मेहनताना
मेहनताना
बड़े-बड़े दावे नहीं,
हर एक मेहनतकश इंसान को
समय पर बेरोकटोक
मेहनताना मिलते रहना चाहिए...!
इसमें कोई गलत बात नहीं...
समय पर मेहनताना मिलना
कोई हद से परे मांग नहीं है,
ये हर एक
मेहनतकश इंसान का
हक़ है...!!
ये हक़ उसके जीने का
एकमात्र विकल्प है...
क्योंकि सबको मालूम है
कि कोई इंसान
"खाली जेब"
किसी भी सूरत-ए-हाल में
खुशहाली का 'ख्वाब'
हरगिज़ नहीं देख सकता !!!
क्या ऊँचे ओहदों पर बैठे
अपने 'कलम' की ज़ोर से
आम इंसानों का भाग्य लिखनेवाले
'खास' लोगों को
इस बात का तनिक ख्याल भी है...???
या यूँ कहें
उन्हें क्या फर्क पड़ता है...!!!
कोई 'मजबूर'
अपनी व्यथा-कथा, अपनी तड़प
और अपनी 'दुर्दशा' का बखान
करे भी, तो कैसे करे...???
किससे करे...???
क्योंकि 'दीवारों' के कान
होते कहाँ हैं...!!!
ये तो सब जानते-समझते हैं
कि खाना तभी स्वादिष्ट लगता है,
जब वो 'समय' पर परोसा जाए,
क्योंकि देर से (लंबे अरसे तक
इंतज़ार के बाद) मिलनेवाला
खाद्यान्न हो या
किसी 'ईमानदार' का मेहनताना --
दोनों ही 'काम' नहीं आता...!!!
ये सोचनेवाली बात है...
ऊपरवाले ज़रा गौर करें, तो
मजबूर-ईमानदार 'कर्मोत्साहित'
इंसानों का भी 'कल्याण' हो।
अगर समानता का अधिकार हो,
तभी इस समाज का
विकास संभव हो पाएगा...!
और तभी 'मानव-निर्माण' का
सुनहरा सपना साकार हो पाएगा,
अन्यथा 'असंपूर्ण' आशाएँ दीप-सा
पूर्ण रूप से प्रज्वलित होने से पहले ही
अनिश्चितता भरी 'तूफानी' हवाओं के
चलने से बूझ जाया करेंगी...
और बाकी रह जाएगी, सिर्फ 'असंतुष्टि और अविश्वास' की 'दावाग्नि'...
ऐसी अवस्था में एक मेहनतकश और ईमानदार इंसान का भविष्य
कितना सुरक्षित है...???
