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Padma Agrawal

Tragedy Inspirational

5  

Padma Agrawal

Tragedy Inspirational

वसीयतनामा

वसीयतनामा

18 mins
674


     


राजप्रसाद जैसा "लक्ष्मी निवास " आज उदास दिखाई पड़ रहा था । राज ग्रुप की चेयर पर्सन 75 वर्षीया राजलक्ष्मी जी के गोलोक गमन के बाद से विशाल भवन मानों उदास हो उठा था । उनकी मुख्य सेविका दुर्गा देवी की आंखों से निरंतर आंसू झर रहे थे । उनकी लाल सुर्ख आंखों के पपोटे स्पष्ट कह रहे थे कि वह रात भर आंसू बहाती रही है ।परंतु विधि के विधान को कोई भी नहीं टाल सकता ... फिर मृत्यु तो जीवन का शाश्वत सत्य है ....

    शोक सभा का आयोजन किया गया । शहर के गणमान्य और प्रतिष्ठित लोगों के अतिरिक्त कंपनी के लोग, रिश्तेदार और परिचितों से हॉल खचाखच भरा हुआ था । लोग पुष्पांजलि के साथ उनको श्रद्धांजलि भी समर्पित कर रहे थे । कंपनी के अधिकारी और कर्मचारी ज्येष्ठ पुत्र जयराज सिंह ओर कमलराज सिंह की नजरों के सामने जाकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते थे क्यों कि अब वही उनके नये मालिक होने वाले थे ।

   धार्मिक प्रवृत्ति के ज्येष्ठ पुत्र जयराज सिंह ने सभी ऑफिस में शोक सभा करने के लिये सूचना प्रसारित कर दी थी । जयराज ने विधिविधान से सारे धार्मिक अनुष्ठान को स्वयं संपन्न किया था । अस्थि विसर्जन के लिये वह स्वयं हरिद्वार गये थे । जयराज सिंह के मन में अपार संतोष था कि सब कुछ और शांति से संपन्न हो गया था ।

यद्यपि कि अभी भी शोक संतप्त परिवार में अजीब सा सन्नाटा छाया हुआ था । परंतु सच कहा जाये तो शांति का माहौल कृत्रिम और बनावटी अधिक था क्योंकि परिवार के सभी सदस्यों के मन में अज्ञात भय था ,

घबराहट और शंकाग्रस्त भी थे, वजह थी ... आज मां जी .. का वसीयतनामा पढा जाने वाला था ।

     पिछले कुछ दिनों से स्वर्णलता जीजी का मां जी के पास आना जाना ज्यादा बढ गया था । वह अधिकतर मां जी के विशाल कक्ष में ही बनी रहतीं और दोनों आपस में गहन विचार मंत्रणा करती रहतीं थीं ।

बड़ी बहू सुमंगला और छोटी बहू राजेश्वरी से उन लोगों के बीच बार बार की आपसी मुलाकात के साथ उन दोनों के बीच होने वाली राय मशविरा ,विशेष रूप से ...वह भी फुसफुसाहट में, राजेश्वरी को चिंता में डाल दिया था । यह स्पष्ट था कि दोनों के बीच कुछ गोपनीय रूप से पक रहा है ।

सुमंगला जो शांत और संतोषी थी ,उनका सोचना था कि मां बेटी के बीच का मामला है इसलिये उनको दखलंदाजी करने का कोई हक बिल्कुल भी नहीं बनता । परंतु स्वभाव से घमंडी और लालची राजेश्वरी उन दोनों के इर्द गिर्द घूमती और सास राजलक्ष्मी से मीठी मीठी बातें करती रहती , शायद मां जी के मुंह से किसी क्षण उनके दिल की हलचल जुबान पर आ जाये । परंतु साम दाम दण्ड भेद के बावजूद वह कुछ भी जानने में विफल रही थी । वह मात्र अनुमान ही लगा सकती थी परंतु सच्चाई के जरा भी करीब नहीं पहुंच पाई थी ।

       लगभग 8 वर्ष पहले की बात है जब एक दिन राय लक्ष्मण राज का हृदयाघात से स्वर्गवास हो गया था । राजलक्ष्मी देवी कुछ महीनों तक तो शोकसंतप्त होकर मौन बनी रहीं परंतु फिर कंपनी के बिगड़ते हालात को देख उन्होंने अपने शोक को तिलांजलि दिया और पति के ऑफिस की कुर्सी पर विराजमान हो गईं और .... कारोबार के निर्णय स्वयं लेने लगीं । उनके कुशल निर्देशन में कारोबार प्रगति के मार्ग पर चल निकला था ।

राजग्रुप प्रदेश में जाना माना नाम बन गया था । दोनों बेटे जयराज और कमल राज मां के आधीन पहले की तरह ही काम करते रहे ।

राजलक्ष्मी जी ने हमेशा से अपने बच्चों की इच्छाओं और जरूरतों का ध्यान रखा था । इसलिये मां जी से किसी को कोई शिकायत नहीं थी ।

"सुमंगला , ये तुम्हारे लिये डायमंड का सेट ..... डिजाइन पसंद न हो ,तो रमेश जी को फोन कर देना ...

"मां जी , ये बहुत सुंदर है .... सुमंगला खुशी से फूली नहीं समा रही थी ।"

"राजेश्वरी , आप योरोप जाने की बात कर रहीं थीं ... ये आप दोनों के लिये योरोप की ट्रिप की टिकट है ...

20 दिनों की बुकिंग है , मैंने कमल को भी ऑफिस से छुट्टी दे दी है ।"

राजेश्वरी खुश होकर बोली मां जी आप सबके मन की बात कैसे जान लेती हैं । उन्होंने आगे बढ कर उनके पैर छू कर अपनी खुशी जाहिर की थी ।

जय का बेटा यू. के. में पढाई कर रहा है तो बेटी यू. एस . में MBA . कर रही है ।

कमल के दोनों बच्चे दून स्कूल में पढाई कर रहे हैं ।

राज ग्रुप की गणेशोत्सव और दीपावली की पार्टी का लोगों को इंतजार रहता था ।

  जयराज तो पूरी मेहनत और जिम्मेदारी से कारोबार को बढाने में लगे हुये थे परंतु कमल राज और राजेश्वरी दोनों हाथ से पैसा उड़ा रहे थे ... कमल को रेसिंग का चस्का था तो राजेश्वरी को क्लब में दोस्तों के साथ बड़ी बड़ी बाजियां खेलने का शौक था ।

जयराज ने जब भी कमल से होने वालों खर्चों के प्रति आगाह किया और बिजनेस पर ध्यान देने को कहा , घर का माहौल तनावपूर्ण हो गया । उन्होंने मां जी के सामने अपने दिल के गुबार को रखा तो उन्होंने कह दिया कि कमल के अंदर बचपना है , जरूरत पड़ने पर वह समझ जायेगा । तुम परेशान मत हो मैं उन दोनों से बात करूंगीं ...

यद्यपि कि वह स्वयं भी उसकी हरकतों से परेशान थीं क्यों कि वह उनकी भी नहीं सुनता था ।

स्वर्णलता देवी उनकी ज्येष्ठ पुत्री थीं । लक्ष्मण राय ने अपनी लाडली बेटी की शादी बहुत धूमधाम से राजघराने में ठाकुर रामेश्वर दयाल के बेटे रंजीत शाह से की थी परंतु शीघ्र ही उन्हें मालूम हो गया था कि वह लालची लोगों के बीच में फंस गये हैं परंतु बेटी की खुशी के लिये वह उनकी उचित अनुचित मांगों को चुपचाप पूरा करते रहे थे ।

   जब पिता नहीं रहे तो उन्होंने मां जी को अपना शिकार बनाया और आये दिन उनके सामने अपनी मांग को लेकर झोली फैला कर बैठ जातीं परंतु राजलक्ष्मी जी ने बेटी की लालची हरकतों के विषय में बेटों को हवा भी नहीं लगने दी और यही वजह थी कि जयराज सिंह बहन कॆ लालची स्वभाव के विषय में बिल्कुल अनजान थे ।

   इन दिनों स्वर्णलता जीजी यहीं पर रह रहीं थीं और सुमंगला ने गौर किया था कि राजेश्वरी के साथ घुटघुट कर बातें हुआ करतीं थी । उनका माथा ठनका था कहीं राजेश्वरी कोई षणयंत्र तो नहीं रच रही है ....परंतु वह कुछ कर भी नहीं सकती थीं । वह मेहमानों की व्यवस्था में लगातार व्यस्त रह रहीं थीं ।

“मां जी की तिजोरी आप कब खोलियेगा ....सुमंगला भाभी ""

सुमंगला क्षण भर को अचकचा गई थीं , तिजोरी का तो उन्हें ध्यान भी नहीं आया था ।

 मेरे जाने के बाद खोलना चाहती हो तो कोई बात नहीं.... मुझे तो मां जी का सतलड़ा हार बहुत पसंद है , मां जी ने कहा भी था कि आपको बहुत पसंद है तो आप ही ले लेना .... मैं तिजोरी खोलूंगीं तो आपको दे दूंगीं ... सुमंगला समझ गईं थीं कि इन दोनों के आपस में यही कुछ तय हुआ होगा ... वह राजेश्वरी की बात

सुनने को उत्सुक थी तभी वह बोली , ""जीजी , मां जी जैसा हार तो आप मेरी शादी में पहने हुई थीं ... मैं एक दिन एल़बम देख रही थी , तब देखा था ... “

“वह तो मैं मां जी का ही पहने हुई थी ""

सुमंगला चौंकी थी , मां जी ने सतलड़ा हार कमल की शादी के उपहार के रूप में बनवा कर दिया था ।

वह चुप चाप जीजी की ओर देखने लगी थी तभी राजेश्वरी बोली कि मांजी ने तो मुझसे कहा था कि मैंने तुम तीनों के लिये एक जैसा बनवाया है ।

यह सुनते ही जीजी बिगड़ गईं , "क्या मैं झूठ बोल रही हूं । मां जी ने कहा था कि मैं तुम्हें दादी की निशानी के तौर पर दे दूंगी । मुझे कुछ नहीं चाहिये..... तुम लोगों का जब मन हो तब तिजोरी खोलना ... मां के जाते ही इतनी बेइज्जती ...कह कर सुबक सुबक कर रोने लगीं .... सुमंगला उन्हें चुप कराने में लग गई थी । तभी रंजीत कुंअर जी और दोनो भाई भी अंदर आ गये कि क्या बात हो गई ?

जब जय राज को सब बात मालूम हुई तो वह बोले चाभी किसके पास है ? सुमंगला और राजेश्वरी दोनों ही उस जगह बार बार जाकर चाभी खोजती रहीं लेकिन उन्हें नहीं मिली , दोनों ही परेशान हो उठीं कि आखिर चाभी कहां गायब हो गई तभी स्वर्ण लता तेजी से उठीं , " इतना नाटक क्यों फैला रखा है ? नहीं खोलना है तो बिल्कुल मत खोलो ... फिर वह स्वयं उठ कर गईं और अल्मारी में खोजने लगीं ... थोड़ी देर यहां वहां ढूंढने के बाद उनको चाभी मिल गई थी ।

वह नाराज होकर बोलीं , "साफ साफ मना कर देतीं , इतना नाटक करने की क्या जरूरत थी "…उन्होंने चाभी जयराज की हथेली पर रख कर कहा ,"मेरा मन खराब हो गया है , जब मैं यहां से चली जाऊं तब तुम दोनों मिल कर आपस में बांट लेना ।" कहते हुये वह कमरे से तेजी से बाहर निकल गईं ।

जीजी की इस तरह की बातों , हरकतों को देख दोनों भाई सन्नाटे में आ गये और उनको खुश करने के लिये जय राज ने आगे बढ कर उनसे बोले , "अब आप ही खोलिये … मां जी के बाद आप ही घर की बड़ी हो "।

"

जय ,मैं तुम्हारी बात रखने के लिये खोल रही हूं , वैसे मुझे कोई मतलब नहीं है ।"

सब शांत थे , लेकिन उनके चेहरे पर विजय़ी मुस्कान थी । तिजोरी खुलते ही नया बवण्डर खड़ा हो गया ... उसमें से महारानी हार , सतलड़ा और चंपाकली जैसे एंटीक जेवर गायब थे ....

तिजोरी से जेवरों को गायब देखते ही सुमंगला की आंखों के सामने अंधेरा छा गया और वह वह धम्म से वहां पड़े सोफे पर बैठ गईं थीं , उनकी आंखें बंद अवश्य थीं परंतु उनकी आंखों के सामने सास के पुश्तैनी जेवर महारानी हार , सतलड़ा , चंपाकली , नगीने जड़ी करधनी झिलमिला रही थी , जिन्हें ससुराल आने पर राजलक्ष्मी जी ने अपने हाथों से उन्हें पहनाया था । उनके बार बार कहने पर भी उन्होंने अपने पास नहीं रखा था ।

अब तो प्रश्न यह था कि जेवर गायब कैसे हुये ? सुमंगला बड़प्पन दिखाते हुये मौन थी परंतु राजेश्वरी भला कब चुप रहने वाली थी उन्होंने सबके सामने स्वर्णलता पर शक जाहिर कर दिया परंतु वह जैसे इन बातों के लिये पहले से ही तैयार थीं ,"मैं क्या जानूं ? तुम दोनों यहां रहती हो , किसी ने निकाल लिये होंगें "।

दोनों बहुयें नंद की चालाकी देख आश्चर्य से भर उठीं थीं ।

स्वर्ण लता तीखी जुबान से बोलीं ,"मां जी के जेवर दोनों ने मिल बांट कर गायब कर दिये और अब दिखावा अच्छा कर रही हो । जाने मां जी कैसे रहतीं थीं , तुम लोगों ने तो मेरा दिमाग खराब करके रख दिया है । “

  स्वर्णलता के आरोप के बाद तीनों महिलाओं के चेहरे पर शक और चिंता की लकीरें खिंच गई थीं । सब की सब एक दूसरे को शक की निगाहों से देख रहीं थीं । राजेश्वरी कभी नंद तो कभी जिठानी की तरफ शक भरी निगाहों से देख रहीं थी ।

जयराज ने माहौल के तनाव को हल्का करने के लिये हंस कर कहा ",जिसको जो जेवर चाहिये रमेश जी के यहां जाकर ले लेना ....अब बात खत्म करो "

“शाम 6 बजे वकील साहब आयेंगें मां जी का वसीयत नामा पढने के लिये मां जी की इच्छानुसार ही बंटवारा होगा । ""

कमल का कहना था कि बंटवारे की क्या जरूरत है , जैसे चल रहा था वैसे ही चलता रहे । क्यों कि वह कारोबार और ऑफिस की जिम्मेदारियों से बचना चाहता था दूसरे उसने 10 करोड़ रु. इधर से निकाल कर अपने ससुराल वालों के साथ मिल कर एक नई कंपनी बनाई है .... अब वह उन पैसों को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति बता कर अपनी बताता है , जिस वजह से मां जी के सामने से दोनों के बीच आपस में विवाद चल रहा था ।

वकील तुषार घोष आये और कागजों की जांच पड़ताल हुई परंतु बंटवारे के विषय में उन्होंने कोई भी वसीयतनामा नहीं तैयार करवाया था । इसलिये यह सुनिश्चित हुआ कि लगभग 100 करोड़ की संपत्ति, जिसमें चल अचल फैक्ट्री, आलीशान कोठियां, फार्महाउस , ज्वेलरी , शेयर्स आदि सभी कुछ के तीन बराबर हिस्से, उनके तीनों बच्चों के बीच में बांटे जायेंगें ।

91 प्रतिशत शेयर राजलक्ष्मी जी के थे और 9 प्रतिशत दोनों बेटों के बच्चों नाम थे इसलिये उनका बंटवारा नहीं होगा ।

स्वर्णलता के चेहरे पर असंतोष नजर आ रहा था ।

यह एक कटु सत्य है कि धन या प्रापर्टी है तो वादविवाद और मनमुटाव होना सुनिश्चित है क्योंकि सभी पक्षों का संतुष्ट होना संभव है ही नहीं ...इस संसार में धनलिप्सा ऐसी होती है कि जितना भी हो वह कम ही प्रतीत होता है ।

वकील साहब चले गये थे परंतु जीजी के चेहरे पर तनाव स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था । मुखर जीजी मौन थीं , मानों मन ही मन वह कोई योजना बना रही हैं । वह और रंजीत जीजा जी अपने घर चले गये ।

    दोनों भाई अपने अपने ऑफिस और काम में बिजी हो गये थे ।

कई बार वकील साहब और इन तीनों की मीटिंग हुई परंतु यह तय नहीं हो पाया कि कौन क्या लेगा , बार बार इन्हीं मुद्दों पर विचार विमर्श होता परंतु निर्णय कुछ नहीं हो पाता कभी कमल नाराज होकर मीटिंग से चले जाते तो कभी स्वर्ण लता ....

स्वर्ण लता नाराज होकर बोलीं ,"अब कोर्ट में ही मिलेंगें । “

जयराज ने बीच बचाव करके मामला सुलझाने का प्रयास किया परंतु फिर वह भी तैश में बोले ," ठीक है , अब कोर्ट में ही तय होने दो

इस तरह से लगभग तीन महीने बीत गये थे , कुछ भी तय नहीं हो पा रहा था ।

अभी परिवार पूरी तरह शोक से उबर नहीं पाया था कि स्वर्ण लता जीजी के वकील का नोटिस दोनों भाइयों के नाम आया कि मां राजलक्ष्मी जी की वसीयत के अनुसार पूरी जायदाद और बिजनेस , को स्वर्णलता और कुंअर रंजीत सिंह के नाम कर दी है । दोनों भाई बतौर मैनेजर की तरह काम करते रहेंगें परंतु मालिकाना हक स्वर्णलता देवी का होगा ।

नोटिस देखते ही दोनों भाइयों के होश उड़ गये । परिवार के सभी सदस्यों के माथे पर चिंता की लकीरें स्पष्ट दिखाई पड़ने लगी ।

एक प्रश्न चिन्ह सबके मन में खड़ा हो गया कि जीजी ने ऐसा क्यों किया ?

मां जी ने कब ये वसीयतनामा तैयार करवाया ? उन सबको हवा भी नहीं लगने दी ..... कमल का कहना था कि यह कुंअर रंजीत के कुराफाती दिमाग की उपज है । उन्होंने हम सबके खिलाफ साजिश रची है ....

   सबके मन में शंका के बीज प्रस्फुटित होकर पूर्ण वृक्ष बन कर लहलहा उठे थे । शांत जयराज भी भविष्य के प्रति शंकालु हो उठे थे परंतु भीरु स्वभाव के जयराज ने स्वर्णलता देवी के समक्ष कभी जुबान तक नहीं खोली थी क्यों कि उन दोनों के उम्र में काफी अंतर था , इसलिये वह किंकर्तव्यविमूढ से हो गये थे ।

कमल राज नाराजगी भरे स्वर में बोले ,"" जीजी को तो पहले ही पिता जी दहेज में फैक्ट्री और जाने क्या क्या दे चुके हैं , इसलिये उनका तो अब कुछ भी मांगने का हक नहीं बनता । हम कोर्ट जायेंगें...... कुंअर साहब ने मां जी से अनजाने में साजिश रचने के लिये उनसे साइन करवा लिये होंगें । “

संपत्ति ने सबके मन में विष बो दिया था ।

जयराज ने अपने अनुभवों के आधार पर कहा कि कमल मामला यदि कोर्ट में पहुंच जायेगा तो हम लोगों के हाथ से निकल कर वकीलों के दांव पेंच में फंस कर , उलझ कर रह जायेगा .... इसलिये जीजी और कुंअर साहब के साथ बात करके आपस में सुलझा लिया जाना ज्यादा, अधिक उचित होगा ।

इस विषम परिस्थिति में क्या करना चाहिये , इस बात को लेकर सभी परेशान हो गये थे और आपस में सब लोग बैठ कर विचार विमर्श और मंत्रणा करते रहते , परंतु कोई उपाय उन्हें नहीं समझ आ रहा था ।

दोनों भाइयों ने आपस में यह तय किया कि हम लोगों के आपसी विवाद की भनक परिवार वालों के सिवा किसी को नहीं लगनी चाहिये .... हम सब जल्दी ही इस समस्या का समाधान निकाल लेंगें ।

 शोकाकुल परिवार आकुल व्याकुल मनोदशा के कारण अपने को बेबस सा पा रहा था । सब ओर तनाव व्याप्त रहता । कोई विश्वास नहीं कर रहा था कि जीजी ऐसा भी कर सकती हैं ...

क्या ,मां जी ने जानबूझ कर ऐसा वसीयत नामा तैयार करवाया है....

या फिर कुंअर साहब ने लालच के कारण यह फर्जी जाल फैलाया है ...जिसमें उन्होंने शिकारी की तरह सबको कानूनी जाल में उलझा कर बरबादी की तरफ ढकेलने का प्रबंध कर दिया है ।

जयराज मानसिक रूप से बहुत तनाव में थे , उन्होंने जीजी को सदा मां की तरह सम्मान की दृष्टि से देखा था और कुंअर साहब ने तो सदा नाराजगी के कारण यहां से दूरी ही बना कर रखी थी ।

पशोपेश और आपसी बातचीत में एक महीना बीत चला था जीजी अपनी बात पर अड़ी हुई थीं कि मांजी सारी संपत्ति उनके नाम करके गई हैं इसलिये दोनों भाइयों को उनके मातहत मैनेजर की तरह ही काम करना होगा ।

 गमगीन जयराज को गुरू निर्णयानंद के रूप में आशा की किरण दिखाई दी .... वह कमल को अपने साथ लेकर बहुत उम्मीद के साथ गुरू जी के पास पहुंचे ।

क्या बात है पुत्र, तुम्हारे माथे पर चिंता की लकीरें ? क्या मां जी के अचानक बिछोह को नहीं सह पा रहे हो "... इस संसार में आवागमन तो शाश्वत सत्य है , उससे क्या घबराना ...."

""गुरू महाराज ,अब आप ही हम लोगों की समस्या का निराकरण कर सकते हैं ।""

“जीजी का कहना है कि वह दोनों मैनेजर की तरह उनके मातहत काम करेंगें और वह मां जी की जगह मालिक बन कर सिंहासनारूढ होंगीं । “

“आप उन्हें समझाइये कि बराबर हिस्सा लेकर मान जायें । “

परंतु शातिर जीजी संभवतः महाराज जी को अपनी तरफ मिला चुकीं थीं ।

उन्होंने तुरंत कहा कि "जब रानी साहिबा अपने स्थान पर स्वर्णलता को प्रतिष्ठित कर गईं हैं तो फिर अनावश्यक वादविवाद की क्या आवश्यकता है ?"

जयराज ने गुरू जी के चरण पकड़ लिये थे और अपने जेब से डायमंड की अंगूठी निकाल कर उनके चरणों पर रख दी थी ।

अंगूठी पर निगाह पड़ते ही गुरू जी का स्वर नरम हो उठा...." जय और कमल तुम दोनों को तो मैंनं गोद में खिलाया है इसलिये तुम दोनों मेरे पुत्र की भांति हो । भाई बहन में आपसी विवाद नहीं होंगें तो कहां होंगें ...

मैं स्वर्णलता देवी को समझाने की कोशिश करूंगा ...आगे प्रभु इच्छा ...."

दोनों भाई गुरू जी की बातों से आश्वस्त नहीं हुये थे वरन् उनकी बातों ने मानसिक यंत्रणा ही दी थी ।

 कमल को गुरू जी से बहुत उम्मीद थी , परंतु अब वह भी टूट रही थी । परंतु जिस प्रकार इंसान आखिरी सांस तक जीवन की आशा लगाये रहता है वैसे उम्मीद की किरण लगाये हुये थे कि शायद जीजी गुरू जी की बात मान जायें ।

जयराज आपसी विवाद की बात जितना छिपाने की कोशिश करते जीजी उतना ही उछाल रहीं थीं

गुरू जी अपने लाव लश्कर के साथ आये , दोनों भाइयों ने उनकी सेवा में जी जान लगा दी ....

जीजी से बोले , " बेटी , आपस में वाद विवाद से क्या लाभ ? परंतु वसीयतना की कॉपी देखते ही बोले ," जब रानी साहिबा ने स्वयं ही अपनी गद्दी राजकुरी को हस्तांतरित की है तो फिर विवाद का क्या प्रश्न ....और वह अपना तामझाम समेट कर चले गये ।

 अब तो गुरू जी की शह पाकर स्वर्णलता ने वसीयतनामा के अनुसार मां जी के ऑफिस में बैठ कर फाइल मांग कर काम काज देखना शुरू कर दिया था ।

ऑफिस में सुगबुगाहट होने लगी थी कि अब कंपनी की नई मालिक स्वर्ण लता हैं ।

जय राज और कमल नें मामले को परिवार के अंदर ही सुलझाने के लिये परिवार के बुजुर्ग और गणमान्य लोगों को बुला कर सुलझाने का प्रयास किया लेकिन वहां पर स्वर्णलता सौदेबाजी पर उतर आईं ... मुझे तो मां जी की इच्छा का सम्मान करना है , मुझे पैसे का कोई लालच नहीं मेरे लिये तो जैसे मेरा आशु वैसे ही जय और कमल ... फिर झट वह सौदेबाजी पर उतर आईं कभी 10 परसेंट तो कभी 20 परसेंट तो कभी 30 परसेंट , वहां पर सभी लोग रंगे सियार की तरह बदलते बयान को सुनकर परेशान हो गये थे ।

कमल इतनी देर से चुपचाप सारा नाटक देख रहे , उनसे न रहा गया वह क्रोधित होकर आपे से बाहर हो उठे थे ," जीजी 30 परसेंट तो आपको वैसे ही मिल रहा था लेकिन आपकी तो नियत ही खराब है , आप तो समूची संपत्ति पर नाग की तरह बैठना चाहती हैं । “

स्वर्ण लता भला कब चुप रहने वाली थीं ,क्रोधित स्वर में बोलीं , "कमल, मैं जानती हूं ,तेरे मुंह में किसने ये शब्द डाले है ...मैं राजेश्वरी को बहुत अच्छी तरह जानती हूं कि वह कितनी लालची और चालाक परिवार की है।""

 जय और सुमंगला ने कमल और राजेश्वरी को वहां से हटा कर अंदर कर दिया था ।

स्वर्णलता देवी बोलीं , " जय आखिरी बार तुमसे कह रही हूं कि कोर्ट से बाहर मामला तय कर लो नहीं तो यदि कोर्ट के चक्कर में पड़ गये तो तुम दाने दाने के मोहताज हो जाओगे ....

 दोनों पक्ष अपनी अपनी बात पर अड़े हुये थे । कोई भी झुकने को तैयार नहीं था ।

 स्वर्णलता और रंजीत कुंअर ने मां के ऑफिस में मैनेजर और स्टाफ की मीटिंग बुला कर अपने को मालिक बता कर फाइल मंगा कर घरेलू विवाद को जग जाहिर कर दिया था ।

जय राज और कमल राज को जीजी की हरकतें असहनीय लगीं .... उन्होंने एक बार फिर से जीजी के साथ समझौते की पहल की परंतु जीजी कुछ भी सुनने को राजी ही नहीं थीं ।

     जय को सौ प्रतिशत यही विश्वास था कि वसीयतनामा या जोर जबर्दस्ती लिखाया गया या अनजाने में कोरे कागज में साइन करवा कर यह अपनी इच्छानुसार लिखवाया गया है ।

कमल का साला चंद्रेश शाह बार बार दोनों भाइयों को विश्वास दिला रहे थे कि वह एक दो पेशी में उनके हक में फैसला करवा देंगें । उनके अतिरिक्त देश के नामी वकीलों को इस मुकदमें के लिये बुलाया गया ।चंद्रेश ने कमल को भी बहला रखा था कि 10 करोड़ वाली कंपनी को बंटवारे से बचा लेंगें ।

भाई बहन आपस में दुश्मन बन गये थे और रोज के रोज नई नई चालें चल रहे थे।

पूरे देश की मीडिया वसीयत नामा के पारिवारिक झगड़े को अपनी ब्रेकिंग न्यूज की तरह दिखा रहे

थे । स्वर्णलता के चेहरे पर शिकन नहीं थी परंतु जयराज मीडिया के सामने आने में बहुत शर्म महसूस होती।

कोर्ट में वसीयतनामा फर्जी है ,की अर्जी दाखिल हो गई ।

अब तो दोनों भाई वकीलों के हाथ के खिलौना बनने को मजबूर थे । वकीलों के इशारे पर ही बयान देना होता... अब न ही स्वर्ण लता के हाथ में कुछ रह गया था न ही जयराज और कमल के .... अब तो सूत्रधार वकील थे ... तारीख पर तारीख .... गवाही ... बयान ...बहस .... मामला उलझता गया और समय बीतता रहा कभी फाइल दबा दी गई तो कभी वकील नहीं आये ...आदि आदि सारे हथकंडे आजमाये गये ।

चंद्रेश वकील ने वसीयतनामा फर्जी है , सिद्ध करने के लिये एड़ी चोटी का जोर लगाते हुये सबूत और गवाह पेश किये .. स्वर्णलता ने भी देश के नामी वकील को बुलाया था ... उनकी दलीलें और गवाह और सबूत बहुत दमदार थे ।

कंपनी की हालत बिगड़ती गई , पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा था , जय डिप्रेशन के शिकार बन गये ।

उनके जीवन की शांति संपन्नता सब कुछ हाथ से फिसलता जा रहा था ....

जिस तरह से बंदर बांट में बंदर ही पूरी रोटी हजम कर जाता है , वही हाल इन भाई बहन का था ....

उनके हाथ कुछ भी नहीं लग पा रहा था और वकीलों का घर भर रहा था ।

 आखिर में जज ने दोनों तरफ की दलीलें सुनने के बाद कंपनी के मैनेजमेंट को अपने हाथ में लेते हुये अपनी ओर से रिसीवर नियुक्त कर दिया और कंपनी का एकाउंट सील कर दिया ।

 स्वर्ण लता और रंजीत तो ऐसे मगरमच्छ के समान थे जो जय और कमल जैसी मछलियों को आसानी से अपना शिकार बना लेते थे परंतु कोर्ट में उनकी चालबाजी काम नहीं आई ।

फैसला लंबित रहा .... कंपनी और बिजनेस की हालत बिगड़ चुकी थी ...

  आपसी विवाद मे हंसते खेलते संपन्न परिवार की खुशियां लुट गई थीं और जीवन संघर्ष मय हो गया था ......

कई वर्षों के बाद , जय सबको बिलखता छोड़ कर इस दुनिया से चले गये और कमल आशा भरी नजरों से कोर्ट के चक्कर लगा रहे हैं .....



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