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Sudha Adesh

Tragedy Inspirational


4  

Sudha Adesh

Tragedy Inspirational


मोहपाश

मोहपाश

23 mins 242 23 mins 242

‘‘तनु बेटा, जा कर तैयार हो जा। वे लोग आते ही होंगे…।’’ मां ने प्यार भरी आवाज में मनुहार करते हुए कहा।


 ‘‘मां, मैं कितनी बार कह चुकी हूं कि मैं विवाह नहीं करूंगी। मुझे पसंद नहीं है यह देखने व दिखाने की औपचारिकता...। मां, मान भी लो कि यह रिश्ता हो गया, तो क्या मैं सुखी वैवाहिक जीवन बिता पाऊंगी? जब भी उन्हें पता चलेगा कि मैं एक गंभीर बीमारी से ग्रस्त हूँ तो क्या वे मुझे…। ’’ तनुजा ने आवेश से कांपती आवाज में कहा।


‘‘बेटा, तूने मन में भ्रम पाल लिया है कि तुझे गंभीर बीमारी है। प्रदूषण के कारण आज हर 10 में से एक व्यक्ति इस बीमारी से पीड़ित है। दमा रोग आज असाध्य नहीं है। उचित खानपान, रहन सहन व उचित दवाइयों के प्रयोग से रोग पर काबू पाया जा सकता है। अनेक कुशल व सफल व्यक्ति भी इस रोग से ग्रस्त पाए गए हैं। ज्यादा तनाव, क्रोध इस रोग की तीव्रता को बढ़ा देते हैं। हमारे खानदान में तो यह रोग किसी को नहीं है, फिर तू क्यों हीन भावना से ग्रस्त है?’’ मां ने समझाते हुए कहा।


‘‘तुम इस बीमारी के विषय में उन लोगों को बता क्यों नहीं देतीं।’’ तनुजा ने सहज होने का प्रयत्न करते हुए कहा।


‘‘तू नहीं जानती है बेटी, तेरे डैडी ने 1-2 जगह इस बात का जिक्र किया था, किंतु बीमारी का सुनकर लड़के वालों ने कोई न कोई बहाना बना कर चलती बात को बीच में ही रोक दिया।’’ असहाय मुद्रा में मां ने कहा।


‘‘लेकिन मां, यह तो धोखा होगा उनके साथ।’’


‘‘बेटा, जीवन में कभी-कभी कुछ समझौते करने पड़ते हैं, जिन्हें करने का हम प्रयास कर रहे हैं।’’ लंबी सांस से लेकर मां फिर बोलीं, ‘‘इतनी बड़ी जिंदगी किसके सहारे काटेगी? जब तक हम लोग हैं तब तक तो ठीक है। भाई कब तक सहारा देंगे? अपने लिए नहीं तो मेरे और अपने डैडी की खातिर हमारे साथ सहयोग कर बेटा... जा, जा कर तैयार हो जा। ’’ मां ने डबडबाई आंखों से कहा।


कुछ कहने के लिए तनुजा ने मुंह खोला ही था किंतु मां की आंखों में आंसू देखकर होंठों से निकलते शब्द होंठों पर ही चिपक गए। अनिच्छा से वह तैयार हुई। मन कह रहा था कि किसी को धोखा देना अपराध है। मन की बात मन में ही रह गई। भाई रंजन ने आकर बताया कि वे लोग आ गए हैं. मां और डैडी स्वागत के लिए दौड़े। 2 घंटे कैसे बीते, पता ही नहीं चला। मनुज अत्यंत आकर्षक, हंसमुख व मिलनसार लगा। लग ही नहीं रहा था कि हम पहली बार मिल रहे हैं। पहली बार मन में किसी को जीवनसाथी के रूप में प्राप्त करने की इच्छा जाग्रत हुई।


वे लोग चले गए किंतु उसके मन में उथल पुथल मच गई। क्या वे मुझे स्वीकार करेंगे? यदि स्वीकार कर भी लिया तो कच्ची डोर से बंधा बंधन कब तक ठहर पाएगा?


2 दिनों बाद फोन पर रिश्ते को स्वीकार करने की सूचना मिली तो बिना त्योहार के ही घर में त्योहार जैसी खुशियां छा गईं। डैडी बोले, ‘‘मैं जानता था रिश्ता यहीं तय होगा। कितना भला व सुशील लड़का है मनुज।’’


किंतु तनुजा चाहकर भी खुश नहीं हो पा रही थी। जनम -जनम के इस रिश्ते में पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक है...सोचकर पता प्राप्त कर चुपके से एक पत्र मनुज के नाम लिख कर डाल दिया और धड़कते दिल से उत्तर की प्रतीक्षा करने लगी।


एक हफ्ता बीता, 2 हफ्ते बीते, यहां तक तीसरा हफ्ता भी बीत गया। उसके पत्र का कोई उत्तर नहीं आया। मनुज का विशाल व्यक्तित्व खोखला लगने लगा था। स्वप्न धराशायी होने लगे थे।एक दिन वह कालेज से लौटी तो दरवाजे की कुंडी में 3-4 पत्रों के साथ एक गुलाबी लिफाफा उसे दिखाई दिया। उसका भविष्य इसी लिफाफे में कैद था। जीवन में खुशियां आने वाली हैं या अंधेरा, एक छोटा सा कागज का टुकड़ा निर्णय कर देगा। वह पत्र खोल कर पढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी।


मां आज किटी पार्टी में गई थीं, अतः बैग से चाबी निकाल कर ताला खोला। कड़कड़ाती ठंड में भी माथे पर पसीने की बूंदें झलक आई थीं। स्वयं को संयत करते हुए पत्र खोला... लिखा था


प्यारी तनु,

तुम्हें जीवनसाथी के रूप में प्राप्त कर मेरा जीवन धन्य हो जाएगा। तुम बिलकुल वैसी ही हो जैसी मैं ने कल्पना की थी।’

मन में अचानक अनेक प्रकार के फूल खिल उठे, सावन के बिना ही जीवन में बहार आ गई…. चारों ओर सतरंगी रंग छितर कर तन मन को रंगीन बनाने लगे। मैंने भी मनुज के पत्र का उत्तर दे दिया था।


2 महीने के अंदर ही वैदिक मंत्रों के मध्य अग्नि को साक्षी मान कर मेरा मनुज से विवाह हो गया। दुख-सुख में जीवन भर साथ निभाने के कसमें वादों के साथ जीवन के अंतहीन पथ पर चल पड़ी। विदाई के समय मां का रो-रोकर बुरा हाल था। चलते समय मनुज से बोली थीं, ‘‘बेटा, नाजुक सी छुईमुई कली है मेरी बेटी, कोई गलती हो जाए तो छोटा समझ कर माफ कर देना।’’


तनुजा की आंखें रो रही थीं किंतु मन नवीन आकांक्षाओं के साथ नए पथ पर छलांग मारने को आतुर था। कानपुर से फैजाबाद आते समय कर की पीछे की सीट पर बैठे मनुज ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया था तथा धीरे-धीरे सहला रहे थे, और वह चाहकर भी उनसे नजरों से नजरें मिलाने में स्वयं को असमर्थ पा रही थी। कैसा है यह बंधन…? अनजान सफर में अनजान राही के साथ अचानक तन मन का एकाकार हो जाना, प्रेम और अपनत्व नहीं, तो और क्या है ?


ससुराल में उसका खूब स्वागत हुआ। सास सौतेली थीं, किंतु उनका स्वभाव अत्यंत मोहक व मृदु लगा। कुछ ने कहा कि कमाऊ बेटा है इसीलिए उसकी बहू का इतना सत्कार कर रही हैं। यह सुनकर सौम्य स्वभाव, मृदुभाषिणी सास के चेहरे पर दुख की लकीरें अवश्य आईं, किंतु क्षण भर पश्चात ही वह निर्विकार मूर्ति के सदृश प्रत्येक आए गए व्यक्ति की देखभाल में जुट जातीं।


ननद स्नेहा भी दिन भर भाभी भाभी कहते हुए उसके आगे पीछे ही घूमती। कभी नाश्ते के लिए आग्रह करती तो कभी खाने के लिए। वही प्रत्येक आने जाने वाले से भी उसका परिचय करवाती। मनुज भी किसी न किसी काम के बहाने कमरे में ही ज्यादा वक्त गुजारते।


 मित्र कहते, ‘‘वह तो गया काम से। अभी से यह हाल है तो आगे क्या होगा?’’ 


मन चाहने लगा था, काश, वक्त ठहर जाए, और इसी तरह हंसी खुशी से सदा मेरा आंचल भरा रहे।


पूरे हफ्ते घूमना फिरना लगा रहा। 2 दिनों पश्चात ऊटी जाने का कार्यक्रम था। देर रात्रि मनुज के अभिन्न मित्र के घर से हम खाना खाकर आए। पता नहीं ठंड लग गई या खाने पीने की अनियमितता के कारण सुबह उठी तो सांस बेहद फूलने लगी।

‘‘क्या बात है? तुम्हारी सांस कैसे फूलने लगी? क्या पहले भी ऐसा होता था?’’ मुझे तकलीफ में देख कर हैरान परेशान मनुज ने पूछा।

‘‘मैं ने अपनी बीमारी के बारे में आप को पत्र लिखा था।’’ प्रश्न का समाधान करते हुए मैंने कहा।

‘‘पत्र, कौन सा पत्र? तुम्हारे पत्र में बीमारी के बारे में तो जिक्र ही नहीं था।’’


तनूजा को लगा, पृथ्वी घूम रही है... क्या इनको मेरा पत्र नहीं मिला? मैं तो इनका पत्र प्राप्त कर यही समझती रही कि मेरी कमी के साथ ही इन्होंने मुझे स्वीकारा है। तनाव व चिंता के कारण घबराहट होने लगी थी। पर्स खोल कर दवा ली, लेकिन जानती थी रोग की तीव्रता 2-3 दिन के बाद ही कम होगी। दवा के रूप में प्रयुक्त होने वाला इनहेलर शरम व झिझक के कारण यह सोचकर नहीं लाई थी कि यदि किसी ने देख लिया और पूछ बैठा तो क्या उत्तर दूंगी !!


बीमारी को लेकर मनुज ने घर सिर पर उठा लिया। इनका रौद्ररूप देख कर मैं दहल गई थी। आखिर गलती हमारी ओर से हुई थी। बीमारी को छिपाना ही भयंकर सिद्ध हुआ था। मेरा लिखा पत्र डाक एवं तार विभाग की गड़बड़ी के कारण इन तक नहीं पहुंच पाया था।


‘‘बेटा, आजकल के समय में कोई भी रोग असाध्य नहीं है। हम बहू का इलाज करवाएंगे। तुम क्यों चिंता करते हो?’’ मनुज को समझाते हुए ससुर जी ने कहा।

‘‘पिताजी, मैं इस के साथ नहीं रह सकता। मैंने एक सर्वगुणसंपन्न व स्वस्थ जीवनसाथी की तलाश की थी न कि रोगी की। क्या मैं इस की लाश को जीवन भर ढोता रहूंगा? अभी यह हाल है तो आगे क्या होगा?’’ कड़कती मुद्रा में मनुज ने कहा।


‘‘पापा, भैया ठीक ही तो कह रहे हैं।’’ स्नेहा, मेरी ननद ने भाई का समर्थन करते हुए कहा।


‘‘तुम चुप रहो। अभी छोटी हो, शादी विवाह कोई बच्चों का खेल नहीं है जो तोड़ दिया जाए।’’ पिता समान ससुर जी ने स्नेहा को डांटते हुए कहा।


‘‘मैं कल ही अपने काम पर लौट रहा हूं।’’ कुछ कहने को आतुर अपने पिता को चुप कराते हुए मनुज ने कहा और वह घर से चले गए।


मनुज की बातों से व्याकुल सास मेरे पास आईं। मेरी आंखों से बहते आंसुओं को अपने आंचल से पोंछते हुए बोलीं, ‘‘बेटी घबरा मत, सब ठीक हो जाएगा। बेवकूफ लड़का है, इतना भी नहीं समझता कि बीमारी कभी भी किसी को भी हो सकती है। इसकी वजह से विवाह जैसे पवित्र संबंध को तोड़ा नहीं जा सकता। हां, इतना अवश्य है कि राजेंद्र भाईसाहब को बीमारी के संबंध में छिपाना नहीं चाहिए था।’’


‘‘मांजी, मम्मी पापा ने छिपाया अवश्य था, किंतु मैंने इन्हें सब कुछ सच सच लिख दिया था। इनका पत्र प्राप्त कर मैं समझी थी कि इन्होंने मेरी बीमारी को गंभीरता से नहीं लिया है, वरना मैं विवाह ही नहीं करती।’’ कहते कहते आंचल में मुंह छिपा कर तनूजा रो पड़ी थी।


डाक्टर भी आ गए थे। रोग की तीव्रता को देख कर इंजैक्शन दिया तथा दवा भी लिखी। रोग की तीव्रता कम होने लगी थी, किंतु इन के जाने की बात सुन कर मन अजीब सा हो गया था। सारी शरम छोड़ कर सासू माँ से कहा, ‘‘मम्मी, क्या ये एक बार, सिर्फ एक बार मुझ से बात नहीं कर सकते?’’


सासू माँ ने मनुज से आग्रह भी किया, किंतु कोई भी परिणाम न निकला। मनुज के जाते समय भी सबके साथ वह भी बाहर आई। इन्होंने मां और पिताजी के पैर छुए, बहन को प्यार किया और मेरी ओर उपेक्षित दृष्टि डाल कर चले गए। सासुमां ने दिलासा देते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा तो विह्वल स्वर में वह बोल उठी, ‘‘मां, मेरा क्या होगा?’’


आदमी इतना तटस्थ हो सकता है, तनुजा ने स्वप्न में भी कभी नहीं सोचा था। विगत एक हफ्ते में उन्होंने कुछ अंतरंग क्षण व्यतीत किए थे, कुछ सपने बुने थे, सुख-दुख में साथ रहने की कसमें खाई थीं, क्या वह सब झूठ था?


डैडी को पता चला तो वे भी आए। उनके उदास चेहरे को देखकर तनुजा उनसे नजरें भी न मिला सकी । कितने प्रयत्न, कितनी खुशी से संबंध तय किया था, क्या सिर्फ एक हफ्ते के लिए ?

‘‘दिवाकरजी, आप मनुज को समझा कर देखिए ,यह रोग भयंकर रोग तो है नहीं, मैं सच कहता हूं, हमारे यहां न मेरी तरफ और न ही इस की मां की तरफ किसी को यह रोग है अतः यदि प्रयास किया जाए तो ठीक हो सकता है।’’ गिड़गिड़ाते हुए डैडी ने कहा।


‘‘भाईसाहब, अपनी तरफ से तो मैं पूर्ण प्रयास करूंगा पर नई पीढ़ी को तो आप जानते ही हैं, यह सदा अपने मन की ही करती है।’’ मेरे ससुरजी डैडी को दिलासा देते हुए कहा।


तनूजा डैडी के साथ अपने घर वापस लौट आई। इस तरह एक हफ्ते में सारे सुख - दुख उसके आंचल में आ गिरे थे। इस जीवन का क्या होगा? यह प्रश्न बार बार उसके जेहन में उभर रहा था। मां उसके लौट आने के बाद गुमसुम हो गई थीं। डैडी अब देर से घर लौटते थे। शायद कोई भी एक दूसरे से नजरें मिलाने का साहस नहीं कर पा रहा था।


तनूजा विश्वविद्यालय की पढ़ाई करना नहीं चाहती थी। 2 बार प्रीमैडिकल परीक्षा में असफल होने के पश्चात एक बार फिर प्रीमैडिकल परीक्षा में सम्मिलित होने का उसने अपना निर्णय सुनाया तो सभी ने उसके इस निर्णय का स्वागत किया। परीक्षा का फॉर्म भरते समय नाम के आगे कुमारी शब्द देख कर मम्मी व डैडी बिगड़ उठे, किंतु, भाई रंजन ने मेरे समर्थन में आवाज उठाई, बोले, ‘‘ठीक ही तो है। जो संबंध अब रहा ही नहीं, उसे लाश की तरह उठाए आखिर यह कब तक फिरेगी?’’


एक महीने पश्चात मनुज ने अपने वकील के माध्यम से तलाक के लिए नोटिस भिजवा दिया। मां- पिताजी ने हस्ताक्षर करने से मना किया, किंतु उसने दृढ़ स्वर में कहा, ‘‘पति-पत्नी का संबंध मन व आत्मा से होता है... यदि मन ही एकाकार नहीं हुए तो टूटी डोर में गांठ बांधने से क्या फायदा? ’’ कहते हुए उसने कागज पर हस्ताक्षर कर दिए।


क्रमशः


तनूजा के जीवन में अब न कोई उमंग थी और न ही तरंग। किसी पर भार बन कर रहना नहीं चाहती थी अतः प्रीमैडिकल में सफल होना उसका प्रथम और अंतिम ध्येय बन गया था। समय कम था। मन को पढ़ाई में एकाग्र किया। परीक्षा हुई और परिणाम निकला। सफल प्रतियोगियों में मैं अपना नाम देख कर खुशी से झूम उठी। वह खुश होती भी क्यों नहीं, मम्मी-डैडी के उदास चेहरों पर एक बार फिर खुशी झलकने लगी थी और उसे उसकी मेरी मंजिल मिल गई थी।


अंततः 5 वर्ष की उसकी एम.बी.बी.एस. पढ़ाई पूरी हुई। वह लड़कियों में प्रथम रही थी। आखिर उसकी योग्यता के कारण उसका प्रादेशिक सरकारी सेवा में नियुक्ति हो गई। वह पूरे दिन रोगियों की सेवा करती तो अलग तरह के आनंद की प्राप्ति होती। कभी-कभी तो उसे लगता कि वह जीवन क्षणमात्र के लिए था। उसका जन्म तो मानव मात्र की सेवा के लिए हुआ है। कभी फ्लोरेंस नाइटिंगेल से अपनी तुलना करती तो कभी जॉन ऑफ आर्क से, मन में छाया कुहासा पल भर में दूर हो जाता और कर्तव्यपथ पर कदम पूरे विश्वास के साथ स्वयं बढ़ने लगते।


एक दिन तनूजा अस्पताल में बैठी रोगियों को देख रही थी कि एक युगल ने कमरे में प्रवेश किया। वह उस जोड़े को देख कर चौंक गई, किंतु चेहरे पर आए परिवर्तन पर यथासंभव अंकुश लगा लिया।


‘‘कहिए, क्या तकलीफ है आप को?’’ तनूजा ने सामान्य होते हुए पूछा।


‘‘ डॉक्टर, आप इनका चैकअप कर लीजिए। इनको चलने फिरने में तकलीफ होती है, पैरों में सूजन भी है।’’ साथ आये युवक ने कहा।


‘‘चलिए।’’ उठते हुए उसने कहा व कमरे में बने पार्टीशन में ले जाकर युवती का पूरा चैकअप किया। बाहर आकर उसने कहा, ‘‘कोई परेशानी की बात नहीं है, इन्हें उच्च रक्तचाप है। इसी कारण पैरों में सूजन है। दवा लिख रही हूँ, समय पर देते रहिएगा। बच्चा होने तक लगातार हर 15 दिन बाद चैकअप करवाते रहिएगा।’’


‘‘जी, डाक्टर.’’


‘‘नाम?’’ दवाई का परचा लिखते हुए उसने पूछा.


‘‘ऋचा शर्मा।’’ उत्तर युवती ने दिया।


परचे पर नाम लिखते समय न जाने क्यों हाथ कांप गया था। उसने कुछ दवाएं व टौनिक लिख कर दिए, साथ में कुछ हिदायतें भी। वे दोनों उठ कर चले गए, किंतु दिल में हलचल मचा गए। उस दिन, दिनभर व्यग्र रही। बार-बार अतीत आकर कुरेदने लगा। जो अतीत वह पीछे छोड़ आई थी, वह क्यों फिर से उसे बेचैन करने लगा।


तनूजा ने अलमारी से वह फोटो निकाली जो विवाह के दूसरे दिन जाकर खिंचवाई थी। फ़ोटो देख कर वह बुदबुदा उठी थी, ‘तुम क्यों मेरे शांत जीवन में हलचल मचाने आ गए। मैं ने तुम से कुछ नहीं मांगा। तुमने साथ चलने से इनकार कर दिया तो मैं ने अपनी राह स्वयं बना ली। तुम इस राह में फिर क्यों आ गए। कितना त्याग और बलिदान चाहते हो?’ रात अशांति में, बेचैनी में गुजरी। सुबह उठी तो रात भर जागने के कारण आंखें बोझिल थीं। अस्पताल जाने की इच्छा नहीं हो रही थी, किंतु फिर भी यह सोच कर तैयार हुई कि कार्य में व्यस्त रहने पर मन शांत रहता है।


अस्पताल में कमरे के बाहर मनुज को प्रतीक्षारत पाया तो कदम लड़खड़ा गए किंतु सहज बनने का अभिनय करते हुए उन्हें अनदेखा कर अपने कमरे में जाकर कुरसी पर बैठ गई। मनुज भी उसके पीछे- पीछे उसके कमरे में चले आए थे।


‘‘माफ कीजिएगा, आप तनूजा हैं न?’’ लड़खड़ाते शब्दों में उन्होंने पूछा।

‘‘क्यों, आप को कुछ शक है क्या?’’ तेज निगाहों से देखते हुए उसने पूछा।

‘‘मैंने तुम्हारे साथ कठोर व्यवहार व अन्याय किया है, जिसे मैं कभी भूल नहीं पाया। कल तुम्हें देखने के बाद से ही मैं पश्चात्ताप की अग्नि में जल रहा हूँ मुझे माफ कर दो, तनु।’’

‘‘तनु नहीं, कुमारी तनुजा कहिए और बाहर आप मेरे नाम की नेमप्लेट देख लीजिए।’’ तनूजा ने निर्विकार मुद्रा में कहा। 

‘‘आपकी पत्नी की तबीयत अब कैसी है? उनका खयाल रखिएगा और हो सके तो प्रत्येक 15 दिन बाद परीक्षण करवाते रहिएगा। ’’ कहकर उसने घंटी बजा दी।

 ‘‘मरीजों को अंदर भेज दो।’’ चपरासी को निर्देश देते हुये उसने कहा।


‘‘अच्छा, मैं चलता हूँ, तनु।’’ मनुज ने मेरी ओर आग्रहपूर्वक देखते हुए कहा।

‘‘तनु नहीं, कुमारी तनुजा।’’ उसने कुमारी शब्द पर थोड़ा जोर देते हुए तीव्र स्वर में कहा।

उसका व्यवहार देखकर, लड़खड़ाते कदमों से मनुज चले गए।


तनूजा उन्हें देखती रह गई। क्या यह वही व्यक्ति है जिस ने उसे मझधार में डूबने के लिए छोड़ दिया था ? किंतु यह इस समय इतना निरीह क्यों? इतना दयनीय क्यों? क्या यह सिर्फ उसके पद के कारण है या इस के जीवन में कोई अभाव है? अपनी सोच पर उसे स्वयं पर हंसी आने लगी थी। इसे क्या अभाव होगा, जिसकी इतनी प्यारी पत्नी है, पद है, मान सम्मान है।


तब तक मरीजों ने आकर उसकी विचार शृंखला को भंग कर दिया और वह कार्य में व्यस्त हो गई।


अतीत ने उसे कुरेदा अवश्य था किंतु अनजाने सुख भी दे गया था...वह व्यक्ति जिसने उसे एक समय अपमानित किया था, मानसिक पीड़ा दी थी, वह उसके सामने निरीह व दयनीय बनकर खड़ा था। इससे बड़ा  सुख और क्या हो सकता था? उस दिन के पश्चात उसके जीवन में एक और परिवर्तन आ गया था, वह तस्वीर जिसे शादी के दूसरे दिन उन दोनों ने बड़े प्रेम से खिंचवाया था, उस फ़ोटो को निकालकर उसने अपने बेड की साइड टेबल पर रख लिया था। अब उसे देखे बिना उसे नींद ही नहीं आती थी। उस तस्वीर में उसका निरीह चेहरा उसके आत्मसम्मान को सुख पहुंचाता था। शायद इसलिए विवाह के 10 वर्षों पश्चात वह तस्वीर उसके बेडरूम की शोभा बढ़ाने लगी थी।


ऋचा हर 15 दिन पश्चात आती रही, किंतु उस के साथ वह चेहरा देखने को नहीं मिला। 2 माह पश्चात लड़का हुआ। उसने आकर आभार प्रदर्शन करते हुए कहा था, ‘‘तनुजाजी, मैं आपका गुनाहगार हूँ किंतु आपने मुझे बेटे का उपहार देकर अनिर्वचनीय आनंद प्रदान किया है। शायद, आप नहीं जानती कि यह मेरी और ऋचा की तीसरी संतान है। अन्य 2 जन्म से पूर्व ही काल के गाल में समा गईं थीं।’’


मनुज चला गया, किंतु अपने हृदय में सुलगते दावानल को मेरे सामने प्रकट कर गया। शायद वह अपनी पूर्व 2 संतानों की असमय मौत का कारण उसके साथ पूर्व में किए गए अपने गलत व्यवहार को समझ बैठा था, तभी वह उसके सामने स्वयं को इतना निरीह व कातर महसूस कर रहा था।


कुछ दिन पश्चात ही उसका वहां से स्थानांतरण हो गया, अतीत से संबंध कट गया... किंतु कभी-कभी उसका दिल अपने ही हाथों से मात खा जाता था। तब तड़प उठती थी तथा सोचती कि क्या मेरे जीवन में यही एकाकीपन लिखा है? मम्मी-पापा का देहांत हो गया था। भाई अपनी घरगृहस्थी में व्यस्त था।


कितने वर्ष यूँ ही बीत गए। अपने को बेसहारा पाकर उसने एक अनाथ बेसहारा लड़की को गोद ले लिया ताकि वह जीवन की शून्यता को भर सके। लड़की पढ़ने में तेज थी। वह भी उसके नक्शे कदम पर चलकर डाक्टरी का प्रोफेशन अपनाकर समाज के अनाथ बेसहारा जनों की सेवा करना चाहती है।


उस लड़की से उसकी मुलाकात भी फिल्मी स्टाइल में हुई। करीब 5 वर्ष पूर्व वह न्यूमोनिया बीमारी से पीडि़त होकर अस्पताल में भरती हुई थी। उसका कोई नहीं था। वह अनाथाश्रम में रहती थी। उसकी मासूम नीली आंखों में न जाने क्या था कि उसका मन उसे अपनाने को मचल उठा... न जाने कब वह उसकी धड़कन बनती गई अंततः वह उसे घर ले लाई ।


पिछले वर्ष ही मैडिकल की प्रतियोगी परीक्षा में उसका चयन हुआ था और पढ़ाई के लिए उसे इलाहाबाद जाना पड़ा और वह फिर एक बार अकेली हो गई थी।


जीवन उसके साथ आंखमिचौली खेल रहा था। सुख-दुख एक ही सिक्के के 2 पहलू हो चले थे। एक दिन अपने कमरे में बैठी अपने संस्मरण लिख रही थी कि नौकर ने आकर बताया कि एक आदमी आपसे मिलना चाहता है। वह बाहर निकल कर आई तो वह बोला, ‘‘डाक्टर साहब, शर्मा साहब का लड़का बेहद बीमार है. आप शीघ्र चलिए।’’


उसने अपना बैग उठाया तथा कार में उस अनजान आदमी को बैठाकर चल पड़ी। ऐसे अवसरों पर अनजान व्यक्ति के साथ जाते समय मन में बेहद उथलपुथल होती थी, किंतु यह सोच कर चल पड़ती कि हर आदमी बुरा नहीं होता, फिर किसी पर अविश्वास क्यों और किसलिए, इंसान को अपना कर्तव्य करते रहना चाहिए। हमारा कर्तव्य हमारे साथ, उस का कर्तव्य उस के साथ...यही तो मेरी विचारधारा थी, जीवनदर्शन था।


कार के पहुंचते ही एक आदमी तेजी से उधर से बाहर आया और बोला, ‘‘डाक्टर साहब, आपको तकलीफ हुई होगी, लेकिन मजबूर था. प्रतीक्षित को 104 डिगरी बुखार है.।’’


‘‘चलिए।’’ तब तक हम रोशनी में पहुंच चुके थे।


‘‘अरे तनु, तुम... ओह, माफ कीजिएगा तनूजाजी, मुझसे गलती हो गई।’’ मनुज एकदम हड़बड़ा कर बोले।


तनूजा भी एकदम चौंक उठी थी। इस जिंदगी में यह दोबारा अप्रत्याशित मिलन किसलिए? वह सोच ही नहीं पा रही थी। अपने अनचाहे विचारों को परे ढकेलकर उसने पूछा, ‘‘प्रतीक्षित कहां है?’’


" आप अंदर आइए।" मनुज ने उसे अंदर ले जाते हुए कहा।


वह अंदर कमरे में पहुंची तो देखा प्रतीक्षित बुखार में तप रहा है। उसकी आंखें बंद हैं, किंतु मुंह से कुछ अस्फुट स्वर निकल रहे हैं। नब्ज देखी तो टायफायड के लक्षण नजर आए। ज्वर की तीव्रता को कम करने के लिए दवा बैग से निकाल कर खिला दी। अन्य दवाइयां परचे पर लिखकर देते हुए बोली, ‘‘ये दवाएं बाजार से मंगवा लीजिए तथा ज्वर की तीव्रता को कम करने के लिए ठंडे पानी की पट्टी माथे पर रखिए और हाथ, पैर व तलवे की भी मालिश कीजिए।’’


मनुज प्रतिक्षित के हाथों को अपनी गोद में लेकर सहलाने लगे तथा चिंतित व घबराए स्वर में बोले, ‘‘डाक्टर साहब, मेरा प्रतीक्षित बच जाएगा न? यही मेरा जीवन है. मेरे जीवन की एकमात्र पूंजी।’’


लगभग एक घंटे पश्चात बंद पलकों में हलचल हुई तथा होंठ बुदबुदा उठे, ‘‘प…पानी… पानी…। ’’


मनुज ने तत्काल उठकर उसके मुंह में चम्मच से पानी डाला. दवा के असर के कारण वह पानी पी कर फिर सो गया।


‘‘अच्छा, अब मुझे इजाजत दीजिए। आवश्यकता पड़ने पर बुला लीजिएगा।’’ घड़ी पर निगाह डालते हुए मैं ने कहा।


‘‘चलिए, मैं आपको छोड़ आता हूँ।’’ मनुज ने मेरा बैग उठाते हुए कहा।


" नहीं, मुझे अकेले चलने की आदत है ,मैं चली जाऊंगी...।" तनूजा ने कहा और वह उसे निशब्द छोड़कर चली आई।


रात भर वह बेचैन रही। प्रतीक्षित से न जाने क्यों उसे अनजाने ही लगाव हो गया था। वह जितना ही उसकी भोली व मासूम सूरत से भागने का प्रयास करती वह उतनी ही और करीब आती जाती। ऋचा नजर नहीं आ रही थी, लेकिन पूछने का साहस भी नहीं कर पाई।


सुबह अस्पताल जाने के लिए गाड़ी स्टार्ट की तो न जाने कैसे स्टियरिंग मनुज के घर की ओर मुड़ गया। जब वहां जाकर कार खड़ी हुई तब होश आया कि अनजाने में वह कहां से कहां आ गई है। यह कैसी दिल की स्थिति थी, वह स्वयं भी नहीं जान पा रही थी। दिल पर अंकुश रखकर गाड़ी बैक करने ही वाली थी कि नौकर दौड़ा दौड़ा आया, तथा बोला, ‘‘डाक्टर साहब, आपकी कृपा से प्रतीक्षित भैया होश में आ गए हैं। साहब आपको ही याद कर रहे हैं।’’


न चाहते हुए भी उसे उतरना पड़ा। उसे वहां उपस्थित देख कर मनुज आश्चर्यचकित रह गए। उन्हें एकाएक विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वह बिना बुलाए उनके बेटे का हालचाल पूछने आएगी ।


‘‘प्रतीक्षित कैसा है? कल उसके ज्वर की तीव्रता देखकर मैं भी घबरा गई थी। अतः उसे देखने चली आई।’’ मनुज के चेहरे पर अंकित प्रश्नों को नजरअंदाज करते हुए उसने कहा ।


मनुज ने प्रतीक्षित से उसका परिचय करवाया तो वह बोला, ‘‘डाक्टर आंटी, मैं ठीक हो जाऊंगा न, तो खूब पढ़ूंगा और आपकी तरह ही डाक्टर बनूंगा। फिर आपकी तरह ही सफेद कोट पहनकर, स्टेथोस्कोप लगा कर बीमार व्यक्तियों को देखूंगा।’’


‘‘अच्छा बेटा, पहले ठीक हो जाओ। अभी ज्यादा खेलना कूदना मत, आराम करना। समय पर दवा खाना। ठीक से खाना खाना वरना ताकत नहीं आएगी। अच्छा, मैं चलती हूँ।’’


‘‘आंटी, आप फिर आइएगा, आपको देखे बिना मुझे नींद ही नहीं आती है।’’


‘‘बड़ा शैतान हो गया है, बार बार आपको तंग करता रहता है।’’ मनुज ने खिसियानी आवाज में कहा।


‘‘कोई बात नहीं, बच्चा है।’’ उसने कहा पर अप्रत्यक्ष में मन कह उठा, ‘तुमसे तो कम है. तुमने तो जीवन भर का दंश दे दिया है।’


तनूजा जानती थी कि उसका वहां बार-बार जाना उचित नहीं है। कहीं मनुज कोई गलत अर्थ न लगा लें। मनुज की आंखों में उसे अपने लिए चाह उभरती नजर आई थी किंतु वह तटस्थ बनी रही।


प्रतीक्षित के ठीक होने पर उसने जाना बंद कर दिया। वैसे भी प्रतीक्षित के साथ उसका रिश्ता ही क्या था? सिर्फ एक डाक्टर व मरीज का ही न...जब बीमारी ही नहीं रही तो डाक्टर का क्या औचित्य?


एक दिन शाम को टी.वी. पर अपनी मनपसंद पिक्चर ‘परिणीता’ देख रही थी। नायिका की पीड़ा मानो मेरी अपनी पीड़ा हो, पुरानी भावुक कर देने वाली पिक्चरों से उसे लगाव था। जब फुरसत मिलती, वह देख लिया करती थी। तभी नौकर ने आकर उसे सूचना दी कि कोई आया है। मरीजों का चैकअप करने वाले कमरे में बैठने का निर्देश देकर वह गई। सामने मनुज और प्रतीक्षित को बैठा देखकर वह चौंक गई।


‘‘कैसे हो, बेटा? अब तो स्कूल जाना शुरू कर दिया होगा?’’ उसने स्वर को यथासंभव मुलायम बनाते हुए कहा।


‘‘हां, स्कूल तो जाना प्रारंभ कर दिया है किंतु आपसे मिलने की बहुत इच्छा कर रही थी। इसलिए जिद करके डैडी के साथ आ गया। आप क्यों नहीं आतीं डाक्टर आंटी अब हमारे घर?’’ प्रतीक्षित ने मासूमियत से कहा।


‘‘बेटा, तुम्हारे जैसे और भी कई बीमार बच्चों की देखभाल में समय ही नहीं मिल पाता है।’’


‘‘यदि आप नहीं आ सकतीं तो क्या मैं शाम को या छुट्टी के दिन आप के घर मिलने आ सकता हूँ ?’’


‘‘हां, क्यों नहीं।’’ उत्तर तो दे दिया था, किंतु क्या मनुज पसंद करेंगे ?


‘‘घर में भी सदैव आपकी बात करता रहता है। डाक्टर आंटी ऐसी हैं, डाक्टर आंटी वैसी हैं।’’ फिर थोड़ा रुक कर मनुज बोले, ‘‘आपने मेरे पुत्र को जीवनदान देकर मुझे ऋणी बना दिया है. मैं आपका एहसान जिंदगी भर नहीं भूलूंगा।’’


‘‘वह तो मेरा कर्तव्य था।’’ मेरे मुख से संक्षिप्त उत्तर सुन कर मनुज कुछ और कहने का साहस न जुटा सके, जबकि लग रहा था कि वे कुछ कहने आए हैं और वह चाहकर भी ऋचा के बारे में न पूछ सकी। प्रतीक्षित इतने दिन बीमार रहा। वह क्यों नहीं आई, क्यों उसने अपने बच्चे की खबर नहीं ली।


उस दिन के पश्चात प्रतीक्षित लगभग रोज ही उसके पास आने लगा। उसका काफी समय उसके साथ बीतने लगा। एक दिन बातों बातों में मैंने उससे उसकी मां के बारे में पूछा, तो वह बोला, ‘‘डाक्टर आंटी, मां याद तो नहीं हैं, सिर्फ तस्वीर देखी है, लेकिन डैडी कहते हैं कि जब मैं 3 साल का था, तभी मां भगवान के पास चली गईं थी।’’


मन हाहाकार कर उठा था। एक को तो उसने स्वयं ठुकरा दिया और दूसरी स्वयं उसे छोड़ कर चली गई। प्रकृति ने उसे उस के अमानवीय व अमानुषिक कृत्य के लिए दंड दे ही दिया था। अब उसे भी प्रतीक्षित के आने की प्रतीक्षा रहती। उसकी स्मरणशक्ति व बुद्धि काफी तीव्र थी। वह जो उसे एक बार बता देती, वह भूलता नहीं था। किसी भी नई चीज, नई वस्तु को देखकर उसके उपयोग के बारे में बालसुलभ जिज्ञासा से पूछता तथा वह भी यथासंभव उसके प्रश्नों का समाधान करती।


स्कूल में विज्ञान प्रदर्शनी थी। उसकी सहायता से प्रतीक्षित ने मॉडल बनाया। मॉडल देखकर वह अत्यंत प्रसन्न था।


प्रदर्शनी के पश्चात वह सीधा मेरे घर आया। उस दिन मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं थी। वह अपने शयनकक्ष में लेटी आराम कर रही थी। वह दौड़ता हुआ आया तथा खुशी से चिल्लाता हुआ बोला, ‘‘डाक्टर आंटी, आप कहां हो? देखो, मुझे प्रथम पुरस्कार मिला है. और आंटी, गवर्नर ने हमारी प्रदर्शनी का उद्घाटन किया था और उन्होंने ही पुरस्कार भी दिया। आंटी, उनके साथ मेरी फोटो भी खिंची है। उन्होंने मेरी बहुत प्रशंसा की।’’ 


" बधाई बेटा, ऐसे ही आपको पुरस्कार मिलते रहें।' उसने लेटे-लेते कहा।


 ‘‘ आंटी आप आज इस समय लेटे क्यों हो, क्या आपकी तबीयत खराब है क्या?’’ उसने पलंग पर बैठते हुए उसकी ओर देखते हुए अचानक कहा।


‘‘लगता है थोड़ा बुखार हो गया है. ठीक हो जाएगा।’’


‘‘आप सबकी देखभाल करती हैं किंतु अपनी नहीं।’’ 


तभी उसकी नजर स्टूल पर रखे फोटो पर गई। फोटो हाथ में उठाकर उसने कहा, ‘‘आंटी, यह तस्वीर तो पापा की है। साथ में आप भी हैं। इसमें आप दोनों यंग लग रहे हैं। यह तस्वीर आप ने कब और क्यों खिंचवाई?’’


जिसका मुझे डर था वही हुआ, इसीलिए कभी उसे शयनकक्ष में नहीं लाती थी। वह फोटो मेरी अहम संतुष्टि का साधन बनी थी अतः चाहकर भी उसे अंदर नहीं रख पाई थी। मेरा अब कोई संबंध भी नहीं था मनुज से, लेकिन यदि तथ्य को छिपाने का प्रयत्न करती तो वह कभी संतुष्ट न हो पाता तथा कालांतर में मेरी उजली छवि में दाग लग सकता था अतः न चाहते हुए भी उसे सब कुछ सचबसच बताना पड़ा।


वस्तुस्थिति जान कर वह उबल पड़ा था...यह डैडी ने अच्छा नहीं किया। मैं यह सोच भी नहीं सकता था कि डैडी ऐसा भी कर सकते हैं। मैं अभी डैडी से जाकर इसका उत्तर मांगता हूं कि उन्होंने आपके साथ ऐसा क्यों किया? अगर मैं बीमार हो जाऊं तो क्या वे मुझे भी छोड़ देंगे? वह जाने को उद्यत हुआ.... उसने उसका हाथ पकड़कर कहा, ‘‘बेटा, मैंने कभी किसी से कुछ नहीं मांगा। जीवनपथ पर जैसे भी चली जा रही हूँ, चलने दो। अब जीवन के आखिरी पड़ाव पर मेरी भावनाओं, मेरे विश्वास, मेरे झूठे आत्मसम्मान को ठेस मत पहुंचाना तथा किसी से कुछ न कहना।’’ कहते-कहते न चाहते हुए भी प्रतीक्षित के सामने आंखों से आंसू टपक पड़े।


‘‘मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगा मां, किंतु आप को न्याय दिलाने का प्रयत्न अवश्य करूंगा।’’ दृढ़ निश्चय व दृढ़ कदमों से वह कमरे से बाहर चला गया था।


किंतु उसके मुखमंडल से निकला, ‘मां’ शब्द उसके जाने के पश्चात भी वातावरण में गूंज कर उसकी उपस्थिति का एहसास करा रहा था। कैसा था वह संबोधन… वह आवाज, उसकी सारी चेतना…संपूर्ण अस्तित्व सिर्फ एक शब्द में खो गया था। जिस मोहपाश को वह वर्षों पूर्व तोड़ आई थी, अनायास ही उसमें फंसती जा रही थी…कैसा है यह बंधन? कैसे हैं ये दिल के रिश्ते ? अनुत्तरित प्रश्न बारबार उसके अंत:स्थल में प्रहार कर उसे बेचैन करने लगे थे।


समाप्त



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