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Sudha Adesh

Abstract

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Sudha Adesh

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गजल किसे कहते हैं

गजल किसे कहते हैं

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एक आवारा बादल 

अनंत आकाश में 

 विचरण करता हुआ 

जा पहुंचा 

द्वार पर प्रभु के 


बोला ,'हे प्रभु ,

शांत करो 

मेरी जिज्ञासा 

बताओ गजल 

किसे कहते हैं ?'


प्रभु ने 

चतुर्दिक दिशाओं में 

व्याप्त इंद्रधनुषी 

सौंदर्य को निहारा 

दर्पित हो 

मधुर मोहनी 


मुस्कान को 

छितरा कर 

लबों पर बोले ,' 

सृष्टि के 

अनुपम सौंदर्य से 


हर्षित या होकर व्यथित 

रचना हो जब 

किसी काव्य की 

तो कहलाती है 

वह गजल ।'


सृष्टि के 

अनुपम ,अलौकिक 

मनोहारी सौंदर्य को 

निहारते निहारते 

वह मनचला मेघ

 जा पहुंचा 


आलीशान महल में 

एक धनवान के 

हाथ जोड़ 

विनती कर बोला,

' हे मित्र ,

बताओ गजल 

किसे कहते हैं ?'


सेठ ने 

अपनी आलीशान 

मखमली कुर्सी पर 

बैठे बैठे 

मेवा ,मिष्ठान का 

लगाते हुए भोग

संतोष की ली सांस 


तृप्ति युक्त 

मुखारविंद से बोले ,

'सुख ,ऐश्वर्य ,

संतोष और शांति के 

आत्म सुख से 

निर्मित काव्य वंदना को 

कहते हैं गजल।'


सुख, ऐश्वर्य 

भोग विलास में 

लीन परिवार के संग 

बिताकर कुछ पल

वह आवारा बादल 

बाहर आया

तो निगाह पड़ी 

रमणीय उपवन में 

वृक्ष के निकट 


बैठे युगल जोड़े पर 

जाकर प्रश्न 

अपना दोहराया

सामने खड़ा देख 

युगल जोड़ा कसमसाया,

थोड़ा झल्लाया  

पर चेहरे पर 


टंगे प्रश्न को देख 

नम्र वाणी में बोला,

' प्रेमी या प्रेमिका की 

बेवफाई आग से 

पीड़ित हृदय की 

आह से कुंदन बन 

गढ़ी जाये जो माला

वह कहलाती है गजल।'


विभिन्न व्यक्तियों से 

एक ही प्रश्न का 

विभिन्न उत्तर सुन

असंतुष्ट मन से 

बेध्यानी, बेखबरी में

वह बावला मेघ

जा घुसा 


गरीब मजदूर की

 कुटिया में 

टूटी खिड़की की 

राह तले...।


प्रश्न सुनकर 

बेचारा निरीह प्राणी 

भूख गरीबी से त्रस्त 

जर्जर देह की 

उभर-उभर कर 


आती पसलियों को 

छुपाने की 

करते हुए चेष्टा बोला,

सुना था 

हसीना के हुस्न की 

तारीफ में 

गढ़ी जाती है 


जो माला या 

वक्त के निरंतर 

थपेड़ों से 

उत्पन्न हुए जख्म 

जब नासूर बन 

टपक -टपक कर 

बनाते हैं 


कागज के पन्नों पर 

खूबसूरत कसीदे

वह कहलाते हैं गजल 

किंतु भैया 

हमारे लिए तो 

दो वक्त की 

रोटी ही ग़ज़ल है 

दो वक्त की 

रोटी ही ग़ज़ल है।


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