कलम ज़ादे

Drama


3.8  

कलम ज़ादे

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चोर की चिट्ठी

चोर की चिट्ठी

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अल-सुबह फजिर की अज़ान के साथ ही अलका जाग उठती थी और उसकी रोज़ाना की दिनचर्या भी शुरू हो जाती थी। लेकिन आज अज़ान की आवाज़ के बाद भी वह बिस्तर से उठी नहीं। नींद तो खुल गई थी परंतु बिस्तर से उठने की हिम्मत नहीं हुई। थोड़ी देर लेटे-लेटे सीलिंग को निहारती रही फिर जब बेचैनी होने लगी तो बेमन से बिस्तर से उठ गई। स्टोव पर चाय का पानी रखने के बाद बोझिल कदमों से अखबार लेने के लिए मेनगेट की तरफ चल दी। फर्श पर पड़ा अखबार उठाते ही वह चौंक गई। पास ही एक सफेद रंग का बन्द लिफाफा पड़ा था। लिफाफे पर लिखा था, सिर्फ अलका दीदी को मिले। आगे-पीछे न कोई नाम न कोई पता। डाकघर की सील भी नहीं थी। इतना तो तय था कि कोई व्यक्ति खुद यहां लिफाफा डालकर गया है। लेकिन, कौनऔर क्यों? इसी उधेड़बुन में जिज्ञासा हुई और तुरंत लिफाफा खोलकर देखा तो एक चिट्ठी रखी मिली। चिट्ठी हाथ में लेकर कुछ पल सोचती रही कि पढूं या फेंक दूं। न जाने किसने लिखी है और इस तरह रहस्यमय तरीके से चिट्ठी भेजने का मतलब क्या। बिना पढ़े फेंक दी तो हजारों सवाल ज़ेहन में कोलाहल मचाते रहेंगे। एक झटके में उसने चिट्ठी खोलकर पढऩा शुरू कर दी !

प्यारी दीदी, नमस्कार।

मैं ही वो बदनसीब चोर हूं जिसने तीन दिन पहले आपके घर में सेंधमारी कर लाखों रुपए की नगदी और सोने-चांदी के आभूषणों पर हाथ साफ किया है !

अलका को काटो तो खून नहीं ! पहली लाइन पढ़ते ही अलका का चेहरा गुस्से से तमतमा गया। पिछले तीन दिनों के दौरान हुआ घटनाक्रम तेज़ी से आंखों के सामने घूमने लगा।

मैं जानता हूँ मेरा यह इकबाल-ए-जुर्म आपके गुस्से को सातवें आसमान पर ले जाएगा और थोड़ी हैरानी भी होगी के एक चोर आपको चिट्ठी लिखने की हिम्मत कर रहा है। आपका गुस्सा होना बेहद लाज़मी भी है। आपकी जीवन भर की जमापूंजी चुराकर मैंने आपके और आपके परिवार के हर सदस्य के सपनों का हरण किया है। कल यानी घटना के अगले दिन आपके घर में हुई चोरी की खबर अखबार में पढ़ी तो बड़ी शर्मिन्दगी महसूस हुई। अफसोस भी बहुत हुआ। मेरी इस करतूत से आपकी शादी निरस्त हो गई जो अगले महीने होना तय थी। ऐसा लगा मानो, जिस बहन की शादी का सपना में बरसों से देख रहा था, आज उसी बहन का नया संसार बसने से पहले खुद अपने ही हाथों से उजाड़ दिया। जी हां, अलका दीदी ! मेरी एक बड़ी बहन है, दिशा ! परिवार में हम तीन लोग हैं। मां, दिशा और मैं। अपना दुखड़ा सुनाने से पहले मैं कुछ कह देना चाहता हूं। दरअसल, मैं वैसा चोर नहीं हूं, जैसा आपने सोचा है। अपने ऐशो-आराम या मेहनत से बचने के लिए मैंने ऐसा शर्मनाक और गैर-कानूनी कृत्य नहीं किया है। हां दीदी, मैं स्नातक हूं और फिलहाल बेरोजगार हूं। पिता का देहांत मेरे बचपन में ही हो गया था।

मां ने सिलाई-कढ़ाई और घरों में काम कर हम दोनों भाई-बहन का लालन-पालन किया और मां के बलिदान व जुनून की बदौलत ही हम दोनों स्नाातक तक पढ़ाई कर सके। फिलहाल किसी छोटी-मोटी नौकरी की तलाश में हैं लेकिन काफी चप्पलें घिसने के बाद भी नौकरी से महरूम हैं। बड़ी बहन की उम्र शादी के लायक हो चुकी है। उसकी आंखों में शादी को लेकर सजने वाले सपने मुझे साफ नजर आते हैं, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति के चलते वह खामोशी धारण किए हुए है। मैंने और मां ने बहुत प्रयास किए कि किसी तरह यहां-वहां से पैसा उधार लेकर दिशा की शादी कर दें, लेकिन हर जगह दहेज और शादी कार्यक्रम के अच्छे इंतजाम की डिमांड हमें मजबूर करती रही। और फिर हम जैसों की मदद भी करता कौन है ! बेटी की शादी न होने से मां भी दुखी रहने लगी है। मां का दुख और बहन की घुटन मुझसे बर्दाश्त नहीं हुई। इसी जद्दोजहद और पसोपेश के चलते मैंने चोरी जैसे घृणित अपराध को अंजाम देने का दुस्साहस कर डाला।

करीब दस दिन अलग-अलग घरों की रैकी करने के बाद आपके सूने घर में चोरी करने का मौका मिला और आपके घर से लाखों का सामान चुरा लाया। मैं खुश था कि अब धूमधाम से दिशा का विवाह कर सकूंगा, उसके सपनें पूरे हो जाएंगे। साफ है कि चोरी की बात मैंने न तो मां को बताई और न ही बहन से जिक्र किया। हां, इतना भर जरूर कह दिया कि अब घबराने की जरूरत नहीं। अच्छा लड़का देखना शुरू कर दो। शादी के लिए रुपए व आभूषण का इंतजाम मैं किसी तरह कर दूंगा! मां व बहन दोनों ही बहुत खुश हुए। इतने खुश हुए कि उन्होंने यह भी नहीं पूछा कि बेटा इतने पैसों का इंतजाम कहां से और कैसे करेगा। शादी की बात सुनकर तो दिशा का चेहरा शर्म और खुशी से दमक उठा था। उसकी खुशी देखकर मैं गदगद हो गया। पहली बार अहसास हुआ कि अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य का निर्वहन करना कितना सुखद और मन को आनन्दित करने वाला होता हैं। बहन की शादी कर हम दोनों मां-बेटे मानो चारों धाम की तीर्थ कर लेंगे।

लेकिन, क्या एक बहन की जि़ंदगी उजाड़कर दूसरी बहन की खुशियां खरीदी जा सकती हैं। आपकी आंखों से बहते आंसुओं से मेरी बहन के जीवन में कभी खुशियों की बारिश नहीं हो सकती दीदी। मनुष्य को इतना भी निर्दयी नहीं होना चाहिए कि वो अपनी खुशियों के लिए दूसरों का घर-संसार उजाड़ दे। दिशा के भाग्य में यदि शादी की खुशियां लिखी होंगी, तो वह हर हाल में उसे मिलकर रहेंगी। बड़े-बूढ़े कहते भी हैं कि भगवान ने सबकी जोडिय़ां बनाकर ही नीचे भेजा है। मैंने सोच लिया था कि आपके सारे रुपए और एक-एक आभूषण आपको लौटा दूंगा। कल दिनभर चिंतन-मनन करने के बाद मैंने समान लौटने का यह तरीका अपनाया है, ताकि आपसे क्षमा याचना भी कर सकूं। हो सके तो मुझे माफ कर देना, दीदी ! मैंने आपका सारा सामान एक थैले में रखकर आपके घर के मेनगेट से टिका कर रख दिया है! जब तक आप समान नहीं उठाएंगी, मेरी नज़र उस पर जमी रहेगी, ताकि कोई और समान न चुरा ले।

एक साथ कई तरह के भाव अलका के चेहरे पर आकर धमाचौकड़ी करने लगे। चिट्ठी हाथ में दबाए वह बहुत तेज़ी से दरवाज़े की और दौड़ी। एक झटके से दरवाज़ा खोला। थैला वहां रखा था। जल्दी से थैला उठाकर वो अंदर ले आई। एकदम से बिस्तर पर पलट दिया। नोटों की सभी गड्डियां और एक-एक ज़ेवर सही-सलामत। उसकी आंखों से आंसू और होठों पर मुस्कुराहट थिरक उठी। अलका ने सारे पैसे और ज़ेवर अपने दोनों हाथों में समेटकर चेहरे से लगा लिए। फिर, अचानक उसे चिट्ठी का ख्याल आया! और एक बार फिर अचानक वह दरवाज़े की और दौड़ पड़ी। दरवाज़ा खोलकर उसने चारों तरफ नज़रें फिराकर देखा। सूनी सड़क पर कोई भी नहीं दिखा! चिट्ठी अभी पूर्ण नहीं हुई थी। आगे लिखा था

एक गुुजारिश है दीदी, इंसानियत व कानून दोनों ही नज़रों से मैंने ऐसे अपराध को अंजाम दिया है और उसकी सजा भी कानून में तय है। एक न एक दिन कानून के लंबे हाथ मुझ तक पहुंच ही जाएंगे। मेरे जेल जाने के बाद मां और दिशा की जिंदगी बर्बाद हो जाने का पूरा अंदेशा है। अत: मैं चाहता हूं कि पुलिस में दर्ज चोरी का मुकदमा आप वापस ले लें ताकि मैं पूरी तरह से बेफिक्र होकर अपनी मां व बहन की सेवा कर सकूं, उनका सहारा बंन सकूं। नमस्कार!

अलका ने फौरन अपनी मां व अन्य परिजनों को जगाकर सारा किस्सा सुनाया। उनके सामने जेवर व रुपए रख दिए। मां का तो खुशी के मारे रो-रोकर बुरा हाल हो गया। सभी ने भगवान का लाख-लाख शुक्र अदा किया और ईमानदार चोर की इंसानियत पर। अलका ने मशरूका वापस मिलने की जानकारी पुलिस को देकर अपनी एफआईआर भी वापस ले ली।


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