रोने की जगह
रोने की जगह
हर घर में
रोने को एक कमरा होना चाहिए
जहाँ सिसकती रूहों पर
पेचीदा सवालों की बारिश न हो
न कोई हमदर्द
झुके कंधों पर अपने मुलायम हाथ रखे
उस कमरे के पायदान पर
ज़माने के सब उसूल छोड़कर
कोई हारता हुआ बुझदिल
ठहर सके दिनभर
कराह सके
याद करके वस्ल के हसीं लम्हे
या किसी मेहरम का
सिकुड़ा चेहरा, मूँदी आँखें
उस कमरे के बाहर
कोई चाय की प्याली लिए
इंतज़ार में खड़ा न हो
किसी की हड़बड़ी में आस्तीनों से मली आँखों
वाले चेहरे पर
मुश्किलों से उभरी मुस्कुराहट देखने को
हमको तो फ़कत फरमान यही चाहिए
हर घर में रोने को एक कमरा होना चाहिए।
