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astha singhal

Tragedy Inspirational


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astha singhal

Tragedy Inspirational


छोटी सी आशा....

छोटी सी आशा....

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समुद्र किनारे, ज़िंदगी के शोरगुल से दूर, मैं खड़ी होकर समुद्र की शांत लहरों को अपने पैरों तले महसूस कर रही थी। कितनी निर्मल, स्वच्छ और शांत लग रही थी आज ये लहरें। इन्हें ऐसे देख क्या कोई कह सकता है कि कुछ समय पूर्व यही लहरें तेज़ हवाओं के कारण उफ़ान पर थीं। 


हमारी ज़िन्दगी भी इन लहरों के समान है। कभी - कभी एकदम शांत, किसी संगीतमय धुन के समान प्रतीत होती है और कभी - कभी उसमें ऐसा सैलाब आ जाता है कि वह टूट कर बिखर जाती है। एक ऐसा ही तूफ़ान पिछले साल 2020 में आया था जिसने पूरे विश्व को एक ऐसी महामारी दी जिससे हम आज तक जूझ रहे हैं। लॉकडाऊन की वजह से कितने लोगों की रोजी-रोटी छिन गई। कितने लोगों के बिजनेस बंद हो गये। कितने लोग सड़कों पर उतर आए। पूरी अर्थव्यवस्था चरमरा गई। सरकार ने भरसक प्रयास किए जो सराहनीय भी हैं। सरकार ने हर तबके के लोगों को राहत पहुंचाने का काम किया। पर कुछ लोग ऐसे भी थे जिन तक कोई मदद नहीं पहुंच पाई। सरकार को इसमें क्या दोष दें जब उनके अपनों ने ही उनका साथ छोड़ दिया था।


ये लोग थे वृद्धाश्रम में रहने वाले वो अनगिनत वृद्ध जो अपनी ज़िंदगी की चौथी पारी खेल रहे थे। पर इस पारी में उन्हें अकेले छोड़ दिया गया। किसी और ने नहीं बल्कि उनके अपनों ने।


ऐसे ही एक वृद्धाश्रम से मैं आलिया बंसल जुड़ी थी साल 2019 में। मेरा कॉलेज का पहला साल था। हमारे कॉलेज में सोशल वर्क के 10 अंक मिलते थे जो फाइनल पेपर में जुड़ते थे। मैंने और मेरी सहेली शालिनी ने सोचा कि इन मुफ्त के अंकों को क्यों गवाएं। तो हमने भी फार्म भर दिया।


कुछ हफ्तों बाद सबको उनके सोशल वर्क के लिए ज़ोन बांट दिए गए। मुझे और पायल को सोशल वर्क के लिए कॉलेज के करीब ही एक वृद्धाश्रम एलोट किया गया।हम दोनों बहुत खुश हुए। हमें लगा कि वृद्धाश्रम में क्या काम होगा। ज़्यादा से ज्यादा किसी बुजुर्ग को घुमाने को कहेंगे या किसी बिमार की सेवा करने को कहेंगे। ये तो चुटकियों में हो जाएगा। और हम जल्दी फ्री भी हो जाएंगे।

हम दोनों अपनी किस्मत पर इतराते हुए अगले शनिवार वृद्धाश्रम पहुंचे।


' द फोर्थ इनिंग्स' यह कैसा नाम है?" पायल ने हैरानी से पूछा।

"हां, नाम तो अजीब ही है। पर हमें क्या। चल अंदर चलते हैं। फिर घर भी तो जल्दी जाना है।" मैंने पायल के हाथ पर ताली मारते हुए कहा।


हम वहां की केयर-टेकर मिसेज मल्होत्रा से मिलने उनके ऑफिस में पहुंचे।


"हैलो मैडम, हम दोनों आदर्श कॉलेज ऑफ कॉमर्स से आएं हैं। हमारे कॉलेज ने हमें यहां सोशल वर्क के लिए भेजा है।" मैंने कहा।

मिसेज़ मल्होत्रा बहुत ही बेरूखी से बोलीं,"ओह! तो आप दोनों हैं। आइए, बैठिए।"


"देखो बेटा, मेरी बात थोड़ी बुरी लगेगी। मैंने आपके कॉलेज को मना किया था कि वो यहां अपने छात्रों को ना भेजें। आप लोग यहां सिर्फ टाइम पास करने आते हैं और मुफ्त के अंक प्राप्त करने। आप लोगों को समाज सेवा का 'स' भी नहीं मालूम और ना ही इसकी समझ है। फिर भी आपकी प्रधानाचार्य के आग्रह करने पर मैंने हां कर दी। तो बताओ आप दोनों हमारे वृद्धाश्रम के लिए क्या योगदान देंगे।"


हम दोनों ने प्रश्न भरी निगाहों से उन्हें देखा। वह थोड़ा हंसी फिर बोलीं,"चलो पहले मैं तुम्हें आश्रम का एक चक्कर लगवाती हूं। शायद तब तुम मुझे कुछ जवाब दे पाओगे।"


वह उठीं और हमें इशारे से अपने पीछे आने को कहा। 

शुरुआत उन्होंने आश्रम के भोजन कक्ष से की। वहां बहुत सी बुज़ुर्ग महिलाएं खाना बना रही थीं। किचन से खाने की इतनी ज़ायकेदार खुशबू आ रही थी कि पेट में चूहे कब्बड्डी खेलने लगे।


" ये हमारी रसोई है। यहां जितनी भी महिलाएं रहती हैं सब मिलकर बारी - बारी खाना बनाती हैं। जैसे आज बंगाली खाना बन रहा है।" मिसेज मल्होत्रा ने कहा और आगे बढ़ गईं। 

मैं कुछ पल और उस खुशबू को महसूस करती रही कि तभी एक बूढ़ी औरत मेरे पास बंगला मिठाई शोणदेश लेकर आईं और बोली,"ले बेटा टैस्ट कर"। उनके स्वर में इतनी मिठास और अपनापन था कि मैं मना नहीं कर पाई। शोणदेश खाते ही मन तृप्त हो गया। मैंने उन्हें गले से लगाते हुए कहा,"वाह! आंटी, आपके हाथों में तो जादू है।" उनकी आंखें नम हो गईं और उन्होंने प्यार से मेरे सर पर हाथ फेरते हुए कहा,"आंटी नहीं, अम्मा"

मेरी आंखों में अनायास ही आंसू आ गए।


फिर वह हमें ऑडियो विजुअल रूम में लें गई। वहां एक बड़ा सा स्क्रीन लगा था और उसपर पुरानी फिल्म 'गोलमाल' चल रही थी। वहां बैठी बुज़ुर्ग महिलाएं हाथों में पॉपकॉर्न पकड़े हंसते हुए फिल्म का मज़ा ले रहीं थीं।

मल्होत्रा मैम ने सबको मुस्कुराते हुए हाथ हिलाया और बोलीं, "यह हमारा रीक्रिएशन रूम है, यहां सब आराम करते हैं और अपनी पसंद की फिल्म देखते हैं।" उन्होंने हाथ हिलाकर हंसते हुए सबको अभिवादन करते हुए कहा।


इस तरह मल्होत्रा मैडम ने हमें कुछ और कमरों में घुमाया। और फिर हमें डॉर्मिटोरी में ले गयीं।


पांच बड़े - बड़े हॉल थे। हर हॉल में दस बिस्तर थे। एक फ्रिज था। गद्दों और तकियों के लिए अलग से बड़ी सी अलमारी थी। हर बिस्तर के साथ एक छोटी सी अलमारी रखी थी। कुछ बिस्तरों पर बुजुर्ग महिलाएं आराम कर रहीं थीं। कुछ यूं ही चुपचाप बैठीं थीं। और कुछ आपस में बातें कर रहीं थीं।

मेरी नज़र वहां बैठी एक बहुत ही बुज़ुर्ग महिला पर पड़ी। उनकी उम्र लगभग 75 वर्ष की होगी। वह खिड़की के पास एक कुर्सी पर बैठीं थीं। चेहरे पर मायूसी और अपनों से बिछड़ने का दर्द साफ छलक रहा था। 

उन्होंने मल्होत्रा मैम को देखा तो डबडबाई आंखों से उन्हें इशारा कर अपने पास बुलाया।

" पुत्तर , बात की मेरे बेटे से? कब आ रहा है वो? मेरा मन नहीं लगता यहां।"

उनकी शब्द तीर के समान चुभ गए मुझे। मेरी आंखें भर आईं।


"अम्मा, मैंने बात की है आपकी बेटे से। वह अभी अमेरिका गया है इसलिए आपको यहां छोड़ गया है। जैसे ही वहां से आएगा आपको घर ले जाएगा।" मल्होत्रा मैम रूआंसी आवाज़ में बोली।

उनकी जुबान से निकले शब्द और उनके हाव-भाव में सामंजस्य नहीं था । साफ दिख रहा था कि वह झूठ बोल रही हैं। मुझे बहुत गुस्सा आया। मैंने वहां से निकलते ही उनसे पूछा, " आपने झूठ क्यों बोला?"


" तो और क्या कहती मैं?" उन्होंने झल्लाकर कहा।

" यह बोलती कि तुम्हारे बेटे ने तुम्हें दूध में गिरी मक्खी की तरह निकाल कर अपनी जिंदगी से बाहर फेंक दिया है। अब कभी तुम्हें लेने नहीं आएगा।" वह चिल्ला कर बोलीं।

पर उनकी आवाज़ में दर्द और परेशानी साफ़ दिखाई दे रही थी।

मैं और पायल स्तब्ध से खड़े रह गए। मैं निशब्द थी। कोई बेटा अपनी मां के साथ ऐसा कैसे कर सकता है? मेरे मन के भावों को मल्होत्रा मैम ने पढ़ लिया था शायद। 


मेरे कंधे पर हाथ रख वह बोली," आज के दौर के बच्चे अपने मां बाप को सिर्फ एक सीढ़ी समझते हैं। जिस पर पैर रखकर वह अपनी मंजिल तक पहुंचते हैं ।पर मंजिल पर पहुंचकर वही मां-बाप उनके लिए बोझ बन जाते हैं। और उन से छुटकारा पाने के लिए वह उन्हें यहां वृद्ध आश्रम में छोड़ देते हैं।"


मेरी आंखों से आंसू रुक नहीं रहे थे। मल्होत्रा मैम ने मुझे बैठने को कहा और पानी का गिलास पकड़ा दिया। कुछ देर तक उस कमरे में शांति थी फिर मैंने पूछा, "आपने इस आश्रम का नाम फोर्थ इनिंग्स क्यों रखा?"


"आलिया, इंसान की पहली पारी उसका बचपन होता है। जहां वह अपने माता-पिता पर आश्रित होता है। उनकी छत्रछाया में बड़ा होता है। दूसरी पारी उसकी जवानी। जहां वह दुनिया को अपने नज़रिए से देखता है। इस संसार में अपना अलग मुकाम हासिल करता है। जोश और उत्साह से भरा होता है। तीसरी पारी है उसका गृहस्थ आश्रम। जहां वह अपने बच्चों को बड़ा करता है । काम धंधा करता है और अपनी जिम्मेदारियां निभाता है। और चौथी पारी है बुढ़ापा। जो सबसे कठिन होती है। इसमें इंसान फिर से आश्रित हो जाता है। पर इस बार अपने माता-पिता पर नहीं बल्कि अपने बच्चों पर। और मेरे हिसाब से जिंदगी में मैंने ऐसे बहुत कम बुज़ुर्ग देखे हैं जो यह कह सकते हैं कि उन्होंने अपनी चौथी पारी भी बहुत शानदार तरीके से खेली है।" मल्होत्रा मैम ने कितनी खूबसूरती से हमें ज़िन्दगी का सारा सत समझा दिया।


" हम्म.….अब बताओ तुम क्या योगदान दे सकते हो इस आश्रम में?" मल्होत्रा मैम का यह प्रश्न हमें क्लीन बोल्ड कर गया।


"नहीं! हम तो कुछ भी नहीं कर सकते। यहां तो सब को सब कुछ आता है।" पायल ने झट से उत्तर दिया और खड़ी हो गई।

पर मैं वहीं बैठी सोचती रही। फिर मैंने कहा," मैम माना यहां आप सब कुछ सिखा रहे हैं। सब को बहुत कुछ आता है। पर एक चीज़ है जो किसी को शायद ही आती हो। आज के इस दौर में कंप्यूटर का ज्ञान बहुत ही आवश्यक है। मुझे लगता है कि सभी बुजुर्ग महिलाओं को भी कंप्यूटर का ज्ञान होना चाहिए। इंटरनेट के ज्ञान से उन्हें काफी मदद मिल सकती है। इससे एक तो उनका समय भी कट जाएगा और दूसरा उन्हें बहुत ही ज्ञानवर्धक बातें सीखने को मिल सकती हैं।"

मल्होत्रा मैम ने कुछ सोचा फिर हंसते हुए बोलीं,"चलो, तुमको एक मौका तो मिलना चाहिए। अगले शनिवार को आ जाना। और हां, छुट्टी के लिए पहले से ही एप्लीकेशन देनी होगी।"


हम दोनों वहां से उठ बाहर आ गए। मैंने पलट कर डॉर्मिटोरी की खिड़की की तरफ देखा। वह बुज़ुर्ग महिला अभी भी वहीं बैठीं थीं। मुझे देख मुस्कुरा दीं। मैंने भी मुस्कुराते हुए हाथ हिलाया और इशारों में ही उन्हें कहा कि मैं जल्दी आऊंगी।

 

मेरी मंज़िल मुझे कहां ले जाने वाली थी मुझे नहीं पता था।यह सफर मेरे लिए क्या चुनौतियां लेकर आएगा मुझे नहीं पता था। बस एक जुनून था कि मुझे इनके लिए कुछ करना है। इन सब की ज़िंदगी का हिस्सा बनना था मुझे। इनकी फोर्थ इनिंग्स को कामयाब बनाने में और इन्हें एक नई पहचान देने में मुझे अपना योगदान देना था।

******************


अगले शनिवार मैं एक नई ऊर्जा के साथ उठी। जल्दी से तैयार हो कर पायल के साथ वृद्धाश्रम पहुंच गयी। वैसे तो पायल बेमन से ही आई थी पर वो आई यह बड़ी बात थी।

मल्होत्रा मैम मुझे देख थोड़ा हैरान हो गई और बोलीं,

" मैं तुम्हारे दृढ़ निश्चय से बहुत प्रभावित हुई हूं आलिया। मुझे लगा था कि तुम शायद नहीं आओगी। पर तुम सच में हमारे साथ जुड़ना चाहती हो, इस बात की खुशी हुई। नौजवान पीढ़ी का यह जोश काबिले-तारीफ है।"


मल्होत्रा मैम के चेहरे पर खुशी और आंखों में चमक साफ छलक रही थी। वह उठीं और हमें स्टाफ रूम में लें गई।


"आलिया , यहां हमारा एक छोटा सा स्टाफ काम करता है। अकाउंट देखना, सब महिलाओं की आज तक की रिपोर्ट तैयार करना, सब की दवाइयों का खर्च, बिमारियों की लिस्ट वगेरह सब तैयार करते हैं। शनिवार और रविवार उनकी छुट्टी होती है तो दो दिन यह रूम खाली रहता है। तीन ही कम्प्यूटर हैं हमारे पास। मेरे ख्याल से बहुत रहेंगे। और यह रही उनकी लिस्ट जो हमारे हिसाब से कम्प्यूटर सीख पाएंगी शायद...। आया अभी सब को लेकर आ रही होगी। "


कुछ पल इंतज़ार के बाद आया दस बुज़ुर्ग महिलाओं को लेकर आई। मैं थोड़ा हैरान थी क्योंकि आश्रम में बहुत सारी महिलाएं हैं। मेरे दिमाग में चल रहे प्रश्न को मल्होत्रा मैम ने पढ़ लिया था शायद। वह बोलीं, "आलिया, कुछ महिलाओं ने तो मना कर दिया। कुछ काफी बुज़ुर्ग हैं तो मुझे नहीं लगता वह सीख पाएंगी। अभी इन दस बुज़ुर्ग महिलाओं से ही श्री गणेश करो। बाकी तो तुम्हारे सिखाने पर निर्भर करता है।" यह कह कर मैम उन सब को मेरे साथ सहयोग करने की हिदायत दे वहां से चलीं गईं।


मैं थोड़ा घबरा रही थी। पर फिर अपने आप से किए संकल्प को याद किया और मैदान में कूद पड़ी। मैंने उन सब का अभिवादन किया और अपना परिचय दिया।


" आलिया.....ओहो... आलिया भट्ट हो क्या।" एक महिला ने चुटकी लेते हुए कहा।

" मुझे तो वो बिल्कुल पसंद नहीं। कितने छोटे कपड़े पहनती है।" दूसरी महिला बोलीं। 

" ऐसे मत बोल, डीयर ज़िंदगी में अच्छी लग रही थी वो।" एक और आवाज़ आई। 


" एक मिनट.... आंटी....आप सब यहां ध्यान दें , मुझ पर, आलिया बंसल पर आलिया भट्ट पर नहीं।" मैंने उनकी बहस को रोकते हुए कहा।

तभी एक महिला ज़ोर से हंसने लगी और बोलीं, " बेटा, तुम पर क्या ध्यान दें। हमें कौन सा अब अपने बेटे के लिए लड़की ढूंढनी है।" 

उनके यह कहते ही सब ज़ोर से हंसने लगीं। कॉलेज में रैगिंग नहीं हुई थी। तो आज वह कसर भी पूरी हो गई। 


" चलिए आज हम कम्प्यूटर पर कुछ मज़ेदार करेंगे। आज हम इसपर वो लिखेंगे जो हमारी पहचान बताता है।" मैंने सब को अपनी तरफ आकर्षित करते हुए कहा।


" ऐसा क्या लिखेंगे जो हमारी पहचान है?" एक आंटी बोलीं


" हमारा नाम ! वही तो हमारी पहचान है। आज हम सब अपना नाम लिखेंगे और उसको बहुत आकर्षक तरीके से सजाएंगे। फिर उसका प्रिंट निकालेंगे।"


मैंने और पायल ने एक कम्प्यूटर पर तीन लोगों को बैठाया और एक-एक करके सबको मदद की उनका नाम लिखने में। उन्हें सिखाया कि कैसे हम कलर बदल सकते हैं, कैसे फौंट बदल कर नाम को अलग लिखावट दे सकते हैं। धीरे-धीरे सबको मज़ा आने लगा। अपने नाम को खुद खूबसूरत बना कर सब बच्चों की तरह खुश हो रहीं थीं। कुछ ही देर में सबसे जान-पहचान हो गई। सबके नाम पता चल गये। जब हमने उनके प्रिंट निकाल कर उनको दिए तो वह सब उसको देख इतनी खुश हुईं जैसे एक छोटा सा बच्चा अपनी पसंद के खिलौने को पा कर होता है। 


"चलिए अब इस प्रिंट को आप अपने बिस्तर के साथ रखी अलमारी पर लगाएंगे। क्योंकि उस अलमारी में आपका सामान है। वो आपकी चीज़ है। " मैंने उत्साहित होते हुए कहा।

हम दोनों उन सब को लेकर डोर्मिटोरी में पहुंचे। वहां हमने मिलकर सब के नाम वाले प्रिंट उनकी अलमारी पर चिपकाने में मदद करी। बाकी सारी महिलाएं भी उत्सुकता से सब देख रही थीं। हमने उनके नाम को और आकर्षक बनाने के लिए उन्हें बहुत से स्टीकर दिये। 


मंजू आंटी ने तो बहुत सारी स्माइली लगाईं। रंजना अम्मा ने अपने नाम को फूलों के स्टीकर से सजाया। विमला मां को रंग - बिरंगे सितारे बहुत भाए। सब ने अपने नाम को सुंदरता की चादर से ढक दिया। उसके बाद वह सब उसको ऐसे निहारती रहीं जैसे परिवार के सब सदस्य नवजात शिशु को निहारते रहते हैं।

 

मैं एक प्रिंट लेकर खिड़की पर बैठी उन बुज़ुर्ग महिला के पास गई।

" अम्मा, ये आपके लिए। क्या इसे मैं आपकी अलमारी पर लगा दूं।" मैंने मुस्कुराते हुए पूछा। 

उनकी सहमती से मैंने उनके नाम वाले प्रिंट को उनकी अलमारी पर चिपका दिया और उसे सुंदर फूल वाले स्टीकर से सजा दिया। फिर मैं उन्हें अलमारी के पास ले आई। अपने नाम को इतने सुन्दर अंदाज़ में लिखा देख वह भाव विभोर हो गई और उसे छूते हुए बोलीं, "सु..लो..चना ..... सुलोचना शर्मा...कितने सालों बाद अपना नाम पढा है। इधर आ गुड़िया।" 

मैं उनके पास जाकर बैठ गयी और उन्होंने मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरा। आंखों से आंसू ना उनके थम रहे थे और ना मेरे।


'नाम में क्या रखा है' यह कथन आज मुझे बेमानी लग रहा था। क्योंकि, सिर्फ एक हमारा नाम ही तो है जो पूरी ज़िंदगी हमारे साथ रहता है। बाकी सब रिश्ते एक -एक कर, हमें जीवन के सफर में छोड़ जाते हैं। पर हमारा नाम आखिर तक हमारे साथ रहता है। इस दुनिया से जाने के बाद भी लोग हमें हमारे नाम से ही याद करते हैं।


अब मैं सिर्फ शनिवार को ही नहीं बल्कि रविवार को भी आश्रम जाने लगी। सब के साथ समय व्यतीत करना, उनके अनुभव सुनना, अपने कॉलेज के अनुभव उनसे साझा करने में मुझे बेहद आनंद आता था।


जीवन एक अवसर है जो उस परम शक्ति ने हमें दिया है जिसने यह संसार बनाया है। अब इस अवसर का हम कितना फायदा उठाते हैं यह हम पर निर्भर करता है।


वृद्ध आश्रम की सभी महिलाएं इस अवसर का फायदा क्यों नहीं उठा सकतीं? ऐसा क्या है जो उन्हें रोकता है? यही प्रश्न मन में लिए मैं आश्रम पहुंची। मल्होत्रा मैम को अपनी योजना के बारे में बताया जिससे आश्रम की महिलाएं भी आत्मनिर्भर बन सकती थीं।


" मैम, मंजू आंटी, कांता मां, शकुंतला दादी, ये सब कितनी अच्छी कढ़ाई करती हैं। हम इनकी कढ़ाई को रुमाल, टी.वी कवर इत्यादि पर बनवा कर ऑनलाइन ऐप्स पर बेच सकते हैं। आजकल घर के भीतर लगाए जाने वाले पौधों की बहुत मांग है। बेबे, आशा ताई, कमला ताई, सविता दादी, सब को पौधों की बहुत समझ है। हम किसी नर्सरी से अनुबंध कर के इसकी भी ऑनलाइन बिक्री कर सकते हैं।" मैंने अपनी सारी योजना उन्हें समझा दी।


हमने सब को इकट्ठा किया और मैम ने मेरी योजना सब को बताई। कुछ बुज़ुर्ग महिलाओं को पसंद नहीं आई। क्योंकि उम्र के इस पड़ाव पर आकर वह फिर से एक नयी शुरूआत करने से कतरा रही थीं। पर ज़्यादातर महिलाओं ने हमारी बात को समझा और माना। क्योंकि उन्हें आत्मनिर्भर बनने का मौका मिल रहा था जो शायद उनमें से काफी महिलाओं को कभी मिला ही नहीं था। वह सदैव अपनी आजीविका के लिए अपने पिता, पति या पुत्र पर ही निर्भर रहीं थीं। आज उनके पास अवसर था अपनी पहचान बनाने का।


एक महीने के भीतर सब तैयारियां हो गई। हालांकि मुझे अंदाजा था कि हम एक साथ बहुत सामान नहीं बना सकते क्योंकि उम्र का भी तकाज़ा है। तेज़ काम करना अब उन सब के बस की बात नहीं थी। पायल ने इसका एक बहुत सही उपाय निकाला। 


"क्यों ना हम एक तरह का कोचिंग संस्थान खोलें यहां पर। ऐसी बहुत सी लड़कियां हैं जो सिलाई कढ़ाई सीखना चाहेंगी। बागवानी सीखना चाहेंगी। बस सब दादियां मिलकर उनको सिखा भी देंगी और बिक्री के लिए माल भी तैयार हो जाएगा।" पायल ने निसंदेह एक बढ़िया सुझाव दिया।


हमने मल्होत्रा मैम से और वहां सभी महिलाओं से इस बात के बारे में वार्तालाप किया। सुझाव सबको पसंद आया। हमने कम्प्यूटर पर ब्रोशुर छापे। आधे माह में ही करीबन पांच- छह लड़कियां सिलाई कढ़ाई सीखने आ गयी। इससे सिलाई कढ़ाई विभाग को तो मदद मिल गई। अब बागवानी के लिए हमने अपने दोस्तों से कॉलेज में बात करी। छह-सात दोस्त हमारी मदद को तैयार हो गये। 


लगभग दो- तीन महीने में एक अच्छा व्यवसाय तैयार हो गया। मेरी सभी दादियां बहुत खुश थीं। सब सुबह से शाम तक कार्य में व्यस्त रहतीं थीं। अब किसी को भी अपने बेटे, पोता- पोती और परिवार की ज़्यादा याद नहीं सताती थी। वह मोह छोड़ कर आगे बढ़ना सीख चुकी थीं। 


मल्होत्रा मैम सब के इस बदलते रूप को देखकर बहुत प्रसन्न होती थीं। वह भावविभोर हो हमसे बोलीं, 

"आलिया और पायल, कायापलट हो गई आश्रम की। कौन कह सकता है कि यह वही आश्रम है जहां हर दिन एक उदासी सब को अपने आलिंगन में समा कर रखती थी। जहां हर रोज़ सब अपनों के लिए बेचैन रहते थे। सब इकट्ठे होते हुए भी तनहा महसूस करते थे। अपने जीवन को कोसते रहते थे। आज सब कितना उर्जावान महसूस कर रही हैं। सब का खोया हुआ आत्मविश्वास वापस आ गया है।आज सब सच में एक परिवार की तरह रह रही हैं।" 


एक साल पंख फैला कर कब उड़ गया पता ही नहीं चला। हमने आश्रम में 2020 का ज़ोरदार ढंग से स्वागत किया। सबने खूब नाच- गाना किया। ज़िन्दगी गुलज़ार लग रही थी। सब कुछ सही चल रहा था कि अचानक विश्व कोरोना जैसी महामारी की चपेट में आ गया। और मार्च में हमारे देश में लॉकडाउन लग गया। लोगों का घर से बाहर आना जाना बंद हो गया। सब अपने ही घर में कैद हो गये। 



मैं रोज़ सबसे सम्पर्क में थी। मल्होत्रा मैम से निरंतर अपडेट लेती रहती थी। कुछ समय तक हमारा आश्रम जिन एन.जी.ओ. से जुड़ा था वह मदद करते रहे पर फिर मदद बंद हो गई। मल्होत्रा मैम ने सभी के बेटों से बात की। कुछ ने तो आधी पगार का बहाना बना दिया। कुछ ने यह कह कर टाल दिया कि जैसे ही इंतज़ाम होगा वह भेज देंगे। और कुछ ने फोन ही नहीं उठाए। बस कुछ ही पैसे भेज रहे थे।


एक दिन मल्होत्रा मैम का फोन आया मेरे पास।

" आलिया, सुलोचना ताई की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई है। क्या तुम डॉक्टर अरेंज करा सकती हो।"


मेरा दिल धक से बैठ गया। अविश्वास के काले बादल आंखों के आगे मंडराने लगे। मैं बेबस और लाचार महसूस कर रही थी। मैंने फिर भी उनको आश्वासन दिया कि मैं कुछ इंतज़ाम ज़रुर करूंगी। मैंने अपने पड़ोस में रहने वाले डॉक्टर वर्मा को बहुत आग्रह किया कि वह मेरे साथ चलें। बहुत मुश्किल से वह चलने को तैयार हुए। मैंने एक हफ्ते का राशन और अन्य ज़रूरी चीज़ समान तैयार किया और मां को किसी तरह मनाया कि वह कुछ दिन मुझे वहां रहने की इजाज़त दें। मल्होत्रा मैम अकेले सब संभाल रहीं हैं। मां ने सख्त हिदायतों के साथ मुझे इजाज़त दे दी। 



डॉक्टर वर्मा ने सुलोचना दादी को चेक करके कहा,

"मैं आपको झूठी दिलासा नहीं देना चाहता। इनकी सांस की तकलीफ़ बहुत ज़्यादा बढ़ गई है। कितने दिन निकाल पाएंगी कहना मुश्किल है।" डॉक्टर वर्मा ने दबी आवाज़ में कहा।


मल्होत्रा मैम और मेरी आंखों में आंसू थे। हम सुलोचना दादी को खोना नहीं चाहते थे। तभी भैया डॉक्टर का लिखा इंजेक्शन ले आया। डॉक्टर वर्मा ने मुझे इंजेक्शन भरना और लगाना सिखा दिया। फिर वह हमसे इजाज़त लेकर भाई के साथ वापस चले गए। 


मैं डोर्मिटोरी में गयी और सबसे मिली। सबका शरीर और मन दोनों ही थके हुए थे। काफी दिनों से आश्रम की सफाई भी नहीं हुई थी। 

" सिर्फ आशा ही है यहां। यह बेचारी जितना कर पाती है कर लेती है। मैं भी सफाई में इसकी कुछ मदद कर देती हूं।" मल्होत्रा मैम ने बताया।

सुलोचना दादी की तबीयत बिगड़ती जा रही थी। उनको सांस लेने में बहुत दिक्कत हो रही थी। मैंने कहीं से ऑक्सीजन का इंतज़ाम किया। पर उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती कराने की ज़रूरत थी। लेकिन बेड की कमी की वजह से हमें कहीं जगह नहीं मिल रही थी। किसी तरह बहुत भागदौड़ के बाद हम एम्ब्युलेंस का इंतज़ाम कर पाए।


हम सब बेसब्री से एंमब्यूलेंस का इंतज़ार कर रहे थे। तभी कांता मां की आवाज़ आई। हम सब भाग कर अंदर गये। सुलोचना दादी हम सब को छोड़कर जा चुकी थीं। उनका जराजीर्ण शरीर बिस्तर पर पड़ा था। हम सब शून्य में उन्हें देख रहे थे। तभी एंमब्यूलेंस की आवाज़ ने कमरे में फैले सन्नाटे को तोड़ा। उसके पीछे भाई की गाड़ी थी। उसने जल्दी से दो कर्मचारियों को स्ट्रेचर लेकर अंदर दौड़ाया। दरवाज़े पर आते ही उसने मुझे पुकारा। मैं भाग कर भाई से लिपट कर रोने लगी। वह भी स्तब्ध खड़ा हो गया। उसे भी विश्वास नहीं हुआ। 


एंमब्यूलेंस ले कर जाने लगी सुलोचना दादी को। जिस एंमब्यूलेंस को उनकी जान बचाने के लिए बुलाया था उसी में उनको अंतिम विदाई देनी पड़ी। शायद हमें देर हो गई उनको हॉस्पिटल में एडमिट कराने में। सबने हाथ जोड़कर उनको अंतिम विदाई दी। दादी अपने अंतिम सफर पर चल दीं। हम सारी ज़िन्दगी रिश्तों के मोह में उलझे रहते हैं। उन्हीं के इर्द-गिर्द हमारी ज़िन्दगी चलती है। उनके लिए हम लड़ते हैं। उनके लिए परेशान होते हैं। उनसे आशाएं और उम्मीदें रखते हैं। यदि वह टूट जाएं तो दुखी होते हैं। 



पर हम यह भूल जाते हैं कि अपने जीवन का अंतिम सफर तो हमें खुद ही तय करना है। उसमें हमारे साथ कोई नहीं चलेगा। यह सफर सिर्फ हमारा है। 


मैं और मल्होत्रा मैम किसी तरह राशन इकठ्ठा करने की जद्दोजहद में लगे थे। पायल लॉकडाउन की वजह से दूसरे शहर में फंस गई थी। पर उसने भी किसी तरह हमारी मदद करने की पूरी कोशिश करी। मदद आ रही थी पर टुकड़ों में। इससे हम सब को ज़रूरत की चीज़ें उपलब्ध नहीं करा पा रहे थे। 


एक दिन मैंने ठान लिया कि बस अब दूसरों पर आश्रित नहीं रहना। अब खुद ही कुछ करना पड़ेगा। सबको बुला कर मैंने सबको समझाते हुए कहा,


"इस लॉकडाउन ने बहुत से लोगों के काम धंधे छीन लिए। बेरोज़गारी बढ़ गई है। पर ऐसे बहुत से लोग हैं जो घर आराम से तो बैठे हैं पर उन्हें कुछ दिक्कतों का सामना कर पड़ रहा है। जैसे, ऐसे बहुत से विद्यार्थियों को हॉस्टल में या उनके द्वारा लिए किराए के मकान में बैठना पड़ रहा है। और उनकी सबसे बड़ी समस्या है कि उन्हें ढंग का खाना नहीं मिल रहा। क्योंकि होटल, रेस्टोरेंट,  ढाबे सभी बंद हैं। उन्हें खुद बनाना पड़ रहा है। और बहुत से ऐसे हैं जिन्हें खाना बनाना आता ही नहीं।" 


" हां, बेचारे बच्चे। पर इस सब में हम क्या कर सकते हैं?" मंजू आंटी ने कहा। 


" इसमें आप लोग ही तो मदद कर सकते हैं। देखिए, आप सब बहुत अच्छा खाना बनाते हैं। तो क्यों ना हम टिफिन बॉक्स की प्रक्रिया शुरू करें। ऐसे बहुत से हॉस्टल है जहां हम अपने बनाए घर के खाने को पहुंचा सकते हैं। बदले में एक कीमत रखेंगे जो ज़्यादा मंहगी ना हो। और खाना बनाने के बर्तन तो हैं ही हमारे पास। खाना पैक करके भरने के लिए डब्बे हम थोक में मेरे एक मित्र के पापा की दुकान से ले सकते हैं। उनको पैसों का भुगतान हम धीरे - धीरे कर सकते हैं।" 


सबने मेरी बात मान ली। शायद इसलिए कि वह मुझे हताश नहीं देखना चाहते थे या फिर इसलिए कि उन्हें मुझ पर भरोसा था। दोनों बातों में से जो भी वजह रही हो पर आशा की किरण अभी भी कायम थी। 


अगला एक हफ्ता बहुत मेहनत का था। हम सबने मेहनत कर के ई- पैम्फलेट तैयार किए। मैंने उन्हें अपने सारे सोशल मीडिया एकाउंट पर डाल दिया। अपने सभी नये - पुराने दोस्तों को मेल से, मेसेज साइट से, सब तरह से भेजा। सिर्फ मैंने ही नहीं पायल, भाई, मां , पापा और घर के सभी रिश्तेदारों ने इसको सोशल मीडिया के द्वारा प्रचारित किया। 


हमारी मेहनत रंग लाई। किचन के शुभारंभ से दो दिन पहले हमें करीब पंद्रह ऑर्डर मिले। कुछ मेरे ही कॉलेज के दोस्तों के थे जो हॉस्टल में रह रहे थे। और स्वच्छ और स्वादिष्ट भोजन के लिए तरस रहे थे। कुछ ऐसे विद्यार्थी थे जो हॉस्टल में नहीं अपितु बाहर किराए पर रहते थे और खुद ही अपना खाना बना रहे थे।


पर समस्या थी कि उनको खाना पहुंचाएं कैसे। आशा ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, " मैम मेरा पति खाली बैठा है आजकल। वह साइकिल पर दे आएगा। और जब आपका काम चल जाए तो कुछ दे देना रोज़ का उसको।" 


आखिरकार सभी पड़ाव को पार कर हमारी किचन शुरू हुई। हमारी प्यारी दादियों ने बहुत ज़ायकेदार खाना बनाया।  हमने उसको सही से पैक किया और उसमें एक पर्ची डाली जिसपर लिखा था 'अपना ख्याल रखना'।


कुछ ही दिनों में हमें थोड़े ज्यादा ऑर्डर मिलने लगे। पायल के दिमाग में एक उपाय आया जिसे मैंने यहां बैठकर कार्यान्वित किया। 


मैंने किचन में खाना बना रही सभी दादियों का एक वीडियो बनाया और एक यूट्यूब चैनल बनाया " दादी के किचन से" और उस पर उस विडियो को भेज दिया। 


एक ही दिन में वह वीडियो बहुत लोगों ने पसंद किया और इससे हमें ज़्यादा ऑर्डर मिलने लगे। अब हम सुबह का नाश्ता, दोपहर का खाना दोनों बनाने लगे। 


तकरीबन एक महीने बाद पापा ने हमारे लिए एक कम्पनी भी दर्ज करा दी और समस्त औपचारिकताएं और दस्तावेज भी इकठ्ठे कर लिए। अब हम ऑनलाइन खाने का ऑर्डर लेने वाली फ़ूड डिलीवरी संस्थानों में अपनी छोटी सी कम्पनी को दर्ज़ करा सकते थे। 


फिर क्या था। हमने अपनी कम्पनी ' दादी के किचन से' को दो - तीन ऑनलाइन कम्पनी में दर्ज़ करा दिया। क्योंकि हम थोड़ा बहुत पहले ही मशहूर हो चुके थे इसलिए जल्द ही ऑर्डर आने लगे। बंगाली, पंजाबी, गुजराती, राजस्थानी, मद्रासी, हर तरह का मेन्यू हमारी किचन से जाने लगा।


आज 2022 में भले ही कोरोना महामारी से अभी तक हमें मुक्ति नहीं मिल पा रही है पर हमारी फोर्थ इनिंग्स के आश्रम की समस्त दादियां अपने मोह के  बंधनों से मुक्त हो गई थीं। 


आज वह खुली हवा में सांस ले सकतीं हैं। अपने पंख फैला उन्हें जिस दिशा में चाहें मोड़ सकतीं हैं। 


'दादी के किचन से' आज बहुत अच्छा चल रहा है। मंजू आंटी और सरला ताई कम्प्यूटर के ज़रिए सारे ऑर्डर संभाल लेती हैं। आज उन्हें मेरी भी आवश्यकता नहीं पड़ती। और यही तो मैं चाहती थी। वो पूरी तरह से आत्मनिर्भर बन जाएं। 


आत्मनिर्भरता ही एक ऐसा हथियार है जो हमें हमारे जीवन की चौथी पारी में भी टूटने नहीं देता। मैं हमारे समस्त बुज़ुर्गों से यही कहना चाहूंगी कि जीवन चलने का नाम है। हम थक कर थोड़ी देर भले ही आराम कर लें पर फिर से उठकर चलना ही पड़ेगा। अपने जीवन को कभी भी लक्ष्य विहीन ना होने दें। नई तकनीकों को सीखने में कोई बुराई नहीं है। उसे अपनाएं और आज की पीढ़ी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलें। लोग पुराने नहीं होते उनकी सोच पुरानी हो जाती है। उन्हें अपनी सोच को नयी दिशा प्रदान करनी पड़ेगी। 


आज आश्रम की सभी महिलाओं ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। उन्हें आज किसी की पत्नी, किसी की मां के रूप में नहीं अपितु उनके नाम से जाना जाता है। लगभग दो साल पहले उन्होंने अपना नाम लिख कर उसे सजाया था। आज उनके उसी नाम से उन्हें एक नई पहचान मिली है। आज उन्होंने अपने अस्तित्व को खोज लिया है। 


अपने सपनों को साकार करने की कोई उम्र नहीं होती। इन सबका सपना था खुद को आत्मनिर्भर बनाने का। खुद की एक पहचान बनाने का। भले ही उस सपने को साकार होने में वक्त लगा पर सपनें देखेंगे तभी तो उनके साकार होने की उम्मीद करेंगे।




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