सोचती हूं
सोचती हूं
सोचती हूं कभी कभी मैं
कि बादल में बैठ जाऊं मैं
ऊंचे उठते कभी नीचे झुकते
आसमां का चक्कर लगाऊं मैं।
सोचती हूं कभी कभी मैं
कि नदियों में गोता लगाऊं मैं
छिपे हुई है जो धरा के नीचे
गहराई और आंखों के पीछे
अनमोल मोती ढूंढ लाऊं मैं।
सोचती हूं कभी कभी मैं
कि ऊंचे पर्वत चढ़ जाऊं मैं
हिम के कुंडों से हैं जो गिरते
झरने का उद्गम देख पाऊं मैं।
सोचती हूं कभी कभी मैं
हरे मैदानों में सो जाऊं मैं
ओस की बूंदों से घुलते मिलते
तारों की छांव बसाऊं मैं।
सोचती हूं कभी कभी मैं
कि चरवाहों सी बन जाऊं मैं
सारी उम्र धरा पर चलते चलते
पूरी दुनिया घूम जाऊं मैं।
