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Sulakshana Mishra

Others


4.7  

Sulakshana Mishra

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अपराजिता

अपराजिता

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रिश्तों के भी अजीब खेल हैं, निभाने वाले तो बनाये हुए रिश्ते निभा जाते हैं और न निभाने वाले तो 7 जन्मों के कसमें वादे तोड़ जाते हैं। इसका कोई कुछ कर भी नहीं सकता क्योंकि रिश्ते अक्सर बड़े नाज़ुक होते हैं और निभाये हमेशा दिल से ही जाते हैं। 

कौशिकी की ज़िंदगी में रिश्तों के नाम पर 2 ही प्राणी थे, उसके पापा और उसकी माँ। कुछ गिनती के दोस्त भी थे, पर जितने भी दोस्त थे, सब बचपन से साथ पले बढ़े थे इसलिए दोस्ती के तार बड़े मजबूत थे। सारे दोस्तों में कौशिकी अपनी दोस्त समायरा के बहुत करीब थी। दोनों को एक दूसरे के बारे में लगभग सब पता था। कौशिकी के माँ-पापा दोनों ही नौकरी पेशा थे। दोनों अलग अलग शहरों में रहते थे। कौशिकी के पापा विशाल वीकेंड में हमेशा उसके साथ ही होते थे। अगर सही मायनों में देखा जाए तो उनका परिवार छोटा और सुखी परिवार था। 

वक़्त की रफ़्तार को समझ पाना कहाँ इतना आसान होता है। कौशिकी को यकीन ही नहीं हो रहा था कि ये कॉलेज में उसका आखिरी साल था। सब दोस्तों के अपने भविष्य को लेकर कुछ ख्वाब, कुछ प्लान थे पर कौशिकी को कुछ समझ में आ नहीं रहा था कि उसको क्या करना है। कभी उसको कुछ अच्छा लगता, कभी कुछ और। अजीब सी कश्मकश थी।

वो अपने घर के लॉन में बैठी इसी उधेड़बुन में थी कि कैसे ये उलझन सुलझे कि तभी समायरा का कॉल आ गया। कुछ परेशान लग रही थी। घंटे भर में मिलने आ रही थी। अभी दोपहर का 2 ही तो बजा था। कौशिकी की माँ, अपराजिता ऑफिस से शाम 7 बजे से पहले नहीं आ पातीं थी कभी, इसलिए समायरा अक्सर कौशिकी के घर पढ़ाई करने आ जाती थी। समायरा मिलने आई तो बहुत उदास थी। आज फिर उसके घर में एक छोटी सी बहस बहुत बड़ी हो गयी। उसके माँ-पापा में लड़ाई भी हो गयी। समायरा के यहाँ अक्सर रिश्तेदारों के ताँता लगा रहता था। कभी किसी को डॉक्टर को दिखाना होता तो किसी के बच्चे के एग्जाम का सेंटर होता था। समायरा की माँ का कहना था कि शहर में और भी रिश्तेदार हैं, सब इनके घर ही क्यों आते हैं ? 

दोनों दोस्तों में इसी घटना की चर्चा चल रही थी। कौशिकी बोली, " हमारे घर तो कोई रिश्तेदार आते ही नहीं। छुट्टियों में हमलोग घूमने चले जाते हैं। माँ-पापा में आजतक तो लड़ाई तो दूर, बहस तक नहीं होती है। दोनों एक दूसरे की बात आसानी से समझ जाते हैं। " 

" मान लिया कि सब एकदम परफेक्ट है तेरी फैमिली में पर कभी भी कोई बहस न होना, थोड़ा अजीब नहीं है? इतने सालों में कोई रिश्तेदार कभी नहीं आया। तुझे अजीब नहीं लगता ?", समायरा ने एक अजीब सा शक़ कौशिकी के दिमाग में डाल दिया। शक़ का इलाज तो आज तक बना न पाया कोई, पर शक़ का बीज तो कहीं भी पनपने की कला जानता है। शाम तक समायरा तो चली गयी पर जाने अनजाने जो शक़ का बीज कौशिकी के दिमाग में पड़ गया था, वो गहराई में अपनी जगह बनाता जा रहा था।

कौशिकी को याद आया कि जब से उसने होश संभाला है, उसके पापा हमेशा से सिर्फ वीकेंड पे या छुट्टी वाले दिन ही आते थे। माँ-पापा में बहस या लड़ाई झगड़े तो कभी नहीं हुए पर कमरे दोनों के हमेशा अलग ही रहे। बचपन में जब भी वो ज़िद्द करती के उसको दोनों के पास सोना है तो माँ हमेशा एक नया बहाना बना देतीं,

"पापा को बहुत काम है। रात में काम करेंगे, तभी खेलेंगे दिन में आपके साथ।"

" कल दिन में पापा की एक मीटिंग है, पापा को तैयारी करनी है।"

" पापा को लाइट जला के नींद नहीं आती और अंधेरे में आपको बुरे सपने आते हैं।"

उसका बालमन तब आसानी से मान भी जाता था। जो बात बचपन में थोड़ा सा खटकी थी उसके मन को, आज वही बात उसको बहुत बड़ी और बहुत अजीब लग रही थी। उसका मन तो बहुत था कि माँ के ऑफिस से लौटने पर आज पूछ ही ले पर उसे समझ नहीं आ रहा था कि कैसे पूछे कि उसको जवाब भी मिल जाये और माँ को बुरा भी न लगे।कौशिकी अपने ही खयालों में खोई हुई थी कि तब तक अपराजिता घर आ गयी। उसकी थकान उसके चेहरे पे लिखी हुई थी। रोज़ की तरह कौशिकी ने 2 कप चाय बनाई और अपनी फेवरेट मठरी के साथ बड़े करीने से ट्रे में रख के ले आयी। उसको देखते ही अपराजिता मुस्कुरा उठी। थकान भी उड़न छू हो चुकी थी अबतक। कौशिकी अपना तनाव छुपाने की नाकाम कोशिश कर रही थी। माँ की आँखों से कहाँ कुछ छुपता है।

" क्या बात है ? कुछ उदास लग रही? सब ठीक तो है न ?, अपराजिता ने पूछा तो कौशिकी को लगा कि चोरी पकड़ी गई।

" नहीं, कुछ भी नहीं। समायरा आई थी दोपहर में। उसके घर में रिश्तेदारों के आने को लेकर अंकल-आँटी में झगड़ा हुआ। हमारे यहाँ तो न कोई कभी आता है, न कभी झगड़ा होता है। है न मम्मा ?" आखिरी के डायलॉग ने अपराजिता को झकझोर दिया। उसने सिर्फ एक " हूँ " में पूरी बातचीत निपटा दी। 

" फालतू बातों में टाइम वेस्ट न करो। पढ़ाई पे ध्यान दो। " यह बोल के वो उठ के चली गयी। 

ऐसा नहीं था कि इस तरीके की बात आज पहली बार हुई है। जब भी कौशिकी ने कुछ पूछने की या जानने की कोशिश की, अपराजिता का रवैय्या हमेशा उदासीन ही रहता था। यही वजह थी कि सब कुछ जो परफेक्ट दिख रहा था, वो अजीब तो था। कौशिकी को सिर्फ वजह जाननी थी।

अपराजिता बहुत परेशान हो चुकी थी कौशिकी के सवालों से। उसकी गलती नहीं थी पर जवाब न दे पाने की खीझ भी कहाँ कम होती है। वो ये सब सोच ही रही थी कि विशाल का फ़ोन आ गया। अपराजिता ने शाम की घटना सुना दी विशाल को।

" अप्पू, मेरी बात ध्यान से सुनो। मैं तुमसे हमेशा कहता था कि कुश को बड़ा हो जाने दो, एक बार समझ आ जायेगी तो सही गलत का फैसला वो खुद कर लेगी। तुम चिंता न करो, मैं कल आ के उस से बात करता हूँ।", विशाल के आश्वासन से अपराजिता को कुछ हिम्मत तो मिली पर सब जानने के बाद उसकी कुश कैसे रियेक्ट करेगी, इसका डर भी कम न था उसको। आखिर कुश के अलावा है ही कौन उसका।

बचपन से कौशिकी को शुक्रवार से प्यार था। रात के खाने तक उसके हीरो न. 1, उसके पापा आ जाते थे। अगले दिन शुक्रवार था। कौशिकी हमेशा की तरह बहुत खुश थी। उसकी खुशी तब दुगनी हो गयी, जब विशाल दोपहर तक घर आ गए। उसको लगा कि शायद पापा को मम्मा को सरप्राइज देना होगा। तभी विशाल के पास एक कॉल आयी और विशाल ने सिर्फ इतना बोल के रख दिया," मैं घर पहुंच गया हूँ"। अभी विशाल कपड़े बदल के आये कि तबतक अपराजिता भी घर आ गयी। कौशिकी की खुशी का ठिकाना नहीं कि सब चाय साथ में पियेंगे।

" आजकी चाय आपने स्पेशल बना दी। ऑफिस से जल्दी आने के लिए आप दोनों को मेरा बड़ा वाला थैंक यू। इसीलिए मैं आपको अपना हीरो मानती हूँ। आप जीनियस हो पापा।" कौशिकी अपने पापा से बहुत लगाव रखती थी। हर बेटी की तरह उसको भी अपने पापा हीरो लगते थे।

" कुश, मैं तुमको दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार करता हूँ, खुद से भी ज़्यादा। जो भी बताने जा रहा हूँ, पता नहीं मुझे बताना चाहिए या नहीं पर अप्पू ने मुझे कल बोला कि तुम हमेशा उस से अपने रिश्तेदारों के बारे में पूछती हो, तो मुझे लगा कि हम तीनों को बैठ कर एक बार बात कर लेनी चाहिए। उसके बाद तुम जो भी फैसला लोगी, हम दोनों को मंज़ूर है।" कहते कहते विशाल की आवाज़ रूंध गयी और आँख नम हो गयी।

कौशिकी सोच में पड़ गयी कि ऐसा क्या है जो पापा ने इस तरह बोला।

" बेटा, दरअसल बात ये है कि ये कहानी बहुत पुरानी है, लगभग 25 साल पुरानी। मेरा सबसे प्यारा दोस्त हुआ करता था, समीर। बचपन की दोस्ती थी हमारी। बहुत नाज़ था मुझे अपनी दोस्ती पर। कॉलेज में आने के बाद समीर को अपराजिता से प्यार हो गया। फिर एक दिन कॉलेज की पढ़ाई खत्म हो गयी। सब अपने अपने रास्ते हो गए।"कौशिकी बहुत ध्यान से सुन रही थी।

" अप्पू से मुझे समीर ने ही मिलवाया था। जब अप्पू से मैं पहली बार मिला, मुझे लगा कि कहाँ कैसेनोवा समीर और कहाँ ये सौम्य सी अपराजिता। पहली बार में ही ये बहुत ही सरल सीधी लड़की लगी मुझे। 2-4 मुलाकातें और भी हुईं इससे, सब समीर के साथ। फिर कुछ दिन बाद इसने मुझे मिलने को बुलाया। मैं चला गया। जब मिलने पहुंचा, पता चला कि राखी की डोर से बांध के इसने मुझे अपना भाई बना लिया।"

"भाई !!, पर आप तो मेरे पापा हैं।", कौशिकी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। 

" कहानी अभी तो शुरू हुई है कुश। पूरी सुन तो लो।", अपराजिता की आवाज़ से साफ से उसकी थकान साफ झलक रही थी। आखिर ज़िन्दगी से लड़ते लड़ते इतने साल हो गए। आज जब फैसले की बारी आई, तो डर स्वाभाविक था। खासकर जब आपका सबकुछ दाँव पे लगा हो।

" कुछ दिनों के बाद पता चला कि समीर और अप्पू, दोनों की नौकरी लग गयी। मेरी भी नौकरी लग गयी थी तो मैं भी व्यस्त हो गया। एक दिन अप्पू ने मुझे बताया कि समीर के घरवाले शादी के लिए मान नहीं रहे हैं इसलिए इन दोनों ने मंदिर में शादी का फैसला किया। अप्पू चाहती थी कि इसका कन्यादान मैं करूँ। मैंने भी सोचा कि शायद इसी तरह सब पर दवाव पड़े और इन दोनों का घर बस जाए। मैंने कन्यादान भी कर दिया। दोनों अलग अलग शहर में थे इसलिए साथ रहना अभी सम्भव नहीं था। वीकेंड पर दोनों साथ होते थे।", विशाल बोलते बोलते अचानक रुक गया और अप्पू की तरफ देखने लगा।

" समीर मुझे झूठे दिलासे देता रहा कि वो अपने घरवालों से बात करेगा। शादी के 2 महीने बाद ही तेरे आने की दस्तक हुई तो समीर ने बहुत अजीब तरीके से रियेक्ट किया। उसने तुझे दुनिया में लाने से मना कर दिया पर मैं अपने बच्चे की हत्यारिन नहीं बन सकती थी।", कहते कहते अपराजिता फूट फूट कर रोने लगी।

कौशिकी की भी आंखों से गंगा जमुना बह निकली। उसने पानी का ग्लास बढ़ाया अपनी माँ की तरफ।

" उस दिन इन दोनों में बहुत लड़ाई हुई। समीर उस दिन अप्पू के घर आया था वो इसको घर पर अकेला छोड़ के चला गया। अप्पू ने मुझे कॉल किया और सबकुछ बताया। अगले ही दिन मैं इसके पास पहुंच गया। मैंने समीर के घरवालों को सबकुछ बताया पर कोई भी अप्पू को और तुमको अपनाने को तैयार न था। सबने अप्पू के चरित्र पर कीचड़ उछाला। अप्पू के घरवाले भी कुछ पीछे न थे। वहाँ से भी अप्पू को अपमान ही मिला। अप्पू अचानक से एकदम बेसहारा हो गयी थी। इसके पास कोई रास्ता नहीं बचा था। ज़िन्दगी भी खत्म नहीं कर सकती थी क्योंकि तुम्हारी ज़िम्मेदारी भी थी। फिर आखिर में मैंने इसका साथ देने का फैसला लिया। हमने तय किया कि जो भी बच्चा होगा, उसको मैं अपना नाम दूँगा और आजतक मैं अपनी बात पर कायम हूँ। चूँकि अप्पू को मैं दिल से बहन मान चुका था, इसलिए हमने उस रिश्ते को भी पूरी ईमानदारी से निभाया।", विशाल ने एक लंबी सांस लेते हुए बताया।

" बेटा, हमने आजतक ये सब सिर्फ इसलिए नहीं बताया कि एक बार तू बड़ी हो जाय, सही गलत का फ़ैसला ले सके, तभी हम बताना चाह रहे थे। छुपाने के इरादा बिल्कुल नही था।", अपराजिता ने कौशिकी की तरफ बड़ी उम्मीद से देखते हुए कहा।

" आपने अपनी सारी जिंदगी ऐसे ही बिता दी। आपने शादी नहीं की ?", कौशिकी ने विशाल आए पूछा।

" बेटा, मैं जिस से शादी करना चाहता था वो मुझे एक एक्सीडेंट में छोड़ के चली गयी। मैंने अपनी जिंदगी मधु की यादों के सहारे बिता दी, और फिर तुम भी तो थीं। तुम्हारे आगे मुझे कभी कुछ चाहिए ही नहीं था।", विशाल ने कौशिकी की तरफ बड़े प्यार से देखते हुए कहा।

" समीर ने कभी मम्मा को कांटेक्ट नहीं किया ?"

" तमीज़ से बोलो कुश, पापा है वो तुम्हारे।",अपराजिता ने डांटते हुए कहा।

" सॉरी मम्मा, मेरे पापा सिर्फ ये हैं।", विशाल के गले मे बाहें डालते हुए उसने कहा।

" पर , आपने ये सब क्यूँ किया पापा?"

" मैं चाहता था कि जो भी बच्चा आ रहा है इस दुनिया में, उसका रिश्तों पर से भरोसा न उठे। मैं अप्पू का भाई था, उसको अकेला छोड़ के कैसे जाता? और अगर मैं चला जाता तो इतनी प्यारी बिटिया कैसे मिलती?", विशाल ने मुस्कुराते हुए कौशिकी से पूछा।

" समीर और अप्पू की शादी दुर्गा देवी के मंदिर में हुई थी, इसीलिए तुम्हारे जन्म के बाद हमने तुम्हारा नाम कौशिकी रखा। तुम दुर्गा देवी की तरह अप्पू को हमेशा बल देती रही। तुम ही उसकी असली ताकत हो बेटा।"

आज कौशिकी को अपने सारे सवालों का जवाब मिल गया था। बचपन में वो माँ-पापा के बीच में भले ही नहीं सोयी, भले ही उसके पास रिश्तेदारों की फौज नहीं थी, पर ये 2 रिश्ते ही उसकी सबसे बड़ी दौलत थे। सच यही था कि एक आदमी ने राखी का मान रख लिया और एक ने सिंदूर को लजा दिया। 

पूरी कहानी सुनने के बाद वो कुछ समझ ही नहीं पा रही थी कि क्या बोले, कैसे बोले! तभी विशाल और अपराजिता ने उसे गले से लगा लिया। 

कौशिकी अपनी इस नन्ही सी दुनिया में खुश थी। जो आज तक उसको अजीब लगता रहा, आज वही सब कुछ उसको बहुत पवित्र और पूजनीय लगने लगा। उसको अपना फैसला सुनाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। उसके चेहरे पे उसकी मंशा साफ झलक रही थी। उसके पापा आज सच में उसके हीरो न. 1 साबित हो चुके थे। 

सारी जिंदगी पूरी दुनिया और परिस्थितियों से हारने वाली अपराजिता को आज उसकी बेटी ने हमेशा की लिए जिता के सही मायनों में अपराजिता बना दिया था।



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