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निशा परमार

Abstract Tragedy

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निशा परमार

Abstract Tragedy

मिट्टी के घरोंदे

मिट्टी के घरोंदे

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मिट्टी के घरोंदे भी 

रखते है अपने माटी में 

सोने की चमक 

थोड़ी अलग 

मटमैले से जज्बातों में 

लिपटी हुई सी

जिनके झरोखे की कोरों से 

सरकते कुछ ख़्वाब 

अटक जाते हैं 

झोपड़ी के तिरके बांस में

जिनको निकालने की 

जद्दोजहद में 

समा जाती है फांस जीवन 

के उन नाखूनों में 

जो खोद रहें है 

माटी की तलहटी को

खोजते हुये सोने से सपने 

मगर हर बार मिलते है 

कुछ ऐसे कंकाल 

जो निवाला मांगते हैं 

जो दफन हुये थे 

भूख की तलवार से

विकास की उस देहरी पर 

जो कहता है कि मैं पूर्ण हूँ 

 

 



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