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Sulakshana Mishra

Drama


4.5  

Sulakshana Mishra

Drama


एक लड़की, भीगी भागी सी...

एक लड़की, भीगी भागी सी...

7 mins 238 7 mins 238

संग्राम सिंह जब अपनी धर्मपत्नी मनीषा के साथ पहली बार खैरागढ़ आए, तो मनीषा को उस कजोते से गाँव से प्यार हो गया। ये प्यार भी बिल्कुल वैसा ही था, जैसा उसे पहली बार संग्राम सिंह को देख के कभी हुआ था। तब के संग्राम सिंह और मनीषा में बस इतना फर्क है कि कल का संग्राम सिंह आज कर्नल संग्राम सिंह है और कल की मनीषा, आज की मिसेज संग्राम सिंह है। मनीषा को प्रकृति से बेहिसाब प्यार था। पेड़ों के झुरमुट, उनमें से छन छन के आती पंछियों की आवाज़ें, सब उसको बहुत भाती थीं। उसने उस जगह को देख कर सिर्फ इतना कहा," मेरा वश चले तो यहीं बस जाऊँ।" 

" मनी, मैं इसी इरादे से तुमको ले कर आया था कि अगर ये जगह तुमको पसंद आई, तो हम इसे खरीद लेंगे।"

"सच !", इससे ज़्यादा कुछ बोल ही नहीं पायी थी उस वक्त।

इस बात को 25 साल हो गए थे। इन 25 सालों में वो दोनों 10-15 दिन की छुट्टियां ले कर खैरागढ़ ज़रूर आते थे। खैरागढ़, कोटद्वार और ऋषिकेश के बीच मे बसा एक बेहद खूबसूरत गाँव था। वो लोग जब भी आते, हरिद्वार की गंगा आरती देखते और फिर चोटीवाला के यहाँ का खाना खा कर खैरागढ़ लौटते। ऋषिकेश, लक्ष्मण झूला, नीलकंठ भी घूम आते। एक दिन उनका लैंसडाउन में बीतता था। कोटद्वार के सिद्धबली के दर्शन वो आते और जाते, दोनों बार करते थे। इस क्रम में बस एक ही बदलाव आया कि कुछ दिनों के बाद वो अकेले नहीं आते थे, उनका बेटा आदित्य भी आने लगा था। अपने माँ-बाप की ही तरह, उसको भी पहाड़ों से और प्रकृति से प्यार था। खैरागढ़ जाने का सोच के ही वो खुशी से उछल जाता था।

इस साल तीनों ने होली, खैरागढ़ में मनाने का कार्यक्रम बनाया। मनीषा को दिल्ली से आना था, उसकी पोस्टिंग दिल्ली में थी। आदित्य तो देहरादून में ट्रेनिंग कर रहा था, उसके लिए कोई खास मुश्किल नही थी। समस्या सिर्फ संग्राम सिंह की थी क्योंकि उनको जामनगर, गुजरात से आना था। संग्राम सिंह और मनीषा, दिल्ली से साथ में पहुंच गए । आदित्य सबसे पहले पहुंच गया। 

वक़्त जैसे जैसे बीतता है, वैसे वैसे ही इंसान की समस्याएं भी बदलती हैं। जब बच्चे छोटे होते हैं , तो उनके पढ़ाई लिखाई से अक्सर माँ-बाप संतुष्ट नहीं होते। वही बच्चे जब आपके सपनों को साकार कर के एक अच्छी नौकरी पा जाते हैं तो माँ-बाप की चिंता की सुई उनकी शादी पे अटक जाती है। यही कहानी मनीषा के साथ थी। उसको बस जल्द से जल्द, आदित्य की शादी करनी थी, पर आदित्य को कोई लड़की समझ ही नहीं आती थी। ऐसा भी नहीं था कि उसको कोई खास लड़की पसंद हो। ये अलग बात थी कि वो ज़रूर लड़कियों के सपनों में छाया रहता था। लड़कियां सिर्फ उसके सुदर्शन व्यक्तित्व पर नहीं लट्टू थीं, उसकी खूबियों की फेहरिस्त भी बड़ी लंबी थी। कुछ मनीषा की परवरिश, कुछ आर्मी का परिवेश, औरतों की इज़्ज़त करना उसकी आदत में शुमार हो गया था। उसका अक्सर कुछ न कहना, बस मुस्कुरा देना, लड़कियों को दीवाना बना देता था। 

मनीषा तो हर तरह से उससे पूछ के हार सी गयी थी पर ये पता न कर पाई के उसको कैसी लड़की से शादी करनी थी। इस बार वो तय कर के आयी थी कि जो भी 8-10 रिश्ते उसके पास थे, उनमें से ही किसी को पसंद करवा के शादी का निर्णय करवा ही लेगी। बड़ी उम्मीदों के साथ उसने सारी लड़कियों के फोटो और बॉयोडाटा करीने से फ़ाइल में लगा लिए थे उसने।

अक्सर हमारी इच्छा कुछ और होती है , और ईश्वर की कुछ और। होली की छुट्टियां खत्म होने को थीं कि समूचे विश्व पे कोरोना का आतंक आ गया था। लॉक डाउन की वजह से उनलोगों को खैरागढ़ ही रुकना पड़ा। मुश्किल घड़ी ज़रूर रही पर मन ही मन सब खुश थे कि तीनों साथ में थे। सच में, इंसान की फितरत का कोई भरोसा नहीं के कब खुश हो जाये और कब दुःखी। वक़्त अपनी रफ़्तार से बीत रहा था। किसी को पता ही न चला और जून के महीना, मानसून ले के आ गया। 

बारिश की बूंदों ने पूरी कायनात को एक नया धुला धुला सा स्वरूप दे दिया था। शाम में चाय पकौड़ियों के दौर लगभग रोज़ ही लग रहे थे। मौसम की खुमारी चारों तरफ फैल गयी थी। ईश्वर ने शायद पहाड़ इसीलिए बनाये थे कि उन पहाड़ों में जा के इंसान खुद को भूल जाये।

वो शाम भी एक जानी पहचानी शाम थी पर आज के बादलों का रंग कुछ ज़्यादा ही स्याह था। बूँदें भी रोज़ से बड़ी थीं और देखते ही देखते वो फुहारों वाली बारिश कब मूसलाधार बारिश में बदल गयी, पता ही न चला। मनीषा और संग्राम सिंह, बंगले के पीछे की तरफ वाले लॉन के सामने कुर्सियां डाल के बैठे थे। उस जगह पे कभी कभी हवा का झोंका कुछ हिस्सा बारिश का भी ले आता। ये बारिश तन मन, दोनों ही भिगो रही थी। तभी गेट पे किसी की आहट हुई। आदित्य सोफे पे लेटा, अपनी मस्ती में एक किताब पढ़ रहा था। इस आहट से वो उठा और गेट की तरफ बढ़ा।

" कौन है वहां पर ?", उसने एक सख्त आवाज़ में पूछा।

" जी, मैं, वो....", ये एक लड़की की आवाज़ थी। शायद पहाड़ की ठंडक की अभ्यस्त नहीं थी, इसलिए काँप रही थी। उसकी ज़ुबान उसकी आवाज़ का साथ नही दे रही थी।

" जो भी हो, अंदर आ के बात करो।" , इतना बोल के वो बंगले के अंदर आने लगा। लड़की उसके पीछे पीछे आने लगी। ड्रॉइंग रूम के बाहर वो रुक के बोली, " मैं यहीं रुक जाती हूँ, नहीं अंदर सब गीला हो जाएगा।"

उसकी आवाज सुनकर आदित्य ने पलट के देख तो देखता ही रह गया। वो लड़की एक बेहद खूबसूरत थी। उसकी बोलती सी आँखों में उसको शायद वो दिख गया, जो इतने समय से वो ढूँढ रहा था। बिना किसी मेकअप के वो लड़की किसी पुरानी फिल्मों की हिरोइन लग रही थी। एक छोटी सी बिंदी और आँखों मे पड़ी काजल की डोरी ने उसकी ज़ुबान को ताला लगा दिया था। वो बस अपलक उसको निहारे जा रहा था। 

" आदि ! कौन है?", मनीषा ने लगातार दुबारा आवाज़ लगाई पर जवाब न मिलने पे उठ कर खुद देखने गयी। आदित्य अभी भी उसको निहार रहा था और वो लड़की अपने गीले बालों को झटक झटक के पानी निकाल रही थी। आदित्य को देखते ही मनीषा के होठों पे मुस्कुराहट तैर गयी। उसको अपना सपना सच होता नजर आ रहा था।

" कौन हो तुम ,बेटा? इतनी रात गए, इस सुनसान जगह पर कैसे आना हुआ ?"

" जी, मेरा नाम वैदेही है। मैं देहरादून जा रही थी। बादलों की वजह से मोबाइल के नेविगेशन ने काम करना बंद कर दिया और मैं रास्ता भटक गई। मैं, मेडिकल स्टूडेंट हूँ, इसलिए मेरे पास " इमरजेंसी पास" था। मेरी कर, आपके बंगले से दस कदम की दूरी पर बन्द हो गयी। आपके बंगले पे नज़र पड़ी, तो सोचा मदद माँग लूँ।", एक सांस में बोल गयी।

" बारिश बहुत तेज़ है। आज रात तुम यहीं रुक जाओ। कल सुबह निकल जाना। हमलोग डिनर करने जा रहे थे, तुम भी खाना खा लो, भूखी होगी।", मनीषा ने उसकी औरआदि, दोनों पर निगाह डालते हुए बोला।

थोड़े संकोच के बाद वो मान गयी। थोड़ी ही देर में, वैदेही खुद को सहज महसूस करने लगी। मनीषा को ऐसा लगा मानों माँ-बेटे, दोनों को एकसाथ इस लड़की से प्यार हो गया हो। अपने खयाल पर उसको खुद हँसी आ गयी।

" जिस तरह से तुमने हमारे घर में एंट्री मारी है, तुम्हारा नाम वैदेही नहीं, रेनू होना चाहिए था। मधुबाला का यही नाम था, चलती का नाम गाड़ी में।", मनीषा के ये कहते ही सब मुस्कुरा उठे। हिंदी फिल्में, असल जिंदगी से प्रभावित होती हैं या असल जिंदगी फिल्मों से, कई बार ये कह पाना बड़ा मुश्किल होता है।

बारिश सिर्फ बूँदों से नहीं भिगोती, अक्सर किसी खास से मिला के हमारा अंतर्मन तक भिगो देती है। वैदेही , बारिश में भीगी पर दिल का एक कोना बारिश में भीगा था आदित्य का। जिस अक्स को वो लफ़्ज़ों में कभी बयाँ न कर पाया, इस बारिश ने उसे, सबके सामने ला खड़ा किया था। वैदेही, जिसे बचपन से आर्मी वाले हीरो से प्यार था, उसने कभी सोचा न था कि ऐसे बारिश में भीगते भागते, वो अपने सपनों वाले हीरो से यूँ टकरा जाएगी।

एक लड़की, भीगी भागी सी....अब शायद भाग के वापस हमेशा के लिए, यहीं आ जायेगी।



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