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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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लग रहा है

लग रहा है

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लग रहा है

सब मुझे ढूंढ रहे हैं

और मैं खो गया हूँ

चाँद भटक रहा है

सूरज बेचैन है

मुस्कराहट घूंघट से बाहर निकल रही है

जटिलता अपने बोझ से चटख रही है

पृथ्वी घूमते घूमते गुनगुना रही है

और माँ कह रही है

मैं तुम्हारी माँ हूँ पर

तुम्हारे लिये कुछ कर नहीं सकती

वो रहे तुम्हारे सपने

ये रहा समय

और ये रहा रास्ता

जाओ

जाओ तो चाँद का भटकना रुके

सूरज की बेचैनी थमे।


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