कलम ज़ादे

Abstract


4.0  

कलम ज़ादे

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सिंगल साइड बर्थ

सिंगल साइड बर्थ

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बात उन दिनों की है जब मैं जोश-ओ-खरोश से भरा ठीक-ठाक से दिखने वाला नौजवान था। दुनिया जीतने जैसे खूबसूरत सपने लिए मैंने अपने शहर से दूर मुंबई में काम करना शुरू किया था। सबकुछ अच्छा चल रहा था। शूटिंग में विराम आने पर मैं अपने शहर लौट आता था और काम शुरू होने की आहट मिलते ही पहुंच जाता था मायावी नगरी। लेकिन इस बार बुलावा कुछ ऐन मौके पर आ गया था। लिहाजा थोड़ी सी तैयारी कर कंधे पर बैग लटकाए स्टेशन जा पहुंचा। शाम करीब पांच बजे ट्रेन का प्रस्थान समय था। मुख्य रेलवे स्टेशन भोपाल के प्लेटफार्म क्रमांक-एक पर यात्रियों की भीड़ धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी। कुछ देर बाद पंजाब मेल ट्रेन इसी प्लेटफार्म पर आने वाली थी। महज पांच मिनट के हाल्ट के बाद मुंबई के लिए रवाना हो जाएगी। अगले दिन सुबह ट्रेन आखिरी स्टॉप सीएसटी मुंबई पहुुंचेगी। मुझे कल सुबह तक हर हाल में मुंबई पहुंचना है। मुंबई पहुंचते ही सुबह की शिफ्ट में काम शुरू। ऐन मौके पर रिजर्व बर्थ की कल्पना भी करना हिमाकत थी। लिहाजा जनरल टिकिट लेने विंडो पर पहुंच गया। जनरल बोगी की भीड़ और धक्का-मुक्की का ख्याल आते ही रूह कांप रही थी ।

विंडो की कतार में खड़ा सोच ही रहा था कि जनरल टिकिट लेकर रिजर्व बोगी में घुस जाऊंगा। कम से कम अखबार बिछाकर नीचे बैठने की जगह तो मिल जाएगी। लेकिन यदि टीसी या रेलवे पुलिस के जवानों ने खदेड़ दिया तो। इसी उधेड़बुन के बीच एक आवाज ने मेरा ध्यान खींच लिया। हमउम्र एक लडक़ा मेरे पास खड़ा था। बोला, टिकिट चाहिए क्या? स्लीपर का है। सिंगल वाली साइड बर्थ। कुछ अजीब सा लगा। मैंने ऊपर से नीचे तक उसे हिकारत भरी नजरों से देखा। सोचा, नकली अथवा पुराना टिकिट बेचकर चूना लगाने वाले बहुत से स्टेशन पर घूमते मिलते हैं। टिकिट गड़बड़ निकला तो कहां तलाशता फिरूंगा उसे। मैंने साफ मना कर दिया। मना करते ही वह चला गया। उसका यूं चले जाना मुझे थोड़ा अजीब-सा लगा। क्यूं चला गयाऐसे लोग तो मधुमक्खियों के छत्ते की तरह मंडराते रहते हैं। पीछा ही नहीं छोड़ते आसानी से। खैर, जो भी होमुझे अब भी जनरल डिब्बे में होने वाली परेशानी के बारे में सोचकर कोफ्त हो रही थी।

दिखने में तो ठीक-ठाक लग रहा था। एक बार फिर दूर खड़ा दिखाई दिया वो। कुछ हैरान सा परेशान सा। न जाने क्या हुआ, मैं लाइन से निकलकर उस तक जा पहुंचा। मुझे आता देख उसके चेहरे पर थोड़ी चमक सी आई। भाई, ले लो टिकिट। मैंने अपने लिए बुक कराया था मुंबई जाने के लिए। लेकिन किसी कारणवश मेरा जाना निरस्त हो गया है। विंडो पर टिकिट वापस करूंगा तो पैसा अधिक कट जाएगा। आपसे अतिरिक्त पैसे भी नहीं मांग रहा हूं। जाने क्यों, शायद मेरी ही गरज थी, न चाहते हुए भी जोखिम उठाते हुए मैंने वो टिकिट खरीद लिया। उस लडक़े ने मुझे आश्वस्त करने का प्रयास भी किया। भइया, जब आप अपनी सीट पर बैठ जाओगे, तभी मैं यहां से जाऊंगा। जब तक ट्रेन नहीं चलेगी मैं यहीं स्टेशन पर ही रहूंगा। बस, आपको अपनी पहचान टिकिट में दिए विवरण के अनुसार ही देना होगी। अनजाने यकीन के साथ मैंने उसकी बात पर भरोसा कर लिया और वरना टिकिट बेचने के बाद वो कहां और मैं कहां। प्लेटफार्म पर बढ़ती भीड़ को देखकर मेरा यकीन हिलने सा लगा था। यदि टिकिट सही नहीं निकला तो। घबराहट व बेचैनी के साथ-साथ भीतर ही भीतर कंपकंपाहट सी हो रही थी। लो, देखते ही देखते ट्रेन भी आ गई। इंजन का आगे का हिस्सा कितना बड़ा और डरावना सा लग रहा था आज, मानो कोई भीमकाय राक्षस। जैसे स्टेशन पर मौजूद हर यात्री को निगल ही जाएगा।

ट्रेन के रुकते ही सभी यात्री एक साथ टूट पड़े। डिब्बे के दोनों दरवाजों से बड़े-बड़े लगेज सहित भीतर घुसने का प्रयास करने लगे। यह भी भूल गए कि सिर्फ चढऩा ही नहीं बल्कि कुछ यात्रियों को स्टेशन पर उतरना भी है।

क्या मर्द, क्या औरतें और क्या बच्चे। बच्चों को तो उनके मां-बाप भीतर की ओर लगभग ऐसे उछाल रहे थे मानो लगेज उछाल रहे हों। मैं भी अपनी बोगी की ओर लपका। हालांकि घुसना आसान न था लेकिन चूंकि अकेली जान था और लगेज के नाम पर सिर्फ एक छोटा-सा बैग। ऊपर से मुंबई की लोकल ट्रेन का तर्जुबा। खुद को भीड़ के हवाले कर दिया और खुद-ब-खुद बोगी के भीतर जा पहुंचा। बोगी के अंदर भी मारामारी और अफरा-तफरी का माहौल था। अरे, आप उठिए यहां सेयह हमारी सीट है अरे जनाब, यह चारों बर्थ हमारी हैं ये देखिए टिकिट। मम्मी, यहां आ जाओहमारी सीटें यहां हैं। अरे डॉली कहां है कहीं ट्रेन में चढऩे से तो नहीं रह गई। अरे, बड़े बदतमीज हैं आप, बात करने का जरा भी तमीज नहीं। चारों तरफ से ऐसी ही आवाजें सुनाई दे रही थीं। मैं चुपचाच धीरे-धीरे अपनी साइड वाली सिंगल बर्थ खोजता हुआ आगे बढ़ रहा था। चारों तरफ से थोड़ी सी मशक्कत के बाद मुझे अपनी बर्थ नजर आ गई।

इत्तमीनान हुआ क्योंकि बर्थ अब तक खाली थी। अपना बैग सीट के एक कोने में रखकर मैंने राहत की सांस ली। डिब्बे के भीतर की गर्दी देखकर दम घुटने सा लगा, लिहाजा अपनी सीट पर बैठकर मुंह खिडक़ी की ओर कर बाहर का नजारा देखने लगा। दो मिनट बाद ट्रेन चलते ही सब सामान्य हो जाएगा। तभी अचानक दो सज्जन से दिखने वाले लगभग एक सी शक्ल और एक-सा पहनावा पहने दो शख्स वहां आए और मेरी बर्थ का नंबर देखने लगे। एक ने दूसरे से कहा, यही हैं अपनी सीट! मुझे समझते देर न लगी। वो मशहूर गायब बंधु थे। रंगमंच और कला-संस्कृति से जुड़ाव होने के कारण मैं उन्होंने झट पहचान गया था। तभी उनमें से एक ने मेरी ओर मुखातिब होते हुए कहा, यह दोनों ऊपर-नीचे वाली हमारी बर्थ हैं। सुनकर ऐसा लगा मानो किसी ने बड़े से हथौड़े से सिर पर वार कर दिया हो। दिल धक से धडक़ उठा। सारी शंकाएं, कुशंकाएं और संदेह को मानो पर लग गए हों। एक पल में तस्वीर दिमाग में घूम गई।

वो लडक़ा बेवकूफ बना गया। टिकट भी फर्जी निकला। वरना ही सीट के दो टिकट कैसे हो सकते हैं। फिर भी, न चाहते हुए मैंने गायक बंधुओं से कहा कि भाई साहब, यह मेरी सीट है। देखिए यह रहा टिकट। लेकिन उन्होंने मेरे टिकट पर नजर भी नहीं मारी। अपना टिकट दिखाते हुए बोले, यह देखिए हमारा टिकट15 दिन पहले ही रिजर्वेशन करा लिया था। नंबर देख लीजिए। वाकई नंबर तो वही था। तो क्या करूं। समझ में आ गया कि टिकट का पैसा तो गया ही, कल तक मुंबई भी नहीं पहुंच सकूंगा। मरे दिल से ट्रेन के डिब्बे से उतर गया। ट्रेन भी चल दी।

नजरों से ओझल होने तक ट्रेन को जाते देखता रहा। एकटक। छोडऩे आए लोग भी जाने लगे थे। अब मुझे गुस्सा आ रहा था। मेरी नजरें अब उस लडक़े को खोजने लगीं जिसने मुझे बेवकूफ बनाया था। लेकिन यह क्या, वो लडक़ा तो सामने खड़ा था। भागा क्यों नहीं। मैंने पहुंच गया उसके पास। मुझे देखते ही वह चौंक गया। अरे भइया, आप यहां, गए नहीं आप। ट्रेन तो चली गई। गुस्से से लाल-पीला होते हुए मैंने उसे सारा घटनाक्रम बता दिया। सुनकर वो भी भौचक्का हो गया। अरे भइया, यह क्या किया आपने। यह टिकट बिल्कुल असली है। आप अपनी सही बोगी पर चढ़े थे। आपको ट्रेन से नीचे नहीं उतरना था। हो सकता है, वो लोग गलती से आपकी सीट पर आ गए हों। उनकी बोगी का नंबर आगे-पीछे होगा। अरे, सहसा मुझे ख्याल आया। मैंने एक बार फिर उस टिकट की बोगी का नंबर देखा। यह तो सही है। वो गायक बंधु ही गलत बोगी में आ चढ़े थे। उन्होंने जब अपना टिकट दिखाया था तो उसमें आगे वाली बोगी का नंबर था।

मेरा सिर चकराने लगा। उस लडक़े ने कहा, अगर अब भी आप हबीबगंज स्टेशन या होशंगाबाद अथवा इटारसी पहुंच जाएं तो ट्रेन मिल जाएगी। मेरा सारा जोश पस्त हो चुका था। भारी कदमों से मैं घर जाने के लिए स्टेशन से बाहर निकल गया।


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