STORYMIRROR

Damyanti Bhatt

Abstract

4  

Damyanti Bhatt

Abstract

क्यूं चाहूं मैंं

क्यूं चाहूं मैंं

1 min
581

ऐसे रिश्ते

जो पायल 

जैसे घाव देते


हों तो ऐसे रिश्ते

माटी और कुम्हार

जो ढल जाये

ढाल दे

एक सुंदर आकार मैं


मैं या मिट्टी

एक गुण धर्म हमारा


यौवन ढल यहां

जैसे मेरी मुट्ठी मैं रेत


एक अपरिचित से

परिचित होने में

भावनाओं के मौन संवाद

 

लोग क्या से क्या 

समझ गये

झूठ और फरेब जीत गया


मैं सच बोलने के

रिश्ते निभाने के

वचन निभाती रह गयी


ऐसे जैसे

तारों के बीच 

चांद तन्हा रह गया



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract