नमन...
नमन...
श्रीमती वीणापानी बोरुवा, उपायुक्त कार्यालय, तिनसुकिया, असम से "पर्यावेक्षिणी सहायिका" के महत्वपूर्ण पद (10/07/1979 - 30/11/2018) से सेवानिवृत्त...
एक प्रेरणादायक-दायित्ववान महिला हैं
जिनके सदव्यवहार एवं
सकारात्मक सोच से
परिचित होने के उपरांत ही
मैंने
'कप्तान चौक' में अवस्थित
उनके सुव्यवस्थित एवं सुरक्षित
किराये के मकान में
अपनी धर्मपत्नी दीपिका एवं
नवजात शिशुपुत्री प्रज्ञा को
विवेकानंद केंद्र विद्यालय, लाईपुली के "नीलाचल, कमरा संख्या 5" के
किराये के कमरे से स्थानंतरित करने का हिम्मत जुटा पाया...
वरना हमारा गुज़र बसर करना
बहुत मुश्किल होता...
क्योंकि कई अनिश्चिताओं से हम
अनचाहे ही घिर चुके थे...!!!
यह संघर्षमय "समय"
हमें बहुत बड़ी सीख दे गया, भाई !!!
यहाँ कुछ भी "पूर्वानुमेय" नहीं है...
वक्त के साथ लोग भी बदलते हैं
और जज़्बात भी बदलते हैं...!
हाँ, भाई, हमें समझ आ ही गई
कि अपनी लड़ाई हमें
अपने बलबूते पर ही
ज़ारी रखनी पड़ेगी...
क्योंकि मेरा कार्यस्थान
असम के कार्बी आंगलोंग जिले में अवस्थित
विवेकानंद केंद्र विद्यालय, खटखटी के
पर्याप्त सुविधाविहीन परिवेश में
होने कि वजह से
मजबूरन अपने परिवार को
(न चाहते हुए भी)
स्वयं से कोसों दूर
रखना पड़ रहा है...!!!
वरना वह कौन 'पिता' होगा,
जो कि अपनी मर्ज़ी से
यूँ
दर्द-ओ -ग़म सहेगा...!!!
मगर "बरमा" ("ताई जी"), आपने हमें
अपने सदव्यवहार से
क्षणभर में ही अपना बना लिया...!!!
यह ईश्वर का आशीर्वाद है
कि हमें
अपनी ज़रूरत के मुताबिक
(विद्यालय परिसर के बाहर भी)
एक अच्छा परिवेश मिला,
जहाँ मेरी धर्मपत्नी दीपिका
एवं
मेरी नवजात पुत्री प्रज्ञा
सुख-शांति से
रह पायेगी --
यह मेरा पूर्ण विश्वास है!!
"बरमा" (ताई जी), आपको हमारा
श्रद्धापूर्वक नमन...
गौरतलब है कि हमारी इस
मुश्किल दौर में हम बेशक़
इस तथाकथित आधुनिक समाज में
खुद्दारी और गद्दारी से पूरी तरह
वाकिफ हो ही गए...!!!
ईश्वर साक्षी हैं
कि हमनें उन गुज़रे पलों में
इस बड़ी दुनिया में
सच्चे मददगार भी देखे
और नेहायत ही चतुर, कपटी, खुदगर्ज़ और निर्दयी लोगों को भी देखे
जिन्होंने अनगिनत बहाने बनाकर
हमसे पीछा छुड़ाया किये...
वो बस मीठी-मीठी बातें कर
ऐन वक़्त में अचानक
हमारे सामने से गायब हुआ किये...
(वो हमें लाचार-बेवक़ूफ़-बेसहारा समझकर
हमसे छल किये...
मगर हम तो उन चालबाज़ों की
रग-रग से वाकिफ थे...!!!)
हमनें उन नाट्यकारों की
भलीभांति पहचान कर ली...
हाँ, हमनें उसी पल
उन सब खुदगर्ज़ लोगों से
हमेशा के लिए तौबा कर ली...!!!)
बेशक़ हमारे जद्दोजहद के दौरान
हमनें तथाकथित मुखौटेधारी, कंजूस,
बेग़ैरत, स्वार्थी अमानुष भी देखे...
जिन्होंने जानबूझकर
हमारी कोई मदद नहीं की...
वो ऊपरवाला भी बस लाचारी से
टकटकी लगाये देखता रहा...!!!
मगर हमने इतनी जद्दोजहद के बाद भी
अपने अस्तित्व पर
किसी भी सूरत-ए-हाल में
कोई आंच नहीं आने दिया...!!!
आज उन स्वार्थी लोगों तक
हमारी बुलंद आवाज़ जायेगी
कि हमें कोई क्या तोड़ पायेगा,
हमारा रास्ता कैसे कोई मोड़ पायेगा,
जब इस दुनिये में
अच्छे लोग हमारे साथ हैं...!!!
हाँ, वो यह जान लें
कि हमारा स्वाभिमान
आज भी ज़िंदा है...!!!
और हम बेशक़
अपनी ज़िन्दगी सुख-समृद्धि एवं
शांति से गुज़ार पाएंगे...!!!
अंततः हमारे इस संघर्षपूर्ण काल में
सम्पूर्ण निस्वार्थ भाव से
हमारा हर संभव साथ देनेवाले
सज्जन व्यक्तियों को
हमारा कोटि-कोटि नमन...!!!
(और उन मुखौटेधारी दोहरे चरित्रवाले
नाट्यकारों को भी हमारा सलाम...!!!)
