STORYMIRROR

Anita Sharma

Abstract

3  

Anita Sharma

Abstract

ज़िन्दगी की उधेड़बुन

ज़िन्दगी की उधेड़बुन

1 min
192

जैसे मनः स्थिति का सूक्ष्म निरीक्षण 

नित उठते भावों के झंझावत 

फिर होता परिस्थिति का परीक्षण 

कभी सरल कभी विषम उलझन 

बूझता पहेली मानुष हर कदम 

कटु यथार्थ से रोज़ टकराते 

संघर्षों और विरोधाभासों से खेलते 

समेटते हुए वजूद अपना 

लड़ रहा मनुष्य हर क्षण 

व्यस्त और मस्त है फिर भी 

सुलझाने ज़िन्दगी की उधेड़बुन



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract