तेरी मोहब्बत
तेरी मोहब्बत
क्यूँ ये मेरे होठ गुनगुना भूल गये हैं
हाँ तेरे हाथ भी सहलाना भूल गये हैं।
आँखों की तेरी वो गुस्ताखियाँ हैं कहाँ
होंठ भी मेरे मुस्कुराना भूल गये हैं।
तुझें देख कर होता था जो नशा
हम भी अब लड़खड़ाना भूल गये हैं।
ज़माने से लड़ते थे हम तेरे लिये
अब तो सिर भी उठाना भूल गये हैं।
