बदलती सोच...
बदलती सोच...
इस तंगी में
तेरह दिनों की
कुल सोलह हज़ार रूपये का
भारी नुकसान
एक आम आदमी के लिए
ज़बरदस्त धक्का है!!!
वो ऊपरवाले रईस
ये बात कैसे महसूस कर पाएंगे...!!!
ये उस आम आदमी के लिए
एक बहुत बड़ी सीख है,
जिसे वो अपनी जद्दोजहद का
नारा (स्लोगन) बनाकर
हमेशा अपने जीवन का
अभिन्न अंग बनाकर रखेगा,
जो कि आगंतुक समय में
उसे अपना शस्त्र बनाकर
ज़रूरत के अनुसार
निक्षेप करने में काम आएगा...!!!
वो आम आदमी
अब केवल
जाग्रत होकर ही 'काम' करेगा,
भावविभोर होकर
तथाकथित 'दार्शनिक' तत्वों पर
आइंदा कभी भरोसा नहीं करेगा...!!!
क्योंकि वास्तविकता तो यही है
कि उसका परिवार --प्रत्यक्ष रूप से
'सिर्फ-और-सिर्फ'
पर्याप्त रुपयों की आपूर्ति से ही
संगठित हो पाएगा !
गौरतलब है कि
उसकी रोज़मर्रा की ज़रूरतें
केवल अपनी जेब में रखी
धन से ही पूरी हो सकतीं हैं,
खोखले प्रवचनों से
कहां किसी का पेट भरता है...!!!
