शहर के पास, शहर से दूर
शहर के पास, शहर से दूर
मैं समुद्र से मिलकर,
उन लड़ती लहरों से टकराती रही
और समुद्र की गहराई को,
अपनी सोच की गहराइयों से मापती रही।
फिर एक वक्त ऐसा आया,
जब आँखों से सैलाब बहता नज़र आया।
अक्सर मुझे ऐसी ही गहराई में,
डूबे रहने की तलाश रहती है।
शहर के पास,
मगर शहर से दूर,
एक ऐसे शहर में जहाँ,
बाहर की दुनिया ओझल होती दिखाई देती है,
बस वहीं खो जाना मेरे शगल में शामिल है।
क्या लोग, क्या ज़माना,
केवल गहराइयों में मशगूल
मेरी कविताएँ अठखेलियाँ कर रहीं होती हैं।
शहर के पास,
मगर शहर से दूर,
एक ऐसे शहर में,
जहाँ दुनिया ओझल होती दिखाई देती हैं,
वहाँ मेरी आत्मा मुझे पुकारती हुई नज़र आती है।
