया...मन दरक गया । बेटी के साथ इतना बड़ा धोखा ,फरेब ...इस भोले भाले चेहरे पर इतना घिनोना नकाब…!! अगर हम अचानक नहीं लौटते तो इस राज पर पर्दा ही पड़ा रह जाता । इस तरह के धोखे के न जाने हमने कितने किस्से सुने थे पर हमारी अपनी पुत्री के साथ भी ऐसा होगा ,सोचा भी नहीं था । बार-बार पढ़ा और सुना था कि इन प्रवासी भारतीयों की जिंदगी फ़रेब से भरी होती है । इनकी एक नहीं कई -कई गर्लफ्रेंड होती हैं । अपने माता-पिता की नजरों में अच्छा बना रहने के लिए यह विवाह तो कर लेते हैं पर अपनी गर्ल फ्रेंडों के साथ घूमने फिरने से बाज नहीं आते । कभी-कभी तो ब्याहता पत्नी को दोजख की जिंदगी जीने को विवश कर देते हैं । कहीं अपनी स्नेहा के साथ भी तो ऐसा ही नहीं हो रहा है ? अभी वे सोच ही रही थी कि वह लड़की दनदनाती हुई बाहर निकली , उसके पीछे-पीछे अभिनव था । वह लड़की तो इधर-उधर देखे बिना चली गई लेकिन अभिनव हमें देखकर रुक गया तथा आश्चर्य से हमारी ओर देखते हुए कहा…


' ममा ,पापा आप !! कब आए ? पहले से खबर दी होती तो मैं एयरपोर्ट लेने पहुँच जाता ।'


अभिनव की मीठी-मीठी बातें सुनकर मन किया कि उसे हम , हमें धोखा देने के लिए खूब खरी-खोटी सुनाएं पर फिर लगा ऐसे इंसान के क्या मुँह लगना !! वैसे भी अगर अपने आने की सूचना उसे दे देते तो इतने बड़े रहस्य से पर्दा कैसे हटता ? हमें चुप देखकर वह मेरे पैरों के पास आकर बैठ गया फिर धीरे से कहा …


'' ममा , शायद आपने सब सुन लिया । सुनकर आप मुझ पर क्रोधित हैं , होना भी चाहिए । आखिर गलती भी मेरी ही है । मुझे पहले ही स्नेहा को सब कुछ बता देना चाहिए था पर मैं ऐसा नहीं कर सका । मुझे डर था कि कहीं सच्चाई जानकर स्नेहा मुझसे दूर न चली जाए । मैं उसे बहुत प्यार करता हूँ ।


 मम्मा यह सच है कि मैं विवाह से पूर्व इस लड़की जेनी को चाहता था । इससे विवाह भी करना चाहता था शायद इस कामना के पीछे एक चाहत छुपी हुई थी कि अगर मैंने अमेरिकन लड़की से विवाह कर लिया तो मुझे अमेरिकन नागरिकता आसानी से मिल जाएगी जिसकी वजह से मुझे कहीं भी आने-जाने या जॉब करने में कोई रुकावट नहीं आएगी । अमेरिकन लड़की से विवाह की पापा- ममा ने इजाजत नहीं दी । उनका इकलौता लड़का होने के कारण मैं उनका दिल नहीं तोड़ना चाहता था । मैंने उनकी इच्छा के आगे सिर झुका दिया ।


मेरे जीजाजी को जब मेरे इस मंतव्य का पता चला तो उन्होंने मुझसे कहा कि अगर तुम अपने माता-पिता की इच्छा का मान रखते हुए किसी इंडियन लड़की से विवाह करना चाहते हो तो मेरे ऑफिस में एक लड़की काम कर रही है , वह ब्रिलियंट होने के साथ-साथ परिश्रमी भी है । अगर तुम कहो तो मैं उससे तुम्हारी बात चलाऊं । उसका ट्रांसफर भी कंपनी बेसिस पर शिकागो हो जाएगा । हाँ इतना बात देना आवश्यक समझता हूँ कि यह लड़की सामान्य कद काठी के साथ साँवली भी है । हो सकता है तुम्हें इससे भी सुंदर लड़कियां मिल जायें पर इसके जितनी परिश्रमी और सकारात्मक सोच वाली लड़की मिल पाएगी, मुझे संदेह है । 


जीजा जी ने स्नेहा की इतनी प्रशंसा की थी तो उस समय मुझे लगा चलो माता-पिता की इच्छा का मान रखने के लिए इंडियन लड़की से विवाह कर लेता हूँ और कुछ नहीं तो कम से कम पैसा तो कमा कर लाएगी 

। भारतीय संस्कृति में पली, बढ़ी होने के कारण ज्यादा चूं चपड़ भी नहीं करेगी । अगर करेगी तो देखा जाएगा । यह सच है मम्मा , जब मैंने स्नेहा से विवाह किया था तब मेरा मन साफ नहीं था । उस समय मैं सोच भी नहीं सकता था कि मैं सामान्य शक्ल सूरत वाली लड़की के साथ जीवन बिता भी पाऊंगा ...पर यह भी सच है जबसे मैंने स्नेहा का साथ पाया है मैं किसी अन्य के बारे में सोच भी नहीं पाता हूँ । उसके साथ रहकर ही मैं जान पाया हूँ कि सुंदरता तन की नहीं मन की होती है । विशेषतया तब जब मानसिक स्तर पर उसे अपने अनुरूप आता हूँ । तब बहुत ही सुकून महसूस करता हूँ ।


ममा, मेरी हर प्रॉब्लम में स्नेहा ने मेरा साथ दिया है । इसके बावजूद उसे जरा भी घमंड नहीं है । आज स्थिति यह है कि मैं उसके बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता । माना वह दूसरों की नजर में सुंदरता के मापदंडों पर खरी नहीं उतरती पर मेरी नजरों में वह दुनिया की सबसे खूबसूरत नारी है ,आत्मविश्वास से ओतप्रोत , जीवन में आई किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम... शायद इसीलिए विश्व सुंदरी के लिए सुंदरता का मापदंड ' ब्यूटी विद ब्रेन ' माना जाता है ।


ममा, जेनी मेरे जी का जंजाल बन गई है । प्रारंभ में उसे लगता था कि मैं स्नेहा को छोड़कर उसके पास लौट आऊँगा पर स्नेहा को न छोड़ने का अपना इरादा जताने के पश्चात अब वह ब्लैकमेलिंग पर उतर आई है । मेरे और उसके कुछ ऐसे फोटो हैं जो हमारी अंतरंगता को दर्शाते हैं । बस उन्हीं कुछ फोटोग्राफ का सहारा लेकर वह हमारे संबंध को तोड़ना चाहती है । काफी दिनों से वह मुझसे मिलने के लिए फोन कर रही थी पर मैं इनकार करता रहा । आज सुबह फीवर लग रहा था अतः ऑफिस से छुट्टी ले ली । पता नहीं कैसे उसे पता चल गया और वह घर चली आई ।


 मम्मा, स्नेहा को जेनी के बारे में बताने से डरता हूँ , कहीं वह मेरी इस गलती को क्षमा ना कर पाए तो... स्नेहा को कुछ न बता पाने के कारण मुझे इसकी उल्टी-सीधी हरकतें सहनी पड़ रही हैं । अब आप ही कोई रास्ता निकाल कर मुझे इससे मुक्त करवाइए ।' अभिनव अपनी बात समाप्त कर मेरी ओर निहारने लगा ।


मैं और शशांक बिना कुछ कहे उठकर अपने कमरे में चले आए । हम दोनों समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें ? मस्तिष्क उसकी बात मानने को तैयार नहीं था पर हमारी आँखों में आँखें डालकर अपने मन की बात हमारे सामने बयान करता उसका मासूम और भोला चेहरा देखकर दिल , मस्तिष्क की सोच को नकारने के लिए कह रहा था । एक बार हम यह सब अनदेखा कर भी दें पर क्या स्नेहा यह सब सहन कर पाएगी ? पूरी रात इसी कशमकश में बीत गई ।


दूसरे दिन ऑफिस जाने से पूर्व अभिनव हमारे पास आया तथा कहा, ' मम्मा- पापा , आप दोनों का नाश्ता टेबल पर रखा है । खा लीजिएगा ।'


शशांक ने उसे देखकर मुँह फेर लिया था । मेरी ओर से कोई उत्तर न पाकर उसने फिर कहा , ' मम्मा- पापा, आप मुझे क्षमा नहीं कर पाए हैं । शायद मेरे इस अपराध को क्षमा कर पाना इतना आसान भी नहीं है । मैंने सारी सच्चाई आपके सामने रख दी है । अब आप जो भी फैसला करेंगे मुझे मंजूर होगा । '


वह चला गया था किन्तु उसके स्वर की दीनता देख, मैं यह सोचकर हैरान परेशान थी कि मुझे हो क्या गया है !! रिश्ते में दरार भले ही आ गई हो पर अभी भी है तो वह हमारा दामाद ही, मैं उससे बातें भले ही न करती पर कम से कम उसे नाश्ता बना कर तो दे ही सकती थी ।


अभिनव के ऑफिस जाते ही शशांक ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा…


' अभिनव फ्राड है वरना वह इतनी बड़ी बात हमसे न छुपाता । उसे इसकी सजा मिलनी ही चाहिए ।'


' वह फ्रॉड नहीं है ...अगर वह स्नेहा के प्रति ईमानदार नहीं होता तो क्या वह हमसे इतनी नम्रता से पेश आता या हमारा इतना ख्याल रखता । इसके अतिरिक्त उस लड़की और अभिनव के बीच हुई बातचीत से भी तो यही निष्कर्ष निकलता है कि अभिनव उसको इग्नोर कर रहा है । वैसे भी जब मैं अभिनय के दोनों रूपों की तुलना करती हूँ तो न जाने क्यों मुझे उसकी बात में सच्चाई नजर आती है ।

जवानी में किसी के प्रति आकर्षण आम है । वह भी इसी आकर्षण का शिकार होकर गलती कर बैठा है । जहाँ तक बताने की बात है तो कोई भी इंसान अपनी गलती यूँ ही सबको नहीं बताता...वह भी ऐसी स्तिथि में जब उसके मन में यह डर हो कि कहीं उसकी गलती उसके जीवन को तहस नहस न कर डाले ।' मन की बात शशांक से कहते हुए मैंने उत्तर दिया ।


' कृष्णा बहुत भोली हो तुम ! जहाँ तक अभिनव और उस लड़की के बीच की बात का प्रश्न है , हो सकता है उसे हमारे आने का आभास हो गया हो और उसने बात का रुख पलट दिया हो । मेरा तो यही मानना है कि वह स्नेहा को प्यार व्यार नहीं करता पर वह सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को छोड़ना भी नहीं चाहता इसलिए वह यह प्रपंच रच रहा है । बहुत अच्छा अभिनेता है । स्नेहा को तो वह अब तक धोखा देता आया ही है, पकड़े जाने पर अब तुम्हें भी इमोशनली ब्लैकमेल करने पर तुल गया है । पर मैं उसे छोडूंगा नहीं, सजा दिलवाकर ही रहूँगा ।' 


 जहाँ शशांक स्नेहा को अभिनव से शीघ्र से शीघ्र मुक्त कराना चाह रहे थे वहीं मैं कोई भी निर्णय जल्दबाजी में नहीं लेना चाहती थी । मैं समझ नहीं पा रही थी कि जो शशांक कह रहे हैं वह ठीक है या जो मेरा दिल कह रहा है या महसूस कर रहा है वह ठीक है ।


 स्नेहा के आने तक हमारे बीच मौन पसरा रहा । अभिनव भी हमारे सामने आने से झिझकता रहा । इन दो दिनों में ही वह कुम्हला सा गया था । उसका पहले जैसा चंचलपन न जाने कहाँ खो गया था । मन कहता एक बार सब कुछ भुलाकर सहज होने का प्रयत्न करें पर शशांक का रुख मुझे सहज नहीं होने दे रहा था । वह स्नेहा के आते ही सारी बात उगल देना चाहते थे पर मैं इसके विरुद्ध थी । मैं चाहती थी कि अपना निर्णय थोपने की बजाय स्नेहा को ही निर्णय लेने दिया जाए क्योंकि कोई भी संबंध तोड़ना आसान है पर उसे निभाना और जोड़ना बेहद कठिन ...। 


कभी कभी जीवन में परेशानियाँ आती हैं, अनबन या शक के कीड़े को कुलबुलाकर दांपत्य को छिन्न-भिन्न करने को आतुर हो उठते हैं पर यह भी सच है कि एक गलत निर्णय जीवन भर का दर्द दे जाता है । आश्चर्य मुझे इस बात का था कि एक गलत निर्णय का दर्द झेलने वाले शशांक स्वयं अपनी माँ की तरह व्यवहार कर रहे हैं ।


मैं सिर्फ एक प्रयास करना चाहती थी । जबकि मुझे स्वयं ही पता नहीं था कि मैं अपने इस मकसद में कामयाब हो भी पाऊंगी या नहीं । जेनी को मैंने एक नजर ही देखा था । वह मुझे सौंदर्य से ओत प्रोत लगी थी । कहीं अभिनव उसके रूप जाल से मुक्त नहीं हो पाया तो ? कहीं सच में वह दिखावा तो नहीं कर रहा है ? कहीं सच में स्नेहा की कमाई पर तो उसकी नजर नहीं है ? कहीं वह सचमुच स्नेहा को धोखा तो नहीं दे रहा है ? अनेक प्रश्न थे जिनका कोई उत्तर मेरे पास नहीं था । वह दिन भी आ गया जब स्नेहा को आना था ।


उस दिन अभिनव ने मेरे पास आकर कहा, ' ममा ,प्लीज स्नेहा से कुछ मत कहिएगा । मैं स्नेहा से अलग रहकर जी नहीं पाऊंगा ।' 


' पर कब तक सच्चाई को उससे छुपा कर रखोगे ? यह मत भूलो झूठ पर खड़ा कोई संबंध स्थाई नहीं होता है । ' इस बार मैं चुप नहीं रह पाई । 


'फिर मैं क्या करूँ ?' पनियाली आँखों से अभिनव ने कहा ।


' अगर तुम सच में स्नेहा को चाहते हो तो उसे सारी सच्चाई बता दो तथा निर्णय भी उसी पर छोड़ दो । यह काम जितना जल्दी कर सको उतना ही अच्छा रहेगा । आज यह बात हमें पता चली है अगर कल यही बात उसे किसी और से पता चलेगी तो शायद वह तुम्हें कभी क्षमा नहीं कर पायेगी और फिर सच बताने में तुम जितनी देर करोगे वह लड़की जेनी तुम पर और भी हावी होती जाएगी ,तब शायद तुम कुछ भी नहीं कर पाओगे ।' तीखी नजर से उसे देखते हुए मैंने कहा ।


' शायद आप ठीक कह रही हैं ? मैं आज ही स्नेहा को सब कुछ सच-सच बता दूँगा पर अगर वह ना मानी तो ...।' मासूम बालक सा वह कह उठा ।


' अगर तुम्हारा प्यार सच्चा है तो स्नेहा को मानना ही होगा । हो सकता है इसमें कुछ समय लगे पर यह तुम्हारी और तुम्हारे प्यार की परीक्षा होगी । इसके लिए धैर्य और समझदारी से काम लेना होगा । पर याद रखना इसमें कोई धोखा या फरेब नहीं होना चाहिए । इंसान एक बार क्षमा कर सकता है पर बार-बार नहीं ।' ना चाहते हुए भी मेरे स्वर में चेतावनी आ गई थी ।


' मम्मा ,आप निश्चिंत रहिए । एक बार गलती कर चुका हूँ, अब आगे नहीं करूँगा और अगर आप चाहेंगी तो मैं और स्नेहा वापस भारत आने का प्रयत्न करेंगे ।' 


'अगर ऐसा हो पाया तो हमारी सारी दुश्चिंतायें समाप्त हो जायेंगी । मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं ।' 


मैंने शशांक को स्नेहा से कुछ भी ना कहने के लिए मना लिया ।


 स्नेहा के आने पर सब सामान व्यवहार करते रहे । रात्रि को अलग कमरे में सोने के बावजूद भी कान खड़े रहे ...एक दो बार जोर की आवाजों के अतिरिक्त कुछ सुनाई नहीं दिया । 


दूसरे दिन जहाँ अभिनव के चेहरे पर चिंता की लकीरें थी वही स्नेहा उखड़ी उखड़ी लगी। । मैंने सदा की तरह नाश्ता परोसा तो इस स्नेहा ने कहा, ' ममा आज जल्दी ऑफिस जाना है । खाने का मन नहीं है । वहीं कुछ खा लूँगी । '


यही हाल अभिनव का था । चाह कर भी मैं दोनों से कुछ नहीं पूछ पाई ।


 दोनों के ऑफिस जाते ही शशांक ने कहा , ' कैसी माँ हो तुम जो अपनी पुत्री के साथ हो रहे अन्याय को बढ़ावा दे रही हो । उसे एक ऐसे शख्स के साथ रहने के लिए विवश कर रही हो जिसने न केवल उसे धोखा दिया वरन इतने दिनों तक अपने कारनामों पर पर्दा भी डाले रहा ।' 


' मैं किसी पर दबाव नहीं डाल रही हूँ सिर्फ सच्चाई का पता लगाने का प्रयत्न कर रही हूँ।'


' चाहे तुम्हारे इस प्रयास में हमारी स्नेहा तिल- तिल कर सुलगती ही क्यों ना रहे । ' 


' रिश्तों की प्रगाढ़ता का पता ऐसे ही समय लगता है । अगर रिश्ता मजबूत है तो हर मुसीबत को झेलते हुए भी निखरता जाएगा और अगर नहीं है तो किसी का भी प्रयास उसे टूटने से नहीं बचा सकता । मैं तो बस इस रिश्ते को एक मौका देना चाहती हूँ ।' मैंने विवश स्वर में कहा ।


' बस तुम और तुम्हारी बातें !! हमारे लौटने के 20 दिन बचे हैं । अगर इस बीच कुछ ठीक नहीं हो पाया तो हम स्नेहा को लेकर लौट जाएंगे । उसे यहाँ इस देश में इस धोखेबाज के साथ नहीं रहने देंगे । नौकरी का क्या उसे वहाँ भी मिल जाएगी ।' कहते हुए शशांक के स्वर में चिंता झलक रही थी ।


 पिता के रूप में शायद वह ठीक भी हों । पुरुष और स्त्री में यही तो अंतर है । पुरुष तुरंत निर्णय ले लेता है जबकि स्त्री पूरी तरह सोच समझकर ही कोई निर्णय लेती है । मुझे स्नेहा पर पूर्ण विश्वास था । फिर भी मन में द्वंद चल रहा था । जब तक जब मन नहीं लगा तो टी.वी. खोलकर बैठ गई... मौसम के समाचार में उस दिन भारी बर्फबारी की आशंका के साथ लोगों को घर से बाहर न निकलने की चेतावनी दी जा रही थी । 


स्नेहा को हमने फोन किया तो उसने कहा ,'मम्मा, यह सब तो यहाँ आम बात है । आप चिंता मत करो मैं समय से घर पहुँच जाऊँगी ।' 


शाम को 5:00 बजे से ही बर्फ गिरने लगी । हमारा पहली बार बर्फ गिरते देखने का अवसर था । रुई के फाहे की तरह बर्फ गिर रही थी । थोड़ी ही देर में आसपास के घरों ,जमीन तथा पेड़ों पर बर्फ की सफेद चादर से बिछने लगी । मन किया बाहर निकलकर रुई के फाहों को अपने हाथ में लेकर मौसम की इस खूबसूरती का आनंद लूँ पर मन में चलते द्वंद के कारण आगे बढ़ते पैर अनायास ही रुक गए । अभिनव और स्नेहा अभी तक नहीं आए थे । सुना था कभी-कभी भारी बर्फबारी के कारण रास्ते ब्लॉक हो जाते हैं । स्नेहा को फोन किया तो वह किसी मीटिंग में व्यस्त थी वहीं अभिनव ने कहा वह रास्ते में है, वह स्नेहा को लेता हुआ आएगा ।


लगभग 1 घंटे पश्चात अभिनव ने स्नेहा के ऑफिस से फोन किया , ' ममा, स्नेहा ऑफिस में नहीं है क्या वह घर पहुँच गई है ? '


' क्या वह ऑफिस ऑफिस में नहीं है ? अगर ऑफिस में नहीं है तो गई कहाँ ?' आक्रोशित स्वर में मैंने प्रश्न किया ।


' ममा आप शांत रहें क्या उसने आपसे किसी और काम की बात की थी ?'


' हाँ, वह किसी मीटिंग की बात कर रही थी । '


' हो सकता है वह किसी बिजनेस डील के सिलसिले में किसी से मिलने गई हो । ठीक है मैं पता लगाकर आपको बताता हूँ ।' 


 मैंने स्नेहा के मोबाइल पर ट्राई किया तो वह आउट ऑफ रीच बता रहा था । मौसम बिगड़ता जा रहा था । लगभग 10:00 बज गए थे पर न अभिनव का पता था और न ही स्नेहा का...। न्यूज़ बुलेटिन बता रहे थे कि ऐसी बर्फ 15 वर्षों के पश्चात पड़ी है । असहाय से हम दोनों बैठे बस न्यूज़ बुलेटिन देखे जा रहे थे तथा बीच-बीच में मोबाइल पर ट्राई करते जा रहे थे पर हर बार निराशा ही हाथ लगती । 


लगभग 11:00 बजे स्नेहा का फोन आया, ' मम्मा मेरी गाड़ी बर्फ में फँस गई है । कोई अन्य उपाय न पाकर मैं वहीं पास में रहने वाली अपनी मित्र गीता के घर रुक गई हूँ । जैसे ही मौसम ठीक होगा मैं आ जाऊँगी ।' 


 स्नेहा से बात करने के कुछ देर पश्चात ही अभिनव का फोन आया वह स्नेहा के बारे में पूछने लगा । जब उसे स्नेहा का उसकी मित्र गीता के घर रुकने की बात बताई तो उसने राहत की सांस लेते हुए कहा, ' ममा आप और पापा खाना खा कर सो जाइए । मैं मौसम ठीक होते ही स्नेहा को लेकर आ जाऊँगा । '


 उसने भी किसी दुकान में शरण ली हुई थी । सुबह मौसम साफ हो गया था पर चारों ओर बर्फ की मोटी परत जमा थी । आसपास के घरों के लोग फावड़े जैसी चीज से घर में आने-जाने के रास्ते पर पड़ी बर्फ को हटाने में लगे हुए थे । लोगों की देखा देखी शशांक भी घर के स्टोर से फावड़ा उठा लाए तथा रास्ते की सफाई में करने में जुट गए । कभी कुछ न करने वाले शशांक को इस रूप में देखकर उसे सुखद आश्चर्य हुआ । सच माहौल और परिस्थितियां भी व्यक्ति में परिवर्तन ला देती हैं ।


उसी समय अभिनव की कार आती दिखी । मैं दौड़ कर बाहर आई । स्नेहा को न देखकर मैं चौकी ...मेरे चिंतातुर चेहरे को देखकर अभिनव ने कहा...


 ' मम्मा , स्नेहा की तबीयत ठीक नहीं है । शायद उसे ठंड लग गई है । उसे अस्पताल में एडमिट करा कर आपको लेने आया हूँ । शीघ्र चलिए ।'


' उसे अकेला छोड़ आए । हमें फोन कर बता देते ,हम पहुँच जाते ।' शशांक ने बदहवास स्वर में कहा ।


' पापा, स्नेहा अकेली नहीं है । उसके साथ उसकी मित्र गीता है । फोन पर बताता तो आप परेशान हो जाते । ऐसे मौसम में टैक्सी मिलने भी मुश्किल होती है । आप पहुँचते भी तो पहुँचते कैसे ? शीघ्र चलिए ...बाहर बहुत ठंड है । गर्म कपड़े ठीक से पहन लीजिएगा ।' 


 अभिनव का कहना ठीक ही था हम दोनों उसके साथ चल दिए । हीटिंग सिस्टम ऑन होने के बावजूद लग रहा था कि ठंड से खून जमा जा रहा है । शायद अभिनव ने हमारी मनःस्थिति भांप ली । आगे रखा थर्मस हमारी ओर बढ़ाते हुए कहा, 'ममा थोड़ी -थोड़ी कॉफी पी लीजिए, राहत मिलेगी ।'


 शशांक ने मेरी ओर से देखा तो मैंने इग्नोरेंस में सिर हिला दिया । शायद जब हम कपड़े बदल रहे थे , इसी बीच उसने कॉफी बना कर थरमस में डाल दी थी ।


 उसके बाद 4 दिन अस्पताल के चक्कर काटने में ही बीत गए । स्नेहा को ठंड लगकर इतना तेज बुखार आया था कि उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था । अभिनव की हालत देखने लायक थी । वह न ढंग से खा रहा था न ही पी रहा था । वह रात दिन उसके पास बैठा उसकी सेवा में लगा रहता । कभी वह डॉक्टर से उसके साथ स्वास्थ्य से संबंधित बात करता तो कभी दवाई का पर्चा लेकर दवाई लाने केमिस्ट के पास चला जाता तो कभी उनके निर्देशानुसार उसे दवाएं तथा जूस इत्यादि देता ।


मैंने कई बार उससे कहा कि तुम आराम कर लो मैं स्नेहा के पास बैठी हूँ पर वह तैयार ही नहीं हुआ । उसकी सेवा एवं चिंता देखकर शशांक की धारणा भी उसके प्रति बदलने लगी । 


आखिर वह दिन भी आ गया जब स्नेहा डिस्चार्ज होकर घर आ गई । पर कमजोरी इतनी थी कि उसके पूर्णतः स्वस्थ होने में कुछ समय और लगना था । मैंने अभिनव से कहा , 'अगर तुम चाहो तो ड्यूटी ज्वाइन कर सकते हो । स्नेहा की देखभाल मैं कर लूँगी ।'


' काम तो होता रहेगा ममा ,-स्नेहा को ऐसी हालत में छोड़ कर ऑफिस जाऊँगा तो काम में भी मन नहीं लगेगा । थोड़ा और ठीक हो जाए तब ऑफिस जाने लगूँगा ।'


कब स्नेहा को कौन सी दवा देनी है ,कब जूस पिलाना है ,कब खाना देना है , सब वह समय-समय पर स्नेहा को देता रहता । उसे यह सब करते देख कर लग ही नहीं रहा था कि वह बेमन से या हमें दिखाने के लिए यह सब कर रहा है । कभी उसकी सहायता के लिए किचन में जाती तो वह कहता, ' मम्मा , आप स्नेहा के पास बैठिए , आपके साथ वह ज्यादा सहज रहती है ।' 


जब भी वह स्नेहा के लिए कुछ लेकर जाता तब मैं किसी ना किसी बहाने उठ जाती... शायद एक दूसरे को समझने का यह सुनहरा अवसर था ।


एक दिन इस स्नेहा ने कहा, ' ममा, पता नहीं मैं ठीक हूँ या नहीं पर इस घटना ने मेरे मन में चलते द्वंद को शांत कर दिया है मैं अभिनव को एक मौका और देना चाहती हूँ ।'


' बेटा , तू कभी गलत हो ही नहीं सकती । मुझे तुझ पर नाज है । वैसे भी बेटा सुख-दुख इंसानी जीवन की धूप - छांव हैं । इंसान वही है जो हर परिस्थिति में अपना मानसिक संतुलन बनाकर रखें तथा सही गलत की पहचान विकसित करने की आदत डाल ले । ऐसी मानसिकता वाला व्यक्ति जीवन की विषम से विषम परिस्थितियों से भी बाहर निकलने की राह खोज ही लेता है । मुझे खुशी है तूने भी ऐसा ही किया है ।' 


कुछ दिन पहले जिस घर में सन्नाटा पसर गया था वहाँ फिर पहले जैसी ही सहजता आ गई थी । हमारे लौटने का दिन भी आ गया पर अब दिल पर कोई बोझ नहीं था ।


विदा के समय अभिनव ने हम दोनों के पैर छुए तो एकाएक मेरे मुँह से निकला…


' अरे यह क्या कर रहे हो बेटा ? तुम हमारे दामाद हो । दामाद पैर नहीं छुआ करते ।'


' मम्मा आप मुझे बेटा भी कह रही हैं और आशीर्वाद भी नहीं देना चाहतीं । यह कैसी नाइंसाफी है ।' कहते हुए उसके चेहरे पर फिर पहले जैसी ही चंचलता छलक आई थी । 


' यूँ ही हँसते और मुस्कुराते हुए अपने जीवन में आई हर परेशानी का सामना करते हुए , जीवन पथ पर निरंतर आगे बढ़ते रहो , बस यही हमारी कामना और आशीर्वाद है ।' आँखों में भर आए आँसुओं को छुपाते हुए मैंने कहा ।


हवाई जहाज उड़ चला था । स्नेहा और अभिनव के विदा करते चेहरे हमें आश्वस्त कर रहे थे कि अब वे कभी अलग नहीं होंगे । शशांक की कही बातें एक बार फिर याद आई जब स्नेहा के विवाह से पूर्व उन्होंने मेरी दुश्चिंताओं से भरे मन को यह कहकर राहत पहुँचाई थी कि हमारी स्नेहा में सांवले रंग के अतिरिक्त क्या कमी है ? वह इंटेलिजेंट है, होनहार है , अच्छा कमा रही है ...जमाना बदल रहा है , इसके साथ ही लोगों का नजरिया भी । समझदार लोग आज आज लड़की का रंग रूप देखकर नहीं वरन योग्यता देखकर विवाह करने लगे हैं । अंततः आंतरिक सौंदर्य ने बाह्य सौंदर्य को मात दे ही दी ।


######



अंततः-31/ठीक


शशांक की पुस्तक ' नागफनियों के दंश' प्रकाशित हो गई थी । लोकार्पण के लिए प्रकाशक ने तैयारी कर ली थी तथा शशांक को लोकार्पण स्थल तक ले जाने का काम मुझे सौंप दिया था । मैं जब शशांक के साथ लोकार्पण स्थल पर पहुँची तब वहाँ लेखक की जगह अपना नाम देखकर शशांक चौक गए । उन्होंने मेरी ओर देखा ...मेरे बिना कुछ कहे ही सब कुछ उनकी समझ में आ गया । 


लोकार्पण के पश्चात पुस्तक चर्चा भी थीं। वक्ताओं ने जब अपने विचार व्यक्त किए तो शशांक भावविभोर हो उठे । अपनी बात कहने का अवसर प्राप्त होते ही उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा , ' अपनी डायरी के इन पन्नों को तो मैं कब का भूल गया था...आज कृष्णाजी के प्रयासों द्वारा समय-समय पर उकेरे उद्दगारों को समाज के सम्मुख पुस्तक रूप में लाकर मुझे आश्चर्यचकित कर दिया है । मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि कैसे कृष्णा जी तथा आप सभी को धन्यवाद दूँ ? आप सब की आशाओं पर खरा उतरूँ, यही मेरा प्रयास रहेगा । 


इसके पश्चात उन्होंने साहित्यिक गोष्ठियों में भी जाना प्रारंभ कर दिया । उनकी जिंदगी को एक मकसद मिल गया था ।


 जीवन को गुजारना है, गुजरता ही है ...दूसरा वकील करने के बावजूद लीला ने रूपा को न्याय मिलने की आस छोड़ दी थी ...। उसका कहना था अगर न्याय मिलना ही होता तो पल्लवी मेम ही क्यों हादसे का शिकार होतीं ? 


शशांक को सेवानिवृत्त हुए 2 महीने बीत गए थे । दिसंबर की एक सर्द शाम को मैं शशांक की इच्छानुसार पकोड़े बना रही थी कि सेल फोन घनघना उठा …। फोन अभिनव का था । 


' हैलो...।'


 ' हैलो ममा, दो गुड न्यूज़ हैं... एक तो आप नानी बनने वालीं हैं ...दूसरी हम अगले माह भारत आ रहे हैं , हमेशा -हमेशा के लिए ...।'


' सच बेटा , यह तो बहुत अच्छी खबर है । बधाई बेटा...जरा स्नेहा को फोन देना ।'


' ठीक है ममा...।'


' धन्यवाद बेटा , नाना- नानी की पदवी देने के लिए ...।' स्नेहा की आवाज सुनते ही मैंने कहा ।


' क्या कहा…? हम नाना -नानी बनने वाले हैं !! जरा मैं भी बात करूंगा स्नेहा से ...।' शशांक ने मोबाइल मेरे हाथ से लेते हुए कहा ।


 नाना -नानी एकाएक मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था । अमेरिका प्रवास के समय जब मैंने स्नेहा से फैमिली प्लान करने के बारे में कहा था तो उसने दो टूक शब्दों में कहा था, ' ममा बच्चे तो बाद में भी हो जाएंगे पर इस समय मेरे लिए कैरियर अधिक आवश्यक है । मैं बच्चे के लिए अपने कैरियर को दांव पर नहीं लगा सकती ।'


 अब विचारों में अचानक इतना परिवर्तन …


'लो स्नेहा तुमसे बात करेगी ।'कहते हुए शशांक ने मुझे फोन पकड़ा दिया ।


' मम्मा, तुम भी सोच रही होगी कि मेरे विचारों में इतना परिवर्तन कैसे आया !! सच तो यह है ममा पिछले कुछ दिनों से मुझे महसूस हो रहा था कि जितना मेरे लिए कैरियर आवश्यक है उतना ही फैमिली प्लान करना भी... और जब ब्रेक देना ही है तो अभी क्यों न ले लूँ ।'


' तूने बहुत अच्छा किया बेटा... अब बस यहाँ आ जा जिससे हमारी सारी चिंताएं दूर हो जाएं ।'


' मम्मा चिंता की कोई बात नहीं है । हम दोनों अपने रिश्ते से बेहद प्रसन्न हैं ।'


हम दोनों इस रिश्ते से बेहद प्रसन्न हैं ...शब्दों ने मेरे मन मस्तिष्क में गूँज-गूँज कर दिल में समय असमय उग आते नागफनियों को कुचल डाला था । ढेरों उतार-चढ़ाव वाली मेरी जिंदगी में अंततः गुलमोहर खिल ही आए थे ।



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