कान खोलकर सुन लीजिए, अकाउंटेंट बाबू...!!!
कान खोलकर सुन लीजिए, अकाउंटेंट बाबू...!!!
अपने तकलीफदेह 'प्रोबेशन पीरियड' में
एक बेसरकारी विद्यालय में सुदीर्घ काल से
ईमानदारी से सेवा करने वाले
एक सच्चे शिक्षक की
घोर पारिवारिक संघर्षमय स्थिति
को मानवतापूर्ण ह्रदय से
न समझते हुए
मेरी तनख्वाह में से
मेरे ही हक़ का
एडवांस में कुछ रुपये न देकर
आपने मुझे जो
दुःख-कष्ट-वेदना दी है,
उसकी भरपाई आप
ज़िन्दगी भर नहीं कर पाएंगे,
ओ अकाउंटेंट बाबू !!!
एक दिन ऐसा
आपके साथ भी होगा,
जब आप भी
पाई-पाई को मोहताज़ होंगे...
ये तो तय है, ओ अकाउंटेंट बाबू !
आपको भी एक दिन उस दौर से
बेशक़ गुज़ारना होगा...!!!
आज आप बड़े शान-ओ-शौक़त से
अपनी चौपहिए वाहन से
इस विद्यालय का दौरा लगाकर
तथाकथित 'ऑफिसियल' नियम चलाकर
'ऐसा-वैसा' बहुत कुछ
करते नज़र आ रहे हैं, ओ अकाउंटेंट बाबू, जो कि मेरी ज़िन्दगी में जबरन
अनिश्चित अमावस-काल ला रहे हैं...
उस ऊपरवाले से मैं, असहाय शिक्षक
ये गुहार लगता हूँ कि
विधाता आपको भी ऐसी दिराहे पर
लाकर खड़ा करे
और उस पल, ओ अकाउंटेंट बाबू !
आप भी इस 'टेबल' से
उस 'टेबल' तक का
दौड़ लगाएं...
और आपको भी
मुंह की खानी पड़े...!!!
उस दिन आपको भी
भलीभांति ये एहसास होगा,
ओ अकाउंटेंट बाबू,
कि किसी ज़रूरतमंद इंसान का
जेब खाली होने पर
उसे दर-ब-दर कितनी
ठोकरें खानी पड़ती है...
और कितनी ज़िल्लत
सहनी पड़ती है...!!!
आएगा, ओ अकाउंटेंट बाबू !
मेरा भी 'टाइम' आएगा...
और उस दिन मैं भी आपको
जल बिन मछली की तरह
तड़पते हुए देखूंगा...
और आपसे पूछूंगा :
"अब कैसा लग रहा है???"
