STORYMIRROR

Sudha Adesh

Abstract

3  

Sudha Adesh

Abstract

आकांक्षा

आकांक्षा

1 min
267

निशीथ के गहन अंधकार में

अतीत की गहराइयों में डूबकर

न जाने क्यों 

हो रही हूँ व्यथित ?


अतीत...

नैराशय और व्यथा से पूर्ण

चाहती हूँ भुलाना

परन्तु असंभव

छलावा मात्र...


रह-रहकर मंडराना

मन-मस्तिष्क में

अनकही विवशता,बेचैनी...


न कब, किस घड़ी

अतीत को छोड़

अभिशपत, अग्नि दग्ध 

ह्रदय को

सावन की सुखद सलोनी

बूँदों से कर शीतल,


भविष्य के सुनहरे 

स्वप्नों की ओर 

हो पाऊँगी अग्रसर।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract