गुजरा कल
गुजरा कल
गुजरा कल
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ऐसा नहीं था कि मैं
कभी किसी दर्द से गुजरा नहीं
हर ख्वाहिश हर वो स्वप्न
मेरा इम्तिहान ले रहे थे
गुजरा कल
कब आंखों के सामने
आ जाता है
फिर एक पल
तो ऐसे लगता है
कि जिंदगी लौट आई है
फिर जीवन में एक
गहरा सन्नाटा
जो दिनों दिन और
खामोशी को
आमंत्रित करता है
ऐसा नहीं था कि
खुशियों ने दस्तक
इस दरवाजे पर नहीं दी
पर उस गहरे सन्नाटे
के शोर में
वो आहट सुनाई नहीं दी
फिर से
जीवन में दस्तक
दे जाता है
वहीं अंधेरा
ओर गहरा सन्नाटा
आर एक खालीपन।

