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Indraj Aamath

Abstract

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Indraj Aamath

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कल नीलम मिली भटिंडा से

कल नीलम मिली भटिंडा से

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सुबह सुबह नींद खुली तो देखा

आंगन में प्रेम पत्र टंगा हु़आ था,

कल की गुस्ताखियां से ये सजा

आज की प्रेम राह पर खड़ा था,


जीवन में कितना पंक्चुअल हूं मैं

हर दिन मुझे ये बतलाता है,

कल की कमियों का आइटम

बनकर मुझे क्यों ये डराता है ।


भट्टू से मेहसाना भर कर

ये रतनगढ़ से चला जाता है

जाने क्यों ये सूरतगढ भी

कोलायत में स्टेबल हो जाता है।


कल नीलम मिली भटिंडा से

फलौदी तक इसे पहुंचना था

जाट का पावर फेल हुवा तो

माथे पर बल पड़ जाना था


दिवाली पर क्रू की कमी से

सिरसा नही चल पाया था

हेडक्वार्टर की भरी सभा में

कत्ल मेरा उसने कराया था


रैक लिंक समझ में तो आ गया

डी-लिंक समझ नहीं आया था

इंटरचेंज फेलियर के डर से

मैं ढंग से सो नहीं पाया था


सरपट पथ पर चली ये सुंदरी

किसान से क्रॉसिंग कराया था

थक कर सोने वाले कर्मी को

सेफ्टी ड्राइव ने फिर जगाया था


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