Sanjay Mishra

Drama Tragedy


3.8  

Sanjay Mishra

Drama Tragedy


माटी के बर्तन

माटी के बर्तन

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‘’अरे साहब जी, ए ही सब समान आप माल मे लिजियेगा तो १००० रुपिया से कम नहीं मिलेगा। हम तो फिर भी बहुत कम दाम लगा रहे हैं। ९० रुपिया सुराही का और ७० रुपिया गमला का। मेहनत भी तो देखिये ना साहब......।“

“देख भाई! मैंने पहले ही बोला,१०० रुपये से १ रुपये भी ज्यादा नही दूंगा। देना है तो बोल वर्ना टाइम वेस्ट मत कर। अगर हिसाब नही बैठ रहा तो.........”यह कहते हुए वह खिड़की का शीशा ऊपर करने लगा और गाड़ी को आगे बढ़ाने का उपक्रम करने लगा।

हाथ आया ग्राहक फिसलते देख घुरहू उठ खड़ा हुआ और सुराही व गमला खिड़की की ओर बढ़ा के बोला-“अरे कोई बात नही साहब,बुरा काहे मानते हैं। आप १०० में ही ले जाइये,आप पहले गिराहक है सुबह से। ये लिजिये”।–यह कहकर उसने खिड़की से दोनो सामान दिये और जवाब मे उसे ५०-५० के दो नोट मिले।

१६० रुपये की उम्मीदो पर १०० रुपए का जो तुषारापात हुआ वो दो दिनों के बाद बिक्री होने के संतोष के आगे रफुचक्कर हो गया। उन नोटो को हाथ में लहराते हुए आंखो में विजयी भाव लिये वह अपनी पत्नि पारबती की तरफ बढ़ा। पारबती भी अपनी मुस्कान रोक ना सकी। पास आ के उसने पारबती के कंधे पर हाथ हौले से रखते हुए कहा-“अब तो खुश!”

घुरहू अपनी बीवी पारबती और अपने तीन बच्चों सूरज,मुन्नी और गुड़िया के साथ, जिनकी उम्र करीब ६-८ साल के बीच थी, मेट्रो पुल की छाया उसका ‘शो-रूम’ होती थी और रात में वही छाया ‘बेड रूम’। सारा परिवार उसका हाथ बटाता था पर गुजारा कैसे होता था इसकी आप बीती वही जानते थे।

पैसे हाथ में लिये अभी मिनट भर ही हुआ होगा कि राजू ने चिल्ला कर कहा,‘’आज तो उधार ना घुरहू भाई,अब तो पैसे भी आ गये”।

“अरे मिल जाएंगे राजू भाई, कहां भागे जा रहे हैं!पूरी गरमी हम भी यहीं,तुम भी यहीं और तुम्हारी ये गन्ने के जूस की मसीन भी”।

इधर पारबती ने जल्दी से मुन्नी को आवाज दी जो सूरज और गुड़िया के साथ पत्थरों को गिनने वाला कोई खेल खेल रही थी।

“सुन, जल्दी से इ ५० रुपिया ले अउर सड़क उह पार से १ कीलो चाउर, ५ रुपिया के मरचा और १० रुपिया के पियाज ले आ। १४ रुपिया वपिस भी ।“

पत्थरो को अपने भाई-बहनो की ईमानदारी के भरोसे छोड़कर जाना आसान काम ना था पर कोई चारा भी ना था इसलिये मुन्नी दौड़ते हुए सड़क पार चली गयी।

“इसमे से ५० रुपिया बचा लेन।“ घुरहू ने पारबती से कहा और वापस बर्तनों के ढेर के सामने बैठ गया। १०० रुपए की बिक्री ने उसे शाम तक बैठने की ऊर्जा दे दी थी।

घुरहू के ‘ओपन-शोरूम’ के आसपास बहुत सी दुकानें थी। मेट्रो गेट के पास गोलगप्पो की,चाट पकौड़ों की, इयरफोंस की और भी बहुत सारी मगर इसमें से घुरहू के जान-पहचान की सिर्फ दो दुकाने थी। एक तो “ राजू गन्ने जूस की दुकान” और दूसरी “पंडित जी चना वाले” राजू गरमी के सीजन मे गन्ने का जूस बेचता था और सर्दी में चाय । पंडित जी सिर्फ चने के सहारे जीवन काट रहे थे। दोनो ही घुरहू के बच्चों को स्नेहवश अपनी दुकान से कुछ ना कुछ खाने पीने को देते रहते थे।घुरहू का भी इनकी दुकान से लेन देन का रिश्ता चलता रहता थ।

अभी कल शाम ही पंडित जी ने घुरहू को समझया था – “देख! तेरा नाम रामशीष है और तेरे नाम में ही भगवान हैं।भगवान के बिना ये दुनिया बेकार है। इसलिए उदास ना हो, मेहनत कर,सब ठीक हो जाएगा ।“

अपने नाम का मतलब तो घुरहू को पहले भी पता था,मगर असली गर्व का एहसास उसे अब हो रहा था। मन ही मन उसने अपने मां-बाप को नमन करके धन्यवाद दिय। अपनी पत्नी पारबती का नाम सोच के तो उसका गर्व दुगुना ही हो गया। वह सोचने लगा कि जब मैं भी बाकी लोगो की तरह ही भगवान का हिस्सा हूँ तो दु:ख किस बात क? अगले कुछ घंटे उसने इन्ही प्रतिकात्मक नामों के गर्व के एहसास के सहारे व्यतीत किए पर जब २ दिन तक एक भी बर्तन नही बिका तो उसे मिट्टी के भगवान की वास्तविकता पता लगी।

रात के करीब ९ बजे होंगे आधी से ज्यदा दुकाने बंद हो चुकी थी। घुरहू भी सारा सामान समेट रहा था । पारबती चुल्हे पर खाना बना रही थी। बच्चे खाट पर बैठ कर आपस मे कुछ खेल रहे थे । अचानक एक नीले रंग की कार ठीक सामने आकर रुकी। कार के अंदर से दो २०-२२ साल के लड़के बाहर निकलेऔर इधर-उधर मुआयना करने लगे। उनमे से एक लड़के ने आवाज लगाई,-“भाई साहब! ये परिवार आपका ही है क्या? घुरहू,जो अब तक बेफिक्र होकर बर्तन समेटरहा था,अचरज का भाव लिए उठ खड़ा हुआ और बोला,-“हाँ साहब जी,बोलिए,हमारा ही परिबार है। कोई बात है का? “

“अरे नहीं !दरसल मेरा नाम अनिकेत है और ये मेरा दोस्त राजीव।हम दोनो ही ट्रिपल एम कॉलेज से PHD कर रहे हैं। हमें हमारी थिसिस पूरी करनी है। हमारी थिसिस का सब्जेक्ट है –“पवर्टी ऑन रोड”।

“मतलब सड़क पर जो गरीब लोग रहते हैं ना,उनके बारे मे शोध करना है। इसलिए उनके साथ कुछ वक्त गुजारना चाहते हैं.........और बहुत से लोगों से मिल चुकेहैं। काफी कुछ जानने को मिला है। आप आखिरी हैं,वापस जाते समय आप दिख गए तो सोचा कुछ और कटेंट मिल जाए।“

काफी प्रयास करने के बाद भी घुरहू को इतनी बातों मे बस इतना समझ आया कि ये लोग उसके साथ कुछ देर रहेंगे,कुछ लिखेंगे और चले जाएंगे। उसने पारबती की तरफ देखा। वह भी उसको प्रश्नवाचक निगाहों से देख रही थी मानो पूछ रही हो-“कहीं कुछ बखेड़ा तो खड़ा नाही होगा।“ पर घुरहू ने उसेआँखों ही आँखों मे निश्चिन्त करते हुए मानो जवाब दिया –“अरे नही,२०-२० साल के लड़के हैं,पढ़ने वाले लगते हैं। अपने मरद पर भरोसा रख । कुछ नाही होगा।“

घुरहू ने उन दोनो को सिर हिला कर स्वीकारोक्ति देते हुए खाट पर बैठने का इशारा किया और फिर बचा कुचा बरतन समेटने चला गया। बच्चों की आंखो मे कौतूहल था। अनिकेत ने इस कौतूहल का सामना स्नेह से किया और मुन्नी के सिर पे हाथ फेरते हुए आवाज दी,-“अरे ओ गन्ने वाले भाई साहब!जरा ७-८ गन्ने का जूस लाइए।“ मिनटों मे राजू हाजिर हुआ और इशारा पा कर सबको जूस देने लगा। राजू को जूस देते वक्त उसे घुरहू की आँखों मे गर्व का भाव दिखा,मानो वह कह रहा हो,”हमारी भी पहचान ऐसे लोगो से है जिनके पास गाड़ी है।“

१० बज रहे थे। अनिकेत ने घुरहू की रोजमर्रा की जिन्दगी के बारे मे काफी कुछ जान लिया था।पल-पल जिंदा रहने के लिए जो संघर्ष था,उसका भी अनूमान लगा लिया था। घुरहू भी अब काफी सहज हो गया था। गाड़ियो के शीशे के पीछे बैठा इंसान,अब उसके सामने बैठा था। काफी बातचीत के बाद घुरहू ने कहा,”साहब,इतना तो पता लग गया कि हमसे जानकारी ले के उसका अपनी पढाई मे यूज करेंगे। मगर अभी तक आपने कछू लिखा तो नाही।“

“अरे अंकल जी,आप टेंशन मत लो।हम न्यूज चैनल वाले नही जो सब कुछ लिखते रहेंगे। आप बस ऐसे बात करते रहिए-आराम से।बस इतना ही काफी है। अब तो मै सोच रहा हूँ यहीं आपके पास रात गुजरूं। क्यों राजीव ?

राजीव जो अब तक सहायक विद्यार्थी की भूमिका मे था, अचानक विफर पड़ा ,”क्या बोल रहा है यार ! वैसे ही सारा दिन घूम के हवा टाइट है और तू ये नया शगूफा छोड़ रहा है। रहने दे भाई , मुझे नही करनी PHD बख्श दे मुझे।

राजीव की त्योरिया चढ़ते देख अनिकेत ने उसे सम्भाला और आखिरकार उसे मना ही लिय। “पर समझ नही आ रहा सोयेंगे कहाँ ? मैं तो बोलता हूँ गाड़ी मे ही सो जाते हैं।“-राजीव ने कहा।

“साहब जी, सोने की दिक्कत तो है ही नहीं।“-घुरहू ने खाट पर हाथ मारते हुए कहा।

“हमारे पास दो खाट है ; एक पर आप दोनो सो जाइए , एक पर पारबती और बच्चे और मै दोनो खाटो के बीच में।“

“पर आप नीचे.........

इस बार घुरहू ने अनिकेत को बीच मे ही काटते हुए कहा ,-“अरे का हो गया ? हम तो वइसे भी कबो-कबो नीचे सोई जाते हैं। आप टेंसन मत लिजिए । आराम से सो जाइए। हम खाना निकलवाते हैं । माटी के खाएंगे तो सुआद लगेग।

“अरे नही! तकलीफ मत उठाइए, हम खा कर आए हैं। आप लोग खा लिजिए।“ अनिकेत ने कहा।

रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे होंगे। अनिकेत और राजीव एक खाट पर, घुरहू दूसरी खाट पर लेटा हुआ था । लाख बोलने के बाद भी पारबती बच्चों के साथ नीचे सोई थी। राजीव किसी तरह शरीर पर तालियां बजा के , करवटें बदल कर सो रहा था । अनिकेत और घुरहू एक दुसरे की तरफ मुह करके बातें कर रहे थे-

“तो अंकल जी , आपका नाम रामाशीष है तो घुरहू नाम कैसे पड़ ? ”

“अब का बोलें साहब जी , हमारे जनम से पहले हमारी अम्मा के पांच बच्चे हुए और सब भगवान को प्यारे हो गये।तब हम हुए और हमारे अम्मा बाबू जी ने हमारा नाम घुरहू रख दिया। उ का है कि हमारे गाँव में मानते हैं कि अगर बच्चे जी ना रहे हों तो खराब नाम रखने से बच्चा जी जाता है ।“

“हैं!-ये कौन सी बात हुई ?” अनिकेत ने हंसते हुए पूछ।

“अब जो है सो है। का कर सकते हैं। फिर हमारी अम्मा ने हमारा नाम रामासीस रखा । “ घुरहू ने कहा।

अनिकेत – “ अच्छा तो आपके परिवार के बाकी लोग क्या करते हैं ? आई मीन , आपके मम्मी पापा। और आपने पढ़ाई कहां तक की? “

घुरहू-“ इ माटी ही हमारे सारे पुर्वजों का पेट पालती आई है । हमारे बाबूजी गाँव के कोंहार थे । अम्मा भी उनका हाथ बंटाती थी।

गाँव के बियाह सादी अउर तीज त्योहार में दीया देकर हमारा घर चलता था। त्योहारी में अनाज मिल जाता था और पहिनने को पुराने कपड़े भी।फिर अम्मा चल बसीं , बाबूजी भी कुछ दिन मे चले गये । पढ़ाई लिखाई हमने किया नहीं था । सो ले दे के यही खानदानी हुनर हमे बिरासत मे मिला था। ६ साल पहिले हम पारबती और मुन्नी को ले दे के दिल्ली आ गए- उ का है कि पारबती से हमारा बियाह बचपने मे हो गया था ।

अनिकेत- “दिल्ली क्यों अचानक ?”

घुरहू – अब का बोले । उ का है कि गाँव मे गुजारा नही हो पा रहा था। बियाह सादी अउर होरी दिवाली मे अब माटी का दीया कौन पूछ्ता है । बहुत उम्मीद लगा के इहां आए पर पता लगा कि इहां हमारा खानदानी हुनर कौड़ियों के भाव भी नहीं बिकता। इटा ढोने की कोसिस किये , मगर हो नहीं पाया हमसे , कभी किए नहीं थे ना । जौ पइसे जमा थे उ मकान के किराए मे ही खरच हो गए । किराया दे ना पाए तो मकान मालिक ने सड़क पर फेक दिया , बहुत हो-हल्ला भी किया । १-२ दिन इसी मेट्रो के पुलिया के नीचे गुजारे , बहुत परेसान थे , इधर-उधर घूम रहे थे तभी सड़क के किनारे एक आदमी को माटी के बरतन बेचते देखे , तो हम भी सोचे कि इ काम तो हम भी कर सकते हैं । अउर तब से एही काम कर रहें हैं । कभी पेट भरता है ,कभी खाली रह जाता है ।

अनिकेत का ह्रदय पसीज उठा । शहर की जिस अंधाधुंध चमक ने गाँव मे घुस कर घुरहू जैसे परिवारों के जीने का सहारा छीना था वही शहर आज खुद उनको आमंत्रण देने के बाद भी उनका पेट भरने में असमर्थ था ।

अपनी आवाज मे तसल्ली देने वाले भाव लाते हुए अनिकेत ने कहा , -“चलो अभी दुख काट लो , बच्चे पढ़-लिख के बड़े हो जाएंगे तो आगे की जिन्दगी संवर जाएगी अंकल जी ।“

घुरहू(हंसते हुए) – “अरे कहाँ संवरेगी साहब जी ! लगता है आप भी उस रंगबिरंगी किताबों को देख कर धोका खा गए । उ तो आप जैसे कुछ भले लोग दे गए थे । बोले थे कि बच्चों को पढ़ाना है। अब आप ही बताइए साहब जी , खाली किताब रखने से थोड़े ही पढ़ाई होती है । उ किताब मे एक जगह एक आदमी का फोटू है , माटी का बरतन बनाते हुए । बच्चे उहे देखकर खुस हो जाते हैं।

आगे अनिकेत से कुछ ना पूछा गया । गरीबी का दुष्चक्र किसी परिवार को कितनी पीढ़ियों तक फंसा के रखेगा , ये कहना मुश्किल है ।

“वैसे एक बात बोले साहब जी, हम जब इंहा पेहली बार आए थे तो सोचे थे कि खूब मेहनत करेंगे और एक दिन अइसी ही सानदार गाड़ी लेंगे । घर नही लेंगे किराया पे । का फायदा ? उसी गाड़ी मे रहेंगे । सोएंगे भी। रोज। घर के किराया का पइसा बचा के गाड़ी में पेटरोल डालेंगे । मगर अब तो इ पक्का हो गया कि इस जनम मे इ सपना पूरा नहीं होगा । चलो अगला जनम जिन्दाबाद ।“

अनिकेत घुरहू के इन मासूम सपनों को सुन के मुस्कुरा उठा । अचानक उठ के बोला , - “ चलिए अंकल जी, एक काम तो कर ही सकते हैं । आपने मुझे बिस्तर दिया, मेरा भी फर्ज़ बनता है कि एक रात के लिये ही सही, आपको आपके सपनों वाली नींद दूँ। चलिए , आइए.....।“

“अरे साहब जी, इ सब रहने दीजिये । हमारा इ मतलब नही था आप छोड़िए इ सब....।“ घुरहू की बात काटते हुए अनिकेत ने उसका हाथ पकड़ के बोला – “ अब ज्यादा सवाल जवाब नही, सब जाग जायेंगे । आपको आपकी माटी की कसम । चलिए।

“अरे साहब जी, आप फालतू परेसान हो रहे हैं । आराम से सो जाइए । रात बहुत हो गयी है । सुबह-सुबह यहाँ गाड़िया आती है।

आपको सुबह उठ के गाड़ी को साइट करना पड़ेगा । “घुरहू ने कहा, पर अनिकेत तो जैसे ठान चुका था ।

“वो मैं कर लूंगा अंकल । आप बस गाड़ी मे सो जाइए ।“

यह कह के उसने गाड़ी की चाबी जेब से निकाल कर गाड़ी का दरवाजा खोल दिया। ना नुकुर करते हुए घुरहू के सामने उसके सपनों की दुनिया खुली पड़ी थी।

अनिकेत खाट पर सोया था घुरहू गाड़ी में। जिंदगियों ने जैसे आपस मे समझौते कर लिये थे । १ घंटे तक तो घुरहू ने अपने आस पास की हर चीज का मुआयना किया। सीट के ऊपर खुद को उछाल उछाल कर देखा, मखमली आराम को महसूस किया। अचानक दिल मे ख्याल आया कि पारबती को बुला ले , आखिर उसका भी तो हक बनता है । मगर फिर सोचा कि कही साहब जी को बुरा ना लग जाए । और फिर पारबती को इन सब चीजो का शौक नहीं । घुरहू खुश था , चाहे १ दिन के लिए ही , भगवान ने उसका सपना पूरा कर दिया था । नींद आज आंखो से गायब ही हो गयी थी । सपना छोटा हो या बड़ा , उनके पूरे होने का एहसास ही आंखो की नींद को कुछ वक्त के लिए गायब कर देता है।

सुबह के करीब पांच बजे होंगे , अचानक जोर की आवाज हुई । ऐसा लगा कुछ फट गया हो। अनिकेत घबरा कर उठ बैठा । बाकी लोग भी उठ बैठे । कुछ लोग इधर उधर दौड़ने लगे । सामने ही अनिकेत की कार ध्वस्त अवस्था मे थी । पीछे एक ट्रक था जिसने उसे टक्कर मारी थी । ड्राइवर को लोगो ने पकड़ लिया था । उसे मार भी रहे थे । चकनाचूर गाड़ी के सामने एक और रुका हुआ ट्रक था जिस पर लोहे के सलिए लदे हुए थे । पीछे के ट्रक के टक्कर ने उन सलियों को अनिकेत की गाड़ी बेध देने पर मजबूर कर दिया था । यह नजारा देख कर अनिकेत की रूह कांप गयी । वह दौड़ के गाड़ी के पास पहुंचा । रात में घुरहू को पीछे की सीट पर सुलाने का दृश्य याद आया तो राहत की सांस ली । आशा की किरण जगी। गाड़ी के पास पहुंचा तो यह उम्मीद भी जाती रही । सामने का दृश्य ह्रदय विदारक था । घुरहू , स्टयरिंग व्हील पर हाथ रखे हुए था । घुरहू की हालत देखकर अनिकेत की चीखे निकल गयी । लोग आस पास खड़े थे । पारबती अब तक बुत बन चुकी थी । बच्चों को ज्यदा कुछ समझ नही आया था अब तक । कुछ लोग फोने लगा रहे थे पुलिस को । कुछ लोग फोटो खींच रहे थे । अनिकेत के अलावा बाकी सब हैरान थे कि घुरहू आखिर गाड़ी मे कैसे पहुंचा ? अनिकेत को समझ नही आ रहा था कि इस अंत का गुनहगार किसको ठहराए । मेट्रो पुल के नीचे रखे मिट्टी के बरतनो को देखकर उसकी आंखे जैसे ठहर गयी । ऐसा लगा जैसे बरतन अपने शहकार का इंतजार करते हुए इस बात से बेफिक्र थे कि अपने एक रात के सपने को पूरा करने के लिए उनके मालिक ने क्या कीमत चुकाई थी .......


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