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Anshu Shri Saxena

Drama


1.0  

Anshu Shri Saxena

Drama


नई भोर

नई भोर

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आज दफ़्तर में काम बहुत था । रेवा जल्द से जल्द काम निपटा रही थी क्योंकि उसे बंटी को लेकर दशहरे का मेला दिखाने भी जाना था । तभी चपरासी ने आकर कहा “ मैडम, बहुत देर से एक साहब आपसे मिलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं....उन्हें अंदर भेज दूँ ? “

“ भेज दो “ कह कर रेवा फिर फ़ाइलों में व्यस्त हो गई । 

“ क्या मैं अंदर आ सकता हूँ ?” आवाज़ सुन कर रेवा चौंक पड़ी । वह सोचने लगी...ओह यह तो निखिल की आवाज़ लगती है....इतने सालों बाद यहाँ क्यों और कैसे आया है ? 

“ हाँ आइये, “ अपने दिल की तेज़ होती धड़कनों को क़ाबू करते हुए रेवा ने कहा । 

पर्दा खुला और आशा के अनुरूप ही निखिल दरवाज़े से भीतर आया । जैसे ही उसकी नज़र रेवा पर पड़ी वह चौंक पड़ा और हकलाते हुए बोला “ रेवा तुम ? मेरा मतलब है मैडम रेवा चौधरी....नगर आयुक्त ? “

“ हाँ , मैं ही हूँ, कहिये किस काम से आना हुआ ?” रेवा ने अपने भीतर उमड़ रहे तूफ़ान को संयत करते हुए शांत स्वर में पूछा । 

“ मैं अपनी ज़मीन पर एक अस्पताल बनवाना चाहता हूँ, उसकी फ़ाइल आपके यहाँ जमा है...यदि अनुमति मिल जाती तो आपकी बड़ी कृपा होती मैडम, “ निखिल ने ‘मैडम’ शब्द पर ख़ासा ज़ोर दिया । 


“ अभी मैं जल्दी में हूँ, पहले सारे काग़ज़ात देख लूँ, जैसा होगा आपको मेरा स्टाफ़ सूचित करेगा, “ कह कर रेवा अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुई ।निखिल उठ कर बाहर चला गया ।

रेवा ड्राइवर को घर चलने को कह गाड़ी में बैठ गई । बैठते ही स्मृतियों ने उसे आ घेरा और वह यादों की गलियों में भटकने लगी ।

कॉलेज मे क़दम रखते ही उसका सामना निखिल से हुआ था । सुंदर सजीला निखिल शहर के एक नामी वकील का बेटा था । कॉलेज की हर लड़की निखिल की दीवानी थी , और कक्षा में लड़कियों के बातचीत का टॉपिक भी निखिल ही हुआ करता था । रेवा के माता पिता शिक्षण से जुड़े थे और वह मध्यमवर्गीय परिवार से थी । गोरा रंग, लम्बे बाल और तीखे नैन नक़्श रेवा को खूबसूरत बनाते थे । वह पढ़ने में भी काफ़ी अच्छी थी इसलिये लड़कियों के बीच निखिल के प्रति दीवानगी देख , वह हँस कर रह जाया करती थी । उसे निखिल जैसे लफ़ंगे लड़के बिलकुल भी पसन्द न थे । 


कॉलेज आरम्भ हुए लगभग पाँच महीने बीतने को थे कि एक दिन कॉलेज के सभी विद्यार्थी शहर से थोड़ी दूर स्थित जलप्रपात पर पिकनिक के लिये गये । वहाँ दोस्तों की फ़रमाइश पर निखिल ने कई गीत सुनाये । रेवा ने महसूस किया कि निखिल गीत गाते समय बार-बार उसी की ओर देख रहा है । न जाने क्यों रेवा को भी निखिल का उसे देखना अच्छा लगा । धीरे- धीरे रेवा निखिल की ओर खिंचने लगी । शायद उसे इस बात का गर्व होने लगा कि जिस निखिल का पूरा कॉलेज दीवाना है, वही निखिल उसे चाहने लगा है । अब निखिल और रेवा के प्रेम के बारे में सभी को पता था और कॉलेज की लड़कियाँ रेवा की क़िस्मत से ईर्ष्या करने लगी थीं ।


फ़ाइनल इयर ख़त्म होने को था । परीक्षाओं से पहले एक दिन निखिल रेवा को ज़िद करके अपने घर ले गया । उस समय निखिल के घरवाले किसी विवाह में शामिल होने के लिये बाहर गये हुए थे । निखिल ने मौक़े का फ़ायदा उठाना चाहा था, परन्तु रेवा किसी तरह वहाँ से बच कर आ पायी थी । 

उसे वापस घर पहुँच कर निखिल से और स्वयं अपने आप से नफ़रत होने लगी । रेवा सोचने लगी “ आज तो अनर्थ ही हो जाता, ग़लती मेरी ही है, मैं ही निखिल की बातों और प्यार के झूठे खेल मे आ गई...मैंने क्या सोचा था और वह कैसा निकला ? “


फ़ाइनल की परीक्षा देकर रेवा दूसरे शहर चली गई और सिविल सर्विसेज़ की परीक्षा की तैयारी में जी जान से जुट गई । अथक परिश्रम और प्रबल इच्छाशक्ति से रेवा ने सिविल सर्विसेज़ की परीक्षा उत्तीर्ण भी कर ली । उस दिन के बाद रेवा ने निखिल से अपने सारे सम्बन्ध तोड़ लिये, हालाँकि निखिल ने रेवा की सहेलियों के माध्यम से एक दो बार सम्पर्क करने का प्रयास भी किया, परन्तु रेवा का तो जैसे प्यार से विश्वास ही उठ गया था ।आज इतने सालों बाद भी रेवा ने विवाह नहीं किया है ।


एकाएक गाड़ी रुकने के साथ ही रेवा की तन्द्रा टूटी । माँ ने दरवाजा़ खोला तो वे रेवा का चेहरा पढ़ कर बोलीं “ क्या बात है ? तू इतना परेशान क्यों दिख रही है ? 

“ कुछ नहीं माँ, ऑफ़िस में ज़्यादा काम था, बंटी कहाँ है ? उसको आज मेला घुमाने का प्रॉमिस किया था मैंने “ रेवा माँ से पूछ बैठी । 

“ बंटी तो बहुत देर से सज सँवर कर बैठी है तेरे इंतज़ार में....कुछ नहीं तो दस बार पूछ चुकी है कि मम्मा कब आयेंगी ? बेटा तू कब तक विवाह नहीं करेगी ? ठीक है, तूने बंटी को अनाथाश्रम से गोद लिया है, परन्तु उसे भी तो पिता का प्यार चाहिये...और क्या तू नहीं चाहती कि तेरे अपने भी बच्चे हों ? फिर लोग भी कैसी कैसी बातें करते हैं कि तू कुँआरी होकर एक बच्ची की माँ बन गई है “ माँ ने हमेशा की तरह रेवा को समझाने की चेष्टा की । 


तब तक चार साल छोटी सी प्यारी सी गोल मटोल बंटी वहाँ आ गई और रेवा के गले में बाँहें डाल दीं “ मम्मा, मैं कब से आपका वेट कर रही थी....मेला देखने चलो न

रात को थक कर बिस्तर पर लेटी रेवा की आँखों से नींद कोसों दूर थी । रह रह कर निखिल का चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम रहा था । निखिल उसका पहला और आख़िरी प्यार था । रेवा सोचने लगी “ पता नहीं, निखिल ने विवाह किया होगा या नहीं ? क्या पता, वह भी अभी तक मुझे न भूल पाया हो, “ परन्तु अगले ही क्षण उसका दिमाग उसकी भावनाओं पर हावी हो गया “ यह कैसी मूर्खतापूर्ण बातें सोच रही हूँ मैं ? निखिल का विवाह हुआ हो या नहीं, उससे मुझे क्या फ़र्क़ पड़ता है ? निखिल ने अपनी दौलत के नशे में चूर होकर मेरे प्यार का अपमान किया...वह मुझे एक बेजान गुड़िया समझ मेरी भावनाओं से खेलता रहा...यह तो अच्छा हुआ कि सही समय पर मेरी आँखें खुल गईं और मैं उसके चंगुल से बच निकली....क्या विवाह करना ही किसी नारी के जीवन का मक़सद होना चाहिये ? क्या पुरुष के बिना नारी संपूर्ण नहीं ? आज मैं सशक्त हूँ, तो मुझे दूसरी बच्चियों और महिलाओं को संबल प्रदान करना चाहिये....आख़िर मैंने सिविल सेवा भी इसीलिये चुनी थी कि मैं समाज के उत्थान में अपना योगदान दे सकूँ....मुझे बंटी को पढ़ा लिखा कर अच्छा नागरिक बनाना है...और बंटी जैसी अन्य दूसरी बच्चियों का भी जीवन सँवारना है “ 


अब रेवा के दिमाग़ की उछल पुथल शांत हो चुकी थी और वह सोच रही थी कि कल ही वह निखिल की फ़ाइल पर उचित कार्यवाही कर अपने स्टाफ़ से निखिल को ख़बर भिजवा देगी, जिससे निखिल को फ़ाइल के बहाने उसके ऑफिस में बार-बार आने का अवसर न मिले । रेवा के जीवन से भी रात के काले अँधेरे विदा ले रहे थे और एक नई भोर का आगमन हो रहा था । 



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