Amit Kumar

Drama


4.6  

Amit Kumar

Drama


रावण

रावण

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गरीब भोला गाँव की बंजर जमीन छोड परिवार सहित रोजी-रोटी की तलाश में शहर की ओर कूच करता है। पत्नी शीला और तीन मासूम बच्चों के साथ वो मुंबई जैसे बडे शहर में चला आता है, जहाँ उसे अपने सपनों को साकार करना है।


सदियों से चली आ रही जमींदार की गुलामी की जंजीरों से वो खुद को और अपने परिवार को आज़ाद कर लेना चाहता है। मुंबई जैसे महानगर के बारे में उसने बहुत कुछ सुन रखा है, अच्छा भी और बुरा भी! लेकिन उसे अपने भगवान और भाग्य पर बहुत भरोसा है जिसके सहारे वो गाँव छोड़ शहर चला आया है।


यहाँ उसकी एक बहुत पुरानी जान-पहचान है, जिसके कारण उसे एक जगह मजदूरी का काम मिल गया है। वो बहुत खुश है परन्तु इतने बड़े शहर में अकेले कमाने वाले का गुजारा बहुत मुश्किल से हो पाता है इसलिए उसके मित्र की सलाह पर ही शीला को भी ठेकेदार मजदूरी का काम दे देता है। बच्चों के स्कूल में भी अभी वक्त लगेगा इसलिए पास की कूलर बनाने वाली फैक्टरी में उन तीनों को उनकी उम्र के हिसाब से काम पर रख दिया गया। लगभग एक महीना बीतने को आया भोला और उसका परिवार ठेकेदार के साथ काम करके खुश था।


फिर एक दिन भोला को बुखार ने घेर लिया, उसका पूरा बदन काँप रहा था, वो काम करने की स्थिति में नहीं था। बहुत मिन्नत-खिदावत करने पर ही ठेकेदार ने एक दिन की छुट्टी दी थी, लेकिन एक दिन से भला क्या होने वाला था?


अगले दिन भोला ने उठने की लाख कोशिश की मगर सब प्रयास विफल रहे। शीला ने ठेकेदार से बहुत मिन्नतें की तब जाकर वो माना और वो भी इस शर्त पर की अपना काम खत्म करने के बाद वो भोला के हिस्से का काम भी करेगी और उसके लिए उसे कोई अलग से पगार भी नहीं मिलेगी! मजबूर शीला को हामी भरनी पडी।


इसी तरह एक सप्ताह बीत गया। भोला की सेहत अब पहले से थोडी बेहतर हो गई परन्तु काम करने की हिम्मत उसमे न थी। उधर ठेकेदार शीला से दिन-रात काम करवाता।

एक दिन शीला की सहनशीलता ने जवाब दे दिया।, उसने ठेकेदार से अपना हिसाब करने के लिए कहा और उससे ये भी कहा कि वो अब बिना पगार का कोई काम नहीं करेगी। बल्कि उसके पास काम ही नहीं करेगी, शहर में काम की कोई कमी नहीं है।


ठेकेदार ने कहा, “ठीक है शाम को तुम्हारे झोंपडे पे आकर तुम्हारा और तुम्हारे पति का हिसाब कर दूंगा।” शीला अपना काम खत्म कर घर की ओर चली गई। ठेकेदार कुर्सी पर बैठा जाती हुई शीला के यौवन और बलखाती कमर को निहार रहा था।अंधेरा होते ही वो भोला के झोंपडे के अंदर जा पहुॅंचा। उसने भोला से बहुत ही प्रेम पूर्वक उसका हाल-चाल पूछा और शीला के गुस्से को भी शांत किया। दिन में उसे ‘ऐऐऐऐ’ या चिल्लाकर ‘शीला’ संबोधित करने वाला इस वक्त बडे ही प्यार से उसे ‘भाभी’ कहकर संबोधित कर रहा था।शीला भी उसके इस व्यवहार से बहुत हैरान थी।


जाने से पहले ठेकेदार काम पर आने के बारे में भोला से कहता है, तो भोला न चाहते हुए भी अगले दिन आने का वादा करता है। हालांकि उसकी पत्नी और बच्चे इस बात से सहमत नहीं, फिर भी भोला ठेकेदार से प्रसन्न हो उसके पैर छूता है। ये देख ठेकेदार उसके पास बैठते हुए बडे प्यार से उसे एक पुडिया निकालकर देता है और कहता है कि, “ये दवा मैं खास तौर पर तुम्हारे लिए लाया हूं इसे खाकर तुम कल सुबह तक ठीक हो जाओगे।" भोला हैरान होकर उसे देखता है और हाथ में रखी पुडिया को उलट-पुलट कर देखता है और फिर धीरे से पुछता है, “ये... ये कौन सी दवा है और कितने की है?”


अगले दिन भोला मे सचमुच एक नई ऊर्जा थी। उसका बुखार और थकावट सब खत्म हो चुका था। भोला सुबह नहा-धोकर खुशी-खुशी काम के लिए रवाना हो गया। जाते ही उसने ठेकेदार को सलाम किया और अपने काम में जुट गया। आज उसने इतना जमकर काम किया कि शीला द्वारा लाया गया खाना भी भूल गया। उसका मन खुशी से झूम रहा था जिसमे वह शीला को भी शामिल कर लेना चाहता था लेकिन शीला को ये सब अच्छा नहीं लग रहा था।


लेकिन शाम होते-होते भोला की तबीयत फिर बिगडने लगी उसे कमजोरी और आलस ने फिर से आ घेरा। उसकी पूरी रात करवटें बदलते हुए निकली। आज की सुबह कल से कुछ अलग थी। भोला कल की तरह ही काम करना चाहता था लेकिन संभव नहीं हो पा रहा था। ठेकेदार अभी तक नहीं आया था और इधर उसके इंतजार में नजरे बाछाए धीरे-धीरे अपना काम कर रहा था।


कुछ देर बाद ठेकेदार की कडक आवाज सुनाई देती है, "जल्दी-जल्दी हाथ चलाओ वरना पगार का पैसा नहीं मिलेगा।" भोला काम छोड ठेकेदार के पास जाता है और उससे कहता है कि कल वाली दवा की एक पुडिया अगर आज भी मिल जाती तो गरीब का भला हो जाता साहब।”


ठेकेदार उसकी आँखों में देखकर धीरे से मुस्काया और कहने लगा, “देखो भोला इस महँगाई के जमाने में भी हम तुम्हारी मदद केवल इसलिए कर रहे है क्योंकि तुम अच्छे आदमी हो।” (इस बीच भोला बडी विनम्रता से उसे देखता रहता है) ठेकेदार अपनी बाय जारी रखते हुए कहता है, “फिर भी न जाने तुम्हारी पत्नी मेरा मतलब है शीला भाभी मुझसे खफा रहती है।(फिर चाटुकारिता से कहता है) अब काम का मामला है थोडा-बहुत यों ऊपर-नीचे कहना ही पडता है! अब इसमे बुरा मानने की क्या बात है?” अपनी बात पूरी करते ही पुडिया उसके हाथ में थमा देता है। पुडिया लेकर भोला खुश होते हुए कहता है, “नादान है थोडी सरफिरी है साहब, मै उसे समझाऊँगा समझ जाएगी। आप... आप नाराज ना हो!” कहकर भोला अपने काम में जुट जाता है और शीला भी अपना काम बखूबी निपटा रही है।


इसी तरह दिन बीतते रहे अब भोला पर तेज धूप या बारिश का कोई असर न होता उसके काम में ऊर्जा और स्फुर्ती बनी रहती। इस बीच वो शीला को ठेकेदार की अच्छाई से प्रभावित करवाता रहता है जिसका असर शीला पर थोडा-बहुत हो भी चुका है। अब शीला आराम से ठेकेदार की बात का जवाब भी देती और कभी-कभार उसके लिए खाना गर्म करने और चाय बनाने जैसे छोटे-मोटे काम भी कर दिया करती लेकिन ठेकेदार उसे बात-बेबात डाँटता ही रहता शीला को बुरा भी लगता लेकिन वो हँस कर टाल जाती।


एक महीना बीतने को आया। आज पगार का दिन है भोला को उसकी तय की गई पगार से आधी पगार मिली है। भोला ने हैरान होकर प्रश्न भरी नजरों से ठेकेदार की ओर देखा तो ठेकेदार ने कहा कि, “ये जो रोज की पुडिया तुम खाते हो इसके पैसे मैं थोडे ही भरूंगा! ये तो तुम्हारी दवा है तुम्ही को खरीदनी है।” क्या-क्या नहीं सोचा था भोला ने पगार मिलते ही बच्चों का स्कूल में दाखिला करवाऊंगा लेकिन पगार तो ना के बराबर है। शीला की पगार से तो मात्र घर का खर्च ही चल पाता है(अपन-आप से बात करते हुए)नहीं-नहीं मै ठेकेदार से अवश्य बात करूंगा। वो अच्छा आदमी है मेरी बात को जरूर समझेगा ये सोच कर वो ठेकेदार के पास जाता है।


ठेकेदार उसकी समस्या को सुनकर भी अनसुना करते हुए कहता है कि, “क्या करेगा बच्चों को पढाकर कोई नौकरी तो मिलने वाली है नहीं, काम तो अंत में अपने ये दो हाथों की कमाई ही आनी है। जिस तरह तुम जी रहे हो वो भी जी लेगा, इसलिए ज्यादा फिक्र करने की जरूरत नहीं है।” लेकिन भोला अपने बच्चों का वास्ता देकर कहता है कि, “आपके द्वारा दिया गया एक-एक पैसा मैं चुकता कर दूंगा बस मेरे बेटे का एडमीशन स्कूल में करवा दीजिए।”


ठेकेदार उसकी बात सुनकर कुछ सोच में पड जाता है और जल्द ही कुछ करने का आश्वासन देता है।

अगले दिन ठेकेदार भोला को अपने पास बुलाता है और कहता है कि, "मै रूपए तो तुम्हें उधार दे दूॅं लेकिन सोच रहा हूॅं कि वापिस चुकाने में तुम्हें बहुत मशक्कत करनी पडेगी।" भोला हाथ जोडकर कहता है, “कोई बात नहीं साहब मैं मरते दम तक काम करता रहूंगा और आपकी उधारी चुकता कर दूंगा। बस मेरे महेश का स्कूल में दाखिला हो जाए। आप कहे तो मैं अलग से और काम करने को भी तैयार हूं।" भोला ने लगभग हाथ जोडते हुए कहा।"अरे, नहीं रे भोला तुम कितना काम करोगे? हाँ एक काम हो सकता है तुम शीला से कह शाम को मेरे घर पे खाना बनाना तथा कुछ अन्य छोटे-बडे काम कर दिया करे। बदले में मैं तुम लोगों की मदद कर दिया करूंगा और दवाई तो तुम ले ही रहे हो।"


”ठीक है...” आश्वस्त होकर भोला घर की तरफ चल दिया और वहाँ पहुॅंच कर सारी बात शीला को बता दी। पहले तो शीला का मन नहीं माना लेकिन फिर महेश का सोचकर उसने ये काम स्वीकार कर लिया।

अब हररोज शीला दिन में मजदूरी और शाम को ठेकेदार के यहाँ काम करती रात के ग्यारह-बारह बजे थक कर घर आती और सो जाती। उधर ठेकेदार हर वक्त उसे अपने जाल में फंसाने की तरकीबें ढूॅंढता रहता कि एक दिन उसे ये मौका मिल ही गया।


उस रात शाम से ही गहरे बादल घिर आए थे, ठण्डी हवाओं ने वातावरण को सुहाना बना दिया था, बादलों के बरसने का अनुमान था। मौसम को देखते हुए शीला ठेकेदार के घर का काम जल्दी से निपटाकर जल्दी से वापिस चले जाना चाहती थी कि दरवाजे पर दस्तक हुई। दरवाजा खुलते ही सामने ठेकेदार खडा था वो भी नशे में मस्त! उसकी आँखों में लाल डोरे चमक रहे थे। शीला उसे वहीं दरवाजे पर छोड किचन की तरफ बढ गई, ठेकेदार अंदर आ गया और सोफे पर बैठ गया। बाहर बारिश का शोर होने लगा था। शीला काम छोड खिडकी के पास आकर बाहर का जायज़ा लेने लगी। बाहर चमकती हुई भयावह बिजली के साथ शहर की बिजली भी गुल हो गई। वो किचन में रोशनी करने के लिए मोमबत्ती ढूॅंढने लगी कि अचानक अपने पास उसने ठेकेदार को महसूस किया, वो घबराकर दो कदम पीछे हट गई। ठेकेदार ने उसे अपनी बाहों के घेरे मेंकस लिया।


शीला ने लगभग विनती वाले अंदाज में कहा, "जाने दीजिए साहब हम गरीब लोग अपनी इज्जत नहीं बेचते।"


”तो मैं कौन सा तुम्हें तुम्हारी इज्जत के पैसे दे रहा हूं।" शीला रोने लगी। "अरेरेरे आप रोने लगी अरे भई औरतों का रोना हमे अच्छा नहीं लगता लो हमने तुम्हें छोड दिया।चलिए अब दो कप चाय बनाइए एक हमारे लिए और एक अपने लिए।" उसके छोड देने से शीला ने राहत की साँस ली और उसके लिए चाय बनाने लगी। "चाय दो कप बनाना ये मत कहना कि आप नहीं पीती इतनी मूसलाधार बारिश में कौन ऐसा शख्स होगा जिसे चाय अच्छी न लगे हाँ अगर ऐसे में कोई ‘चीयर्स’ हमदम मिल जाए तो बात ही कुछ और होगी।" इतना कहकर वो ड्राइंगरूम में बैठकर चाय का इंतजार करने लगा। कुछ देर बाद शीला चाय बनाकर ले आई। "अरे इसके साथ कंटेनर में रखे बिस्किट भी ले आती तो अच्छा होता।"


शीला चाय वही रखकर किचन से बिस्किट लाती है। ठेकेदार की चाय टेबल पर रखकर वहीं पास में नीचे बैठकर वो कप उठा लेती है, जो पहले से ही टेबल के एक कोने पर उसके लिए रख दिया गया था। चाय की चुस्कियाँ लेते हुए उसे सिर्फ इतना याद था कि बाहर मूसलाधार बारिश हो रही है और खिडकी से अंदर आते हवा के ठंडे झोंके उसे आनंदित कर रहे थे फिर उसके बाद क्या हुआ उसे कुछ भी याद नहीं। सुबह जब उसकी आँख खुली तो दिन का उजाला उसी खिडकी से अंदर आ रहा था और वो अपने अस्त-व्यस्त कपडों के साथ वहीं फर्श पर पडी थी उसके द्वारा पी गई चाय अपना कमाल दिखा चुकी थी। दूसरा कप टेबल पर वैसे ही भरा पडा था। उसने उठना चाहा लेकिन अंग-अंग दुख रहा था। बडी मुश्किल से उठके उसने खुद को संभाला, कपडे ठीक किए और कमरे से बाहर निकल कर बेतहाशा अपने झोंपडे की तरफ भाग खडी हुई। झोंपडे में अभी सब सो रहे थे। वो सीधा पीछे लगे नल की तरफ गई और उसके नीचे बैठकर बेतहाशा रोई। कुछ देर रोने के बाद वो झोंपडे में आई, कपडे बदले और बच्चों के लिए भोजन की व्यवस्था करने लगी।भोला भी नोंद से जागकर काम पर जाने के लिए तैयारी करने लगा। भोला तैयार हो गया लेकिन शीला ज्यों की त्यों बैठी रही। भोला के पूछने पर उसने काम पर जाने से ये कहकर इन्कार कर दिया कि उसकी तबीयत ठीक नही है।


“आज शीला काम पर क्यों नही आई??” ठेकेदार ने अपनी भारी-भरकम आवाज में भोला से पूछा। "हाँ साहब उसकी तबीयत कुछ ठीक नहीं थी। आराम करना चाहती है।" भोला ने उसके हाथ से ली हुई पुडिया खाते हुए कहा।"क्या हुआ?” ठेकेदार ने प्रश्न किया। “मालूम नहीं साहब, ज्यादा बात नहीं की उसने...” कहकर भोला अपने काम मे जुट गया।

शीला का पूरा दिन लेटे-लेटे ही बीत गया। शाम के समय उनका ही एक साथी मजदूर उसके झोंपडे पे आया और ये बता गया कि ठेकेदार ने तुम्हारे बेटे का एडमीशन करवा दिया है। स्कूल की वर्दी और पुस्तकों सहित अन्य सामान भी उपलब्ध करवा दिया है। ये कहकर वो व्यक्ति चला गया। शाम के समय जब भोला घर पर आया तो उसने भी यही सब बात दोहराई। वो बेहद खुश लग रहा था। उसने बताया कि, “ठेकेदार ने बताया कि इन सब पर पच्चीस हजार रूपया खर्च आया है। जिसे हम दोनो दिन-रात मेहनत करके चुकता कर देंगे (कुछ सोचते हुए) बस एक बार हमारा बेटा पढ-लिख जाए फिर जीवन आराम से कट जाएगा।” शीला ने कोई प्रतिक्रिया जाहिर न की, उसका मन बेहद उदास था। वो भोला के कंधे से लग कर जी भर कर रो लेना चाहती थी परन्तु वो ऐसा न कर सकी।


अगले दिन शीला फिर से काम पर नहीं गई, वो ठेकेदार के पास काम करना नही चाहती थी। जब ये बात उसने भोला से कही तो वो कुछ सकपका गया और उसने यही बात ठेकेदार से जाकर कह दी।"न जाने उसे क्या हो गया है साहब वो कभी ऐसी न थी दिन- यरात बिना रूके बिना थके काम करने वाली है वो।"


"तबीयत ठीक नहीं होगी। कुछ दवाई वगैरा खाई क्या?” ठेकेदार ने संवेदना जताई।"नहीं साहब अभी तो नहीं।" भोला ने निराशा से सर हिला दिया।"तो ऐसा कर भोला आज से तू दवाई की एक और पुडिया ले जाना और शीला को भी दे देना।” ठेकेदार ने उसे गौर से देखते हुए कहा।"ठीक है साहब। परन्तु उसे दवाई खिलाना आसान नहीं है "


"अरे भोला तू भी सचमुच का ही भोला है ऐसे खाने को मत देना उसकी चाय या खाने में घोल देना, मतलब तो उसके ठीक होने से ही है ना।” बात भोला की समझ में आ गई थी।


भोला ने घर जाकर वैसा ही किया।थोडी देर तक उसे शीला में असर दिखाई देने लगा। फिर अगले दिन से उनकी दिनचर्या शुरू हो गई। दोनो काम पर जाने लगे अब शीला भी भोला की ही तरह ठेकेदार के बस में आ चुकी थी। सब समझते हुए भी वो अन्जान थी।


मन से वो ठेकेदार के साथ काम नहीं करना चाहती थी। उन्हे ठेकेदार दवारा दी गई दवा के पैसे काट कर ऊपर से महेश की एडमीशन के पैसे काट कर ना के बराबर पगार मिलती थी। शारीरिक शोषण अलग से झेलना पडता था। शीला को ठेकेदार जब जी चाहे अपने घर बुला लेता।जरूरत पडने पर उनके मासूम बच्चों से भी उनकी क्षमतानुसार काम लिया जाता। भोला और उसका परिवार ठेकेदार का गुलाम बन कर रह गए थे। ठेकेदार ने ड्रग्स के जरिए उन सब को अपने काबू में कर लिया था। एक वो ही नहीं और भी ऐसे बहुत से लोग ठेकेदार के नीचे काम कर रहे थे जिन्हें वो ना के बराबर पगार देता था। देता था तो बस एक पुडिया जो एक अच्छे-भले इंसान को उसका गुलाम बना देती है।


एक शाम भोला अपने झोंपडे मेंनबैठा सोच रहा था कि गाँव से जमींदार की गुलामी छोड कर शहर आया था, एक स्वतन्त्र और अच्छा जीवन जीने के लिए। लेकिन मुझे क्या पता था कि गुलामी के रूप भी अलग-अलग है। आज वो बिन पैसे भी ठेकेदार की चाकरी करने को तैयार है। आज विजय दशमी के दिन भी वो अपने बच्चो को नए-कपडे और खिलौने लेकर नहीं दे पाया। बाहर पटाखों के फूटने की आवाजें आ रही है। उसका छोटा बेटा भागता हुआ अंदर आता है और कहता है, "माँ-बाबा चलो न बाहर देखो ‘रावण’ जल रहा है, रावण मर रहा है!” भोला एक लम्बी साँस खींच कर कहता है, “नहीं बेटा रावण तो आज भी जिन्दा है और तब तक रहेगा जब तक इस दुनिया में गरीबी, बेरोजगारी और मजबूरी रहेगी। आदमी-आदमी का गुलाम रहेगा, छल-कपट रहेगा तब तक रावण भी रहेगा।” कह कर भोला अपनी आँख मे आए आँसूं पोंछता है।


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