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deepak mahlinda

Drama


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deepak mahlinda

Drama


अमृत धारा

अमृत धारा

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नदी को बहते देखा है ?

पीयूष श्रोत सी जल-धारा !


गंगा, यमुना, सरस्वती की,

संस्कृति याद दिलाती है,

नवजीवन की श्रोत है यह,

नयी राह दिखलाती है ।


जीवन के कौतूहल में भी,

अविरल बहती जाती है,

नदी है समस्त प्राणी की जननी,

फिर भी मैली हो जाती है ।


पशु-पक्षी हो या मानव जीवन,

सबकी जीवन प्रदायनी है,

देती अनुराग सभी को

जीवन आनंदीत कर देती है ।


धड़ती है विकराल रूप यह,

जीर्ण-शीर्ण कर देती है,

जननी है यह जीवन की धारा,

जीवन का उद्देश्य बताती है ।


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