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Mahavir Uttranchali

Abstract


4.4  

Mahavir Uttranchali

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कवि ‘महावीर’ नामी दोहे

कवि ‘महावीर’ नामी दोहे

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सब कहें उत्तरांचली, ‘महावीर’ है नाम

करूँ साहित्य साधना, है मेरा यह काम।


‘महावीर’ बुझती नहीं, अंतरघट तक प्यास

मृगतृष्णा मिटती नहीं, मनवा बड़ा हतास।


करवट बदली दिन गया करवट बदले रात

‘महावीर’ पल-पल गिने, काल लगाये घात।


रंगों का त्यौहार है, उड़ने लगा अबीर

प्रेम रंग गहरा चढे, उतरे न ‘महावीर’।


‘महावीर’ अब देखिये, फूल चढ़े सिरमौर

सजनी इतराती फिरे, रूप और का और।


मुक्तछंद के दौर में, कौन सुनाये बंद

‘महावीर’ कविराज की, अक्ल पड गई मंद।


काँटों का इक ताज है, जीवन का यह रूप

‘महावीर’ यह सत्य है, छाया का वर धूप।


सदियों तक संसार में, जिंदा रहे विचार

‘महावीर’ करते रहों, तेज कलम की धार।


‘महावीर’ मनवा उड़े, लगे प्यार को पंख

बिगुल बजाय जीत का, फूंक दिया है शंख।


‘महावीर’ अपने बने, जो थे कल तक ग़ैर

मालिक से मांगूं यही, सबकी होवे ख़ैर।


‘महावीर’ संसार ने, लूटा मन का चैन

दो रोटी की चाह में, बेगाने दिन-रैन।


‘महावीर’ ये नौकरी, है कोल्हू का बैल

इसमें सारे सुख-पिसे, हम सरसों की थैल।


जीवन हो बस देश हित, सबका हो कल्याण

‘महावीर’ चारों तरफ, चलें प्यार के वाण।


जो भी देखे प्यार से, दिल उस पर कुर्बान

‘महावीर’ ये प्रेम ही, सब खुशियों की खान।


प्रतिबिम्ब देखता नहीं, चढ़ी दर्प पे धूल

‘महावीर’ क्या जानिए, ख़ार उगे या फूल।


दोहों में है ताजगी, खिला शब्द का रूप

‘महावीर’ क्यों मंद हो, कालजयी यह धूप।


दर-दर भटकी आत्मा, पाया नहीं सकून

‘महावीर’ पानी किया, इच्छाओं ने खून।


गोरी की मुस्कान पर, मिटे एक-से-एक

‘महावीर’ इस रूप पर, उपजे भेद अनेक।


जीवन बूटी कौन-सी, सूझा नहीं उपाय

‘महावीर’ हनुमान ने, परवत लिया उठाय।


‘महावीर’ संसार में, होगा कौन महान

हर चीज़ यहाँ क्षणिक है, क्यों तू करे गुमान।


भूल गया परमात्मा, रमा भोग में जीव

‘महावीर’ क्यों हरि मिले, पड़ी पाप की नीव।


हरदम गिरगिट की तरह, दुनिया बदले रंग

‘महावीर’ तू भी बदल, अब जीने का ढंग।


‘महावीर’ मनवा उड़े, चले हवा के संग

मन की गति को देखकर, रवि किरणें भी दंग।


‘महावीर’ इस रूप का, मत कीजै अभिमान

यह तो ढ़लती धूप है, कब समझे नादान।


‘महावीर’ इस दौर में, पढ़ते नहीं किताब

फिल्मस-इंटरनेट का, रखते सभी हिसाब।


आग लगी चारों तरफ़, फूल खिले उस पार

‘महावीर’ अब क्या करें, घिरे बीच मंझधार।


‘महावीर’ जब दर्द है, जीवन का ही अंग

तो इससे काहे डरो, रखो सदा ही संग।


वर्धमान ‘महावीर’ की, बात धरी संदूक

मानवता को भूलकर, उठा रहे बंदूक।


‘महावीर’ ये ज़िन्दगी, है गुलाब का फूल

दो पल ही खिलना यहाँ, फिर सब माटी धूल।


बड़े-बड़े यौद्धा यहाँ, वार गए जब चूक

‘महावीर’ कैसे चले, जंग लगी बंदूक।


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