Click Here. Romance Combo up for Grabs to Read while it Rains!
Click Here. Romance Combo up for Grabs to Read while it Rains!

दो राहें थीं

दो राहें थीं

2 mins 21.3K 2 mins 21.3K

अंधियारे को मिटते देखा था

बस एक किरण सूरज की से

साख बदलते देखा था

क्षण भर में मन की गर्मी से

चिड़ियों की गुंजन मद्धम थी

कुछ सावन की हरियाली थी

आजीवन ना मिटने वाली

एक साख गजब बना ली थी

क्षणभर में बाजी यूं पलटी किस्मत मुझसे मुंह मोड़ चली

दो राहें थी,

इक घर को

इक सपनों की ओर चली


था कठिन समय वह निर्णय का

सब कुछ उस पर था टिका हुआ

उस ईश्वर से आस

उसी के आगे सिर था झुका हुआ

क्षण भर को राह वही देखी

जिस पर से मैं हो आया था

शून्य से लेकर शिखर

आज मैंने ख़ुद को पहुँँचाया था

बचपन को एक बार सोचा

स्मृति मुझको झकझोर चली

दो राहें थी,

इक घर को

इक सपनों की ओर चली


बचपन में जो भी सोचा था

वह आज पूर्ण हो आया था

सपनों वाली राह पे अपनी

आगे ख़ूब निकल आया था

न हो विस्मृत कोई,

न तप, न प्रयास किसी का

धन्य है जीवन यह जिससे

यह जीवन है मात्र उसी का

माँँ की ममता करके

मुझको भाव विभोर चली

दो राहें थी,

इक घर को

इक सपनों की ओर चली


सबकी उम्मीदें पूर्ण हुई

सपने सबके साकार हुए

ईश्वर के मुझपर

अविस्मरणीय उपकार हुए

सबको खुश करने का सपना

मेरा बचपन से था

कुछ करने का एक जुनून

सिर पर मेरे छुटपन से था

सबकी ममता सपनों को करके

मेरे कमज़ोर चली

दो राहें थी,

इक घर को

इक सपनों की ओर चली


लौटा आज स्वयं

मैं फिर बचपन की हरियाली में

चेहरे को छूती थीं

बूंदे काली घटा निराली में

इक लंबी अवधि बीत गयी

जब माँ ने ख़ूब खिलाया था

आँचल से ढककर लोरी गाकर

गोदी में हमें सुलाया था

माँँ की लोरी

फिर से कानों में करके शोर चली

दो राहें थी,

इक घर को

इक सपनों की ओर चली...।


Rate this content
Log in

More hindi poem from Abhishek shukla

Similar hindi poem from Drama