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Ashok Patel

Drama


3.4  

Ashok Patel

Drama


फिर नया एक ख्वाब लिखता हूँ

फिर नया एक ख्वाब लिखता हूँ

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अपने आंसू, गम, जज़्बात लिखता हूँ

पसंद नहीं फिर भी वो बात लिखता हूँ।

टूट जाता है ख्वाब मेरा जब भी

फिर से नया एक ख्वाब लिखता हूँ ।



मन में जो उठती हैं अनकही बातें

वही सारे अल्फाज़ लिखता हूँ।

चोट खाकर ही पत्थर तराशें गए

आज फिर से वही मिशाल लिखता हूँ ।


जो लोग अच्छाई के नकाब में होते हैं

उनकी असलियत कई बार लिखता हूँ ।

अक्सर मेरी रातें यूं ही गुजर जाती है

जब कभी अपना अलग मिज़ाज़ लिखता हूँ।


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