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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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चलते चलते

चलते चलते

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चलते चलते
तुम्हारा यूं मिलना
जैसे ये मृत्यु लोक नहीं
जीवन की उत्पति केंद्र है।
एक एहसास का उग़ आना
कि जीवन काल एक
अभेद्य किला है
समय इसमें अपने सिवाय
किसी और को आने नहीं देता।
 कितना सुन्दर लग रहा है
 इस शक्ति पर्व में हवा में ही
तुम्हारे नए रूप का अभ्युदय और
उसका संचालन
अदभुत हो मां ।
दुनिया अटकी हुई है तुम्हारे नौ रूपो में
और तुम एक नए रूप में
 जीवन के आस पास सक्रिय हो
संभालते हुए, संवारते हुए मुस्कराते हुए।


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