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Bhavna Thaker

Abstract

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Bhavna Thaker

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चलो प्रेम की जिह्वा में प्राण

चलो प्रेम की जिह्वा में प्राण

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कलयुग की क्षितिज पर बैठे दम तोड़ रहे प्रेम की जिह्वा में प्राण पूरे चलो,


पत्ता पीपल का पकने से पहले ही टूटकर शाख से जुदा न हो जाए कहीं...

प्रेम का समुन्दर पी ले चलो ईर्ष्या की धूप में सूख कर सहरा न हो जाए कहीं... 


किसी वीतरागी मन में मोहब्बत की मेहंदी रचे और,

नम आँखों से जुगलबंदी करते जब होंठों पर पड़ी उदासी खिल उठे 

तब समझ लेना प्रेम ने अपनी बाज़ी जीत ली है..


अस्त हो जाएगा गमगीन सूरज शाम होने से पहले 

तारे उग आएंगे रात होने से पहले..

पंछी लौट आएंगे शाम होने से पहले

 

ए कवियों लिखते रहना तुम प्रीत सभर शृंगार रस सजी कविताएँ 

ताकि मटमैले समय के बीच भी ज़िंदा रहे  हरी डाल पर बैठे पंछियों के बीच प्रेम,

और सुलगती रहे जवाँ दिलों के भीतर इश्क की चिंगारियां..

 

मैं अपनी यादों की लौ थोड़ी और तेज़ कर दूँगी,

मेरे माशूक तुम दौड़े चले आना उस दिन ढलते सूरज को साथ मिलकर अर्घ्य देंगे, 

आओगे न..


चलो साथ मिलकर सहज ले विलुप्त होते बिखर रही प्रेम की परिभाषा को।



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