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Sulakshana Mishra

Abstract


4.5  

Sulakshana Mishra

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मिटी हुई लकीर

मिटी हुई लकीर

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वक़्त कभी रुकता नहीं, कभी थकता नहीं, बस चलता ही जाता है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि या तो बेचारे वक़्त का कोई पीछा कर रहा है या इसको किसी की तलाश है। इन दो वजहों के अलावा कोई और वजह तो समझ आती नहीं चलते जाने की। वक़्त की चाल के हस्ताक्षर भी अजीब होते हैं। एक रूपसी स्त्री को बुढ़ापे की दहलीज पर छोड़ आता है और एक नन्हें शैतान बालक को जवानी की दहलीज पर। सुनने में ये बात अविश्वसनीय लगेगी पर सच यही है कि वक़्त की फितरत एक स्त्री सी है, एकदम मूडी। ये मौसम क्या हैं ? वक़्त के मूड स्विंग ही तो हैं। गुस्से से लाल हुआ तो प्रचंड गर्मी, ख़ुश हुआ तो बसंत, रोया तो बारिश और डर गया तो सर्दी।

जैसे हर किसी का कोई न कोई पसंदीदा मौसम होता है, मल्लिका का भी था। दीवानी थी वो बारिश की। बचपन से ही बारिश के मौसम और कागज की कश्ती में उसके प्राण बस्ते थे। अपनी कश्ती को आगे बढ़ता देख, वो ज़ोर ज़ोर से तालियाँ बजाती थी। कपूर खानदान की इकलौती बेटी होने के नाते उसके नाज़ नखरे भी खूब उठाये जाते और रही सही कसर उसकी बेदाग खूबसूरती पूरी कर देती थी। बचपन में शैतानियों के बाद जाने कहाँ से एकदम निश्छल मासूमियत का पर्दा ओढ़ लेती कि कोई कुछ कह ही नहीं पाता। बचपन में बिना ताज़ की राजकुमारी थी वो। 

एक कहावत है कि ईश्वर सबको सबकुछ नहीं देता। वो एक न एक कमी सबकी ज़िंदगी में लिख देता है ताकि इंसान खुद को बेकाबू न कर ले। मल्लिका को खूबसूरती तो सारे जहाँ की दे दी पर किस्मत में से एक लकीर मिटा दी। मल्लिका ने जब तक कॉलेज की पढ़ाई खत्म की, लड़कों के शादी के रिश्तों ने एक लंबी लाइन लगा दी। आखिर पढ़ी लिखी, खूबसूरत लड़की थी।अपने खानदान की इकलौती वारिस भी थी। स्वभाव से भी मन मोहिनी थी। देखा जाय तो सब कुछ तो था उसमें जो किसी भी स्वप्न सुंदरी में होता है। बहुत सोच समझ के, जांच परख के उसके घरवालों ने उसकी शादी राजन से कर दी। धीरे धीरे वो दिन भी आ गया जब मल्लिका राजन की दुल्हन बन के विदा हो गयी। उसे क्या पता था कि वो अपने मायके में सिर्फ अपनी बचपन की यादें ही नहीं, अपना बचपन भी छोड़ के जा रही थी। शादी के बाद वो लखनऊ से देहरादून आ गयी। राजन का परिवार लखनऊ में था पर राजन फारेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में प्रोफेसर था इसलिए देहरादून में रहता था। जहाँ अमूमन नए युगल हनीमून के लिए जाते हैं, मल्लिका उन हसीन वादियों में बसने जा रही थी। राजन का बंगला भी हरियाली से चारों तरफ से घिरा हुआ था। मौसम शायद इस नए जोड़े पर कुछ ज़्यादा ही मेहरबान रहता था। हल्की ग़ुलाबी ठण्ड और महीन महीन फुहारों की बौछार शायद युगलबंदी सजा रही थी मल्लिका के स्वागत में। शादी के बाद कब दिन, महिनों में बदले और महीने, साल में, पता ही न चला। 

मल्लिका की ज़िंदगी में सबकुछ अच्छा चल रहा था। राजन उसकी हर छोटी बड़ी ज़रूरत का ध्यान रखता। दून कि वादियाँ उसके मूड को हमेशा खुशनुमा रखती थीं। सब कुछ ठीक था पर शायद ठीक सिर्फ दिख रहा था, ठीक था नहीं। मल्लिका एक बेटी से पत्नी तो बन गयी थी पर पत्नी से माँ बनने का उसका सफर कुछ ज़्यादा ही लंबा था। उसकी शादी को 3 साल हो चुके थे पर उसके इंतज़ार का अंत शायद अभी आया नहीं था। अब शायद उस वक़्त की आहट हो चली थी जो किस्मत की एक मिटी हुई लकीर का वक़्त था। 

मल्लिका को बारिश अब लुभाती नहीं थी। पास के पार्क में बने एक कृत्रिम ताल में बच्चों का झुंड जब अपनी अपनी कश्तियों को मंज़िल की ओर रवाना करता, तो न जाने क्यूँ उसकी आँखों से भी एक छोटी मोटी बारिश हो ही जाती। राजन उसके दर्द को उसकी आँखों में पढ़ चुका था। मल्लिका ने जो चक्कर डॉक्टरों के लगाए, वो शायद हर बार कभी उसे उम्मीद की किरण जागते, कभी नाउम्मीदी के अंधेरो में धकेल देते। विज्ञान कितनी भी तरक्की कर ले, फिर भी कुछ छूट जाता है जो विज्ञान से भी परे होता है। ऐसा ही था मल्लिका की नियति का लेख। डॉक्टरों ने अपनी तसल्ली के लिए हर जाँच कर ली, हर संभव दवा भी दे डाली। सारी जाँचों ने दोनों को पूर्णतया सामान्य घोषित तो कर दिया पर अधूरे सफर की वजह कोई न बता पाया। कोई बताएगा भी कैसे, कोई वजह हो तो बताई जाय। डॉक्टरों के चक्कर लगाते लगाते कब वो मंदिर, दरगाहों और फकीरों के आगे झोली फैलाने लगी, उसे खुद याद नहीं। ये बिना वजह की नाउम्मीदी का दर्द सिर्फ वो औरत ही जान सकती है, जो इससे गुज़री हो। कैसे हर बार आँखों मे सपने सजते हैं और टूटने के बाद वही सपने कैसे आँखों से गर्म पिघले हुए शीशे की तरह बह जाते हैं। धीरे धीरे उनकी शादी को 10 साल होने को आए। इन 10 सालों में भी उसकी जिंदगी का न सन्नाटा खत्म हुआ और न ही वो मीठी मीठी किलकारियां गूँजी। कई बर्फ उसके दिल में ज़िंदगी खत्म करने का खयाल आया पर बिना कसूर के राजन को ज़िंदगी भर म लिए ज़िंदगी की सज़ा देना उसे मुनासिब न लगा।

आज फिर बारिश बेतहाशा हो रही थी। मल्लिका की आँखों से नींद कोसों दूर थी। अंधेरे की वजह से उसे लगा कि रात के 1-2 बजे होंगे पर जब घड़ी पे नज़र पड़ी तो 4 बजने को थे। वो कुछ देर बालकनी में बैठ गयी जाकर। बालकनी में बैठ कर दूर तक पसरी हरियाली उसके दर्द को कुछ कम कर देती थी। आज बारिश से सामने पेड़ों की पत्तियां धुल गयी थीं मानो अभी अभी नहा के उतरी हों। रुक रुक के आती पंछियों की आवाज उसे अपनी ओर खींचती। वो सोच रही थी कि जो बारिश उसको दीवाना बना देती थी, आज उसके अधूरेपन के दौर में उसके दिल में नश्तर चुभो रही थी। वो अपने खयालों में गुम थी कि अचानक से एक बच्चे के रोने की आवाज़ से उसकी तन्द्रा टूटी। उसे लगा कि वो खयालों में खोई थी और किसी ने अचानक उसको यथार्थ के धरातल पर बेरहमी से पटक दिया हो। बच्चे की आवाज़ जैसे जैसे तेज़ हो रही थी, कोई अदृश्य ताक़त मल्लिका को उस ओर धकेल रही थी। मल्लिका लगभग बदहवास सी भागती हुई उसी जगह पहुंच गई, जहां से आवाज़ आ रही थी। उसे अपनी आँखों पे भरोसा नहीं हो रहा था। कोई एक दुधमुंही बच्ची को कपड़े में लपेट के पार्क के अंदर छोड़ के चला गया था। वो मजबूरी थी या हैवानियत, ये कहना मुश्किल था पर मल्लिका के लिए ये नन्ही परी सही मायनों में आशा की किरण थी। बिना एक पल गवाएं, उसने बच्ची को उठा के अपने सीने से लगा कर चुप कराया। उसका स्पर्श पाते ही वो करुण कृन्दन तुरंत गायब हो गया।शायद वो बच्ची भी एक सुरक्षित स्पर्श के लिए तड़प रही थी।जिस तेजी में मल्लिका उस बच्ची तक आयी थी, उसी तेजी से वो बच्ची को लेकर वापस अपने घर के अंदर चली गयी।

मल्लिका को कमरे में न पा कर राजन की भी नींद टूट चुकी थी। वो जैसे ही कमरे से निकला, उसने जो देखा, उसको खुद की आंखों पे यकीन नहीं हो रहा था। मल्लिका ने उसको पूरे किस्से का ब्यौरा दिया। कुछ देर तो दोनों ने पुलिस में मामला दर्ज कराने की बात पे विचार किया पर अन्ततः उस खयाल को वहीं दफ़न किया गया।मल्लिका ने राजन को यकीन दिला दिया कि किसी मजबूर माँ ने उसे चुना है । उस माँ ने अपने जिगर के टुकड़े को मल्लिका को देकर उसके अधूरेपन को खत्म कर दिया है। मल्लिका की खुशी देखते ही बन रही थी। दोनों ने उस बच्ची को पालने का निर्णय लिया और रिमझिम हमेशा के लिए उनकी हो गयी। 

बारिश अब भी आती है पर अब मल्लिका की रिमझिम जब अपनी कागज़ की कश्ती को पानी में उतारती है, तो मल्लिका की तालियां, कश्ती का हौसला बढ़ाती हैं। कभी कभी किस्मत से कुछ लकीरें मिट जाती हैं। बस उन मिटी हुई लकीरों के विकल्प तलाशने होते हैं। खुशियाँ खुद ब खुद लौट आती हैं।



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