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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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संवाद 3

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सुरेन्द्र कुमार सिंह चांस
 हम है तुम हो
 समय है
समय में हलचलें हैं
 समाचार हैं
आवाजें हैं
 कितना दिलचस्प है
 हमारा निजाम
एक आवाज का रहगुजर है
आगे आगे आवाज
पीछे पीछे निजाम
 संविधान अपनी जगह
मर्यादाएं अपनी जगह
 तरक्की अपनी जगह
आपस का प्रेम अपनी जगह
 और इनकी चित्रकारी गतिशील है
 लगता ही नहीं है कि
ये जो है
नहीं है
और जो नहीं है
 वो आवाज के अनुरूप दृश्यमान है।
 दिलचस्प तो है कि
 जो होना चाहिए
उसके निरूपण के विपरीत
 जो आभासी रूप में है
 उसके लिए निजाम का
 प्रतिपक्ष आंदोलित है
 जाहिर है जो होना चाहिए
वो विषय नहीं रहा।
हम है
 तुम हो
 और इस विडंबना की
शल्यचिकित्सा का औजार है हमारे पास
 पर कितने विभेद हैं हमारे तुम्हारे बीच
 उसकी आवाज में
मानो हम एक दूसरे के खून के प्यासे हैं
 और लगभग नित्य रक्त रंजीत होती है पृथ्वी
 और हमें गुनाहगार बनाने के लिए बाध्य हो तुम।
 कितनी कठिन समस्या है हमारे सामने
अपने को बेगुनाहगर साबित करें कि
 तुम्हे उन जंजीरों से मुक्त करे
जिनकी चर्चा मात्र से तुम डरते हो
 जिनकी चर्चा मात्र से तुम
आजाद हो सकते हो। क्रमशः ।


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