Sulakshana Mishra

Drama


5.0  

Sulakshana Mishra

Drama


कजरी ताई

कजरी ताई

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" कजरी ताई" !, पूरा गांव उनको इसी नाम से बुलाता था। फिर चाहे वो गांव के प्रधान जी हों या कोई और। उनकी उम्र का भी कोई पक्का हिसाब किताब था नहीं, कोई कहता कि 80 पार कर चुकी तो कोई कहता कि 90 पार हुआ है, कुछ लोग सैकड़ा पार करवा देते। अगर विश्वस्त सूत्रों की मानें, तो उनकी उम्र 80-85 के बीच में थी।

" कजरी ताई, दुल्हन बन के जिस साल आयी रहीं, उसके अगले साल देश आजाद भवा। तब रही उनकी उमर 10-12 साल की। गौना, शादी के सातवें साल भवा रहै।", ये कथन था सरजू बाबू का। सरजू बाबू, कजरी ताई के खानदान के ही थे और गांव के सबसे गंभीर व्यक्ति थे। बहुत इज़्ज़त थी उनकी गाँव में। सरजू बाबू ने ही बातों बातों में एक दिन बताया था कि इनके पति ने कभी इनको पत्नी का स्थान दिया नहीं। उन्होंने दूसरी शादी कर ली पर कजरी ताई ने सास ससुर के साथ गाँव में रहने का निर्णय लिया और आज दोनों के न रहने पर भी अपने निर्णय का मान रख रही हैं। इनके पति पहले तो लगभग हर साल गाँव आते थे पर जबसे माँ-बाप नहीं रहे, उनका आना भी अब खत्म ही समझो।

कजरी ताई न जाने किस मिट्टी की बनी थीं, न वो कभी अपने बीते हुए कल की बात करतीं, न कभी उनके व्यवहार से परित्यक्ता होने का आभास होता।

वैसे तो गाँव में सभी बच्चों से कजरी ताई को विशेष प्रेम रहता पर सलोनी इन सब में, सबसे खास थी क्योंकि सलोनी उनको खुद बहुत ज़्यादा मानती थी। सलोनी की दादी की बहुत पक्की सहेली थीं कजरी ताई, इसलिए सलोनी जब भी गाँव आती, कजरी ताई से ज़रूर मिलती। वो जितना कजरी ताई के बारे में जानती, उतनी उनके प्रति श्रद्धा उसकी बढ़ जाती। जैसे जैसे सलोनी एक कन्या से नारीत्व की तरफ बढ़ रही थी, उतनी ही उसकी समझ नारी मन की संवेदनाओं के प्रति भी बढ़ रही थी। अगर उसकी दादी की मानें तो उसकी खुद की ज़िंदगी भी कजरी ताई की ही देन है। सलोनी की दादी, कमला देवी बताती थीं कि जब सलोनी पैदा होने को थी, बारिश रुकने का नाम ही न ले रही थी। अब समस्या ये कि जिन लेडी डॉक्टर को आना था, वो बारिश की वजह से आ ही न पायीं । सलोनी, डॉक्टर के आने से पहले आ गयी। उस वक़्त सलोनी की माँ, सुधा के पास सिर्फ कजरी ताई ही थीं। उन्होंने सब अकेले संभाल लिया था। सलोनी का पहला स्पर्श कजरी ताई का मिला, सबसे पहले कजरी ताई ने ही देखा भी था और गोद भी लिया था। बाद में नाम भी उन्होंने ही रखा था इसीलिए सलोनी को लगता, की कजरी ताई उसके वजूद में समा चुकी थीं।

जब सलोनी थोड़ा बड़ी हुई तो एक दिन उसने कजरी ताई से पूछा, " ताई, जैसे मेरा नाम आपने रखा है, वैसे आपका नाम किसने रखा, कजरी ?"

" अरे बिट्टो ! हमारे जमाने में नाम कोई रखता नहीं था, बस पड़ जाते थे। अब हम थे कजरे के शौकीन, हम हो गए कजरी। हमको न भातीं सूनी सफेद आँखें।", इतना कह के कजरी ताई ने अपनी कजरारी आँखें बड़ी अदा से मटकाईं। सलोनी भी सोचने लगी कि इनके काजल में ज़रूर कोई जादुई शक्ति है वरना इनकी ज़िंदगी के सूनेपन को मिटा पाने का सामर्थ्य भी कहाँ किसी में था। खैर! कजरी ताई अपने जीवन में पूरी तरह से संतुष्ट थीं। सुहागिनों के सारे व्रत उपवास पूरी श्रद्धा से करतीं । एक बार सलोनी ने पूछा तो बोलीं, " अरे बिट्टो ! हमारे जमाने में , उसको का कहते हैं अंगरेजी में " डिवोर्स" तो होता नहीं था इसलिए अब मर के ही जे डोर टूटेगी। पूजा पाठ तो अब अगला जनम सुधारने के लिए कर रहे। एक दिन वरत करके कौन सा मरे जा रहे हम।"

सलोनी सोचती रही कि एक अनपढ़ औरत भी अंदर से कितनी गहराई की बात कर सकती है। यही आजकल के परिवेश में कोई ऐसा करे तो सही सज़ा मिले। ऐसा नहीं था कि वो औरतों के प्रति उदासीन थी। बात कजरी ताई के स्वभाव की थी। सच मे कितनी सरल और उदार थीं कजरी ताई।

समय बीतता गया और कजरी ताई ने समय के साथ खुद को समर्पित कर दिया था पूरे गाँव को। कोई बेटी या बहू गर्भवती होती तो कजरी ताई उसकी सेवा टहल में कोई कसर न छोड़ती। कभी उसकी मालिश करतीं तो कभी मेवे दूध में पका के खिलातीं। होने वाले बच्चे के स्वागत की तैयारी में दिन रात एक कर के छोटी छोटी पुतड़ियाँ सिलतीं।  

एक बार सलोनी ने टोका तो बोलीं," अरे बिट्टो ! इस जनम तो ऊपरवाले ने औलाद का सुख दिया ना। अब सबकी सेवा करू हूँ कि शायद अगले जनम औलाद का मुँह देख सकूँ। वैसे भी मुझ अकेली के पास काम ही क्या है।" कजरी ताई के अगले जनम के भय ने बहुतों के इस जनम को सुधार दिया था। एक दिन सलोनी शाम में कजरी ताई के घर गयी उनसे मिलने क्योंकि अगले दिन उसे शहर वापस जाना था। अपनी पहली नौकरी की शुरुआत करनी थी। उसने सोचा कि कजरी ताई के आशीर्वाद के बिना कुछ अधूरा से रह जायेगा। कजरी ताई अंदर के अंधेरे कमरे में कुछ कर रही थीं। सलोनी की आवाज़ सुनकर बहुत खुश हुईं। 

" अरे बिट्टो! तू बैठ, बस मैं आयी हाथ पोंछ के।"

सलोनी बाहर के कमरे में पड़े तखत पर बैठ गयी। तभी उसकी नज़र एक मलमल के छोटे से झोले पर पड़ी। कौतूहलवश उसने खोल के देखा, तो बस देखती रह गयी। उस झोले में ढेर सारी छोटी छोटी डिब्बियां थीं। तब तक कजरी ताई आ गईं थीं। उसने उनसे पूछा, " ताई, का करोगी इत्ती सारी डिब्बियों का ?"

" अरे बिट्टो ! ई कौनो साधारण डिबिया थोड़े हैं। ई हैं कजरौटा। अब गाँव भरे मा सबके बच्चा होत हैं। तब हम सब बच्चन का , गाय के देसी घी मा पार कर कजरा दिहा करित हन। बच्चन के बुरी नज़र से बचावै खातिर। औ ई देखो। ई है चाँदी का कजरौटा। तोहार बच्चा खातिर।" कजरी ताई अपने हाथ मे एक खास डिब्बे को सलोनी को दिखाते हुए बोलीं। सलोनी लजा गयी अपने बच्चे की बात सुन के। सलोनी ने कजरी ताई को अपनी नौकरी के बारे में बताया तो वो बहुत खुश हुईं और उसे ढेर से आशीष देते हुए बोलीं, " अरे बिट्टो ! अब मेरी जिंदगी का कौन ठिकाना। बस एक ठो बात रही मन मा। बताय दी तोहे ?"

" बोलो न ताई। क्या बात है?"

" बस एकहै इच्छा रही मन मा कि तोहार बियाह देख लेतेन और तोहरा एक ठो चंदा सा बेटुआ देख लेतेन। ओकरे बाद यमराज खुसी खुसी लै जाँय हमका। हमका कौनो गम नाहीं। और सुन बिट्टो, तोहरे बेटुआ के नाम हम ही रख्खब।"

" बेटी हो गयी और आपका बेटुआ न हुआ। तब का करोगी ताई?", सलोनी ने उनको छेड़ते हुए कहा।

" अरे बिट्टो ! हमारे जमाने में आशीष बेटुआ की ही दिही जात रहै। अब आजकल कौनो फरक कहाँ। अब तू तो बिटिया है न हमार। तू तो सबके बेटुअन पे भारी है न।", इतना कह कर वो अपने पोपले मुँह से खूब हँसी।

कहते हैं न कि दिन में किसी एक पल को सरस्वती देवी हमारी जुबान पर विराजती हैं। उस शाम सरस्वती देवी, कजरी ताई की जुबान पे बैठी थीं। सलोनी के घरवालों को जल्द ही एक समकक्ष रिश्ता मिल गया और सलोनी दुल्हन बन के विदा हो गयी। कजरी ताई ने बहुत ज़िम्मेदारी के साथ शादी की तैयारियां करवायीं। बन्ना बन्नी बड़े मन से गाये।ढोलक खूब बजायी और झुकी हुई कमर भी खूब लचकायी। जब सलोनी विदा हो के जा रही थी, उसके मन में बार बार खयाल आ रहा था कि चलो, कजरी ताई का एक अरमान तो पूरा हुआ। शादी के बाद सलोनी का गाँव जाना तो कम हो गया पर हर इतवार विडियो कॉल कर के सबको देख लेती थी।कजरी ताई हर बार उसको बेटे का आशीर्वाद देने से न चूकती थीं। शादी के 6 महीने बीतते ही पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ गयी। नन्हे मेहमान के आने की ख़बर थी ही खुशी वाली। सलोनी का मायका उसकी ससुराल से 50-60 किमी ही दूर था। उसका मायका बस कहने को गांव था, नहीं तो किसी मामले में शहर से कम न था। सलोनी की माँ उसको अपने पास ले आयीं कि कुछ आराम कर लेगी उनकी लाडो। सलोनी गाँव क्या पहुँची, कजरी ताई तो दिन रात उसकी सेवा में लग गयीं। सलोनी को कई बार लगता कि ज़रूर कोई पिछले जनम का नाता होगा इनसे। आजकल कोई सगा भी इतना नही करता किसी के लिए। और फिर वो दिन भी आ गया जब बच्चे को दुनिया के सामने आना था। सलोनी ने बहुत प्यारे से बेटे को जन्म दिया। पूरा गांव , कजरी ताई के सोहर की आवाज़ से गूंज उठा।

" सुधा, कजरी को छठी पे बुला लेना। कजरौटा उसी से ले लेना।", सलोनी की दादी, कमला देवी ने सलोनी की माँ को हिदायत दी।

" अम्मा , बाकी सब तो ठीक है पर जरूरी है कि कजरी ताई की छाया पड़े मेरे नाती पे ? खुद तो सारी जिंदगी निरबंसी रही। जाने कैसा न अपशकुन कर दे मेरे नाती पे।", सुधा ने दो टूक जवाब दिया। इस जवाब की आशा किसी को न थी।इस सब के बीच किसी ने ध्यान ही नहीं दिया कि कजरी ताई दरवाजे के बाहर कब आयी और कब ये सब सुन के उल्टे पाँव वापस चली गईं। कजरी ताई की आँखों में जैसे बाढ़ आ गयी। गंगा जमुना बहे जा रही थीं। आँसू थे कि रुकने का नाम ही न ले रहे थे। 

आज सलोनी का बेटा 5 दिन का हो गया था। सलोनी अब आराम से चल फिर रही थी। उसने बच्चे को अपनी माँ को दिया और पीछे के तरफ लगे पेड़ पौधों की तरफ जाने लगी। सुधा जी ने टोका तो बोली, " जी घबरा रहा है, बस दूर नहीं जाऊंगी। खुली हवा में मन अच्छा हो जाएगा।"

सलोनी तेज़ कदमों से चल के 5-7 मिनट में कजरी ताई के दरवाजे पहुँची। कजरी ताई उसको देख के लिपट गयीं।

" अम्मा की बात का बुरा मान गयीं ताई ? कैसे भूल गयीं के अपने बेटुआ का नाम भी आपको रखना है और काजल भी आपके कजरौटे का ही लगना है। जल्दी चलिए। मुझे देर हुई तो अम्मा परेशान हो जाएंगी।"

" अरे बिट्टो! तेरी अम्मा सही तो कहती है। मै अभागन हूँ रे। न पड़वा तू बेटुआ पे मेरी परछाईं।", अपने आँसू पोंछते हुए ताई ने सलोनी को समझाया।

" ताई, जिस कजरौटे के काजल ने तुम्हारी ज़िंदगी के सूनेपन को तुम्हारी आँखो से मिटा दिया, उसमे तो सच मे कोई शक्ति है न। अपने बेटे के लिए मुझे ऐसे ही किसी शक्तिशाली जादुई कजरौटे का काजल चाहिए। रही बात तुम्हारे अभागन होने की, तो तुम्हारे हाथों ने न जाने कितने बच्चों की ज़िंदगी लिख दी है। अब चलो जल्दी।", सलोनी ने लगभग उनको घसीटते हुए कहा। कजरी ताई तो हमेशा से प्यार की भूखी थी, चल पड़ी उसके पीछे पीछे।

" अच्छा एक बात बताओ ताई, ये तुम्हारे जमाने में भी गुस्सा होने का रिवाज था ? अम्मा की बात पे, बिना मुझसे मिले, तुम चली आयीं। अब मैं तुमसे गुस्सा हूँ, समझीं।", सलोनी ने झूठ मूठ का नाटक किया तो कजरी ताई बड़े बुझे मन से बोली, " अरे बिट्टो! हमको लगा कि हमारी किसी को ज़रूरत ही नहीं है। हम चले तो आये, लेकिन बेटुआ खिलाने को मरे जा रहे थे कसम से।"

" हाँ, तो अब चलो और जी भर के अपना बेटुआ खिलाओ ताई। "

कजरी ताई ने अपनी मुठ्ठी में पकड़ा हुआ चाँदी का कजरौटा और मजबूती से जकड़ लिया। शायद कजरौटे को भी किसी बुरी नज़र से बचाना था।


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