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Sudha Adesh

Tragedy


3.5  

Sudha Adesh

Tragedy


गांधारी

गांधारी

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करीब 10 वर्षों पश्चात छवि अपने गाँव धीरजपुर आई है। इस गाँव में उस का बचपन बीता है। यहाँ उसके दादाजी, तायाजी, ताईजी और उनके बच्चे व चचेरे भाई बहन हैं। तायाजी की बड़ी बेटी शिखा का विवाह है। चारों ओर धूमधाम है। कहीं हलवाई बैठा मिठाई बना रहा है तो कहीं मसाले पीसे जा रहे हैं, कहीं दरजी बैठा सिलाई कर रहा है तो कहीं हँसी ठिठोली चल रही है…पर वह सब से अनभिज्ञ घर की छत पर खड़ी प्राकृतिक सौंदर्य निहार रही थी। चारों तरफ हरे-भरे खेत, सामने दिखते बगीचे में नाचते मोर तथा नीचे कुएँ से पानी भरती पनिहारिन के दृश्य आज भी उस के ज़हन में बसे थे। वह सोचा करती थी न जाने कैसे ये पनिहारिनें सिर पर दो और बगल में एक पानी से भरे घड़े लेकर चल पाती हैं ।


यह सोच ही रही थी कि छत पर एक मोर दिखाई दिया। फोटोग्राफी का उसे बचपन से शौक था और जब से उसके हाथ में स्मार्टफोन आया है, हर पल को कैद करना उस का जनून बनता जा रहा था। मानो हर यादगार भोगे पल से वह स्वयं को सदा जोड़े रखना चाहती हो। कुतूहलवश उसने उसके नृत्य का वीडियो बनाने के लिए अपने मोबाइल का कैमरा ऑन किया पर वह मोर जैसे आया था वैसे ही चला गया, शायद प्रकृति में आए बदलाव से वह भी अछूता नहीं रह पाया ।

अनमने मन से छवि अंदर आई। दीवानखाने में लगे विशालकाय कपड़े का कढ़ाईदार पंखा याद आया जिसे बाहर बैठा पसीने में लथपथ नौकर रस्सी के सहारे झला करता था और वह एवं अन्य सभी आराम से बैठे पंखे की ठंडी हवा में मस्ती किया करते थे। वह सोचने लगी, न जाने कैसी संवेदनहीनता थी कि हम उस निरीह इंसान के बारे में सोच ही नहीं पाते थे ।


पिछले दस वर्षों में सब कुछ बदल गया है। कच्चे घरों की जगह पक्के घरों, टूटी-फूटी कच्ची सड़कों की जगह पक्की सड़कों तथा हाथ के पंखों की जगह बिजली से चलने वाले पंखों ने ले ली है। किसी-किसी घर में गैस के चूल्हे तथा पानी की पाइप लाइन भी आ गई हैं। विकास सिर्फ शहरों में ही नहीं, गाँव में भी स्पष्ट नजर आने लगा है ।

‘‘दीदी, चलिए आप को गाँव घूमा लाऊँ।’’ छोटी बहन नील ने उस के पास आ कर कहा।

गाँव घूमने की चाह उस के अंदर भी थी अतः वह उसके साथ चल पड़ी। पहले वह मंदिर ले कर गई। मंदिर परिसर में ही एक छोटा सा मंदिर और दिखाई दिया...रानी सती मंदिर। वहाँ पहुँचने के बाद छवि ने नील की ओर आश्चर्य से देखा।


‘‘दीदी, हमारी छोटी दादी अपने पति के साथ यहीं सती हुई थीं। उनकी स्मृति में दादाजी ने उनके नाम से मंदिर बनवा दिया। जिस दिन वे सती हुई थीं, उस दिन यहाँ हर साल बहुत बड़ा मेला लगता है। दूर-दूर से औरतें आकर अपने सुहाग की मंगलकामना करते हुए उनके समान पतिपरायण बनने की कसमें खाती हैं ।’’ श्रद्धा से नतमस्तक होते हुए नील ने कहा।


‘‘छोटी दादी सती हो गई थीं पर यह तो आत्मदाह हुआ। क्या किसी ने उन्हें रोकने का प्रयास नहीं किया ?’’ आश्चर्य से छवि ने पूछा ।

‘‘यह तो पता नहीं दीदी, पर लोग कहते हैं कि वे अपने पति को बेहद चाहती थीं। वे उनकी मृत्यु को सहन नहीं कर पाईं। अंतिम क्षण तक साथ रहने की कामना के साथ वे श्मशान घाट तक गईं। जब अग्नि ने जोर पकड़ लिया तब वे चिता में कूद पड़ीं। जब तक लोग कुछ समझ पाते तब तक उनका शरीर धू-धू कर जलने लगा। उनको बचाने की सारी कोशिशें व्यर्थ हो गई थीं।’’ नील ने कहा।


‘‘यह घटना कब घटित हुई ?’’

‘‘करीब 40 वर्ष हो गए होंगे।’’

नील की बात सुन कर छवि अपने विचारों में खोने लगी थी…

इस मंदिर की उसे याद क्यों नहीं है ? ‘ बचपन की सब बातें याद थोड़े ही रहती हैं सोचकर मन को तसल्ली दी। वैसे भी वह यहाँ रही ही कितना है।

चार वर्ष की थी तभी अपने माँ-पापा के साथ शहर चली गई थी। बीच-बीच में कभी आती भी थी तो हफ्ता दो हफ्ता रहकर चली जाती थी। पिछले दस वर्षों से तो उसका आना ही नहीं हो पाया है। कभी उसकी परीक्षा तो कभी भाई प्रियेश की। इस बार शिखा दीदी के विवाह को देखने की चाह उसे गाँव ले आई थी, वरना उसकी तो मैडिकल में प्रवेश परीक्षा के लिए कोचिंग चल रही हैं।


वह तो आ गई पर उसका भाई प्रियेश इस समय भी नहीं आ पाया। अगले सप्ताह से उसकी प्रैक्टिकल परीक्षा होने वाली है। शहर की भागदौड़ वाली जिंदगी में गाँव की सहज, स्वाभाविक एवं नैसर्गिक स्मृतियां उसके ज़हन में जब-तब आकर उसे सदा गाँव से जोड़े रखती थीं। इन स्मृतियों को उसने अपनी कहानी और कविताओं में ढाला था, चित्रों में गढ़ा था ...उसके शौक का उसकी सहेलियाँ यह कहकर मज़ाक बनातीं…

 ‘साइंस स्टूडैंट होकर भी इतनी भावुक क्यों हो ? कल्पनाओं की दुनिया से निकल कर यथार्थ की दुनिया में रहना सीखो।’ 


 ‘यह मेरा शौक है। दरअसल, मैं जीवन में घटी हर घटना को मस्तिष्क से नहीं , दिल से महसूस करना चाहती हूँ। उनका हल खोजना चाहती हूँ. शायद, शहर की मशीनी जिंदगी से त्रस्त जीवन को मेरा यह शौक मेरे दिल को सुकून पहुँचाता है। जीवन के हर पहलू को समझने की शक्ति देता है और यही दर्द, मेरे दिल से निकली ध्वनियों में प्रतिध्वनित होता है।’ उनकी बात सुनकर वह कहती।


विचारों के भंवर से निकलते हुए छवि ने नील से कहा, ‘ तू कह रही है कि हर वर्ष यहाँ मेला लगता है तथा स्त्रियां उनके जैसा ही बनने की कामना करती हैं।’’

‘‘हाँ दीदी।’’

‘‘इस का अर्थ है कि हम सती प्रथा का विरोध करने के बजाय उसे बढ़ावा देने का प्रयत्न कर रहे हैं।’’

नील उसकी बात का कोई उत्तर नहीं दे पाई। वे दोनों निशब्द आगे बढ़ते गए। चारों ओर प्राकृतिक सौंदर्य बिखरा पड़ा था। वह उसे आत्मसात करने का प्रयत्न करने लगी।

‘‘दीदी, देखो यह ट्यूबवैल... याद है, यहाँ हम नहाया करते थे। यहाँ से देखो तो जहाँ तक नजर आ रहा है वह पूरी जमीन अपनी है। यह देखो गेहूँ, सरसों के खेत, यह मटर तथा गन्ने के खेत। यहाँ से गन्ने वीरपुर स्थित शूगर फैक्टरी में जाते हैं। देखो, गन्ने ट्रकों पर लादे जा रहे हैं। दीदी, गन्ना खाओगी ?’’ अचानक नील ने पूछा ।

‘‘हाँ, क्यों नहीं ...।’’


छवि को गन्ना चूसना बेहद पसंद था। शहर में भी माँ गन्ने के सीजन में गन्ने मंगा लेती थीं। वह और प्रियेश आँगन में बैठ कर आराम से गन्ना चूसा करते थे। अब जब गन्ने के खेत के पास खड़ी है तब बिना गन्ना चूसे कैसे आगे बढ़ सकती है !! नील ने गन्ना तोड़ा और वे दोनों गन्ने का स्वाद लेने लगीं। गन्ने की मिठास से मन की कड़वाहट दूर हो गई। घर लौटने से पूर्व उसने प्राकृतिक सौंदर्य को कैद करने के लिए कैमरा ऑन किया ही था कि कुछ लोगों के चिल्लाने व एक औरत के भागने की आवाज़ सुनाई दी। उसने नील की ओर देखा...


‘‘दीदी, यह औरत बाल विधवा है। इसके देवर के घर बच्चा पैदा हुआ था पर कुछ ही दिनों में वह मर गया। उसके देवर ने इसे यह कह कर घर से निकाल दिया कि यह डायन है, इसी ने उसके बच्चे को खा लिया है। तब से यह घर-घर माँगकर खाती है और इधर-उधर घूमती रहती है। बच्चे वाली औरतें तो इसे अपने पास फटकने भी नहीं देतीं। आज किसी बच्चे से अनजाने में टकरा गई होगी, जिसकी वजह से इसे पीटा जा रहा है।’’ नील ने उसकी जिज्ञासा शांत करने का प्रयत्न किया ।

‘‘नील, क्या तुम्हें भी ऐसा लगता है कि यह डायन है ?’’

‘‘नहीं दीदी, पर गाँव के लोग ऐसा मानते हैं ।’’

‘‘लोग नहीं, अशिक्षा उन के मुँह से यह कहलवा रही है। अगर ये शिक्षित होते तो ऐसा कभी नहीं कहते ।’’ कहते हुए वह आगे बढ़ी तथा उस औरत को बचाने का प्रयत्न करते हुए अपने मन की बात छवि ने उन लोगों से कही।

‘‘आप यहाँ की नहीं हो....आप क्या जानो इसकी करतूतें। ’’ एक गाँव वाला बोला।

‘‘भाई, यह एक इंसान हैं और एक इंसान के साथ ऐसा व्यवहार शोभा नहीं देता।’’

‘‘अगर इंसान होती तो बच्चों की मौत नहीं होती। एक दो नहीं, पूरे चार बच्चों को डस गई है यह डायन।’’

‘‘भाई, बच्चों की मृत्यु संयोग भी तो हो सकता है। किसी बेसहारा पर इस तरह के आरोप लगाना उचित नहीं है। ’’ 

वह कुछ और कहने जा रही थी, तभी पीछे से किसी ने कहा,‘‘चलो भाई, चलो, ये बड़े ठाकुर साहब की पोती हैं। इनके मुँह लगना उचित नहीं है।’’ यह कह कर वे सब चले गए ।


छवि ने उस औरत को अपने हाथ में पकड़ा गन्ने का टुकड़ा देना चाहा पर वह औरत, ‘‘मैं डायन नहीं हूँ, डायन नहीं हूँ. मैं बड़े ठाकुर को नहीं छोडूँगी...।’’ कहते हुए भाग कर झाडि़यों में छिप गई। उसके चेहरे पर डर स्पष्ट नजर आ रहा था ।

‘बड़े ठाकुर को नहीं छोडूँगी...’ ये शब्द छवि के दिल पर हथौडे़ की तरह प्रहार कर रहे थे। उसने नील की तरफ देखा, वह इस सब से बेखबर गन्ना चूस रही थी।


उस औरत की बातें तथा गाँव वालों का व्यवहार देख कर छवि समझ नहीं पा रही थी कि लोगों के मन में दादाजी के प्रति डर उनके प्रति सम्मान के कारण है या उनके आंतक के कारण। दादाजी गाँव के सर्वेसर्वा हैं। लोग कहते हैं उनकी मर्ज़ी के बिना इस गाँव में एक पत्ता भी नहीं हिलता है। तो क्या दादाजी का इन सब में हाथ है ? अगर दादाजी न्यायप्रिय होते तो न छोटी दादी के साथ ऐसी घटना घटती और न ही लोग उस औरत को डायन कह कर मारते पीटते। अजीब मनःस्थिति के साथ वह घर लौटी। मन की बातें माँ से करनी चाही पर वे ताईजी के साथ विवाह की तैयारियों में इतना व्यस्त थीं कि बिना सुने ही कहा, ‘‘मैं बहुत व्यस्त हूँ, कुछ चाहिए तो जा शिखा या नील से कह, वे दिलवा देंगी। शिखा के मेंहदी लगने वाली है, तू भी नीचे आ जा।’’


माँ की बात मान कर छवि नीचे आई। मेंहदी की रस्म चल रही थी। वह अपने मोबाइल का कैमरा ऑन कर वीडियो बना रही थी, तभी एक आदमी की आवाज़ सुनाई पड़ी, ‘‘माईबाप, मेरे बेटे को क्षमा कर दीजिए। वे उसे फाँसी देने वाले हैं।’’

‘‘तेरे बेटे ने काम ही ऐसा किया है। उसे यही सजा मिलनी चाहिए जिससे दूसरे लोग सबक ले सकें और दोबारा इस गाँव में ऐसी घटना न हो।’’ दादाजी कड़कती आवाज़ में बोले।

‘‘माईबाप, सूरज की कोई गलती नहीं थी। वह तो कल्लू की बेटी ने उसे फँसा लिया। इस बार उसे क्षमा कर दीजिए, आगे वह कोई ऐसा काम नहीं करेगा।’’

‘‘सिर्फ उसे ही नहीं, कल्लू की बेटी को भी फाँसी देने का फैसला पंचायत सुना चुकी है। मैं उस में कोई फेरबदल कर समाज को गलत संदेश नहीं देना चाहता।।’’ इतना कह कर दादाजी अंदर चले गए और वह आदमी वहीं बैठकर सिर पटकने लगा। नौकर उसे घसीट कर बाहर ले जाने लगे ।


पूरा परिवार मूकदर्शक बना पूरी घटना देख रहा था। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उस आदमी के लड़के ने किया क्या है जो वह आदमी, दादाजी से अपने पुत्र का जीवनदान माँग रहा है...तभी बुआजी का स्वर गूँजा, ‘‘लड़कियों, रुक क्यों गईं, अरे भई, नाचो गाओ. ऐसा मौका बार-बार नहीं आता।’’


इतनी संवेदनहीनता, ऐसा आचरण वह भी गाँव के लोगों का... जिनके बारे में वह सदा से यही सुनती आई है कि गाँव में एक व्यक्ति का दुख सारे गाँव का दुख होता है। उसे लग रहा था कैसे हैं इस गाँव के लोग !! कैसा है इस गाँव का कानून जो एक प्रेमी युगल को फाँसी पर लटकाने का आदेश देता है पर इसको रोकने का प्रयास करना तो दूर, कोई व्यक्ति इसके विरुद्ध आवाज़ भी नहीं उठाता मानो फाँसी देना सामान्य बात हो ।

जब छवि से रहा नहीं गया तब वह नील का हाथ पकड़ कर उसे अपने कमरे में ले आई। इस पूरे घर में एक वही थी जो उस के प्रश्न का उत्तर दे सकती थी। कमरे में पहुँच कर छवि ने उससे प्रश्न किया तब नील ने उसका आशय समझ कर उसका समाधान करने का प्रयास करते हुए कहा…


 ‘‘दीदी, गाँव में हम सब एक परिवार की तरह रहते हैं। उस आदमी के बेटे ने इस गाँव की ही एक लड़की से प्रेम किया तथा उसके साथ विवाह करना चाहता है। उन का गोत्र एक है। एक ही गोत्र में विवाह करना हमारे समाज में वर्जित है। उसे पता था कि उनके प्यार को गाँव वालों की मंजूरी कभी नहीं मिल सकती। इसलिये उन दोनों ने भागने की योजना बनाई। इसका पता गाँव वालों को लग गया। पंचायत ने दोनों को मौत की सजा सुना दी। अगर दादाजी चाहते तो वे बचा सकते थे पर दादाजी गाँव के रीतिरिवाजों के विरुद्ध नहीं जाना चाहते हैं।’’


नील ने जो कहा उसे सुनकर छवि के रोंगटे खड़े हो गए। वह भावनाओं पर अंकुश न रख पाई और बोली, ‘‘गाँव वाले कानून अपने हाथ कैसे ले सकते हैं, दादाजी ने पुलिस को क्यों नहीं बुलाया?’’

‘‘दीदी, हमारे गाँव में पुलिस का नहीं, दादाजी का शासन चलता है. कोई कुछ नहीं कर सकता।’’

‘‘दादाजी का शासन, क्या दादाजी इस देश के कानून से ऊपर हैं?’’

‘‘यह तो मैं नहीं जानती दीदी, पर दादाजी की इच्छा के विरुद्ध हमारे गाँव का एक पत्ता भी नहीं हिलता। ’’

‘‘अरे, तुम दोनों यहाँ बैठी गपशप कर रही हो। नीचे तुम्हें सब ढ़ूँढ़ रहे हैं,’’ ताईजी ने कमरे में झांकते हुए कहा।।

‘‘चलो दीदी, वरना डांट पड़ेगी।’’ सकपका कर नील ने कहा ।


छवि नील के पीछे खिंची चली गई। शिखा को मेंहदी लगाई जा रही थी। कुछ औरतें ढोलक पर बन्ना बन्नी गा रही थीं। सबको हंसते-गाते देखकर उसे लग रहा था कि वह भीड़ में अकेली है। गाने की आवाज़ के साथ हम उम्र लड़कियों को थिरकते देख उस के भी पैर थिरकने को आतुर हो उठे थे पर मन ने उसका साथ नहीं दिया।

अवसर पा कर मन की बात माँ से की तो उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, यह गाँव है, यहाँ के रीतिरिवाज पत्थर की लकीर की तरह हैं. यहाँ हमारा कानून नहीं चलता।’’

‘‘तो क्या दबंगों का राज चलता हैं?’’ तिक्त स्वर में छवि ने कहा।

‘‘चुप रह लड़की, मुँह बंद रख। अगर तेरे दादाजी ने तेरी बात सुन ली या किसी ने उन तक पहुँचा दी तो तुझे अंदाजा भी नहीं है कि हम सब के साथ कैसा व्यवहार होगा?’’ माँ ने उसे डाँटते हुए कहा।

‘‘माँ, क्या इसी डर से सब उनकी गलत बात का भी समर्थन करते रहते हैं ?’’

‘‘नहीं बेटा, वे बड़े हैं, उन्होंने दुनिया देखी है। वे जो कर रहे हैं वही शायद गाँव के लिए उचित हो ।’’ माँ ने स्वर में नरमी लाते हुए कहा ।

‘‘माँ, कहने को तो हम 21वीं सदी में पहुँच चुके हैं पर दो प्यार करने वालों को इतनी बेरहमी से मृत्युदंड?’’

‘‘बेटा, मैं मानती हूँ कि यह गलत है, लेकिन जिन बातों पर हमारा वश नहीं, उन के बारे में सोचने से कोई लाभ नहीं है ।’’

"माँ, बात हानि लाभ की नहीं, उचित अनुचित की है।’’

‘‘कहाँ हो छवि की माँ, शिखा का सूटकेस पैक करा दो।’’ ताईजी की आवाज़ आई ।

‘‘आई दीदी ।’’ कह कर माँ शीघ्रता से चली गईं ।


उसके प्रश्नों का उत्तर किसी के पास नहीं है। विचारों का झंझावात उस का पीछा नहीं छोड़ रहा था। पहले सती दादी, फिर डायन और अब यह खाप पंचायत का फैसला... कहीं तो कुछ गलत हो रहा है जिसे उस का मासूम मन स्वीकार नहीं पा रहा है। मन की शांति के लिए वह अकेली ही मंदिर की ओर चल दी।

मंदिर पहुँचते ही फिर सती दादी का विचार मन पर हावी हो गया। जिनसे वह कभी मिली नहीं थी, देखा भी नहीं था, उनसे कुछ ही दिनों में न जाने कैसा तारतम्य स्थापित हो गया था। बार-बार उनका चेहरा उस के ज़हन में आ कर उसे बेचैन कर रहा था। वह मंदिर के सामने खड़ी हो कर मंदिर में लगी उनकी तस्वीर को निहारने लगी। तस्वीर में वे 20-22 वर्ष से ज्यादा नहीं होंगी, चेहरे पर छाई भोली मुसकान ने उस का मन मोह लिया। वह कल्पना ही नहीं कर पा रही थी कि जब वे जली होंगी तो उनका यही चेहरा कितना वीभत्स हो गया होगा ।

‘‘बेटी, तुम कभी विवाह नहीं करना और अगर विवाह हो गया है तो कभी कन्या को जन्मने नहीं देना।’’ पीछे से आवाज़ आई। आवाज़ सुनकर छवि ने पलट कर देखा तो पाया कि सफेद बाल तथा झुर्रियों वाला चेहरा उसकी ओर निहार रहा है। छवि को अपनी ओर देखकर उसने अपनी बात फिर दोहराई ।


‘‘यह आप क्या कर रही हैं?’’

‘‘मैं सच कह रही हूँ बेटी, बेटी के दुख से बड़ा कोई दुख इस दुनिया में नहीं है।’’


हताश निराश औरत की दुखभरी आवाज़ सुनकर छवि का मन विचलित हो उठा। ध्यान से देखा तो पाया वह लगभग 80 वर्ष की बुढ़िया है। वह मंदिर की दीवार के सहारे टेक लगा कर बैठी थी तथा उसी की तरह मंदिर को निहारे जा रही थी। चेहरे पर दर्द की अजीब रेखाएं खींच आई थीं। उसे एहसास हुआ कि यह अनजान वृद्धा भी उसी की भांति किसी बात से परेशान है। इससे बातें करके शायद उसके मन का द्वंद्व शांत हो जाए। वह नहीं जानती थी कि वह वृद्धा उसकी बात समझ भी पाएगी या नहीं। पर कहते हैं मन का गुबार किसी के सामने निकाल देने से मन शांत हो जाता है, यही सोचकर वह उसके पास जाकर बैठ गई तथा मन की बातें जबान पर आ ही गईं ...


‘‘दादी, यह सती रानी का मंदिर है। कहते हैं ये अपने पति को बहुत प्यार करती थीं। पति के जाने का ग़म वह नहीं सह पाईं, इसलिए उनके साथ सती हो गईं। पर क्या एक औरत की अपने पति से अलग कोई दुनिया नहीं होती, यह तो आत्मदाह ही हुआ न? ’’ कहते हुए उसने फोन पर यह सोचकर रिकौर्डिंग करनी प्रारंभ कर दी कि शायद इस घटना से संबंधित कोई सूत्र उसे मिल जाए।

वृद्धा कुछ क्षण के लिए उसे देखती रही, फिर कहा, ‘‘बेटी, तुम्हारा प्रश्न जायज है पर मर्द के लिए औरत सिर्फ औरत है ...मर्द ही उसे कभी पत्नी बनाता है तो कभी माँ, यहाँ तक कि सती भी...इस संसार की जननी होते हुए भी स्त्री सदा अपनों के हाथों ही छली गई है ।’’


‘‘आप क्या कहना चाहती हैं, दादी?’’

‘‘मैं सच कह रही हूँ बिटिया, लगता है तुम इस गाँव में नई आई हो?’’

‘‘हाँ दादी, प्यार अलग बात है, पर मुझे विश्वास ही नहीं होता कि कोई औरत अपनी मर्ज़ी से अपनी जान दे सकती है।’’

‘‘तू ठीक कह रही है, बेटी। मैं तुझे सच्चाई बताऊंगी पर पता नहीं तू भी औरों की तरह मेरी बात पर विश्वास करेगी या नहीं। मेरी बात पर किसी ने भी विश्वास नहीं किया, बल्कि पगली कह कर लोग सदा मेरा तिरस्कार ही करते रहे। सती रानी और कोई नहीं, मेरी अपनी बेटी सीता है।’’

‘‘आप की बेटी सीता?’’आश्चर्य से छवि ने कहा।


‘‘हाँ बेटी, मेरी बेटी, सीता... पिछले चालीस वर्षों से मैं इसे न्याय दिलवाने के लिए भटक रही हूँ पर कोई मेरी बात पर विश्वास ही नहीं करता। इसके पति वीरेंद्र प्रताप सिंह की मृत्यु एक बीमारी में हो गई थी। उस समय यह पेट से थी। उस समय उसके जेठ को लगा भाई तो गया ही, अब दूसरे घर की यह लड़की उनकी सारी संपत्ति में हिस्सा माँगेगी, इसलिए बलपूर्वक इसे अपने भाई की चिता के साथ जलने को मजबूर कर दिया। इस बात की खबर उस घर में काम करने वाली नौकरानी ने हमें दी थी। हमने जब अपनी बात ठाकुर के सामने रखी तो वे आग बबूला हो गया। हमने गाँव वालों के सामने अपनी बात रखी तब ठाकुर के डर से किसी गाँव वाले ने हमारा समर्थन नहीं किया…. और तो और, नौकरानी भी अपनी बात से मुकर गई। जब मेरे पति और बेटे ने ठाकुर को देख लेने की धमकी दी तब ठाकुर ने न केवल मेरे पति बल्कि मेरे बेटे को भी अपने गुंडों के हाथों मरवा दिया। सब कुछ समाप्त हो गया बेटी.’’


‘‘दादी, वह दरिंदा कौन था ?’’

‘‘ठाकुर राघवेंद्र प्रताप सिंह।’’

‘‘ठाकुर राघवेंद्र प्रताप सिंह?’’ सुन कर छवि स्तब्ध रह गई।


‘‘हाँ बेटी, वह दरिंदा ठाकुर राघवेंद्र प्रताप सिंह ही है जिसने मेरी बेटी को मरने के लिए मजबूर किया। हमारे विरोध करने पर उसने मेरे पूरे परिवार को मिटा डाला। मैं किसी तरह बच भागी तो मुझे पागल घोषित कर दिया।’’

‘‘दादाजी ने ऐसा किया, नहीं नहीं. ऐसा नहीं हो सकता.... मेरे दादाजी ऐसा नहीं कर सकते।’’ अचानक छवि के मुंह से निकला.

‘‘क्या तुम ठाकुर राघवेंद्र की पोती हो ?’’ उस वृद्धा के चेहरे पर आश्चर्य झलका पर उसके उत्तर देने के पूर्व ही वह फिर कह उठी, ‘‘मैं जानती थी, तुम भी औरों की तरह मेरी बातों पर विश्वास नहीं करोगी। मुझ पर कोई विश्वास नहीं करता, सब मुझे पगली कहते हैं, पगली।’’


अट्टहास करती हुई वृद्धा उठी और टेढ़े मेढे रास्तों में खो गई। वह वृद्धा सचमुच उसे पगली ही लगी । पर वह झूठ क्यों कहेगी ? एक माँ होकर वह भला अपनी बेटी की छवि को धूमिल क्यों करेगी ? किसी पर बेबुनियाद आरोप क्यों लगाएगी ? यह नहीं हो सकता, अगर यह नहीं हो सकता तो आखिर सच्चाई क्या है ? तभी पिछली सारी घटनाएँ उस के मनमस्तिष्क में घूम-घूम कर उस बुढ़िया की बात की सत्यता का एहसास कराने लगीं।


नील भी यही कह रही थी कि सती दादी हमारी छोटी दादी हैं तो क्या, दादाजी ने जायदाद के लिए अपने छोटे भाई की पत्नी को सती होने के लिए मजबूर किया। उन पर किसी को शक न हो, इसलिए उन्होंने सती दादी को इतना महिमामंडित कर दिया कि यहाँ हर वर्ष मेला लगने लगा। छवि का मन कल से भी ज्यादा अशांत हो गया था। दादाजी का एक वीभत्स चेहरा सामने आया था। एक दबंग और उससे भी अधिक लालची, जिसने पैसों के लिए अपने ही छोटे भाई की गर्भवती पत्नी की जान ले ली। उसका मन किया कि जा कर सीधे दादाजी से पूछे पर उनसे पूछने की हिम्मत नहीं थी। वे इतने रोबीले थे कि बच्चे, बड़े सभी उन से डरते थे। जमींदारी चली गई पर जमींदार होने का एहसास अभी भी बाकी था। वैसे भी, वे अपना गुनाह क्यों कबूल करेंगे ...जिस गुनाह को छिपाने के लिए उन्होंने छोटी दादी के घर वालों को मिटा डाला, गाँव वालों का मुँह बंद कर दिया। 


दादाजी से छवि का बात करना या बहस करना व्यर्थ था पर उस के जमीर ने उस का साथ नहीं दिया। वह अपने प्रश्नों का भंडार ले कर उनके कमरे की ओर गई। कमरे से आती आवाज़ों ने उसे चौकन्ना कर दिया। सुराग पाने की कोशिश में उसने मोबाइल ऑन कर दिया...


‘‘ठाकुर साहब, संभालिए अपनी पोती को, आज जब वह गन्ने के खेत में थी तभी हम उस कम्मो को सताते हुए उधर से गुजरे। आपकी बात मान कर हमने कम्मो को लोगों की नज़रों में डायन बना दिया है। कम्मो को मारते देखकर आपकी पोती ने हमें मना किया। जब हमने कहा कि वह डायन है तब उसने कहा कि डायन वायन कोई नहीं होती, बच्चे उसकी बुरी नजर के कारण नहीं बल्कि अन्य कारणों से मरे हैं। वह बड़ी-बड़ी बातें कर रही थी। आज उसे मंदिर में उस बुढ़िया से बातें करते भी देखा. अगर कुछ दिन और वह यहां रही तो हमें डर है कि कहीं कम्मो का भेद न खुल जाए। आज तो कम्मो ने उससे बात नहीं की, कहीं…।’’


‘‘नहीं नहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा। ऐसा करो, कम्मो को समाप्त कर दो।’’

‘‘आप क्या कह रहे हैं, ठाकुर साहब?’’ एक आदमी ने आश्चर्य से कहा।

‘‘मैं ठीक कह रहा हूँ. मैं नहीं चाहता कि उसकी वजह से हमारे चरित्र पर कोई दाग लगे। बस, इतना ध्यान रखना कि उसकी मृत्यु एक हादसा लगे। इतना अभी रखो, बाद में और दूँगा।’’ दादाजी ने उसके हाथ में नोट की गड्डी रखते हुए कहा।


तो क्या दादाजी और कम्मो…पहले उसे भोगा, फिर दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका। वह किसी को सच्चाई न बता पाए, इसलिए उसे डायन बना दिया। यह सुनकर छवि अवाक रह गई। दरवाज़ा खुलने की आवाज़ ने उसे चैतन्य किया। वह ओट में खड़ी हो गई। दादाजी का एक अन्य घिनौना रूप उसके सामने था ।


अवसर पाकर छवि ने माँ से बात कही तो वे एकदम घबरा गईं. उन्होंने इधर-उधर देखा, फिर उस का हाथ पकड़ कर कोने में ले गईं और संयत हो कर बोलीं, ‘‘क्या बकवास कर रही है, छवि ?’’

‘‘माँ, आपका व्यवहार देख कर लग रहा है, मेरी बातों में सच्चाई है। कम्मो, वह वृद्ध औरत जो सीता दादी की माँ है, जिसे सब पगली कहते हैं, ने मुझसे जो कुछ भी कहा, वह सच है।’’

‘‘व्यर्थ के पचड़ों में मत फँसो. जो मुझसे कहा है वह घर में किसी अन्य से न कहना। हल्दी की रस्म प्रारंभ होने वाली है, कपडे़ बदल कर वहाँ पहुँचो ।’’ माँ किसी उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना उसे आदेश देती हुई चली गईं ।


दादाजी, जिन्हें वह सदा सम्मान देती आई थी, आज उसे दरिंदा नजर आने लगे... इंसान के रूप में ख़ूँख़ार जानवर, जिन्होंने जायदाद के लिए अपने छोटे भाई की पत्नी को मरने को मजबूर किया, कम्मो को बर्बाद किया। इन जैसे लोगों के लिए किसी का मान सम्मान कोई मायने नहीं रखता... यहाँ तक कि जायदाद के आगे इंसानी रिश्तों, भावनाओं की भी इनके लिए कोई अहमियत नहीं है। वे अपने स्वार्थ के लिए कुछ भी कर सकते हैं। पर उनसे भी ज्यादा माँ का व्यवहार उसे आश्चर्यजनक लग रहा था। वे शहर में महिला मुक्ति आंदोलन की संरक्षक हैं। जहाँ कहीं अत्याचार होते, वे अपनी महिला वाहिनी ले कर पहुँच जातीं हैं तथा पीड़िता को न्याय दिलवाने का प्रयत्न करती हैं। पर यहाँ सब कुछ जानते समझते हुए भी वे मौन हैं, पर क्यों ?


यह सच है कि यह घटना उनके सामने घटित नहीं हुई लेकिन उस वृद्धा को तो न्याय दिलवा सकती थीं जो अब भी न्याय की आस में भटक रही है। तो क्या वे दादाजी, अपने ससुर, के विरुद्ध आवाज़ उठातीं। अंतर्मन ने सवाल किया। अगर वे ऐसा करतीं तो क्या उनका भी वही हाल नहीं होता जो उस वृद्धा का हुआ ? और फिर वे सुबूत कहाँ से लातीं ? किसी आरोप को सिद्ध करने के लिए सुबूत चाहिए , कौन दादाजी के विरुद्ध गवाही देता ? आश्चर्य तो उसे इस बात का था कि पापा जज होते हुए भी मौन रहे ।

छवि का मन बार-बार उसे धिक्कार रहा था... ‘पर अब तुम क्या कर रही हो, तुम्हें भी तो अब सब पता है. क्यों नहीं सबके सामने जाकर सच्चाई उगल देती ? क्यों नहीं दादाजी के चेहरे पर लगे मुखौटे को हटा कर उनका वीभत्स चेहरा समाज के सामने लाकर उन्हें बेनकाब कर देती ?


पर क्या यह इतना आसान है ? शाश्वत सत्य तो यह है कि इंसान दूसरों से तो लड़ भी ले लेकिन अपनों के आगे बौना हो जाता है। गाँव की जिन मधुर स्मृतियों को वह सहेजे हुए थी। उनमें ग्रहण लग गया था। उसका मन कर रहा था कि यहाँ के घुटन भरे माहौल से कहीं दूर भाग जाए जहाँ उसे सुकून मिल सके । पर जाए भी तो जाए कहाँ, जहाँ भी जाएगी, क्या इन विचारों से मुक्ति पा पाएगी ? तब वह क्या करे ? क्या वह भी पूरा जीवन अपने परिवार के अन्य सदस्यों की तरह ही इस अन्याय को दिल में समाये जीवन गुजार दे...नहीं-नहीं वह ऐसे नहीं जी पायेगी ...तब, वह क्या करे ?


उस का सर्वांग सुलग उठा। मन का ज्वालामुखी फटने को आतुर था …

‘आज तो मीडिया का जमाना है. इस घटना को किसी पत्रपत्रिका में प्रकाशित करवा दो।’ अवचेतन मन से आवाज़ आई।

हाँ, यही ठीक रहेगा। आरोपी को दंड नहीं दिलवा पाई तो क्या हुआ, समाज का यह विद्रूप चेहरा, कटु सत्य तो कम से कम सामने आएगा। कम से कम ऐसी घटनाओं को अंजाम देने से पहले लोग एक बार तो सोचेंगे, किसी को आत्मदाह के लिए बाध्य तो नहीं किया जाएगा।

छवि ने डायरी निकाली तथा अपने विचारों को कलमबद्ध करने लगी। मन के झंझावातों से मुक्त होने का उसके पास एक यही साधन था। अपने लेख को किसी पत्रिका में छपवा कर दादाजी को बेनकाब करने का उसने मन ही मन प्रण कर लिया था।


‘‘दीदी, आप क्या कर रही हैं ? यहाँ भी आपका लिखना-पढ़ना नहीं छूटा !! चलिए, नीचे सब आप को ढ़ूँढ़ रहे हैं।’’ नील ने आकर कहा।

‘‘हाँ, चल रही हूँ ।’’ उसने डायरी अपने सूटकेस में रख दी।

नील उसे लगभग खींचते हुए नीचे ले आई। शिखा को हल्दी लगाई जा रही थी। कुछ औरतें ढोलक पर बन्ना बन्नी गा रही थीं। माँ के चेहरे पर उसे देखते ही चिंता की रेखाएं खिंच गईं। शायद, उन्हें डर था कि वह कहीं किसी से कुछ कह न दे, व्यर्थ रंग में भंग हो जाएगा ।


सब को हँसते-गाते देखकर भी वह स्वयं को सहज नहीं कर पा रही थी। उसे लग रहा था कि वह भीड़ में अकेली है। तभी उस ने सोचा, उसे जो करना है वह तो करेगी ही पर वह हँसी-खुशी के माहौल को बदरंग नहीं करेगी।

जब लौट कर आई तो उसने डायरी के पन्ने फटे पाए। पीछे-पीछे उसकी माँ भी आ गई। उसे परेशान देखकर बोली, ‘‘बेवकूफ़ लड़की, गड़े मुर्दे उखाड़ने की कोशिश मत कर, मत भूल कि वे तेरे दादाजी हैं, इस गाँव के सम्मानित व्यक्ति... लोगों के लिए देवता स्वरूप। ऐसा तो सदियों से होता आ रहा है। वैसे भी , तेरी बात पर विश्वास कौन करेगा ? वह तो अच्छा हुआ कि मैं किसी काम से यहाँ आई थी, तेरा सूटकेस खुला देखकर बंद करने लगी तो डायरी देख कर शक हुआ और मैंने देख लिया। अगर तेरी यह हरकत घर में किसी को भी पता चल गई तो तेरे साथ हमारा जीना भी दूभर हो जाएगा।' 


फिर जायदाद, आखिर यह पैसा इंसान को किस हद तक गिराएगा !! नीचे ताईजी की आवाज़ सुनकर माँ दनदनाती हुई चली गई थीं। वह लाचार सी बैठी सोचने लगी कि हर काल, हर समय में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली कहावत ही चरितार्थ होती रही है। जिसके हाथ में ताकत है वही समर्थ है। कानून उसके हाथ का खिलौना बनकर रह जाता है. शायद इसीलिए माँ-पापा सब कुछ जानते और समझते हुए भी चुप रहे और शायद इसी मानसिकता के तहत उसके अन्याय के विरुद्ध मुँह खोलने की कोशिश को माँ गलत ठहरा कर उसे चुप रहने के लिए विवश कर रही हैं। बार -बार उस वृद्धा के शब्दों के साथ उसका अट्टहास मनमस्तिष्क में गूँज कर उसे बेचैन करने लगा... 


‘पिछले 40 वर्षों से मैं उसे न्याय दिलवाने के लिए भटक रही हूँ पर कोई मेरी बात पर विश्वास ही नहीं करता। सब मुझे पगली कहते हैं, पगली ।’ 


वह तो उस वृद्धा से भी अधिक लाचार है। वह कम से कम न्याय की गुहार तो लगा रही है पर वह तो सब जानते बूझते हुए भी चुप रहने को विवश है। वह बेचैनी में अपना मोबाइल सर्च करने लगी। तभी मंदिर में वृद्धा से बातचीत का वीडियो नजर आया... साथ ही, गन्ने के खेत में लोगों का कम्मो के साथ जोर जबरदस्ती के वीडियो के साथ ही, उसमें कम्मो की आवाज़ भी रिकॉर्ड थी ।


 ‘मैं डायन नहीं हूँ, डायन नहीं हूँ. मैं बड़े ठाकुर को नहीं छोडूँगी।’ वीडियो में रिकॉर्ड कम्मो की आवाज़ उसे विचलित करने लगी थी। अपने बेटे के जीवन की भीख माँगते आदमी का तथा उसकी आवाज़ को नकारते दादाजी की आवाज़ के साथ कम्मो को मारने का आदेश देते हुए दादाजी की आवाज़ ने उसे संज्ञाशून्य बना दिया था। सारे सुबूत सिर्फ एक ही ओर इशारा कर रहे थे।


‘तुम विवश नहीं हो, संवेदनशील मस्तिष्क कभी विवश नहीं हो सकता।’ 


अपने अंतर्मन की यह आवाज़ सुनकर एकाएक उसने निर्णय लिया कि वह अपनी पत्रकार मित्र शिल्पा की सहायता से वीडियो क्लिप के जरिए अपराधियों को दंड दिलवाएगी तथा समाज का यह विद्रूप चेहरा सामने लाएगी। समाज का कटु सत्य तो कम से कम समाज के सामने आएगा, सोचकर छवि ने संतोष की सांस ली तथा विवाह की सभी रस्मों में पूरे मन से सम्मिलित हुई। उसे देखकर माँ भी निश्चिंत थीं। उन्हें लग रहा था उसने अपनी बेवजह की जिद्द छोड़ दी है।


यद्यपि अपनों के विरूद्ध निर्णय लेना आसान नहीं है पर अन्याय का विरोध करना एक इंसान का कर्तव्य है ...इसी भावना के वशीभूत उसने शिल्पा और उसकी टीम को विश्वास में लिया तथा उनके एक महीने के अथक परिश्रम के बाद आखिर धीरजपुर गाँव का धीरज टूट गया और दादाजी का घिनौना रूप समाज के सामने आ ही गया। टी.वी. पर फ्लैश होती वीडियो क्लिप को देखकर  छवि संतुष्टि का अनुभव कर रही थी ।


टी.वी.पर फ्लैश होती खबरों को देखकर पापा घर फोन मिलाने लगे...माँ ने उसकी ओर तीखी नजरों से देखा । उसकी झुकी नजरें देख वह समझ गईं लेकिन पुत्री के मोह ने उन्हें गांधारी बना दिया ।


सुधा आदेश


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