Dhan Pati Singh Kushwaha

Drama


5.0  

Dhan Pati Singh Kushwaha

Drama


सच्ची दौलत

सच्ची दौलत

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"क्या हुआ आंटी, लगता है आप की तबीयत ठीक नहीं है ?"-मेरी बेटी स्नेहा ने साथ वाले घर की मिसेज चौधरी को गिरने से बचाने के लिए पकड़ते हुए कहा।वे अस्वस्थ सी लग रहीं थीं और शायद सिर चकराने के कारण असंतुलित होकर गिरने वाली थीं।

मिसेज चौधरी कुछ बोलती इससे पहले ही बेटी फिर बोली-"आंटी, आपको तो तेज बुखार हैं।चौधरी अंकल कहां हैं ? चलिए हम आपको अस्पताल ले जाकर डॉक्टर को दिखाते हैं। "

मिसेज चौधरी कुछ बोल ना सकीं। उन्होंने अपने घर की ओर इशारा किया। इतने में ही चौधरी जी घर से तेजी से दौड़ते हुए आए। उन्होंने घबराई हुई मुद्रा में पूछा -"क्या हुआ ? मैं मैं तो तुम्हें इस चबूतरे पर बैठा कर गाड़ी निकालने गया था।"

स्नेहा बोली-"अंकल, आंटी को तेज बुखार है इसी वजह से इन्हें चक्कर आ गया और यह गिरने ही वाली थी कि मैंने इन्हें पकड़ लिया। इन्हें तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए। मैं पापा को बुलाती हूं। हम अभी डॉक्टर के पास चलते हैं।"

स्नेहा ने मुझे बुलाकर स्थिति से अवगत कराया।

मैंने गाड़ी निकाली। चौधरी साहब, और स्नेहा मिसेज चौधरी को बीच में बैठाकर सहारा देते हुए पीछे वाली सीट पर बैठे।हम चारों गाड़ी से अस्पताल के आपातकालीन विभाग में पहुंचे।

डॉक्टर ने मिसेज चौधरी का चेकअप किया और उनके उपचार की प्रक्रिया में उनको कुछ इंजेक्शन देकर इंट्रावेनस ग्लूकोज देने के लिए बोतल चढ़ाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। डॉक्टर के अनुसार मैसेज चौधरी को डिहाइड्रेशन हो गया था इसलिए रिहाइड्रेट करने के लिए उन्हें ग्लूकोज देना अनिवार्य था।

डॉक्टर ने जो भी दवाएं लिखी थी मैं उन्हें तुरंत मेडिकल स्टोर से लेकर के आ गया था। स्नेहा मिसेज चौधरी के बेड के पास स्टूल पर बैठ गई। स्टाफ नर्स ने इशारे से मरीज के पास सिर्फ एक व्यक्ति को छोड़कर बाकी लोगों को बाहर जाकर बैठने को कहा ताकि वार्ड में भीड़-भाड़ न हो।

चौधरी साहब हमारे पड़ोसी थे। उनको और उनकी पत्नी को अपनी अमीरी पर बड़ा गर्व था वे दूसरों से बातचीत करने में अपना अपमान समझते थे। उनके अनुसार उनके पास सब कुछ है और उन्हें कभी भी किसी की मदद की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी वे पैसा फेंको -तमाशा देखो वाले सिद्धांत को मानने वाले व्यक्ति थे। मिसेज चौधरी भी गली में अपनी चर्चा के दौरान कहती थीं कि इस गली में हमारे पतिदेव की सैलरी के बराबर किसी की भी सैलरी नहीं है। गांव में भी हमारे पास जितनी प्रॉपर्टी है उतनी प्रॉपर्टी हमारी इस गली में किसी के पास नहीं होगी।

हमारे स्टैंडर्ड के हिसाब से यह गली नहीं है हम तो बड़ी वाली गाड़ी लेने को हैं लेकिन यहां गलियां इतनी पतली है कि गाड़ी इन गलियों में कैसे निकलेगी ?

वे तो जब बोलना शुरू करतीं तो ऐसा लगता था कि उन्हें केवल बोलना ही है ज्यादा सोच विचार में भी अपना वक्त बर्बाद नहीं करती थीं। एक बार वे कह रही थीं कि हमारा बेटा एक महीने में तीन हजार रुपए से ज्यादा के तो कोल्ड ड्रिंक ही पी जाता है।

तब स्नेहा ने उनसे कहा था-"आंटी, दस रुपया प्रति बोतल के हिसाब से तीन हजार की तीन सौ बोतलें हुईं। एक महीने में तीस दिन होते हैं। इस हिसाब से एक दिन में दस बोतलें उसके हिस्से में आती हैं। अब आपका बेटा एक दिन में ये दस बोतलें कैसे पीता है ? चौबीस घंटे में कितने घंटे सोता है ? कितने घंटे जागता है ? दस बोतल रोज खत्म करने के लिए उसने अपना क्या रूटीन तय किया हुआ है ? उसकी सेहत के लिए भी यह नुकसानदायक है जैसा कि बाबा रामदेव तो कहते हैं कि ठंडा मतलब टॉयलेट क्लीनर।

मिसेज चौधरी ने झूठ पकड़े पर भी झेंपना तो सीखा ही नहीं था। ऐसे मौकों पर भी मुस्कुराते हुए अपने घर के अंदर घुस जाती थीं। वैसे वे तो आसपास लोगों से बात करना भी अपनी प्रतिष्ठा के खिलाफ समझती थीं सामान्यतया किसी से बात की तभी करती जब उन्हें शेखी बघारनी होती थी।आसपास के लोग उनकी इस आदत से भलीभांति परिचित थे तभी तो जब वहअपनी हांक रही होती थीं तब उनकी बात को कोई गंभीरता से नहीं सुनता था।

मिस्टर चौधरी उनसे भी चार कदम बढ़ाकर थे। कभी किसी से बात नहीं करते किसी के सुख-दुख उन्हें कुछ लेना-देना नहीं था।अपने घर से बाहर के लिए निकलते समय या बाहर से आते हुए घर में प्रवेश करते समय वह किसी की तरफ आंख उठाकर भी देखना नहीं पसंद करते थे।

चौधरी दंपत्ति का शायद यही विचार था कि उनके पास बहुत सारा पैसा है। आज के समय पैसे की मदद से कुछ भी किया जा सकता है। अगर आपके पास पैसा है उससे आप दुनिया की कोई भी सेवा प्राप्त कर सकते है। सीधा सा सिद्धांत है कि पैसा फेंको- तमाशा देखो। शायद इसीलिए वे किसी से कोई संबंध नहीं रखना चाहते थे। उनका ऐसा मानना था कि लोग अमीरों से संबंध अपने लाभ के लिए ही बनाते हैं।

उनके पास पैसा चाहे जितना हो लेकिन वे रिक्शेवाले से ,सब्जी वाले से ,फल वाले से या अन्य जिस किसी की सेवा लेते उससे दो- चार रुपए के लिए भी लंबी बहस करने पर उतर आते थे। और इस बहस में वह अपनी अमीरी को बढ़ा चढ़ाकर वर्णन करके पूरे मोहल्ले को जानकारी करवा देते थे।

झगड़े पर उतर आते हैं और इस क्रम में एक नहीं बल्कि अनेक बार उनकी पिटाई भी हो चुकी थी। मोहल्ले का कोई भी आदमी उनके झगड़े के बीच कोई समझौते की बात या उनका पक्ष लेने की जहमत नहीं उठाताथा क्योंकि उनके व्यवहार सभी सभी लोग भली भांति परिचित हो चुके थे।

अपने बच्चों के साथ भी उनके संबंध मधुर नहीं थे। बेटी शादी के बाद दूसरे शहर अपने ससुराल चली गई और उनका इकलौता बेटा शहर में कहीं दूर किराए पर रहता था। बच्चे केवल त्यौहार आदि पर आ जाते थे बाकी उन्हें अकेले रहने में ही ज्यादा शांति का अनुभव होता था। पहले जब बच्चे साथ रहते थे तो बच्चों के साथ डांटने-फटकारने की उनकी आवाज अक्सर सुनाई देती रहती थी।

बच्चों के जाने के बाद उनके घर पर काम करने के लिए जो बाई आती थी। उसके काम में मीन-मेख निकालना उनकी आदत थी अक्सर वे उसे डांटने के बहाने ही तो अपनी अमीरी का यशगान करके संतुष्टि का अनुभव करते थे क्योंकि लोगों से उनकी बातचीत ना के बराबर होती थी और आसपास के लोग भी उन्हें अपनी गाथा गाने का अवसर ही नहीं देते थे।

इमरजेंसी के बाहर मेरे साथ बैठे हुए चौधरी साहब आज बेहद गंभीर और गमगीन लग रहे थे। उनके चेहरे की भावना से स्पष्ट था की वह बेहद परेशान हैं। उनके कंधे पर मैंने तथ्यों ही हाथ रखा वे फफक -फफक कर रो पड़े।

 मैंने उन्हें धैर्य बंधाते हुए कहा-"चौधरी साहब ,आप बिल्कुल चिंता न करें। हम सब तन -मन-धन सहित आपके साथ हैं। आपको किसी भी प्रकार की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। भाभी जी जल्दी ही ठीक हो जाएंगी जैसा कि डॉक्टर भी कह रहे थे कि हम लोग उन्हें सही वक्त पर ले आए।

देर हो जाना घातक हो सकता था।"

इतना सुनते ही तो वह फूट-फूटकर रो पड़े-"हमारा व्यवहार आप लोगों के साथ मधुर नहीं रहा लेकिन फिर भी आपने हमारी उन गलतियों की तरफ ध्यान न देकर हमारी मदद की है। इस समय आप लोग देवताओं की तरह हमारे रूखे व्यवहार को ध्यान में दिए बिना हमारी सहायता में लग गए। हम आपके आजीवन शुक्रगुजार रहेंगे।"

मैंने सांत्वना देते हुए उनसे कहा-"आप नाहक ही अपराध बोध लिए बैठे हैं।हम लोग ऐसा कभी नहीं सोचते आजकल सभी का समय बहुत ही कीमती है। हर आदमी अपने काम में व्यस्त है। आखिर हम एक दूसरे के पड़ोसी हैं हमारा - आपका सबसे निकट का संबंध है। हम एक-दूसरे के सुख-दुख में जितने जल्दी भागीदार हो सकते हैं इतना जल्दी कोई नहीं हो सकता। हमारा या आपका कोई निकट संबंधी जब जानेगा तभी आ पाएगा और जानने के बाद भी उसे कितना समय लगेगा यह भी समय पर ही निर्भर करता है।" 

"आज हमारी समझ में आ चुका है कि आदमी का काम आदमी से ही होता है। अगर इस समय आप लोगों ने मदद ना की होती तो मैं अकेले इसे कैसे लाता ? और अगर देर हो जाती तो न जाने क्या हो जाता ? इंसान की जान अमूल्य होती है इसकी पैसे से तुलना नहीं की जा सकती है। मानवीय मूल्यों की कभी भी पैसे से तुलना नहीं की जा सकती।"-चौधरी के मन से पश्चाताप की ज्वाला शांत नहीं हो रही थी।

मैंने उन्हें इस विषय से पूरी तरह सुनिश्चित कर पूरा ध्यान भाभी जी के स्वास्थ्य की ओर लगाने के लिए कहा। जब मैंने उनसे यह जानने की कोशिश की कि इतनी गंभीर समस्या अचानक तो नहीं आ सकती। तबीयत कई दिनों से खराब रही होगी। तब उन्होंने बताया कि पिछले एक हफ्ते से इसने काम वाली बाई को डांट कर भगा दिया। तबीयत खराब होने के बावजूद यह काम करती रही मेरे पास भी इसे डॉक्टर को दिखाने का समय नहीं था। आजकल बेटे से बातचीत बंद है इसलिए उसे भी खबर नहीं की गई। पिछले तीन -चार दिन से बुखार आ रहा था कल सुबह से लूज मोशन भी शुरू हो गए थे। शाम को तबीयत खराब लग तो रही थी पर बहुत ज्यादा नहीं। रात करीब ग्यारह बजे तबीयत कुछ ज्यादा खराब होने लगी थी लेकिन इतनी रात में ले जाना संभव नहीं लगता था।सवेरे तक जो हाल हुआ उसके हिसाब से इसे मैं अकेले कैसे लाता। स्नेहा ने जिस समय इसे पकड़ा उस उस समय की हालत को देखकर तो मेरे हाथ पांव ही फूल गए थे। आज मैं यह जान चुका हूं कि सच्ची दौलत आपसी सहयोग संबंध ही है बाकी ये धन सम्पत्ति सब गौण है।"

मैंने उन्हें अपराध बोध से पूर्णतया मुक्त कराने के उद्देश्य से कहा-"आप इन सब चीजों को भूल जाएं और "बीती ताहि बिसारि के आगे की सुधि लेहु " क्योंकि वे क्षण जो दुख दें उन्हें भूल जाना ही श्रेयस्कर है। देखिए! वार्ड ब्याय शायद हमें बुला रहा है।"

चौधरी साहब मेरे साथ साथ वार्ड ब्वॉय की ओर बढ़ चले।


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