रणभूमि और प्रतिष्ठा
रणभूमि और प्रतिष्ठा
तु स्थिर क्यों है, ये रण ही है, मेरी ना सुन कि मन हि है,
किसे किसे तू टालता है भूमि को निहारता।
है दूसरा विकल्प भी, समा के हो जा शून्य ही,
कि स्थिर रहे जो यूं तो नाश ही सही।
है मोह को भी क्या बचा, यूं जी के कौन कया रचा,
तो दर्द के हि साथ आज राह लो।
मुक्त ना हि मृत हुआ , ना मुक्त कोई जी रहा,
ना शान्त मुक्त कोइ मृत ना जीव है।
तो युद्ध को गुहार दो, कि मौत का प्रहार लो,
ये रण है इसमे खुद को तुम उतार लो।
हो जीत ही ये तय नहीं, हो हार इसका भय नहीं,
हो चोट बस उसे जो तुझको छू गया।
ना दुशमनो से फासले, ना रक्त की कमी करो,
वो रण हि क्या जो केशरी दिखे नहीं।
मलाल ना रहे कोई, ना चूक की कोई जगह,
वो दो जहां में हो कहीं, पहचानकर हलख से जां निकाल दो।
तो युद्ध को गुहार दो, कि मौत का प्रहार लो,
ये रण है इसमे खुद को तुम उतार लो।
ना शेष कुछ रहा तेरा, ना शेष अब उधर रहे,
हो खत्म उसके भाग का श्वास भी।
जो वार सख्त हो इधर, तो प्राण सख्त हो तेरी,
संकल्प तेरा अस्त्र तेरा शस्त्र भी।
हर ढाल उसकी चीर दे, ना पीछे मुण ना ढील दे,
दुहरा ना पाए कोइ फिर अतीत को।
जो मृत हुए तो मारकर, जो जी गए तो शान से
कि चैन है तभी जो सर उठा रहे।
तो शून्य रूप त्याग कर, व रूद्र रुप धार कर
विश से भी अब निचोण लो।
तो युद्ध को गुहार दो, कि मौत का प्रहार लो
ये रण है इसमें खुद को तुम उतार लो।
