STORYMIRROR

निशा परमार

Abstract

3  

निशा परमार

Abstract

असंख्य अन्तर्द्वन्द

असंख्य अन्तर्द्वन्द

1 min
42

स्वयं की खोज करता

स्वयं का अंश

असंख्य अन्तर्द्वन्द को

चीरता मस्तिष्क

शन्काओ से भरा

हाथ में कमण्डल

ह्रदय को भेदता

प्रश्न चिन्हों का तीर

अपेक्षाओं के छोर में

बंधे मोह की मोहरें

शरीर की शाख पर

पकते भ्रम के कन्दमूल

भोग विलास के चबूतरे पर

पाखंड का हवन करता

मन का पुजारी

असत्य के घन्टा

पर चढी कुकर्म की पीताम्बरी

असाध्य व्याधि से ग्रसित

जीवन के लक्ष्य

मृत्यु शैय्या पर पड़ा

सुविचारों के प्रवाह का तन

पतन के पाषाण पर

सिर पटकता व्यक्तित्व

इन अनगिनत वाद विवादों के मध्य

जीवन का बुद्ध बनकर

आत्मा की समाधि

तक प्रस्थान का मार्ग

क्या सम्भव हो सकेगा ??

 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract